09/10/2024
*🙏🏻🙏🏻जय श्री सिया राम🙏🏻🙏🏻*
श्लोक ४५ - अध्याय - १
कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरिक्षण
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥
हा! शोक! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हो गए हैं ।
व्याख्या:
इस श्लोक में, अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा है कि अगर युद्ध में शस्त्रधारी लोग, यानी सेनापति, मेरी हत्या कर दें और मुझे प्रतिकार का कोई साधन न मिले, तब भी मेरे लिए यह अधिक कल्याणकारी होगा। अर्जुन का यह कहना है कि यदि उसका सामना शस्त्रधारी कौरवों से होता है और उसके पास आत्मरक्षा के लिए कोई भी उपाय नहीं होता, तो भी उसकी मृत्यु उसकी आत्मा की शांति के लिए लाभकारी होगी।
अर्जुन का यह भाव है कि यदि युद्ध में शस्त्रधारी कौरव उसकी रक्षा नहीं कर सकते और उसकी मृत्यु हो जाती है, तो यह उसके लिए एक सुरक्षित और उचित स्थिति होगी। यह श्लोक उस समय की मानसिक स्थिति को दर्शाता है जब अर्जुन युद्ध के दौरान अत्यंत असहज और निराश महसूस कर रहा है और उसकी स्थिति युद्ध करने के लिए अनुकूल नहीं लगती।
राघव धाम ट्रस्ट (पंजीकृत)
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