27/04/2022
मिशन लोकतंत्र-
लोकतंत्र की
स्थापना के चरण
लोकतंत्र में व्यवस्था का लोकतांत्रिकरण होना चाहिये यानि व्यवस्था को राजतंत्र में अपनाये जाने वाले दंड, निजीकरण, पूंजीवाद, टैक्स, नौकरी जैसे लक्षणों तथा कर्मफल की मान्यता के साथ किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने की मानसिकता से मुक्त होना ही होगा, क्योंकि यह सब तो अर्धसमझ की तानाशाही, मनमानी राजतांत्रिक व्यवस्था के तथ्य हैं, न की समझदारी की जनता की स्वयं की सभी का जीवन संरक्षण कर लोकहित करने वाली लोक हितकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के तथ्य।
इस प्रकार लोकतंत्र सदैव दंड, निजीकरण, पूंजीवाद, टैक्स, नौकरी को स्वीकारने वाली राजतांत्रिक मनमानी, तानाशाही व्यवस्था के लक्षणों तथा कर्मफल की मान्यता के साथ किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने की राजतांत्रिक अन्धविश्वासी मानसिकता से मुक्त ही होगा, अन्यथा लोकतंत्र के नाम पर चुनी हुई सरकार द्वारा यह सब स्वीकारने पर लोकतंत्र की स्थापना न होकर लोकतंत्र के स्थान पर छद्म लोकतंत्र एक अपराधी-तंत्र के रूप में स्थापित हो जायेगा और मूर्ख जनता इसी को लोकतंत्र समझने का भ्रम रखती रहेगी।
तानाशाही राजतंत्र से निकलने तथा लोकतंत्र की स्थापना के लिये चुनाव द्वारा सरकार बनाना लोकतंत्र स्थापित करने का पहला चरण तो हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की स्थापना होना नहीं होएगा। लोकतंत्र स्थापित करने के लिये चुनी हुई सरकार द्वारा व्यवस्था का लोकतांत्रिकरण कर सभी के जीवन को संरक्षित कर लोकहित करना सबसे पहली जरूरी संवैधानिक बाध्यता है यानि व्यवस्था को दंड, निजीकरण, पूंजीवाद, टैक्स, नौकरी की अमानवीयता तथा कर्मफल की मान्यता के साथ किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने की मनमानी, अव्यावाहारिक मानसिकता (राजतंत्र की तानाशाही व्यवस्था के प्रमुख लक्षणों को स्वीकारने वाली मानसिकता) से आजाद होना बहुत जरूरी है, इसके बिना लोकतंत्र स्थापित ही नहीं हो सकेगा और लोकतंत्र के स्थान पर छद्म लोकतंत्र एक अपराधी-तंत्र के रूप में स्थापित हो जायेगा और अर्धसमझ लोग इसी को लोकतंत्र समझने का भ्रम रखकर राजतंत्र से भी खतरनाक दुष्परिणाम पाते हुए बार बार चुनाव द्वारा दंड को विधि के रूप में स्वीकारने वाली अपराधी पार्टियों को चुनकर सत्ता में बैठाते हुए लोकतंत्र, संविधान, देश, मानवता एवं मानवजाति से छ्ल करते हुए देशद्रोह का महा अपराध करते रहेंगे।
लोकतांत्रिकरण का मतलब है व्यवस्था को दंड, निजीकरण, पूंजीवाद, टैक्स, नौकरी की अमानवीय व्यवस्था तथा कर्मफल की मान्यता को मानते हुए किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने की अवैज्ञानिक, अन्यायी, असुधारवादी मानसिकता से पूर्णतः आजाद कर सभी के जीवन को गरिमामय बनाते हुए संरक्षित कर लोकहित करना। यही असली आजादी यानि वास्तविक स्वतंत्रता को प्राप्त होना होगा, स्वराज्य स्थापित होना होगा।
यही होगी राजतंत्र के अर्धसमझ के मूर्खता-बदमाशी के मनोविकृत-अपराधी यानि अमानवीय, अन्यायी, अधार्मिक युग से निकलकर लोकतंत्र के समझदारी के कानून एवं न्याय के मानवीय, धार्मिक, न्यायिक युग में प्रवेश करने की अभूतपूर्व, अदभुत, चमत्कारी, क्रान्तिकारी युग परिवर्तन की घटना।
युगपरिवर्तन समय की माँग
-युगप्रवर्तक सूरजपाल 'बुध्दियोगी'
बुध्दियोग मार्ग (बौध्दिक-संतुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का समझदारी का मार्ग) अपनाऔ। धार्मिक, न्यायिक, सभ्य-विकसित, मानवीय, लोकतांत्रिक बनकर लोकतंत्र स्थापित करो।
--विश्व-व्यापी बुध्दियोग जनजागरण अभियान।
14-A, अशोक नगर,आगरा