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22/08/2026

अंग्रेज अफसर का सिर काटकर किले पर लटकाया! 🚩1857 की क्रांति की ज्वाला जब धधक रही थी, तब पाली के आउवा गाँव के शेर, ठाकुर ख...
10/02/2026

अंग्रेज अफसर का सिर काटकर किले पर लटकाया! 🚩
1857 की क्रांति की ज्वाला जब धधक रही थी, तब पाली के आउवा गाँव के शेर, ठाकुर खुशाल सिंह चंपावत ने अंग्रेजों को खुली चुनौती दी थी। यह कहानी है उस अदम्य साहस और स्वाभिमान की, जिसने फिरंगियों की नींद हराम कर दी थी।

दो बार चटाई धूल:
जोधपुर रियासत और अंग्रेजों की संयुक्त विशाल सेना को ठाकुर खुशाल सिंह ने एक बार नहीं, बल्कि दो बार करारी शिकस्त दी:
1.बिठौड़ा का युद्ध
2. चेलावास का युद्ध (जिसे 'गौरों और कालों का युद्ध' भी कहा जाता है)

इतिहास गवाह है:
इस संघर्ष में उन्होंने अंग्रेज पॉलिटिकल एजेंट 'मॉक मेसन' का सिर काटकर आउवा किले के मुख्य दरवाजे पर लटका दिया था। यह अंग्रेजों के अहंकार पर सबसे बड़ा प्रहार था।
मातृभूमि के ऐसे वीर सपूत और उनके बलिदान को हमारा शत-शत नमन! 🙏💐

इस वीर गाथा को अधिक से अधिक शेयर करें ताकि आज की पीढ़ी भी आउवा के इस संघर्ष को जान सके। 👇

हारते नहीं है,       डरते नहीं है बिना कारण किसी से        लड़ते नहीं है।क्षत्रियों से ईर्ष्या भाव रखने वालों आपको ज्ञात...
10/02/2026

हारते नहीं है,
डरते नहीं है
बिना कारण किसी से
लड़ते नहीं है।
क्षत्रियों से ईर्ष्या भाव रखने वालों आपको ज्ञात होना चाहिए की यह अखण्ड भूमि इन्हीं क्षत्रियों के लहू से एक - एक कण सिंचित किया हुआ हैं और इन्ही क्षत्राणीयों ने खुद तलवार पकडा़कर युध्द भूमि में अपने लाल, सुहाग, पिता, भाई भतीजे को उतारा है।

कभी खुद लड़़कर बलिदान हुई लेकिन अपनी मातृभूमि, स्वाभिमान, धर्म कुल की लाज न जाने दी सर कटवा लिए आँखें फुडवा ली, जौहर कर गई लेकिन कभी पीछे नहीं हटी कभी युध्द भूमि से भागे नही, शत्रु के सामने कभी घुटने नही टेंके, क्षत्रिय सत्योपासक होता है।

जय मां भवानी

#राजपूतानाशौर्यविरासत

मोदी बोले कि मैं ओबीसी हूँ किसी को कोई समस्या नहीं होती मोहन यादव कहते है कि मैं यादव हूँ किसी को कोई आपत्ति नहीं होती ह...
09/02/2026

मोदी बोले कि मैं ओबीसी हूँ
किसी को कोई समस्या नहीं होती
मोहन यादव कहते है कि मैं यादव हूँ
किसी को कोई आपत्ति नहीं होती है
रेखा गुप्ता कहती हैं कि मैं बनिया हूँ
किसी को कोई दिक्कत नहीं होती है
लेकिन आस्था सिंह ने कह दिया कि “ठाकुर हूँ मैं
सब को बड़ी समस्या हो गई

मेरी तो आस्था सिंह से ये शिकायत रहेगी कि मुँह तोड़ देना चाहिए था …और दूसरी बात जिसने भी आस्था सिंह के साथ बतमिजी की है बक्सा नहीं जाएगा घर में घुसकर दिनदहाड़े तोडूगा ध्यान रखना इस बात को बिल्कुल में गजराज सिंह राजपूत जिला सागर एमपी से हूं मैं भी ठाकुर हूं तन मन धन से साथ खड़ा हूं पूरी क्षत्रिय करणी सेना परिवार खड़ी हे

क्षत्रियअक्सर युद्ध में सामर्थ्य दिखाते रहे हैं, लेकिन वे वैदिक काल के बाद ब्राह्मणों के बाद दूसरे स्थान पर स्थापित हुए।...
09/02/2026

क्षत्रियअक्सर युद्ध में सामर्थ्य दिखाते रहे हैं, लेकिन वे वैदिक काल के बाद ब्राह्मणों के बाद दूसरे स्थान पर स्थापित हुए। आज के समय में क्षत्रिय केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के शिखर पर हैं।
क्षत्रिय -

"कल्ला रण में यूं लड़े, जैसे महाकाल का रूप।शीश कटे पर कम न हुई, राजपूती आन की धूप॥"जय मां भवानी 🙏
09/02/2026

"कल्ला रण में यूं लड़े, जैसे महाकाल का रूप।
शीश कटे पर कम न हुई, राजपूती आन की धूप॥"
जय मां भवानी 🙏

वीरों की भूमि राजस्थान! इस मानचित्र में राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों के महान योद्धाओं और शासकों को दर्शाया गया है। चाहे...
09/02/2026

वीरों की भूमि राजस्थान!
इस मानचित्र में राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों के महान योद्धाओं और शासकों को दर्शाया गया है। चाहे बप्पा रावल हों, राव बीका हों, या दुर्गादास राठौड़—हर किसी का इतिहास अद्वितीय है।

आप राजस्थान के किस क्षेत्र से आते हैं और आपके क्षेत्र के आराध्य वीर कौन हैं? कमेंट में जय माता दी लिखकर बताएं!🚩🚩🚩

यह रहा Facebook के लिए भावनात्मक, गर्व से भरा और वायरल-फ्रेंडली पोस्ट, जिसे पढ़कर लोग Like, Comment और Share करने को मजब...
09/02/2026

यह रहा Facebook के लिए भावनात्मक, गर्व से भरा और वायरल-फ्रेंडली पोस्ट, जिसे पढ़कर लोग Like, Comment और Share करने को मजबूर हों 👇
🔥 जैसलमेर का अर्द्ध साका (1550 ई.) – जब विश्वासघात के सामने भाटी वीर सिंह बनकर खड़े हुए 🔥
राजस्थान की मरुभूमि केवल रेत नहीं…
यहाँ विश्वास, बलिदान और वीरता इतिहास बनकर सांस लेते हैं।
1550 ई. में
काबुल–कंधार का भगोड़ा शासक अमीर अली खां,
जैसलमेर के महारावल लूणकरण भाटी की शरण में आया।
राजपूत धर्म निभाते हुए उसे शरण दी गई…
पर बदले में मिला घोर विश्वासघात।
29 अप्रैल 1550 की सुबह—
बेगमों की डोलियों के नाम पर
मुस्लिम सैनिक किले में घुसाए गए।
किले के द्वार खुले थे…
और षड्यंत्र अचानक युद्ध में बदल गया।
⚔️ राजपूतों को पहले से कुछ ज्ञात नहीं था
फिर भी वे पीछे नहीं हटे।
अन्त:पुर के द्वारपालों ने
रानियों के सतीत्व और सम्मान की रक्षा हेतु
अपने ही हाथों से उन्हें वीरगति दी।
💥 युद्ध भयानक था…
महारावल के भ्राता मंडलीक जी
हजार सैनिकों सहित वीरगति को प्राप्त हुए।
और तभी—
बाड़ी से आए कुंवर मालदेव भाटी
(महाराणा प्रताप के बहनोई)
खिड़की से किले पर चढ़े
और अली खां का वध कर दिया।
🔥 300 पठान किले के भीतर
🔥 200 बाहर मारे गए
⚔️ वीरगति पाने वाले भाटी योद्धा ⚔️
▪ मंडलीक जी
▪ प्रताप सिंह जी
▪ राजसिंह जी
▪ कुंवर हीरजी
▪ कुंवर हरदास
▪ दुरजनसाल जी
▪ सूरजमल जी
🧡 इस युद्ध में केसरिया तो हुआ,
पर जौहर नहीं हुआ—
इसीलिए इतिहास इसे
👉 “जैसलमेर का अर्द्ध साका” कहता है।
🙏 यह कहानी केवल इतिहास नहीं,
यह राजपूत स्वाभिमान, नारी सम्मान और धर्म की अमर गाथा है।
अगर आपको अपने पूर्वजों पर गर्व है—
तो इस वीरगाथा को Like 👍 | Comment ✍️ | Share 🔁 ज़रूर करें।









🚩 जब दो बादशाह मिलकर भी एक ‘हिंदुआ सूरज’ को नहीं डिगा पाए! ⚔️इतिहास गवाह है—मेवाड़ की मिट्टी में ऐसी तासीर थीकि वहाँ के ...
09/02/2026

🚩 जब दो बादशाह मिलकर भी एक ‘हिंदुआ सूरज’ को नहीं डिगा पाए! ⚔️
इतिहास गवाह है—
मेवाड़ की मिट्टी में ऐसी तासीर थी
कि वहाँ के एक योद्धा को हराने के लिए
दुश्मनों को गठबंधन बनाने पड़ते थे।
यह किस्सा है महाराणा कुंभा का—
वीरता, कूटनीति और रणनीति का बेजोड़ उदाहरण।
📜 आइए, जानें 1457 ई. के बदनोर युद्ध का सच
1️⃣ क्या थी ‘चंपानेर की संधि’ (1456 ई.)
जब मालवा का सुल्तान महमूद खिलजी
और गुजरात का सुल्तान कुतुबुद्दीन
अकेले-अकेले महाराणा कुंभा से कई बार पराजित हो चुके,
तो उन्होंने अहंकार एक तरफ रखा और 1456 में संधि की।
मकसद: मिलकर मेवाड़ पर हमला
लालच: जीत के बाद मेवाड़ को आधा–आधा बाँटना
2️⃣ रणभूमि: बदनोर (1457 ई.)
भारी लाव-लश्कर के साथ
दोनों सुल्तानों की संयुक्त सेनाएँ
मेवाड़ की ओर बढ़ीं।
उन्हें लगा—दो तरफ़ा हमले से कुंभा घुटने टेक देंगे।
पर वे भूल गए थे कि सामने
‘अभिनव भरताचार्य’ और ‘छाप गुरु’ महाराणा कुंभा खड़े हैं।
3️⃣ कुंभा की जीत: कारणों का विश्लेषण
यह विजय सिर्फ़ तलवार से नहीं,
कूटनीति और रणनीति से मिली—
🔹 बिखराव की नीति:
इतिहासकारों के अनुसार,
कुंभा ने युद्ध से पहले ही
दोनों सुल्तानों के बीच अविश्वास पैदा कर दिया।
🔹 त्वरित आक्रमण:
रक्षात्मक होने के बजाय
कुंभा ने आक्रामक रुख अपनाया और
बदनोर के पास दुश्मन को संभलने का मौका दिए बिना
उसे कुचल दिया।
परिणाम:
जिस मेवाड़ को बाँटने के सपने लेकर वे आए थे,
उन्हें अपनी जान बचाकर भागना पड़ा।
🏛️ निष्कर्ष
यह युद्ध साबित करता है—
“एक शेर, सौ लंगूरों पर भारी होता है।”
महाराणा कुंभा ने न सिर्फ़ युद्ध जीता,
बल्कि विजय के प्रतीक स्वरूप
‘कीर्ति स्तम्भ’ और ‘कुशाल माता मंदिर’ (बदनोर)
का निर्माण भी करवाया।
🙏 नमन है ऐसे महान योद्धा को!
👇 अगर यह गाथा आपके रगों में गर्व भर देती है
तो LIKE ❤️ | COMMENT ✍️ | SHARE 🔁 ज़रूर करें




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