01/07/2026
नाम बदल देने से या ऊंचा नाम रख देने से इतिहास नहीं बदलता, और
सम्मान भी नहीं मिलता।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि हमें किस नाम से बुलाया गया... और हमारा क्या काम था सवाल यह है कि क्या उस नाम ने हमें बराबरी, सम्मान और सत्ता में हिस्सेदारी दिलाई?
अगर किसी समाज को सदियों तक शिक्षा, जमीन, सम्मान और अवसरों से दूर रखा जाए... और फिर उसे एक मीठा नाम या ऊंचा नाम दे दिया जाए या ऊंचे नाम से पुकारा जाए कि अब सब ठीक है, तो क्या वे लोग बराबर हो जाएंगे जो जमीन से और कई प्रकार के संसाधनों से जो वंचित रहे क्या वह केवल नाम ऊंचा देने से या ऊंची पोस्ट देने से बराबर हो जाएंगे या हो गए अगर आज मुझे कोई राजपूत ठाकुर ब्राह्मण या कवि के नाम से पुकारे तो क्या मैं वास्तव में उन लोगों के पास पिछले हजारों सालों से जो व्यवस्थागत संपत्ति प्रॉपर्टी अधिकार इज्जत मिली है वह वह नाम बदलने से मिल जाएगी और अगर ऐसा हो रहा है या किसी को यह लगता है कि हां बदल जाएगी तो यह न्याय नहीं, बल्कि आपको गुमराह करने और आपको अपने अधिकारों से दूर करने का एक साजिश है ध्यान भटकाने की कोशिश है।
कई समाज के लोग जो ऊंचे ऊंचे नाम बताते हैं शान शौकत बताते हैं लेकिन वास्तव में क्या वह अन्य समाज के बराबर उनका नाम बदलने से दर्जा मिल गया ।।। गैर बराबरी समाप्त हो गई ।।।
यही वजह थी कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने दया नहीं, अधिकार मांगे। उन्होंने हमें सिखाया कि समाज का उत्थान सहानुभूति से नहीं, बल्कि शिक्षा, संगठन और संघर्ष से होगा।
आज भी खुद से एक सवाल पूछिए—
क्या हमें ऐसा नाम चाहिए जो हमारी पहचान किसी और की दया से तय करे...
या
ऐसी पहचान चाहिए जो हमारे संविधान, हमारे अधिकार और हमारे आत्मसम्मान से बने?
याद रखिए...
सम्मान कभी उपहार में नहीं मिलता, उसे अधिकार बनाकर हासिल करना पड़ता है।
हमारी लड़ाई किसी शब्द से नहीं, समानता, न्याय, शिक्षा और सत्ता में बराबर की भागीदारी की लड़ाई है। ना कि ऊंचे नाम पद और झूठी आन बान शान की है ।।
जय भीम! जय संविधान!
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