28/05/2021
कोरोना काल की दूसरी लहर में प्राणवायु की किल्लत की विकट समस्या से निपटने के लिए भारतीय रेल ने एक अत्यंत सराहनीय कदम उठाया और ऑक्सीजन एक्सप्रेस नामक मालगाड़ी को ग्रीन कॉरिडोर में यानि सर्वोच्च प्राथमिकता वाली ट्रेन बनाकर चलाने का फैसला किया।
जैसा कि आपको पता ही होगा कि कोई भी वाहन चाहे वो रिक्शा हो या हवाई जहाज, बिना चालक के नहीं चल या दौड़ सकता। और जब बात सर्वोच्च प्राथमिकता की हो, तो आप ये अंदाज़ा लगा ही सकते हैं कि इसके चालक को कितना सजग, सतर्क, तेज़, चुस्त और चौकन्ना होना अतिआवश्यक है। किंतु इन सभी विशेषताओं के इतर कुछ विशेषताएं और हैं जिनका ज़िक्र न तो रेलवे करता है और न ही कोई जानता है वो विशेषताएं निम्न प्रकार से हैं -
1. ऑक्सीजन एक्सप्रेस के लोको पायलट को 6 से 8 घण्टे तक एकाग्रता रखना आना चाहिए, क्योंकि इसे विज्ञान भी नकारता है, कि एक व्यक्ति 4 घण्टे से ज्यादा एक जगह ध्यान नहीं लगा सकता, तू हुआ न हमारा लोको पायलट सुपरमैन या कोई योगी।
2. ऑक्सीजन एक्सप्रेस के लोको पायलट को 6 से 8 घण्टे भूखा रहना आना चाहिए, क्योंकि ये ट्रैन कहीं नहीं रुकती है, सिवाय क्रू बदली होने के, देखा लोको पायलट का नियंत्रण अपनी इन्द्रियों पर, तो क्या इन्हें योगी की उपाधि से नवाज़ा नहीं जाना चाहिए।
3. बिना ऑटो पायलट मोड के ट्रैन को अधिकतम गति पर बनाये रखने की कला, हालांकि ये कौशल लगभग सभी लोको पायलट में हैं, किन्तु कुछ देर की बात हो तो ठीक है, परन्तु 6 से 8 घण्टा अधिकतम गति पर बनाये रखने से लोको पायलट के दिमाग का वही हाल होता है, जो आपका एक पानी से भरे गिलास को निरन्तर सीधा हाथ करके 6 से 8 घण्टे में हो सकता है। आप खुद समझदार हैं अंदाज़ा लगा लीजियेगा।
4. ऑक्सीजन एक्सप्रेस के लोको पायलट को एक अद्वितीय, अनोखे, अप्राकृतिक, अतुलनीय, आलौकिक, अपरिमित, और अचंभित कर देने वाले हुनर से परिपूर्ण होना अत्यंत ही आवश्यक है और वो है किसी बोतल या थैली में लघु शंका से निवृत्त होना। हालांकि ये सुनने में आपको अजीबो गरीब लग सकता है किंतु ये सत्य है और वो भी चलती ट्रेन के केबिन में अपने सहयोगियों के सामने। क्यों है ना ये कला दूसरी दुनिया की। क्योंकि ट्रैन तो अब रुकेगी नहीं। शुरू हुई तो सीधा 300 से 400 किमी पर ही रुकेगी 6 से 8 घण्टे बाद। और जो लोको पायलट ये कला को निभाने में अक्षम रह जाते हैं उन्हें फिर किया जाता है प्रताड़ित अलग अलग तरीकों से, जैसे आप स्टेटमेंट लिखकर दो कि इतने सेकंड या मिनट कहाँ खराब कर दिए, कैसे कर दिये, क्यों कर दिए, कब कर दिए, जवाब प्रशासनानुसार हो तो ठीक अन्यथा तुम आ जाओ ससपेंड होकर साहेब से मिलने, बताते हैं तुम्हे हम गाड़ी चलाना, हालांकि वहाँ गाड़ी चलाना सिखाने के अलावा सब कुछ सिखाया जाता है जैसे गालियाँ कैसे दी जाती हैं, ज़लील कैसे किया जाता है, मर्यादा का उल्लंघन कैसे किया जाता है, मानसिक ग़ुलामी को कैसे बरकरार रखा जाता है, डराया धमकाया कैसे जाता है, किसी की ज़िंदगी खराब कैसे की जाती है, किसी के स्वाभिमान को ठेस कैसे पहुँचायी जाती है, आदि। हाँ ट्रेन कैसे चलाई जाती है ये उन्हें भी नहीं पता होता है, क्योंकि ये सारी कलाएं उन्हें ही आती हैं जिन्हें ट्रैन चलानी नहीम आती।
खैर बातें बहुत हो गईं, अब चलते हैं सार की ओर और वो ये है कि हमारे रेल मंत्री को ये तक नही पता कि ट्रेन कैसे चलती है, यदि पता होता तो लोको पायलट का नाम और फ़ोटो चिपकाना नहीं भूलते। और यदि ये एक बार भी ऑक्सीजन एक्सप्रेस के इंजन में बैठ गए होते तो फिर ये ज़िन्दगी में कभी लोको पायलट के अलावा किसी को रेल कर्मचारी मानने में भी देर लगाते।
अंततः AILRSA अजमेर मंडल इस खबर की कड़ी निंदा करता है, और आप सभी लोको रनिंग स्टाफ से अपील करता है कि इस अतार्किक खबर का खंडन करें और रेल प्रशासन तक अपनी आवाज़ पहुंचाए कि साहेब ट्रेन चलाने वालों को भी कभी याद कर लिया करो, जय हमेशा ही सौतेला व्यवहार करते रहोगे।
और हाँ हमारी बातें समझ में न आ रही हों, या तकलीफ हो रही हो, तो इस खबर में प्रकाशित एक भी चेहरे को हमारे साथ एल बार 400 किमी के अनवरत सफर पर ज़रूर भेजें। फिर या तो ये कभी नहीं बोलेंगे कि हम ट्रेन चलाते हैं या फिर ये कभी ऐसी खबरों में अपनी तस्वीर देने में डरेंगे।
एक पीड़ित लोको पायलट
निवेदक
AILRSA अजमेर