Alirajpur District Administration

Alirajpur District Administration Alirajpur : a state of the Indian Union is a district of Madhya Pradesh
where Nature and Culture ar

अलीराजपुर जिले की आदिवासी संस्कृति एवं लोक कलाएँ:- आदिवासी अर्थात् आदि समय से यानि प्रारंभिक काल से जो लोग यहाँ निवास कर रहें वे ही आदिवासी कहलाते हैं, मतलब मानव के धरती पर जीवन के अस्तित्व के समय से लेकर आज पर्यन्त जो लोग चिरकाल से निवासरत् हैं, वे ही आदिवासी हैं। अब जहाँ तक इन लोगों की संस्कृति का प्रष्न हैं यह बहुत व्यापक व विस्तृत क्षेत्र हैं क्योंकि संस्कृति शब्द समाहित करता हैं, किसी भी समूद

ाय विषेष के संस्कारों, आदतों, रीति-रिवाजों, रस्मों, त्यौहारों, रहन-सहन, खान-पान, पहनावा, जीवन शैली आदि को शामिल किया जाता हैं। हमारे अलीराजपुर जिले में आदिवासी समूदाय मूख्यरूप से तीन वर्गों में विभाजित हैं- 1. भील, 2. भीलाला, 3. पटलिया इनमेें कमोबेष भीलाला व पटलिया समूदाय के लोग अधिक उन्नत षिक्षित व साधन सम्पन्न होकर विकसित हैं, वहीं भील समूदाय के लोग अभी भी पिछड़े हुएँ हैं, इसके अनेक कारण हैं, परन्तु आदिवासी अपनी अलग ही पहचान रखते हैं। आम आदिवासी बहुत अधिक श्रमषील, अभिमानी स्पष्टवादि व भोले-भाले होते हैं। खेती व मेहनत मजदूरी कर अपने लालन-पालन करते हैं। आमतोर पर आदिवासी बनावटी नहीं होते हैं, वे जो बहार होते हैं, वैसे ही अन्दर होते हैं। वैसे आदिवासी संयुक्त परिवारोें में ही विष्वास करते हैं व संयुक्त रूप में ही रहते हैं, जहाँ एक-एक घर में 20 से 25 व्यक्ति तक आसानी से निवास करते है। आदिवासियों का जीवन बहुत सरल व सहज होता हैं, इनकी आवष्यकताएँ भी सीमित हैं। इनके घर फलियों में होते हैं, फलिया जिसे मोहल्ला भी नाम दिया जा सकता हैं, जो ग्राम की महत्वपूर्ण ईकाई होता हैं, ऐसे कई फलियों से मिलकर एक ग्राम होता हैं, ये फलिये पाँच किलोमीटर की दूरी में भी हो सकते हैं ओर ऐसे सभी फलियों में औसतन 25 से 50 घर हो सकते हैं आमतोर पर किसी भी ग्राम में 10 फलिये तो होते ही हैं परन्तु कहीं-कहीं पर इसका विस्तार 20 फलियों तक हो जाता हैं। सामान्यतः आदिवासियों के घर कच्चे बाँस-बल्लियों व मिट्टी के ही बने होते हैं, परन्तु अब आधुनिकता के चलते तथा शासकीय योजनाओं से आई आर्थिक समृद्वता से अब गाँवों में आर.सी.सी.के. पक्के मकान व हवेलियाँ भी अब तेजी से बन रहीं हैं। आदिवासियों के मुख्य त्यौहार भगोरिया, इन्द, चोदस, गलबाबजी, गाता स्थापना, दिवासा, फसल कटाई पर नवाई त्योहार, बाबादेव का पुजन, पाटला पुजन आदि होते हैं। वैसे ये लोग प्रमुख हिन्दू त्योहार होली, दिवाली, रक्षाबन्धन आदि भी बहुत उल्लास से मनाते हैं। रंगगुलाल होली भी खुब खेलते हैं, दिपावली पर पटाखें भी खुब फोड़ते हैं। आदिवासियों में विवाह युवक-युवतिंयों के आपसी रजामंदी के आधार पर जाति समाज पंचायतों द्वारा तय किये जाते हैं, जिसमें वर पक्ष को वधू के परिवार जनों को वधू मूल्य देना आवष्यक होता हैं, यह स्थापित रिवाज़ हैं, जिसे दापा भी कहा जाता हैं, इसमें 1000 रूपये से लेकर 50000 रूपये नगद, चांदी के गहनें, बकरे, अनाज शामिल होते हैं, इसे देने के बाद ही विवाह सम्पन्न होता हैं। किसी भी व्यक्तिगत व पारिवारिक आयोजन में बकरा मारना अनिवार्य होता हैं, साथ ही रातभर खुब नाचना-गाना भी होता है तथा आग्रह पूर्वक पीने-पीलाने का दोर भी चलता हैं। आदिवासी लोग अच्छे मेहमान नवाज़ भी होते हैं वहीं सुख-दूःख में भी परस्पर सहयोगी होते हैं। किसी व्यक्ति की मृत्यु पर अंत्येष्टि कार्यक्रम पर दूर-दराज ग्रामों से लोग लकड़े देने आते हैं व शोक सन्तप्त परिवार को अपनी सांत्वना प्रदान करते हैं। आदिवासी लोग जन्म-जात कलाकार होते हैं। अपने रहने के मकान से लेकर खेत-खलिहान तक का सारा कार्य, अपने जीवन उपयोग के खाट, पंलग, कोठियां आदि खुद ही बना लेते हैं फिर भी आदिवासी लोगों में कुछ कलाएँ खास हैं, जो लोक कलाओं के रूप में ख्यात हैं, जिनमें महत्पूर्व हैं- पिथौरा (पिठोरा) कला, बाँस कला, उन से निर्मित वस्तुओं की कला, काष्ठ कला, माटी कला आदि इनमें पिथौरा कला महत्पूर्ण हैं, जिसमें आदिवासी लोग अपने घरों पर भित्ति चित्रों को उकेरते हैं, जिनमें जंगली जानवरों देवी-देवताओं आदि के चित्र होते हैं, इसके पीछे मंषा यही होती हैं कि ईष्वर हमारी रक्षा करें व हमें सम्पन्न्ता प्रदान करें। बाँस कला में बहुत ही कलात्मक वस्तुएँ, बांसुरी, डलियां, टोकनी, झाडू, पर्स इत्यादि बहुत सी वस्तुएँ बनाई इनके द्वारा बनाई जाती हैं। इसके साथ ही उन से निर्मित वस्तुओं से भी महत्पूर्ण चीजें तैयार की जाती हैं, इनमें कमर का घंुघरू वाला लटकता कन्दौरा, सिर की चैमोल, सिर पर महिलाओं द्वारा बांधी जाने वाली डोरी, नाचने का वागरा आदि बहुत सी चीजें बनाई जाती हैं। इसी प्रकार लकड़ी व मिट्टी से भी बहुत कलाल्मक वस्तुएँ व मूर्तियाँ आदि भी आदिवासियाँ द्वारा बेहतर ढं़ग से बनाई जाती हैं। आदिवासियों द्वारा अपने जीवन यापन की वस्तुएँ साप्ताहिक रूप में हाट बाजारों में खरीदी जाती हैं। आदिवासी समाज में प्रत्येक वर्ग की अपनी जाति पंचायत होती हैं, लग-भग प्रत्येक ग्राम में यह होती हैं। ग्राम का पटेल, तड़वी, पुजारा आदि का मुख्य रोल होता हैं, जो आपसी जगड़ों, विवादों व षिकायतों का निराकरण करतें हैं, इनका निर्णय प्रायः मान्य ही होता हैं। वैसे आदिवासी संस्कृति व कला को अक्षुण्ण रखने के लिए सरकार को विषेष प्रयास करना चाहिए कारण बदलते हुए आधुनिकता के दोर व आदिवासियों में षिक्षा के जमकर प्रचार-प्रसार व लाभान्विती के चलते अब पारंपरिक लोक कलाएँ विलुप्त सी होती जा रहीं हैं। आज आदिवासी वर्ग काफी सम्पन्न होता चला हैं। प्रायः गाँवों में चार पहिया वाहन (जीप-कार) एवं टैªक्टर तो आम बात हो चली हैं। बीते दषकों से सतत् विभिन्न शासकीय आर्थिक योजनाओं के दरिये आदिवासियों में काफी तेजी से आर्थिक सम्पन्नता आती जा रहीं हैं ओर अब ये अपने पारंपरिक खेती के धंधें के अलावा भी अन्य कई तरह के व्यवसायिक कार्य भी करने लगे हैं। आदिवासियों बस एक कमी खलती हैं वह है उनके स्वभाव की उग्रता किसी भी छोटी सी बात पर तेजी से आवेषित होकर क्रोध में बड़े से बड़ा जघन्य अपराध, हत्या आदि भी करना आम बात हैं, ये बहुत बड़ी कमी हैं जिसे समाज के प्रबुद्व लोगों को आगे आकर अपने समूदाय के लोगों को सतत् समझाईष देकर इन उग्र स्वभावगत आदतों को त्यागने के लिए तैयार करना होगा अन्यथा जिले का जो इस समूदाय का आपसी आपराधिक इतिहास व रेकार्ड हैं वह यूँ ही जारी रहेगा। उसके लिए शासकीय प्रयास नाकाफी हैं।

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