10/04/2018
नमस्कार🙏
मैं एक एसएससी CGL स्टूडेन्ट, 2 कड़ोर स्टूडेंट्स हर साल एसएससी के अलग-अलग परीक्षाओं में सम्मिलित होते हैं, कोई भी एक नाम चुन लीजिये, मैं वो हुँ। 2016 में हमारा एग्जाम डिजिटल हो गया, पूरा इंडिया हो रहा था सो ये भी हो गया। हमने सोचा गोले भरने से निजात मिलेगी। परीक्षा के आआख़िरी 20 मिनट हम गोले भरने के लिए सुरक्षित रखते थे, अब उन 20 मिनटों में कुछ स्कोर करेंगे।
पर हुआ कुछ ऐसा कि डिजिटल इण्डिया का फायदा उन लोगों को मिला जो समाज के अगड़े थे, पैसे वाले। किसी भी "डेवलपमेंट" का फायदा यही ले जाते हैं। कम्प्यूटर हैक होने लगे, सेंटर मैनेज होने लगे, रुट एक्सेस नाम के एक डिजिटल दैत्य से हमारा सामना हुआ जो हमारे भविष्य को निगल लिए जाता था। हम औऱ हमारे आस-पास के साथी, जो मेन्स में 2-4 नम्बरों से रह जाते थे, अब पीटी में छटने लगे। पहले मुझे लगा ये बस हमारा हाल है। डिजिटल इण्डिया के माध्यम से ही पता चला पूरे देश के योग्य युवा की फौज बन गई है। जिनका सेलेक्सन हो रहा था वो हमारी कक्षा के सबसे आखिरी बेंच पर बैठने वाले वो छात्र थे जिनको हमारे टीचर्स ने कभी किसी सवाल का जवाब ने दे पाने के लिए हमेशा से योग्य मान कर नज़रंदाज़ कर दिया था। वही छात्र सेलेक्ट किये जा रहे थे जो स्कूल के एग्जाम अपने मम्मी-पापा के रिक्वेस्ट से क्लास में प्रोमोट होते रहे थे, बोर्ड में मैनेज किये गए थे। आखिर में वही छात्र अपने मम्मी-पापा के पैसों के दम पर एसएससी में भी मैनेज कर लिए गए।
हमेशा से क्लास के अगले बेंच पर बैठने वाले, हम स्टूडेन्ट अचानक से जिंदगी की दौर में आख़िरी कतार में खड़े कर दिए गए।
गलती किसकी थी, हमने R S अग्रवाल को गीता की तरह पढा था। किरण के मैथ्स/इंग्लिश के प्रीवियस ईयर 3 दफा खत्म कर दिए थे। राकेश यादव सर के मैथ्स की बुक के सवाल पेज नम्बर सहित छप गए थे दिमाग पर। हम स्टूडेंट्स जिस नम्बर पर मेन्स में कुछ नम्बर से छट जाते थे अब उस से बेहतर नम्बर लाने पर भी 10-12 नम्बर से छटने लगे थे।
गलती किसकी थी? डिजिटल इण्डिया के पहले साल 2016 में हमे पता ही नही चला हो क्या गया हमारे साथ। 2017 मे हुए परीक्षाओं में चीजें स्पष्ट होने लगी। हमारे भविष्य के साथ खेलने वालों की बढ़ी हिम्मत ने इनसे कई गलतियां करवाई। हमें सैकड़ो सुबूत मिले। हम उन सुबूतों को लेकर एसएससी ऑफिस तक गए। हमारे सुबूतों को गलत बता दिया गया। हमारे सारे सुबूतों को सिरे से खारिज कर दिया गया और जारी धांधली को "टेक्निकल ग्लिच" बता कर पल्ला साफ कर लिया उन लोगो ने जो पद पर इसलिए बिठाए गए थे कि योग्य छात्रों का इस्तेमाल राष्ट्र निर्माण में कर सकें। पर उनके "कोर्स ऑफ एक्शन" ने उनकी स्थिति को संदेहास्पद बना दिया।
हम वहीं बैठ गए, धरने पर, CGO में, 27 फरबरी को। पहले दिन हम संख्या में कम थे तो पुलिस ने हमे वहाँ से हटा दिया।
अगले दिन हम संख्या में बड़े हुए तो टिके रहे। हमने सिस्टम की चिन्ता बढ़ा दी। जिन लोगो ने हमे नकारा था अब वो हमारे खिलाफ साजिश करने लगे। फिर भी हम जमे रहे।
प्रेसर, गुटों के खेल, अंदरूनी फूट करवाना... आदि सबके नज़र में आता रहा मैं उसकी बात नही करूँगा। ये सबको पता है।
अब खेल शुरू किए गए। दिन को हमारी संख्या ज्यादा होती थी तो उस वक्त हम सेफ होते थे, पर रात को हमे धमकाने गुण्डे आने लगे। शुरू में हमे पता नही चला कौन हैं ये लोग। धीरे धीरे हम इन्हें पहचानने लगे। ये लोग हमारे साथ CGO में भीड़ के साथ चुपचाप बैठे होते थे। रात को यही छात्र हमारे खिलाफ हो जाते थे, चाहते थे हम अपना प्रोटेस्ट खत्म कर दें।
क्यों कर दें?? हमारे डिमांड्स का क्या? क्यों हमारे साथ सिस्टम के सारे पॉवर और पॉलिटिक्स के सारे पैंतरे इस्तेमाल किये जा रहे थे जब हम एक छोटी से डिमाण्ड, CBI इन्क्वायरी के लिए बैठे थे।
आप सही हो तो ये बात CBI इन्क्वायरी के रिपोर्ट के रूप में हमारे सामने आबे दीजिये न!! क्या दिक्कत है?
पर नही, वो नही माने, हमने भी नही मानी हार।
एक ग्रुप NSUI का, हमारे प्रोटेस्ट में चुपके से घुल गया। 16 मार्च को, निर्णायक दिन को उन्होंने हमारा एक बड़ा नुकसान कर दिया। हमारे छात्र प्रतिनिधि को धमका कर वहाँ से निकाल दिया NSUI वालों ने। उन्होंने अपना प्रतिनिधि भेजा, जो अंदर गई तो हमारे उम्मीद लेकर गई थी। वापस आई तो उन्होंने आश्वासन दिया सारे डिमांड्स मान लिए गए हैं। हम खुश हुए। पर हमारी खुशी कुछ घन्टो की थी। एसएससी ने कोई भी नोटिफिकेशन नही दिया जिस नोटिफिकेशन की बात हमारे प्रतिनिधि ने की थी।
हमने 31 मार्च को "हल्ला बोल" करने का निश्चय किया। निर्धारित डेट पर हम पार्लियामेंट स्ट्रीट पर एकत्रित हुए। पर, फिर से NSUI के गुण्डे आ गए, हमारा स्टेज खराब किया, हम स्टूडेंट्स के साथ धक्का मुक्की की, जबरदस्ती हमे मार्च पर ले गई और पुलिस से पिटवा कर गायब हो गए।
कुछ गलती हमारी थी। हमने सोचा प्रोटेस्ट है, हम पर हमले सिस्टम के ही होंगे। यहाँ हम चूक गए। हमले उन पोलिटिकल इनट्रेस्ट वाले ग्रुप की भी हुई जो हमारे हक की लड़ाई में अपना पोलिटिकल हित साधना चाह रहे थे।
अब, हम फिर एकत्रित हो रहे हैं और हम पर हमले तेज हो गए हैं। हमारी पहचान की जा रही है। हमे ट्रेस किया जा रहा है। हमे धमकाया जा रहा है। हमारे जो साथी इनके ट्रेस में हैं उनपर हमले किये जा रहे हैं।
हमारे इनबॉक्स को गालियों और धमकियों से भरा जा रहा है। हमारे ग्रुप को तोड़ने की साजिश की जा रही है। हमारे साथियों के खिलाफ गलत प्रचार किया जा रहा है। गलत तथ्यों के साथ स्क्रीन शॉट्स वायरल किये जा रहे हैं।
क्यों कर रहे हो भाई तुम, स्टूडेंट ही हो तुम भी। हमारी तरह।
रोज रात को अपना वजूद और अपना हक बचाने के लिए तुमसे लड़ता हुँ। तुम्हारी धमकियां, गालियां सुनता/सहता हुँ। रात को सोने से पहले तुमसे हुई लड़ाई दिमाग के दीवारों पर लाल रंग छाप देती है। सुबह जागने के बाद जब आईना देखता हूँ तो दिमाग मे उस रंग की एक परत बची होती है, पर सुकून होता है जब उस आईने में खुद को पाता हूँ, पहचान लेता हूँ खुद को।
तुमसे लड़ते हुए भूल गया मैं कौन था। मैं आज जो भी कर रहा हूँ ये मेरा काम नही होता था। हमारी दुनिया किताबो में थी। हमे सरकारी होब्स चाहिए और तुम्हे पॉलिटिक्स में जाना है। हमारे रास्ते अलग हैं। तुम क्यों हमारे हक की आहुति देना चाहते हो??
स्टूडेंट्स हैं हम तुम्हारे तरह ही। डायन भी 7 घर छोड़ कर शिकार करती है।
जो स्टूडेंट्स प्रोटेस्ट कर रहे हैं वो इसलिए कर रहे हैं क्योंकि गरीब हैं। खरीद नही सकते नौकरी और उनके पास तुम्हारी तरह 10 ऑप्शन नही हैं। उनका फ्यूचर बस सरकारी नौकरी है।
ये अगर सफल होते हैं तो इन 2 करोड़ छात्रों में से कम से कम 20-30 हज़ार योग्य छात्र हर साल अपना भविष्य सवार सकेंगे और देश का भी।
अगर प्रोटेस्ट नाकाम हुआ तो NSUI के 2-4 लोग जरूर पॉलिटिक्स में आ जाएंगे। बहुत आसान मैथ है, 20-30 हज़ार के बदले 2-4... बड़ा हित किसका है?
हम पर हमले बन्द कीजिये!!!
जेन्युइन डिमांड्स हैं साहब हमारी, हमे लड़ने दीजिये। आप कही भी अपने ग्राउंड तलाश कर सकते हो, दिल्ली राजनीति के लिए बहुत उपजाऊ है। आपको मिल ही जाएगा कुछ न कुछ। हमे छोड़ दीजिए आप, अलग हो जाइए हमारे प्रोटेस्ट से कि जो एनर्जी हम आपके ताकत को रोकने में व्यर्थ करते हैं उसे एकत्रित कर के सिस्टम के खिलाफ इस्तेमाल कर सकें🙏🙏🙏
प्लीज़!!