28/04/2026
दैनिक भास्कर बिका हुआ समाचार पत्र है ? जो सबसे पहले बिक चुका था भाजपा के हाथों उसकी कुछ फोटो में शेयर कर रहा हूं इसकी विश्वसनीयता ही समाप्त है?
और बसपा नेता ने पहले भी मांग किया है की चुनावी सर्वे को बंद किया जाना चाहिए लेकिन चुनाव आयोग और सरकार यह सुनने को तैयार नहीं है क्योंकि सत्ता का संरक्षण प्राप्त है और इनको फंडिंग भी हो रही है।
दैनिक समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती है। जब कोई बड़ा मीडिया संस्थान—जैसे दैनिक भास्कर—चुनावी सर्वे या राजनीतिक आकलन प्रस्तुत करता है, तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह तथ्यों, संतुलन और निष्पक्षता पर आधारित होगा। लेकिन हाल के सर्वे को लेकर जिस तरह के सवाल उठ रहे हैं, वह मीडिया की भूमिका और उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर बहस की मांग करता है।
सर्वे और उसके निष्कर्ष
हालिया सर्वे में भारतीय जनता पार्टी को अत्यधिक मजबूत और बाकी लगभग सभी दलों को कमजोर या समाप्तप्राय दिखाया गया। यह चित्रण स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है, क्योंकि भारत की राजनीति बहुदलीय संरचना पर आधारित है, जहां क्षेत्रीय दलों की भी मजबूत पकड़ है।
उदाहरण के लिए, मायावती की पार्टी बसपा और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में अब भी प्रभावशाली जनाधार रखती हैं।
2014 के संदर्भ और पुराने विज्ञापन
आपके द्वारा साझा की गई तस्वीरें 2014 के आसपास के विज्ञापन अभियानों की ओर इशारा करती हैं। उस समय मीडिया संस्थानों ने अलग-अलग राजनीतिक नारों और संदेशों के साथ खुद को प्रस्तुत किया।
“ना दलितों की सुनी, ना यादव की कही” या “ना माया का जाल, ना अखिलेश का क्लेश” जैसे वाक्य सिर्फ पत्रकारिता नहीं बल्कि एक तरह के राजनीतिक नैरेटिव का निर्माण करते दिखाई देते हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि मीडिया कभी-कभी खबर देने के बजाय माहौल बनाने का काम भी करता है।
निष्पक्षता पर उठते सवाल
जब एक ही मीडिया संस्थान पहले ऐसे राजनीतिक झुकाव वाले विज्ञापन देता दिखे और बाद में सर्वे में एक पक्ष को अत्यधिक मजबूत दिखाए, तो स्वाभाविक है कि उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठें।
यह जरूरी नहीं कि हर सर्वे गलत हो, लेकिन पारदर्शिता—जैसे सैंपल साइज, क्षेत्रीय वितरण, पद्धति—स्पष्ट न हो तो संदेह बढ़ता है।
मीडिया, बाजार और राजनीति
आज मीडिया सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि एक बड़ा उद्योग भी है। विज्ञापन, कॉर्पोरेट हित और राजनीतिक दबाव—इन सबका असर संपादकीय फैसलों पर पड़ सकता है।
इसलिए “मीडिया बिक चुका है” जैसी धारणा भले ही पूरी तरह सही न हो, लेकिन यह भी सच है कि मीडिया की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता लगातार परीक्षा में है।
जनता की भूमिका
इस स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जनता की होती है।
किसी एक सर्वे या चैनल पर आंख बंद करके भरोसा न करें
अलग-अलग स्रोतों से जानकारी लें
डेटा और जमीनी हकीकत की तुलना करें
निष्कर्ष
लोकतंत्र में मीडिया का काम सत्ता या विपक्ष का प्रचार करना नहीं, बल्कि सच को सामने लाना है। अगर सर्वे और रिपोर्टिंग पक्षपाती नजर आती है, तो यह सिर्फ मीडिया की समस्या नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चुनौती है।
विश्वसनीयता एक बार खो जाए तो उसे वापस पाना मुश्किल होता है। इसलिए मीडिया संस्थानों के लिए यह जरूरी है कि वे निष्पक्षता, पारदर्शिता और जिम्मेदारी को प्राथमिकता दें।
भारत की समस्त मीडिया ने अपनी विश्वसनीयता खो दिया है पिछले 2014 के बाद से यह जग जाहिर है कुछ अपने आप को दिखाने के लिए निष्पक्षता का ढोंग करते हैं लेकिन सच्चाई सबके सामने हैं - रत्नेश कुमार