28/09/2020
पराया धन
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अधरों पर खिली मुस्कान वो
मेरे बगिया की शान है वो
चिड़ियों सी चहकती रहती है,
बाबा की अपने जान है वो I
जब जब पायल छनकाती है,
खुशियाँ घर मे भर जाती है,
वो बेला की लता सी फैलकर,
घर आँगन महकाती है।
उसकी मीठी बोली कोयल सी
कानो में रस भर जाती है,
उसका वो फुदकना चिड़िया सा
घर मेरा रौशन कर जाती है।
छोटी सी उमर में उसका युँ,
हरपल चिन्ता करना अपनो का,
उसमे मुझे अपने बचपन का
प्रतिबिंब दर्शन करवाती है I
बेटी तो पराया धन होती है,
मन मेरा ये मान ना पाता है,
कैसे कर दू अपना अंश अलग मैं,
ये सोच के दिल घबराता है।
दुनियां की निर्मम रीत ये
क्यूँ हर कोई निभाता हैं,
जो अपने ही तन का हिस्सा हो,
क्यूँ ना जीवन भर रख पाता है।
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स्वरचित ( मंजू कुशवाहा)
चित्र _गुगल आभार