04/09/2026
पॉडकास्ट के माइक के सामने बैठकर कुछ लोगों को अचानक लगता है कि कानून उनकी जेब में और संविधान उनके जूते के नीचे रखा है।
भाई साहब कैमरे पर बैठकर ऐसे शेखी बघार रहे थे जैसे किसी का सिर फोड़ना, हत्या के प्रयास की धाराएं लगवाना और सिस्टम को ठेंगे पर रखना कोई ओलंपिक का गोल्ड मेडल हो! "अरे हमने सिर फोड़ दिया, 60 टांके लगवा दिए, फिर भी पूरी रात बाहर घूमते रहे... फलाने नेता जी हमारे बड़े भाई हैं, एक कॉल पर सब सेट है।"
वाह! रसूख देखिए इनका, जैसे थानेदार सुबह उठकर पहले इन्हीं को हाजिरी लगाने आता हो।
पर मजाल है कि ऐसे "इंटरनेट के बाहुबलियों" की हेकड़ी 24 घंटे भी टिक जाए। जैसे ही सोशल मीडिया पर लानत-मलानत शुरू हुई, विपक्ष ने संसद तक सवाल दागे और जिन 'बड़े भाइयों' का नाम लेकर हवाबाजी हो रही थी उन्होंने खुद एफआईआर करवा दी—भाई साहब का सारा बाहुबल अचानक धड़ाम हो गया।
अब पुलिस की गाड़ी का सायरन बजते ही वही "शेर" अचानक भीगी बिल्ली बनकर कहने लगा— "अरे वो तो हम मज़ाक कर रहे थे जी, व्यंग्य था, सटायर था, हम तो बस आत्मरक्षा कर रहे थे!"
अरे भाई! माइक पर तो तुम खुद को दिल्ली का डॉन बता रहे थे, अब थाने का गेट दिखते ही रोस्टिंग का 'कॉमेडियन' क्यों बन गए?
असल में सोशल मीडिया ने कुछ लोगों को यह गलतफहमी दे दी है कि चार लाइक्स और कुछ हजार फॉलोअर्स का मतलब कानून से ऊपर होने का लाइसेंस है। पर सच यही है: कैमरे के सामने गुंडई की डींगें हांकना बहुत आसान होता है, लेकिन जब कानून का शिकंजा कसता है, तो सारी 'स्वतंत्रता' हवा हो जाती है और बस हवालात का सन्नाटा बचता है।