Vish Mukt Vishwa

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विष मुक्त विश्व—“सर्वेपि सुखिनः संतु”। प्राकृतिक खेती, ग्रामीण सशक्तिकरण, युवाओं की जागरूकता और कार्बन क्रेडिट के माध्यम से टिकाऊ, विष-रहित भविष्य का निर्माण। संपर्क: 8423389144 | रेदौपुर, आज़मगढ़।

05/09/2026
🌱 NATURAL FARMING | NATURAL UNDERSTANDING | SELF-RELIANT FARMERBasti, Uttar Pradesh में Colonel Mishra Ji के Farm पर Col...
02/09/2026

🌱 NATURAL FARMING | NATURAL UNDERSTANDING | SELF-RELIANT FARMER

Basti, Uttar Pradesh में Colonel Mishra Ji के Farm पर Colonel Sahib द्वारा आयोजित यह विशेष कार्यक्रम केवल Natural Farming Practice की चर्चा नहीं था, बल्कि Nature, Agriculture, Science, Health, Economy और Sustainable Development को एक साथ समझने की एक महत्वपूर्ण पहल थी।

इस सीमित और गंभीर चर्चा में Dr. Ramgopal Ji जैसे Natural & Vedic Farming Practitioner के साथ यह समझने का प्रयास हुआ कि—

खेती सिर्फ Production नहीं है।
खेती एक Complete Ecosystem है।
और हर Farmer अपने आप में एक Local Enterprise है।

🌍 NATURAL FARMING ECOSYSTEM

अपना बीज → अपना खेत → अपना पानी → अपनी खाद → अपना कीट नियंत्रण → अपना उत्पादन → अपनी Processing → अपना Product → अपना Outlet → अपना Monetization

इसके साथ—

🐄 अपनी गौशाला
🌱 अपना जैविक संसाधन
💧 अपना Water Conservation
☀️ अपनी Drying & Storage
🔬 अपना Scientific Approach
💡 अपना Innovation
💰 अपना Value Addition

यही मॉडल एक किसान को केवल Farmer नहीं, बल्कि Farmer + Entrepreneur + Local Industry बना सकता है।

खेती के चारों तरफ होने वाली Processing, Seed Production, Drying, Storage, Water Conservation, Animal-based Activities, Packaging और Local Employment—ये सभी मिलकर Rural Economy की छोटी-छोटी Industries बन सकती हैं।

🇮🇳 FARMER → FAMILY → VILLAGE → LOCAL ECONOMY → SELF-RELIANT INDIA

इस पहल का उद्देश्य Natural Farming को केवल एक farming technique के रूप में देखना नहीं, बल्कि Natural Understanding + Scientific Knowledge + Local Resources + Value Addition + Monetization के एक integrated model के रूप में विकसित करना है।

और इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए यह YouTube Channel केवल Videos का माध्यम नहीं है।

यह एक Farmer-led Knowledge & Monetization Platform है—जहाँ ऐसे कार्यक्रम, Natural Farming Practices, Rural Innovation, Indigenous Knowledge और Farmer-led Enterprises को एक मंच देने का प्रयास किया जाता है।

🌾 यह Channel किस सोच के लिए है?

अपना बीज
अपना खेत
अपना पानी
अपनी खाद
अपना कीट नियंत्रण
अपना उत्पाद
अपनी Processing
अपना Outlet
अपनी गौशाला
अपना Knowledge
अपना Innovation
अपना Monetization

FROM FARM TO MARKET — FROM KNOWLEDGE TO VALUE — FROM FARMER TO ENTERPRISE

🌍 एक ऐसा प्रयास जिसमें हर किसान अपने क्षेत्र में एक Industry बने, हर गांव अपनी Economy बनाए और स्थानीय संसाधन स्थानीय विकास का आधार बनें।

🎥 FULL DISCUSSION देखें:

👇

🔗 YOUTUBE LINK: https://youtu.be/DxO-PLaOaZU

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क्योंकि यह सिर्फ एक YouTube Channel नहीं—एक Farmer-led Movement है, जो Natural Understanding, Sustainable Agriculture और Self-Reliant Rural Economy की दिशा में संवाद और प्रयास को आगे बढ़ा रहा है।

Ep-540 : प्राकृतिक खेती का रहस्य डॉक्टर रामगोपाल ने समझाया।...

01/09/2026

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आज से रिवरसाइड कैलिफोर्निया अमेरिका में श्रीमदभागवत कथा का शुभारंभ॥

🌿 हर कांटे का अपना दर्द है — और हर दर्द की अपनी पहचाननमिश प्राकृतिक कृषि फार्म में प्रकृति को छूकर समझने का एक अनुभव— मन...
01/09/2026

🌿 हर कांटे का अपना दर्द है — और हर दर्द की अपनी पहचान

नमिश प्राकृतिक कृषि फार्म में प्रकृति को छूकर समझने का एक अनुभव

— मनोवैज्ञानिक एवं इंजीनियर राकेश कुमार पांडे की दृष्टि से

पिछले कुछ महीनों से नमिश प्राकृतिक कृषि फार्म में बायो-फेंसिंग पर काम करते हुए मैं प्रकृति के एक ऐसे पक्ष को बहुत करीब से महसूस कर रहा हूं, जिसे किताब में पढ़कर शायद पूरी तरह समझा ही नहीं जा सकता।

बारिश के बाद पौधों की बढ़वार तेज हुई तो कटिंग, ग्राफ्टिंग, छंटाई और कटे हुए पौधों को दोबारा जमीन में लगाने का काम लगातार बढ़ गया।

इसी दौरान करौंदा, नींबू, शिकाकाई, गुलाब, नागफनी, ड्रैगन फ्रूट, एप्पल बेर, बेल, शतावर और एलोवेरा जैसे पौधों के साथ काम करते हुए एक विचित्र अनुभव हुआ—

हर कांटा चुभता है, लेकिन हर कांटे का दर्द एक जैसा नहीं होता।

किसी की चुभन सुई जैसी है।
किसी की चुभन के साथ त्वचा चिरती है।
कोई भीतर तक प्रवेश करके गहरा बिंदु छोड़ता है।
कोई हुक की तरह त्वचा को पकड़कर खरोंचता हुआ निकलता है।
और कुछ इतने महीन होते हैं कि कांटा दिखाई कम देता है, लेकिन उसकी उपस्थिति त्वचा देर तक महसूस करती रहती है।

वैज्ञानिक भाषा में इन चोटों को पौधे के नाम से अलग-अलग “दर्द” का नाम नहीं दिया जाता। चोट की प्रकृति के अनुसार इन्हें मुख्यतः puncture wound (भेदन-चोट), scratch/abrasion (खरोंच), laceration (त्वचा का चिरना) या त्वचा में कांटे का अंश रह जाने पर retained foreign body injury के रूप में समझा जाता है।

लेकिन मनुष्य का अनुभव वैज्ञानिक वर्गीकरण से थोड़ा आगे जाता है।

🌵 दस पौधे — दस अलग स्पर्श, दस अलग अनुभव

1. करौंदा — गहरा और याद रहने वाला दर्द

मेरे व्यक्तिगत अनुभव में इन सबमें सबसे प्रभावशाली करौंदे का कांटा रहा।

लंबा, मजबूत और सीधा कांटा जब त्वचा में प्रवेश करता है तो अनुभव केवल ऊपरी खरोंच का नहीं रहता। यह deep puncture जैसा महसूस हो सकता है—पहले एक तीखी चुभन, फिर उसी बिंदु पर अंदर से आता हुआ दर्द।

मुझे लगा करौंदे के कांटे को आज तीसरा दिन हो चुका है, फिर भी उस स्थान को मैं बिना देखे पहचान सकता हूं।

यही दर्द की अद्भुत मनोवैज्ञानिक स्मृति है।

आंख घाव को भूलने लगती है,
लेकिन मस्तिष्क उस स्थान का नक्शा कुछ समय तक संभालकर रखता है।

2. नींबू — नुकीला, साफ और अचानक हमला

नींबू का कांटा अक्सर ऐसा एहसास देता है जैसे किसी ने अचानक महीन नुकीली वस्तु से त्वचा को भेद दिया हो।

दर्द तत्काल, स्पष्ट और एक बिंदु पर केंद्रित होता है।

यह प्रकृति की चेतावनी जैसा लगता है—
“फल चाहिए तो मेरे पास सावधानी से आओ।”

3. शिकाकाई — पकड़ने और खींचने वाला कांटा

शिकाकाई का अनुभव अलग है। इसकी शाखाओं पर छोटे, मुड़े हुए hooked prickles पाए जाते हैं।

इसलिए इसका दर्द केवल “अंदर जाने” का नहीं, बल्कि कई बार पकड़ने, अटकने और खींचने जैसा महसूस होता है।

मानो पौधा कह रहा हो—

“मुझे पार करना इतना आसान नहीं है।”

यही गुण इसे प्राकृतिक जैविक बाड़ के लिए रोचक बनाता है।

4. गुलाब — चुभन से अधिक चीरने वाला अनुभव

गुलाब हमें कांटेदार दिखाई देता है, लेकिन वनस्पति विज्ञान की भाषा में उसके ये नुकीले भाग असली thorns नहीं बल्कि prickles हैं।

वे तने की बाहरी परत से उत्पन्न होते हैं।

इनकी आकृति कई बार हुक जैसी होने के कारण हाथ या त्वचा इनसे रगड़कर निकलती है तो केवल एक बिंदु नहीं बनता—एक लाइन जैसी खरोंच या चिरान बन सकती है।

इसलिए गुलाब का अनुभव मेरे लिए “needle pain” से अधिक कई बार scratch/tear sensation जैसा है।

फूल जितना कोमल,
उसकी सुरक्षा व्यवस्था उतनी ही स्पष्ट।

5. नागफनी — एक कांटा नहीं, कभी-कभी कांटों की पूरी रणनीति

नागफनी के साथ अनुभव और भी अलग हो सकता है।

विशेषकर Opuntia समूह की नागफनी में बड़े कांटों के अतिरिक्त बहुत महीन, आसानी से त्वचा में घुसने वाले glochids भी हो सकते हैं।

बड़ा कांटा दिखाई देता है और आदमी उससे बचता है।

महीन glochid कई बार दिखाई भी ठीक से नहीं देता, लेकिन त्वचा में रह जाए तो बार-बार चुभन और irritation का एहसास करा सकता है।

यानी—

नागफनी का बड़ा कांटा डराता है, छोटा कांटा परेशान करता है।

6. ड्रैगन फ्रूट — छोटे लेकिन सतर्क करने वाले spines

ड्रैगन फ्रूट भी cactus परिवार का सदस्य है। इसके areoles पर छोटे spines होते हैं।

इनके साथ काम करते समय दर्द अक्सर बहुत बड़े घाव की बजाय छोटी, तेज और स्थानीय चुभन के रूप में अनुभव हो सकता है।

अर्थात आकार छोटा होने का अर्थ यह नहीं कि पौधे ने अपनी सुरक्षा छोड़ दी।

7. एप्पल बेर — टकराने पर अचानक मिलने वाली चुभन

बेर (Ziziphus) की शाखाएं कांटेदार हो सकती हैं।

काम करते समय इसकी शाखा पकड़ते हुए या झाड़ी के भीतर हाथ डालते समय अचानक मिलने वाली चुभन मन को तुरंत सतर्क कर देती है।

बायो-फेंसिंग के संदर्भ में यही विशेषता महत्वपूर्ण है—

जिस रास्ते को मनुष्य और पशु आसानी से पार कर सकते हैं, वहां केवल पौधों की संख्या नहीं, उनकी संरचना भी सुरक्षा बनाती है।

8. बेल — कठोर वृक्ष की कठोर सुरक्षा

बेल (Aegle marmelos) में भी मजबूत spines पाए जा सकते हैं; वनस्पति विवरणों में ये लगभग 2.5–5 सेंटीमीटर तक दर्ज हैं।

इसलिए बेल का कांटा किसी कोमल सतही prickle जैसा नहीं है।

मजबूत शाखा से जुड़ी नुकीली संरचना जब लगती है तो उसका अनुभव अधिक दृढ़ और केंद्रित हो सकता है।

9. शतावर — छोटा, मुड़ा हुआ और अचानक मिलने वाला कांटा

शतावर (Asparagus racemosus) देखने में अत्यंत कोमल और महीन पौधा लगता है, लेकिन इसके तनों और मुख्य शाखाओं पर spines होते हैं। वनस्पति विवरणों में पुराने तनों पर इनके लगभग 2 सेंटीमीटर तक पहुंचने का उल्लेख मिलता है।

यानी प्रकृति यहां एक सुंदर विरोधाभास रखती है—

ऊपर से कोमलता, भीतर सुरक्षा की पूरी व्यवस्था।

10. एलोवेरा — कांटा कम, सीमा-रेखा अधिक

एलोवेरा की पत्ती के किनारों पर दांत जैसी नुकीली संरचनाएं होती हैं।

इनका अनुभव सामान्यतः करौंदे जैसे लंबे, गहरे puncture देने वाले कांटे से अलग है। काम करते समय पत्ती को गलत दिशा में खींचने या दबाने पर किनारा त्वचा को चुभ सकता है या खरोंच सकता है।

मेरे लिए यह प्रकृति की “boundary marking” जैसा है—

पत्ती कहती है—मुझे छुओ, लेकिन मेरी सीमा पहचानकर।

🧠 आखिर हर कांटे का दर्द अलग क्यों महसूस होता है?

यहीं किसान का अनुभव और मनोविज्ञान आपस में मिलते हैं।

दर्द केवल इस बात से निर्धारित नहीं होता कि कांटा “कितना तेज” है।

उसका आकार, मोटाई, लंबाई, प्रवेश की गहराई, प्रवेश का कोण, वह सीधा है या मुड़ा हुआ, त्वचा में रगड़ा है या सीधे घुसा है, और उसका कोई सूक्ष्म हिस्सा अंदर रह गया है या नहीं—ये सभी अनुभव को बदल सकते हैं।

इसीलिए करौंदे की गहरी चुभन, गुलाब की खरोंच, शिकाकाई की पकड़ और नागफनी के महीन कांटे की irritation—मस्तिष्क में चार अलग अनुभव बन सकते हैं।

और यही कारण है कि कई बार तीन दिन बाद भी उंगली उस जगह को “जानती” है जहां कांटा लगा था।

दर्द केवल त्वचा की घटना नहीं है;
वह शरीर से मस्तिष्क तक पहुंची सूचना और उसकी स्मृति भी है।

🌿 क्या कांटे की चुभन का कोई आयुर्वेदिक उपचार है?

यहां प्राकृतिक कृषि और चिकित्सा को अलग-अलग समझना जरूरी है।

हम प्राकृतिक खेती करते हैं, इसलिए हर चीज का उपचार भी खेत की किसी जड़ी-बूटी से ही करना आवश्यक नहीं है।

मिट्टी लगे कांटे से हुए गहरे puncture wound में किसी पत्ती, मिट्टी, गोबर, पौधे का रस या घरेलू लेप सीधे घाव में डालना सुरक्षित सिद्धांत नहीं माना जाना चाहिए।

प्राथमिकता है—घाव को साफ बहते पानी से अच्छी तरह धोना, दिखाई देने वाली गंदगी हटाना और देखना कि कांटे का कोई हिस्सा अंदर तो नहीं रह गया।

विशेष रूप से खेत में लगी गहरी puncture injury में tetanus vaccination की स्थिति भी महत्वपूर्ण है।

यदि दर्द लगातार बढ़ रहा हो, सूजन/गर्मी बढ़े, मवाद बने, बुखार आए, लालिमा फैलती जाए अथवा कांटे का हिस्सा अंदर होने का संदेह हो तो चिकित्सकीय जांच आवश्यक है।

इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा का पहला सिद्धांत मेरे लिए यही होना चाहिए—

प्रकृति का सम्मान करें, लेकिन संक्रमण को प्रकृति के भरोसे न छोड़ें।

🌳 फिर प्रकृति ने कांटे बनाए ही क्यों?

जब महीनों तक इन पौधों के बीच काम किया तो एक बात बहुत स्पष्ट हुई—

कांटा पौधे की क्रूरता नहीं है; वह उसकी सुरक्षा-इंजीनियरिंग है।

पौधा भाग नहीं सकता।

उसके पास पशु की तरह पैर नहीं, पक्षी की तरह पंख नहीं और मनुष्य की तरह दीवार बनाने की क्षमता नहीं।

इसलिए करोड़ों वर्षों के विकास ने अनेक पौधों को अपनी सुरक्षा के लिए अलग-अलग संरचनाएं दीं—कहीं thorn, कहीं spine, कहीं prickle।

ये शाकाहारी जीवों द्वारा अत्यधिक चराई को रोकने में मदद कर सकते हैं। गुलाब जैसे पौधों में prickles का संबंध सुरक्षा के साथ-साथ चढ़ने/सहारा लेने जैसी भूमिकाओं से भी जोड़ा गया है।

यानी जिसे मनुष्य “कांटा” कहता है,
पौधे के लिए वह उसका security architecture है।

और यही कारण है कि प्राकृतिक बायो-फेंसिंग में कांटेदार पौधों का महत्व बढ़ जाता है।

हम ईंट की दीवार खड़ी करते हैं तो वह केवल सीमा बनाती है।

लेकिन करौंदा, नींबू, बेल, बेर, शिकाकाई, नागफनी जैसे पौधों की जीवित बाड़—

सीमा भी बनाती है,
जैव-विविधता भी बढ़ाती है,
फल या उपयोगी उत्पाद भी दे सकती है,
और समय के साथ स्वयं विकसित भी होती रहती है।

🌱 कांटों ने मुझे क्या सिखाया?

इंजीनियर की दृष्टि से देखूं तो प्रत्येक कांटा एक अलग design solution है।

मनोवैज्ञानिक की दृष्टि से देखूं तो प्रत्येक चुभन एक अलग sensory memory है।

और किसान की दृष्टि से देखूं तो प्रत्येक कांटा कहता है—

“प्रकृति को केवल दूर से देखकर मत समझो।
मेरे बीच काम करो।
मुझे काटो, लगाओ, संभालो, मुझसे घायल भी होओ—
तब तुम्हें पता चलेगा कि प्रकृति केवल सुंदर नहीं है, वह बुद्धिमान भी है।”

आज भी करौंदे के कांटे का वह बिंदु तीसरे दिन अपनी उपस्थिति बता रहा है।

और शायद यही पिछले कुछ महीनों की प्राकृतिक खेती का एक छोटा-सा, लेकिन गहरा पाठ है—

हर कांटे की अपनी बनावट है।
हर चुभन की अपनी भाषा है।
हर दर्द की अपनी स्मृति है।
और हर पौधे के पास उस कांटे को बनाने का अपना कारण है।

हम कांटे को दर्द की दृष्टि से देखते हैं।

पौधा उसी कांटे को जीवन की दृष्टि से देखता है।

— मनोवैज्ञानिक एवं इंजीनियर राकेश कुमार पांडे
नमिश प्राकृतिक कृषि फार्म

🌱 खेती सिर्फ खेत तक सीमित नहीं—किसान की हर क्षमता आय का साधन बन सकती हैकर्नाल के Colonel K.C. Mishra जी के प्राकृतिक खेत...
26/08/2026

🌱 खेती सिर्फ खेत तक सीमित नहीं—किसान की हर क्षमता आय का साधन बन सकती है

कर्नाल के Colonel K.C. Mishra जी के प्राकृतिक खेती मॉडल की यह झलक एक महत्वपूर्ण संदेश देती है—खेती केवल बीज, खाद और पानी का नाम नहीं है। खेती एक पूरा Integrated Economic Model है।

मिश्रा जी अपने खेत में प्राकृतिक एवं विषमुक्त खेती के साथ अनेक फसलों, फलदार वृक्षों, औषधीय पौधों, मल्टी-क्रॉपिंग, जैव-विविधता, मिट्टी में कार्बन बढ़ाने और जल प्रबंधन पर काम कर रहे हैं। यही मॉडल दूसरे किसानों के लिए भी सीखने और अपनाने योग्य है।

लेकिन आज किसान की आय का एक और महत्वपूर्ण रास्ता है—अपने काम को दुनिया तक पहुँचाना।

अगर किसान:
🌱 अपना बीज तैयार करे
🌱 अपना प्राकृतिक खाद/इनपुट बनाए
🌱 अपनी नर्सरी विकसित करे
🌱 मल्टी-क्रॉपिंग और फल-फूल लगाए
🌱 सोलर ऊर्जा अपनाए
🌱 वर्षा जल संचयन करे
🌱 अपनी उपज की Processing & Value Addition करे
🌱 दूसरे किसानों को प्रशिक्षण दे
🌱 और अपने पूरे अनुभव को YouTube, Facebook एवं अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर साझा करे

तो उसकी खेती + ज्ञान + प्रशिक्षण + डिजिटल कंटेंट + नेटवर्क—सभी मिलकर आय के अलग-अलग स्रोत बन सकते हैं।

इस वीडियो को रिकॉर्ड करके किसानों तक पहुँचाने वाला किसान भी इसी सोच का उदाहरण है। वह केवल खेती नहीं कर रहा, बल्कि एक किसान की सफलता को दूसरे किसानों तक पहुँचा रहा है। यही काम भविष्य में डिजिटल मोनेटाइजेशन के माध्यम से अतिरिक्त आर्थिक मूल्य भी पैदा कर सकता है।

आज यदि Colonel K.C. Mishra जी का मॉडल लगभग 70% आत्मनिर्भर आर्थिक चक्र बना चुका है, तो उनके साथ जुड़ने वाले किसान, अपने-अपने अनुभव और संसाधन जोड़कर इसे 100% के करीब एक मजबूत किसान-आधारित आर्थिक मॉडल बना सकते हैं।

किसान का अपना पूरा चक्र:

अपना बीज → अपनी नर्सरी → अपना प्राकृतिक इनपुट → अपना खेत → अपनी फसल → Processing → अपना बाजार → प्रशिक्षण → डिजिटल कंटेंट → Monetization

यही है “खेती को व्यवसाय, ज्ञान को संपत्ति और किसान को आत्मनिर्भर बनाने” की दिशा।

इसलिए किसान भाइयों—एक-दूसरे को प्रमोट कीजिए। एक किसान की कहानी दूसरे किसान की प्रेरणा बन सकती है।

🎥 इस वीडियो को देखें, सीखें और आगे किसानों तक पहुँचाएँ।
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मनोवैज्ञानिक एवं इंजीनियर राकेश कुमार पांडेय
प्राकृतिक खेती, सतत विकास, किसान सशक्तिकरण एवं सामाजिक-आर्थिक आत्मनिर्भरता के पक्षधर।

सोच बदलें → मॉडल बनाएं → किसानों को जोड़ें → ज्ञान साझा करें → आय के नए रास्ते बनाएं।

Ep-530 : कर्नल के सी मिश्रा की प्राकृतिक खेती का जहर मुक्त माडल।...

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26/08/2026

🌱 आजमगढ़ मॉडल: कम जमीन, अधिक उत्पादन की मिसाल

गंगापुर गाँव, विकास खंड, हरैया ब्लॉक, आजमगढ़ के श्री पटेल जी के फार्म पर मचान विधि और मल्टी-क्रॉपिंग का शानदार प्रयोग देखने को मिला। 🌾

मुर्गी फार्म के चारों ओर मचान पर नेनुआ, खीरा, लौकी, करेला, कुंदरू, परवल, कद्दू और ड्रैगन फ्रूट जैसी फसलें लगी हैं, वहीं नीचे की जमीन में सूरन, बांदा सहित अनेक सब्जियों की इंटरक्रॉपिंग की गई है।

यह मॉडल बताता है कि सीमित जमीन का वैज्ञानिक और नवाचारी उपयोग करके उत्पादन एवं आय दोनों बढ़ाई जा सकती हैं।

इस अवसर पर आजमगढ़ में उत्कृष्ट खेती के लिए पहचान रखने वाले श्री राजबहादुर जी के साथ खेत का भ्रमण किया। उनका खेत आधुनिक कृषि तकनीकों के कारण किसी यूरोपियन फार्म जैसा सुव्यवस्थित दिखाई देता है। 🇮🇳🌱

इस कृषि भ्रमण में मनोवैज्ञानिक एवं इंजीनियर राकेश कुमार पांडेय, रेशम कायाकल्प आजमगढ़ अवार्ड से सम्मानित तथा अनिका एजुकेशनल हेल्थ एंड वेलफेयर ट्रस्ट, भारत; विष-मुक्त विश्व, रेडौपुर, आजमगढ़ एवं 56 बहुउद्देशीय रेशम वस्त्र उत्पादन सरकारी समिति, आजमगढ़ के संस्थापक, भी शामिल रहे।

हमारा प्रयास है कि आजमगढ़ सहित पूरे प्रदेश के ऐसे प्रगतिशील और नवाचारी किसानों को एक मंच पर जोड़ा जाए, जो खेती में नए प्रयोग कर रहे हैं और अपने गाँव-ब्लॉक को कृषि नवाचार का मॉडल बना सकते हैं।

एक किसान का नवाचार—हजारों किसानों के लिए प्रेरणा बन सकता है। 🌾🇮🇳

#आजमगढ़मॉडल #कृषिनवाचार #मचानविधि

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विष मुक्त विश्व, रेदौपुर, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश
Azamgarh
276001

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