Baghpat City

Baghpat City Baghpat, historically known as Vyaghraprastha, is a city in the Indian state of Uttar Pradesh.

बागपत से खुदाई में मिली तलवारों को हंगरी के बुडापेस्ट लैब में भेजा गया था, जहां कार्बन डेटिंग के जरिए ये तलवारें 4500 वर...
11/08/2025

बागपत से खुदाई में मिली तलवारों को हंगरी के बुडापेस्ट लैब में भेजा गया था, जहां कार्बन डेटिंग के जरिए ये तलवारें 4500 वर्ष पूर्व की बताई गई हैं

अब सिर्फ 25 मिनट में बागपत से दिल्ली पहुँच जाएंगें। दिल्‍ली-देहरादून एक्‍सप्रेसवे के पहले फेज की कुल लंबाई 32 किलोमीटर ह...
29/06/2025

अब सिर्फ 25 मिनट में बागपत से दिल्ली पहुँच जाएंगें। दिल्‍ली-देहरादून एक्‍सप्रेसवे के पहले फेज की कुल लंबाई 32 किलोमीटर है। खास बात यह है की इसमें से लगभग 18 किलोमीटर हिस्‍सा एलिवेटिड है। पहले फेज का शुभारंभ होने वाला है।

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री माननीय श्री नितिन गडकरी जी एवं भारत सरकार का हार्दिक आभार प्रकट करते हैं।

इस शाही ताबूत में छिपा है 5 हजार साल का इतिहास!बागपत के सिनौली में उत्खनन के दौरान मिले आठ फुट के शाही ताबूत में पांच हज...
30/05/2025

इस शाही ताबूत में छिपा है 5 हजार साल का इतिहास!

बागपत के सिनौली में उत्खनन के दौरान मिले आठ फुट के शाही ताबूत में पांच हजार साल का इतिहास छिपा है। इसमें कोई राजा दफन किया गया था या किसी योद्धा को यह सम्मान मिला था। ताबूत के ऊपरी हिस्से पर आठ खास मानव कलाकृतियां बनाई गई हैं। बीच में पीपल के पत्ते और युद्ध सामग्री भी दर्शाई गई है, इससे लगता है कि किसी योद्धा को सम्मान के साथ यहां पर दफनाया गया होगा।

सिनौली में दूसरी बार के उत्खनन का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु शाही ताबूत और इसके निकट मिला रथ ही है। भारतीय पुरातत्व संस्थान के निदेशक संजय मंजुल बताते हैं कि आठ फुट का ताबूत बेहद खास है। इसमें चारपाई की तरह चार पाए लगाए गए हैं। इन पर भी तांबे से नक्काशी की गई है। लकड़ी के इस ताबूत पर तांबे का काम किया गया, बाद में लकड़ी तो गल गई, लेकिन तांबे की नक्काशी से उस दौर की संपन्नता का पता चलता है। ताबूत की लंबाई आठ फुट है। इसके आसपास अन्य कंकाल और दो युद्ध रथ मिले हैं। ऐसा लगता है कि किसी योद्धा या इस क्षेत्र के राजा की मृत्यु के पश्चात उसके रथ, तलवार, हेलमेट को शाही ताबूत के पास ही दफन किया गया है। इस पर शोध होगा। इतिहास तो पांच हजार साल पुराना है, लेकिन ताबूत और इसमें दफनाए गए योद्धा का जुड़ाव क्या है, कैसी उस दौर की संस्कृति रही होगा, इस क्षेत्र का नाम क्या होगा और किस तरह के लोग रहे होंगे, इन सभी सवालों के जवाब तो शोध के बाद ही मिल सकेंगे।

13 साल बाद फिर मिली वही तलवार
साल 2005-06 में सिनौली में उत्खनन कार्य कराया। तब भी यहां तलवार मिली, लेकिन उस तलवार की मूठ या हत्था गायब है, लेकिन इस बार ठीक उसी तरह की तलवार मिली है, इसका हत्था सुरक्षित है।

महाभारत में बरनावा और लाक्षागृह सबसे अधिक चर्चित है। बागपत के बरनावा में उत्खनन शुरू हुआ सांस्कृतिक विरासत जानने के लिए है। ट्रैंच भी लगे, लेकिन उत्खनन बीच में ही रोक कर पुरातत्वविद सिनौली पहुंच गए। बरनावा में अभी तक के उत्खनन से करीब 36 सौ साल पुराने पुरावशेष मिल चुके हैं। चित्रित धूसर मृद भांड, गुप्त काल के अवशेष, राजपूत काल और मुगल काल के तमाम अवशेष मौजूद हैं। शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन कहते हैं कि अगर विस्तार से उत्खनन किया जाए तो बरनावा की खोज पूरी होगी। लाक्षागृह भी यहीं पर साबित होगा।

सिनौली में कब्र गाह तो कहां रहते थे लोग
सिनौली फिर से चर्चा में है। दूसरी बार उत्खनन में फिर कब्र गाह मिला है। यह तो साबित हो गया कि यहां का इतिहास पांच हजार साल या इससे भी अधिक पुराना है, लेकिन अभी कई सवाल बाकी है। सिनौली में अगर कब्र गाह था तो आबादी कहां थी और यहां से कितनी दूर थी। किस तरह का शहर बसाया गया था या फिर कोई बड़ा ग्रामीण संस्कृति का गांव था। अनुमान तो यह है कि यमुना नदी नजदीक ही है। इसके आसपास ही कोई बड़ा गांव या शहर रहा होगा, गांव या शहर के लोगों के शवों को सिनौली और इसके आसपास के क्षेत्र में दफनाया जाता रहा है। एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. केके शर्मा कहते हैं कि यहीं लंबी जांच और सर्वेक्षण का विषय है। पिछले पांच हजार साल में कितने गांव, कितने शहर उजड़े और फिर दोबारा बसाए गए। वर्तमान समय में भी आबादी से दूर ही श्मशान घाट या कब्रिस्तान को दूर बनाया जाता है, तब भी इसी तरह की परंपरा रही होगी।

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