31/08/2026
आर्काइव | मोहन भागवत आरएसएस के प्रमुख कार्यकर्ताओं के वंश से आते हैं. उनके पिता, मधुकरराव, एक प्रचारक थे, जिन्होंने 1940 के दशक में बॉम्बे प्रांत के गुजराती भाषी जिलों में बड़े पैमाने पर काम किया था. वह 1942 में प्रचारकों के पहले बैच में से थे, जिन्होंने ब्रह्मचारी रहने और संगठन के विस्तार के लिए अपना जीवन समर्पित करने की कसम खाई थी. उस समय गोलवलकर सरसंघचालक थे. इस समय भारत का स्वतंत्रता संघर्ष अपने शीर्ष पर था, आरएसएस ने निश्चित रूप से खुद को इस आंदोलन से दूर रखा था और इसलिए, इसमें कोई भूमिका नहीं थी. गोलवलकर ने उस समय कहा था "हिंदुओं, अंग्रेजों से लड़ने में अपनी ऊर्जा बर्बाद मत करो, मुस्लिम, ईसाई और कम्युनिस्ट जैसे हमारे आंतरिक दुश्मनों से लड़ने के लिए अपनी ऊर्जा बचाओ." यह उग्र दर्शन 30 जनवरी 1948 को उस समय चरम पर पहुंच गया जब एक आरएसएस नेता नाथूराम गोडसे, ने अहिंसा और सांप्रदायिक सद्भाव के दर्शन के लिए गांधी की हत्या कर दी.
गांधी की हत्या के मद्देनजर भूमिगत हो गए आरएसएस कार्यकर्ताओं के बारे में 27 मार्च 1948 की एक पुलिस खुफिया रिपोर्ट, मधुकरराव का वर्णन करती है:
एक दक्खनी ब्राह्मण उम्र 35, चौड़ा माथा, धंसे हुए गाल, कद 5' 5'', मूल रूप से नागपुर का है. उसने बीएससी तक पढ़ाई की है. संघ का मुख्य संगठनकर्ता है. संघ के सदस्यों पर उसकी अच्छी पकड़ है और उसकी संगठन क्षमता अच्छी है. वह वर्ष 1941 में अहमदाबाद शहर पहुंचा. वह गुजरात और काठियावाड़ में आरएसएस की गतिविधियों का मुख्य आयोजक है.
आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया और इसके हजारों नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. मधुकरराव ने शादी कर ली, एक लॉ कॉलेज में दाखिला लिया और नागपुर से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दक्षिण में एक छोटे से शहर चंद्रपुर में अपने पैतृक घर में रहने लगे. हालांकि उन्होंने आरएसएस नहीं छोड़ा. बाद में, वकालत करते हुए भी, उन्होंने संगठन के चंद्रपुर जिला प्रमुख के रूप में काम करना जारी रखा, एक ऐसा पद जो उनके पिता, नारायणराव भागवत ने उनके लिए रखा था. इन्हें नानासाहेब के नाम से भी जाना जाता है ये आरएसएस संस्थापक केबी हेडगेवार के सहयोगी थे.
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