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देवीपाटन मंडल संयोजक | भीम आर्मी

पूर्व जिला प्रवक्ता • भीम आर्मी बहराइच
पूर्व मंडल प्रवक्ता • देवीपाटन मंडल
पूर्व जिला अध्यक्ष • आज़ाद समाज पार्टी बहराइच

शिक्षा: UPSC अभ्यर्थी • LL.B छात्र

लगता है दिन में प..u..वा ले लिया है🤣🤣🤣गोरखपुर को गोरखपुर मत लिखा spen likha😁😁😁
31/08/2026

लगता है दिन में प..u..वा ले लिया है🤣🤣🤣
गोरखपुर को गोरखपुर मत लिखा spen likha😁😁😁

31/08/2026

गरीब, किसान और मजदूर के पास रिश्ते और प्रेम के अलावा कुछ नहीं!

गरीब और अमीर, रिश्ते और प्रेम, जनसभा भाषण, सामाजिक न्याय, बहुजन आवाज, संघर्ष की आवाज🎨

#गरीब #किसान #मजदूर #गरीबोंकीआवाज #किसानकीआवाज #मजदूरकीआवाज #सामाजिकन्याय #बराबरी #संघर्ष #जनआवाज #बहुजन

31/08/2026

किसानों की लड़ाई में किसानों मोटिवेट करते हुए 💪💪

31/08/2026
31/08/2026

आर्काइव | भागवत ने अपने सार्वजनिक भाषणों का उपयोग बीजेपी सरकार की प्रशंसा करने और उसके संदेशों को बढ़ाने के लिए किया है. नागपुर में विजयादशमी कार्यक्रम एक ऐसा समारोह होता है जो आरएसएस के गठन के बाद से प्रतिवर्ष होता रहा है. हर साल इस मौके पर आरएसएस प्रमुख देश के लिए संघ के विचार को सामने रखते हैं. आम तौर पर सरसंघचालक से उम्मीद की जाती है कि वह पिछले साल का आलोचनात्मक मूल्यांकन करेंगे. हालांकि, 2014 के बाद से, भागवत ने केवल प्रधान मंत्री की सराहना ही कि है यह मोदी के दूसरे कार्यकाल के दौरान और बढ़ा है.
आरएसएस के वरिष्ठ नेता के अनुसार इस स्थिति से भागवत की सहमति का एक कारण प्रचारकों तक अधिक भौतिक विशेषाधिकारों की पहुंच हो सकता है. मोदी के नेतृत्व में संघ के पास पहले से कहीं अधिक संसाधन हैं. वे बताते हैं, "2014 के बाद मोहनजी की भाषा बदल गई है. अब वह अक्सर कहते हैं कि हमें पहले जैसी तंगी में नहीं रहना है. हर जिले में वातानुकूलित कमरों और होटल जैसी सुविधाओं के साथ संघ कार्यालय बन चुके हैं या बन रहे हैं. प्रचारक अब कारों, ब्रांडेड कपड़ों और महंगे मोबाइल फोन के आदी हो गए हैं.” आरएसएस नेता के अनुसार, मोदी खुद आरएसएस के कार्यकर्ता रहे हैं, "प्रचारकों की ताकत और कमजोरियों दोनों को समझते हैं और उन्होंने इनका उपयोग अपने प्रतिरोध की क्षमता को खत्म करने के लिए किया है और खुद को संघ से भी ऊपर कर लिया है." लेकिन आरएसएस नेता इस बात से हैरान हैं कि सत्ता संतुलन में हुए इस बदलाव से भागवत खुद इतने स्थिर क्यों हैं. ''ऐसा लगता है कि मोहनजी को संघ की सत्ता मोदी के हाथों में जाने देने में कोई दिक्कत नहीं है.''

इसका कारण यह हो सकता है कि भागवत किसी बड़ी परेशानी में हैं. इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दौरान देश को हिलाकर रख देने वाले सिलसिलेवार बम विस्फोटों की जांच में आरएसएस के कई सदस्यों के शामिल होने के आरोप लगे थे. बीजेपी के केंद्र की सत्ता में आने के बाद इन जांचों में आश्चर्यजनक मोड़ आया. जिसे जून 2015 में सार्वजनिक किया गया, जब विस्फोट के एक मामले में विशेष लोक अभियोजक रोहिणी सालियान ने दावा किया कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने उन्हें आरोपियों पर "नरमी बरतने" के लिए कहा है. परिणामस्वरूप बाद के वर्षों में एक के बाद एक कई मामलों में आरएसएस से जुड़े संदिग्ध आतंकवादियों को बरी किया गया.

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31/08/2026

आर्काइव | मोहन भागवत आरएसएस के प्रमुख कार्यकर्ताओं के वंश से आते हैं. उनके पिता, मधुकरराव, एक प्रचारक थे, जिन्होंने 1940 के दशक में बॉम्बे प्रांत के गुजराती भाषी जिलों में बड़े पैमाने पर काम किया था. वह 1942 में प्रचारकों के पहले बैच में से थे, जिन्होंने ब्रह्मचारी रहने और संगठन के विस्तार के लिए अपना जीवन समर्पित करने की कसम खाई थी. उस समय गोलवलकर सरसंघचालक थे. इस समय भारत का स्वतंत्रता संघर्ष अपने शीर्ष पर था, आरएसएस ने निश्चित रूप से खुद को इस आंदोलन से दूर रखा था और इसलिए, इसमें कोई भूमिका नहीं थी. गोलवलकर ने उस समय कहा था "हिंदुओं, अंग्रेजों से लड़ने में अपनी ऊर्जा बर्बाद मत करो, मुस्लिम, ईसाई और कम्युनिस्ट जैसे हमारे आंतरिक दुश्मनों से लड़ने के लिए अपनी ऊर्जा बचाओ." यह उग्र दर्शन 30 जनवरी 1948 को उस समय चरम पर पहुंच गया जब एक आरएसएस नेता नाथूराम गोडसे, ने अहिंसा और सांप्रदायिक सद्भाव के दर्शन के लिए गांधी की हत्या कर दी.

गांधी की हत्या के मद्देनजर भूमिगत हो गए आरएसएस कार्यकर्ताओं के बारे में 27 मार्च 1948 की एक पुलिस खुफिया रिपोर्ट, मधुकरराव का वर्णन करती है:

एक दक्खनी ब्राह्मण उम्र 35, चौड़ा माथा, धंसे हुए गाल, कद 5' 5'', मूल रूप से नागपुर का है. उसने बीएससी तक पढ़ाई की है. संघ का मुख्य संगठनकर्ता है. संघ के सदस्यों पर उसकी अच्छी पकड़ है और उसकी संगठन क्षमता अच्छी है. वह वर्ष 1941 में अहमदाबाद शहर पहुंचा. व​ह गुजरात और काठियावाड़ में आरएसएस की गतिविधियों का मुख्य आयोजक है.

आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया और इसके हजारों नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. मधुकरराव ने शादी कर ली, एक लॉ कॉलेज में दाखिला लिया और नागपुर से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दक्षिण में एक छोटे से शहर चंद्रपुर में अपने पैतृक घर में रहने लगे. हालांकि उन्होंने आरएसएस नहीं छोड़ा. बाद में, वकालत करते हुए भी, उन्होंने संगठन के चंद्रपुर जिला प्रमुख के रूप में काम करना जारी रखा, एक ऐसा पद जो उनके पिता, नारायणराव भागवत ने उनके लिए रखा था. इन्हें नानासाहेब के नाम से भी जाना जाता है ये आरएसएस संस्थापक केबी हेडगेवार के सहयोगी थे.
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विनोद 😜😜अब भारत के अंधभक्त लोगों का क्या होगा और ओ  किस धर्म को टारगेट करेंगे 😁😁🫣🫣😁
31/08/2026

विनोद 😜😜अब भारत के अंधभक्त लोगों का क्या होगा और ओ किस धर्म को टारगेट करेंगे 😁😁🫣🫣😁

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