आर्ष विद्या समाजम - AVS Hindi

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स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🇮🇳❤️🙏
15/08/2026

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🇮🇳❤️🙏

23/07/2026

23 जुलाई – बाल गंगाधर तिलक जयंती | सार्वजनिक गणेशोत्सव आंदोलन के प्रेरणास्रोत 🇮🇳

जब ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने राजनीतिक सभाओं और सार्वजनिक अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाए, तब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने यह समझा कि भारत की सांस्कृतिक परंपराएँ लोगों को एकजुट करने का एक शक्तिशाली माध्यम बन सकती हैं।

1893 में तिलक ने महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव को लोकप्रिय बनाया और जो उत्सव मुख्यतः घरों तक सीमित था, उसे एक सामुदायिक उत्सव में परिवर्तित कर दिया। भगवान गणेश के पावन ध्वज तले हजारों लोग भक्ति कार्यक्रमों, देशभक्ति से प्रेरित भाषणों, विचार-विमर्श, पारंपरिक कलाओं तथा सामाजिक सुधार के कार्यक्रमों के लिए एकत्रित होने लगे। चूँकि धार्मिक सभाओं पर ब्रिटिश शासन द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने की संभावना अपेक्षाकृत कम थी, इसलिए ये उत्सव लोगों को संगठित करने और राष्ट्रवाद की भावना को पोषित करने का प्रभावी माध्यम बन गए।

तिलक का विश्वास था कि सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक एकता का जागरण किए बिना राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती। सार्वजनिक गणेशोत्सवों ने जाति और वर्ग के विभाजनों को कम करने, नागरिक सहभागिता को प्रोत्साहित करने तथा सामान्य नागरिकों को राष्ट्र के भविष्य पर विचार-विमर्श करने के लिए एक साझा मंच प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनका प्रसिद्ध उद्घोष, "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा।" भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरणादायक उद्घोष बन गया, और सार्वजनिक गणेशोत्सव ने उस भावना को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आज भी सार्वजनिक गणेशोत्सव की यह विरासत हमें स्मरण कराती है कि सांस्कृतिक परंपराएँ राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ कर सकती हैं, सभ्यतागत मूल्यों का संरक्षण कर सकती हैं और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना को प्रेरित कर सकती हैं।

23/07/2026

23 जुलाई – क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद की जयंती पर श्रद्धापूर्वक स्मरण 🇮🇳

अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की जयंती पर हम भारत माता के उन वीरतम सपूतों में से एक को श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं, जिनका जीवन अद्वितीय साहस, बलिदान और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण का उज्ज्वल उदाहरण था।

23 जुलाई 1906 को जन्मे आज़ाद ने अपना युवाकाल भारत की स्वतंत्रता के उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया। स्वतंत्रता के आह्वान से प्रेरित होकर वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के प्रमुख क्रांतिकारी बने और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

असहयोग आंदोलन के दौरान जब उन्हें बालक अवस्था में गिरफ्तार किया गया, तब उन्होंने अपना नाम "आज़ाद", अपने पिता का नाम "स्वतंत्रता" और अपना पता "जेल" बताया। उसी दिन से उन्होंने यह प्रण लिया कि अंग्रेज उन्हें कभी जीवित पकड़ नहीं पाएंगे—एक ऐसा वचन जिसे उन्होंने अद्भुत दृढ़ संकल्प के साथ निभाया।

27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में जब वे ब्रिटिश सैनिकों से घिर गए, तब चंद्रशेखर आज़ाद ने अपनी अंतिम गोली तक निर्भीक होकर संघर्ष किया। आत्मसमर्पण करने के बजाय उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान देना स्वीकार किया और सदैव "आज़ाद" रहने की अपनी प्रतिज्ञा निभाई। उनका अंतिम कार्य साहस, सम्मान और अटूट आत्मबल का अमर प्रतीक बन गया।

उनकी जीवनगाथा हमें स्मरण कराती है कि स्वतंत्रता अनगिनत वीर पुरुषों और महिलाओं के बलिदानों से प्राप्त हुई, जिन्होंने अपने जीवन से ऊपर राष्ट्र को रखा। आज जब हम चंद्रशेखर आज़ाद को स्मरण करते हैं, तब आइए हम केवल उनके बलिदान का ही नहीं, बल्कि उनके राष्ट्रप्रेम, अनुशासन, स्वाभिमान और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा के आदर्शों का भी सम्मान करें।

ईश्वर करे कि उनका जीवन प्रत्येक भारतीय को सत्यनिष्ठा, साहस और गहन उत्तरदायित्व की भावना के साथ राष्ट्र की सेवा करने की प्रेरणा देता रहे।

"दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,
आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे।"

वंदे मातरम्! जय हिन्द! 🇮🇳

13/07/2026

आर्ष विद्या समाजम द्वारा 6, 7 एवं 8 जुलाई 2026 को दिल्ली केंद्र में आयोजित सुदर्शनम् डी-रेडिकलाइज़ेशन मार्गदर्शक प्रशिक्षण त्रिदिवसीय शिविर (डी-रेडिकलाइज़ेशन काउंसलर्स प्रशिक्षण शिविर) – Level 1

13/07/2026

आर्ष विद्या समाजम के लिए गौरवपूर्ण क्षण!!!

कल (12/07/2026) श्री परमेश्वर तथा गुरु-परंपरा के आशीर्वाद से, सज्जनों के समर्थन से, आर्ष विद्या समाजम के लिए एर्नाकुलम जिले में अपना स्वयं का एक कार्यकेंद्र होने का स्वप्न साकार हो गया है!

27 वर्ष पूर्ण कर चुके AVS की गतिविधियों का अधिकांश भाग एर्नाकुलम जिले के त्रिप्पूणित्तुरा को केंद्र बनाकर ही संचालित हुआ था। 20 मार्च 2020 से तिरुवनंतपुरम को मुख्यालय बनाकर कार्य प्रारंभ किया गया।

आज केरल के अतिरिक्त कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा तथा पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कार्यकेंद्रों वाला, तथा भारत के अधिकांश राज्यों में गतिविधियों का आयोजन करने वाला एक संगठन बनने के बावजूद भी, "जिस भूमि पर पहला कदम रखा था", वहाँ अपना स्वयं का एक केंद्र होना कार्यकर्ताओं का स्वप्न था। त्रिप्पूणित्तुरा के निकट कांजिरामट्टम स्थित कार्यकेंद्र का उद्घाटन आचार्यश्री के. आर. मनोज जी महाराज द्वारा कल (12/07/2026) संपन्न किए जाने के साथ ही यह लक्ष्य साकार हुआ। इसके पश्चात् आचार्यजी ने आर्ष विद्या समाजम की अद्वितीय योजनाओं का विवरण प्रस्तुत किया।

अब तक की गतिविधियों में आर्ष विद्या समाजम के साथ खड़े रहे सभी सज्जनों के प्रति हार्दिक धन्यवाद। आगे भी आप सभी का समर्थन निरंतर प्राप्त होता रहे, ऐसी विनम्र प्रार्थना है।

स्नेह एवं आदर सहित,
आर्ष विद्या समाजम

आर्ष विद्या समाजम स्थापना दिवस!आज (8 जुलाई 2026):आर्ष विद्या समाजम के स्थापना के 27 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं...!आधुनिक युग ...
08/07/2026

आर्ष विद्या समाजम स्थापना दिवस!

आज (8 जुलाई 2026):
आर्ष विद्या समाजम के स्थापना के 27 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं...!

आधुनिक युग की चुनौतियों और संभावनाओं को पहचानकर, पंचमहा कर्तव्यों को वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से निभाते हुए, श्री परमेश्वर और आर्ष गुरु परंपराओं द्वारा दिए गए “कृण्वंतो विश्वमार्यम” (मानव और जगत को श्रेष्ठ बनाना) के महान मिशन को पूरा करने के लिए 1999 जुलाई 8 को सद्गुरुदेव आचार्यश्री मनोज जी महाराज द्वारा स्थापित आध्यात्मिक-दार्शनिक-शैक्षणिक-सांस्कृतिक-पुनर्जागरण संस्था ही आर्ष विद्या समाजम (AVS) है।

AVS इस लक्ष्य को दो तरह से पूरा करने का उद्देश्य रखता है: भावात्मक और संरक्षणात्मक।

भावात्मक:-
वास्तविक सनातन धर्म और उस दिव्य विज्ञान के लाभों को - (अर्थात पूर्ण स्वास्थ्य, समग्र व्यक्तित्व विकास, मानव विकास, संपूर्ण जीवन विजय, श्रेष्ठ समाज निर्माण, सर्वदुखों का समूल निवारण आदि) दुनिया भर में पहुँचाना।

संरक्षणात्मक:-
आज समाज जिन छह प्रकार की आसुरी शक्तियों का सामना कर रहा है, उनसे लोगों को मुक्त कराना।
इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उन्होंने 'दशतल प्रवर्त्तन पद्धति' (दस चरणों की कार्ययोजना) नामक एक अनूठी संगठनात्मक योजना तैयार की है।

सरल शब्दों में कहें तो आर्ष विद्या समाज की गतिविधियाँ तीन स्तरों पर हैं:

1) Intervention, Recovery & Rehabilitation (आपातकालीन रक्षा योजना / Rescue Operation)
समाज में हर किसी को बचपन से ही कई तरह से प्रभावित करने वाले छह प्रकार के ब्रेन वॉशिंग के शिकार होकर अपने, अपने परिवार, समाज, राष्ट्र और दुनिया के खिलाफ जाने वालों को वापस लाने का यह एक आपातकालीन चिकित्सा उपाय (रेस्क्यू ऑपरेशन) है। 'सुदर्शनम डी-रेडिकलाइजेशन' मार्गदर्शन के माध्यम से आर्ष विद्या समाज इस कार्य को करता है।

सामान्य ज्ञान, चर्चा के लिए तत्परता और सत्य को जानने पर उसे स्वीकार करने की बौद्धिक प्रतिबद्धता - इन तीन शर्तों को मानने वाले किसी भी व्यक्ति को सही रास्ते पर लाने की वैचारिक शक्ति से युक्त डी-रेडिकलाइजेशन काउंसलिंग कार्यक्रम!!!
न केवल रेडिकलाइजेशन के शिकार हुए लोगों को, बल्कि इन आसुरी शक्तियों के मिशनरी प्रवक्ता बने लोगों को भी वापस लाकर सनातन धर्म का प्रचारक बनाने का गौरवशाली इतिहास आर्ष विद्या समाज के पास है।

राष्ट्रविरोधी मतांतरण सहित गलत विचारधाराओं से रास्ता भटक रहे हजारों लोगों को सन्मार्ग पर लाने वाले महात्मा सद्गुरुदेव आचार्यश्री मनोज जी महाराज हैं।
अज्ञानता, गलतफहमी और ब्रेन वॉशिंग के कारण राष्ट्रविरोधी विचारों से प्रभावित हुए 8,500 से अधिक युवक-युवतियों को आचार्य जी पहले ही वापस ला चुके हैं!! इसमें से करीब एक हजार लोगों को रेडिकलाइजेशन का सामना करने की क्षमता मिली है। वापस आए सौ से अधिक लोग अपने अनुभवों को सार्वजनिक रूप से साझा करने के लिए तैयार हैं। बीस से अधिक लोग सनातन धर्म के प्रचारक और प्रचारिकाओं के रूप में सेवा कर रहे हैं। 4 लोगों ने अपने अनुभवों का वर्णन करते हुए पुस्तकें लिखी हैं।

2) जागरूकता या प्रतिरोध (PREVENTION):
गलत विचारों की ओर बढ़ने से रोकना इस क्षेत्र का कार्य है। दर्शन, इतिहास और वर्तमान समय को रेखांकित करते हुए समाज को प्रभावित करने वाले भ्रम को दूर करने का यह कार्यक्रम है। सटीक जागरूकता के माध्यम से लाखों लोगों को सही मार्गदर्शन देकर रेडिकलाइजेशन को रोकना संभव हुआ है। विभिन्न संस्थाओं को डी-रेडिकलाइजेशन काउंसलिंग में प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

3) मूलभूत समस्या समाधान (स्थायी योजना):
समस्याओं का स्थायी समाधान खोजने (कारण का पता लगाकर मूल सहित समस्या का समाधान करने) के साथ-साथ 'लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु' के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए AVS ने चार प्रकार की अनूठी गतिविधियाँ तैयार की हैं!

1. समग्र और वैज्ञानिक अनुष्ठान - अनुसंधान - प्रशिक्षण योजना: पाठ्यक्रम (शिवशक्ति योगविद्या, आध्यात्मिक शास्त्रम, भारतीय संस्कृति, विद्यार्थी निपुणता वर्ग (SEP: स्टूडेंट्स एक्सीलेंस प्रोग्राम), सुदर्शनम, मृत्युंजयम, संगठनात्मक शास्त्र, व्यायामकी विज्ञान) कक्षाएं, शिविर आदि।

2. धर्म प्रचारक पद्धति (संगठनात्मक योजना): सनातन धर्म प्रचारकों की पहचान कर, उन्हें प्रशिक्षित कर विभिन्न स्थानों और विभिन्न क्षेत्रों में तैनात करना।

3. संस्थाओं की योजना: साधना शक्ति केंद्र, विज्ञानभारती अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन अनुसंधान प्रतिष्ठान, विज्ञानभारती विद्या केंद्र, विज्ञानभारती लर्निंग सेंटर्स।

4. व्यापक और समग्र वास्तविक सेवा-सशक्तिकरण-संरक्षण गतिविधियाँ।
सनातन धर्म को दुनिया भर में पहुँचाने के महान लक्ष्य के हिस्से के रूप में, आर्ष विद्या समाज ने केरल के तिरुवनंतपुरम, एर्नाकुलम, त्रिशूर जिलों के साथ-साथ चेन्नई, बैंगलोर, महाराष्ट्र और दिल्ली में केंद्र शुरू किए हैं।
2026 में भारत के अन्य राज्यों और विदेशों में भी अपनी गतिविधियों का विस्तार करना इसका लक्ष्य है।

किन्तु, बीते हुए पथ पर यदि एक दृष्टि डालें, तो यह स्पष्ट होता है कि आर्ष विद्या समाजम की यात्रा सुगम और सुंदर नहीं थी!

एक ओर, विकास में भी बाधा उत्पन्न करने वाली आर्थिक विवशताएँ...! दूसरी ओर, मतांतरण माफियाओं तथा वोट बैंक की राजनीति से उत्पन्न होने वाली धमकियाँ और चुनौतियाँ...!!

अनेक झूठे मुकदमे...! दुष्प्रचार...!! निरंतर चलते रहे...!!!

किन्तु, इन सबका सामना कर पाना केवल सर्वेश्वर की करुणा, आर्ष गुरु-परम्परा के आशीर्वाद, सनातन धर्मशास्त्र की कृपा तथा आर्षविद्यासमाज के गुरुनाथ आचार्यश्री की सशक्त उपस्थिति एवं मार्गदर्शन के कारण ही संभव हो सका...!

निन्दा-स्तुति में हो, मान-अपमान में हो, सुख-दुःख में हो, जय-पराजय में हो अथवा लाभ-हानि में —
बिना विचलित हुए, स्थितप्रज्ञ बने रहने वाले सद्गुरु ही हमारे आदर्श हैं...!

जीवन की अंतिम श्वास तक, इस सत्कर्म-पथ पर
दृढ़ साहस के साथ आगे बढ़ते रहने के अटल संकल्प के साथ, राष्ट्रीय जनसमुदाय के लिए स्वास्थ्य-शिक्षा सेवाओं, समग्र सशक्तिकरण तथा संरक्षण के प्रयासों में Team AVS बिना थके, बिना डगमगाए, एकजुट होकर आगे बढ़ती रहेगी..!!

आर्ष विद्या समाजम (AVS) की अब तक की विकास-यात्रा में सहयोग प्रदान करने वाले तथा कठिन परिस्थितियों में हमारे साथ खड़े होकर सहायता करने वाले सभी शुभचिंतकों के प्रति हम अपनी निष्कपट श्रद्धा, प्रेम एवं कृतज्ञता व्यक्त करते हैं...! आगे भी आप सभी का हर प्रकार का सहयोग प्राप्त होता रहे, ऐसी प्रार्थना हम जगदीश्वर के श्रीचरणों में करते हैं..!

स्नेह एवं आदर सहित,
आर्ष विद्या समाजम 🚩

सुदर्शनम् डीरैडिकलाइज़ेशन मार्गदर्शक प्रशिक्षण शिविर (परामर्शदाता प्रशिक्षण) – स्तर 1आचार्य श्री के. आर. मनोज जी महाराज ...
05/07/2026

सुदर्शनम् डीरैडिकलाइज़ेशन मार्गदर्शक प्रशिक्षण शिविर (परामर्शदाता प्रशिक्षण) – स्तर 1

आचार्य श्री के. आर. मनोज जी महाराज के मार्गदर्शन में!!

आर्ष विद्या समाजम् (www.arshaworld.org) द्वारा 6, 7 और 8 जुलाई 2026 को डीरैडिकलाइज़ेशन परामर्शदाताओं (काउंसलर) के लिए एक विशेष प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया जा रहा है।

यह 15 स्तरों वाले विशेष प्रशिक्षण का पहला चरण है। इसका उद्देश्य ऐसे मार्गदर्शक (काउंसलर) तैयार करना है, जो आर्ष विद्या समाजम् की अनूठी और सफल "सुदर्शनम् डीरैडिकलाइज़ेशन काउंसलिंग" पद्धति में प्रशिक्षित हों।

📅 तिथि: 6, 7 और 8 जुलाई 2026
🕘 समय: सुबह 9:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक
📍 स्थान: एवीएस गुरुग्राम केंद्र, दिल्ली एनसीआर

कृपया 1 जुलाई 2026 तक नीचे दिए गए पंजीकरण फ़ॉर्म में अपनी जानकारी भरकर अपनी उपस्थिति की पुष्टि करें।

जो लोग ऑनलाइन जुड़ना चाहते हैं, वे भी पंजीकरण फ़ॉर्म भर सकते हैं।

पंजीकरण लिंक:
https://forms.gle/RLURWr5hiGW9MHCd7

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
📞 8943006350
📞 9074676026

04/07/2026

*स्वामी विवेकानन्द जी के महासमाधि दिवस पर उनका स्मरण*

एक समुद्री यात्रा के दौरान कुछ विदेशी मिशनरी बार-बार हिन्दू धर्म का अपमान कर रहे थे। स्वामी विवेकानन्द ने पहले धैर्य, गरिमा और तर्क के साथ उनका उत्तर दिया। किन्तु जब उनकी चेतावनियों के बावजूद अपमान जारी रहा, तब कहा जाता है कि विवेकानन्द जी उठे, उनमें से एक व्यक्ति का कॉलर पकड़कर दृढ़ता से कहा—

"यदि तुमने मेरे धर्म का एक बार भी और अपमान किया, तो मैं तुम्हें समुद्र में फेंक दूँगा।"

यह सुनकर वे मिशनरी स्तब्ध रह गए और शेष पूरी यात्रा के दौरान उन्होंने हिन्दू धर्म के प्रति फिर कभी कोई अनादरपूर्ण बात नहीं कही।

बाद में स्वामी विवेकानन्द ने अपनी इस प्रतिक्रिया के पीछे की भावना को स्पष्ट करते हुए पूछा, "यदि कोई तुम्हारी माँ का अपमान करे, तो तुम क्या करोगे?" उन्होंने हमें स्मरण कराया कि जिस प्रकार हम अपनी माँ का अपमान कभी सहन नहीं कर सकते, उसी प्रकार जब हमारे धर्म का जानबूझकर अपमान किया जाए, तब भी हमें उदासीन नहीं रहना चाहिए। सच्ची आध्यात्मिकता दुर्बलता नहीं है—वह विवेक, करुणा और आत्मसंयम से निर्देशित शक्ति है।

स्वामी विवेकानन्द जी के महासमाधि दिवस के इस पवित्र अवसर पर, आइए हम भारत के इस महान सपूत को कृतज्ञतापूर्वक नमन करें, जिन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक श्वास सनातन धर्म, भारत और समस्त मानवता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनका जीवन आज भी हमें निर्भय, आत्मविश्वासी, अपने शाश्वत मूल्यों में दृढ़ तथा ज्ञान, चरित्र और धर्मसम्मत आचरण के माध्यम से धर्म की रक्षा के लिए समर्पित रहने की प्रेरणा देता है।

आइए, हम उनके इस कालजयी संदेश के अनुसार जीवन जीने का प्रयास करें—

"उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति होने तक मत रुको।"

जय सनातन धर्म। 🙏🕉️

आज (4 जुलाई): स्वामी विवेकानन्द महासमाधि दिवस 🙏🕉️🙏1863 की 12 जनवरी को बंगाल में जन्मे स्वामी विवेकानन्द, सनातन धर्म–वेदा...
04/07/2026

आज (4 जुलाई): स्वामी विवेकानन्द महासमाधि दिवस 🙏🕉️🙏

1863 की 12 जनवरी को बंगाल में जन्मे स्वामी विवेकानन्द, सनातन धर्म–वेदान्त दर्शन के आधुनिक युग के सबसे शक्तिशाली वक्ता, प्रस्तावक तथा वैश्विक प्रभाव स्थापित करने वाले आध्यात्मिक आचार्य थे। 1893 में शिकागो में आयोजित वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन्स में दिए गए उनके भाषण के पश्चात वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आकर्षण का केंद्र बन गए! योग–वेदान्त दर्शन के लिए विख्यात वे भारत की संस्कृति और सनातन धर्म के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार किए गए! वे पूर्व और पश्चिम के बीच दर्शन, धर्म तथा विज्ञान के सेतु बन गए।

पूर्वाश्रम में नरेंद्रनाथ दत्त नाम से परिचित रहे यह अज्ञात भारतीय संन्यासी, 1893 में शिकागो में आयोजित मत संसद में अचानक प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचे! वहाँ हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व स्वामी विवेकानन्द ने किया था! पौरस्त्य एवं पाश्चात्य संस्कृतियों के संबंध में उनके व्यापक ज्ञान के साथ-साथ उनका उत्साहपूर्ण वक्तृत्व, प्रभावशाली संवाद-कौशल तथा विशाल मानवीय मूल्य—इन सबके सम्मिलित व्यक्तित्व ने पाश्चात्य जगत के लिए उन्हें एक अप्रतिरोध्य आकर्षण बना दिया।

बाद में स्वामी विवेकानन्द के नाम से विख्यात हुए नरेंद्र, श्रीरामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे। 1902 में उन्होंने अपना जीवन-दायित्व पूर्ण कर महासमाधि प्राप्त की। यद्यपि उन्होंने पृथ्वी पर केवल 39 वर्ष ही व्यतीत किए, तथापि पूज्य स्वामीजी विश्व को अमर योगदान देकर ही विदा हुए। उन्होंने पश्चिम बंगाल के बेलूड़ मठ को मुख्यालय बनाकर रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। यह संगठन भारत, अमेरिका तथा विश्व के अन्य भागों में हिन्दू आध्यात्मिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु कार्य कर रहा है।

अपने गुरु श्रीरामकृष्ण देव के इस वचन—कि समस्त प्राणी ईश्वरीय सत्ता की मूर्त अभिव्यक्ति हैं—से स्वामी विवेकानन्द अत्यन्त प्रभावित हुए; इसी कारण उन्होंने घोषणा की कि मानवता की सेवा के माध्यम से परमेश्वर की सेवा की जा सकती है! श्रीरामकृष्ण गुरु की महासमाधि के पश्चात स्वामी विवेकानन्द ने सम्पूर्ण भारत का व्यापक भ्रमण किया और ब्रिटिश भारत की वास्तविक स्थिति का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया! अपनी यात्राओं के दौरान जनसामान्य की घोर निर्धनता और पिछड़ेपन ने उन्हें अत्यन्त गहराई से प्रभावित किया! वे प्रथम आध्यात्मिक नेता थे जिन्होंने स्पष्ट रूप से यह समझा और उद्घोषित किया कि भारत के पतन का मुख्य कारण जनसामान्य की उपेक्षा है। इसके पश्चात वे संयुक्त राज्य अमेरिका गए और विश्व धर्म संसद में (जहाँ उन्होंने "अमेरिका की मेरी प्रिय बहनों और भाइयों..." से प्रारम्भ होने वाला अपना प्रसिद्ध भाषण दिया!) भारत का प्रतिनिधित्व किया! हिन्दू दर्शन के मूल सिद्धान्तों का प्रचार करते हुए उन्होंने अमेरिका, यूरोप तथा इंग्लैंड में सैकड़ों सार्वजनिक एवं निजी व्याख्यान तथा कक्षाएँ संचालित कीं।

शिक्षा का प्रसार करना, निर्धनों तथा महिलाओं का उत्थान करना आदि अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए उन्हें समर्पित व्यक्तियों के एक संगठन की आवश्यकता थी। जैसा कि उन्होंने बाद में कहा, "निर्धनों और उपेक्षितों के घर-घर तक महान आदर्शों (सनातन धर्म) को पहुँचाने वाली एक यंत्र-व्यवस्था को कार्यरत करना" उनकी आवश्यकता थी। "इसी यंत्र के रूप में कार्य करने के लिए" उन्होंने 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की! भारत तथा विश्व के अन्य देशों में अस्पतालों, विद्यालयों, महाविद्यालयों, छात्रावासों, ग्रामीण विकास केन्द्रों आदि का संचालन तथा भूकम्प, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के पीड़ितों के पुनर्वास एवं राहत कार्यों पर मिशन ने अपना ध्यान केन्द्रित किया! स्वामी विवेकानन्द ने अपनी युवावस्था में ही, मात्र 39 वर्ष की आयु में, इस संसार को त्याग दिया। किन्तु पृथ्वी पर अपने अल्प जीवनकाल में उन्होंने अत्यन्त महान योगदान दिए! उन्होंने भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परम्परा को पाश्चात्य जगत की ऊर्जस्विता के साथ समन्वित किया!

यदि हम ईश्वर की खोज करना चाहते हैं, तो स्वामीजी के ये वचन हमारी सहायता करेंगे—

“सफल होने के लिए आपके भीतर अत्यन्त दृढ़ निष्ठा और अद्भुत इच्छाशक्ति होनी चाहिए। दृढ़ संकल्प वाला व्यक्ति कहता है—‘मैं समुद्र पी जाऊँगा, अपनी इच्छा से पर्वतों को चूर-चूर कर दूँगा।’ ऐसी ऊर्जा धारण करो, ऐसी इच्छाशक्ति के साथ कठोर परिश्रम करो, और तुम अपने लक्ष्य तक पहुँच जाओगे।”

ईश्वर का साक्षात्कार करने की इच्छा रखने वालों के लिए स्वामीजी का उपदेश—

“अन्य सभी विचारों का त्याग कर, दिन-रात पूर्ण मनोयोग से ईश्वर की उपासना करो। इस प्रकार जब दिन-रात परमेश्वर की खोज की जाती है, तब वही स्वयं को प्रकट करते हैं और अपनी उपस्थिति का अनुभव भक्तों को कराते हैं।”

सनातन धर्म के प्रचार एवं संरक्षण के परम दायित्व का पालन करने का हम सबको आह्वान करने वाले उस महान क्रांतिकारी आध्यात्मिक गुरु के श्रीचरणकमलों में शत-शत कोटि प्रणाम...!
🙏

आज (3 जुलाई): परमपूज्य गुरुदेव श्री निखिलेश्वरानन्द परमहंस जी की महासमाधि दिवस 🙏🪷🕉️🪷🙏आर्ष विद्या समाजम् के संस्थापक एवं ...
03/07/2026

आज (3 जुलाई): परमपूज्य गुरुदेव श्री निखिलेश्वरानन्द परमहंस जी की महासमाधि दिवस 🙏🪷🕉️🪷🙏

आर्ष विद्या समाजम् के संस्थापक एवं निदेशक आचार्यश्री मनोज जी महाराज, पूज्य गुरुदेव श्रीमाली जी के शिष्य हैं। हमारे शास्त्रों में जिन परा एवं अपरा विद्याओं का केवल संकेत मात्र मिलता है, उनके पोषण और पुनरुद्धार करने में पूज्य गुरुदेव का अद्वितीय योगदान रहा है। आचार्यश्री मनोज जी महाराज को गुरुदेव से शक्तिपात दीक्षा भी प्राप्त हुई है।

21 अप्रैल 1933 को राजस्थान के जोधपुर के एक गाँव में पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में पंडित मुल्तान चंद श्रीमाली जी और रूपा देवी के पुत्र के रूप में जन्मे नारायण दत्त श्रीमाली जी ही आधुनिक विश्व के ऋषि श्रेष्ठ संपूज्य स्वामी निखिलेश्वरानंद परमहंस बने! बीसवीं सदी के महाऋषि थे श्रीमाली जी!

भगवती देवी से छोटी उम्र में विवाह करना पड़ा था, फिर भी श्रीमाली जी का मन ज्ञान-विज्ञान की खोज में ही लगा रहता था। उन्होंने उन महाविद्याओं को प्राप्त करने का संकल्प लिया जो सामान्य जन के लिए अप्राप्य थीं। क्या हमारे भारतीय शास्त्रों में वर्णित सभी बातें सत्य हैं? इन्हें प्रामाणिक रूप से कहाँ से सीखा जा सकता है? ऐसे ही प्रश्नों और विचारों में निमग्न होकर, सत्य की खोज के लिए उन्होंने गृह त्याग कर दिया। इसके पश्चात उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और अनेक गुरुओं की खोज में भटकते रहे। उनमें से कई मिथ्या और आडंबरपूर्ण भी निकले। कुछ आचार्य ऐसे भी थे, जिन्होंने उन्हें अत्यंत कठोर कष्ट दिए और कठोर अनुशासन के माध्यम से परीक्षा ली। उनमें से कई मिथ्या और आडंबरपूर्ण भी निकले। कुछ आचार्य ऐसे भी थे, जिन्होंने उन्हें अत्यंत कठोर कष्ट दिए और कठोर अनुशासन के माध्यम से परीक्षा ली। असंख्य कठोर कष्टों और यातनाओं के पश्चात उन्हें योग्य गुरुओं का सान्निध्य प्राप्त हुआ और वे सच्चे ज्ञान को अर्जित कर सके। ऋषिमंडल के सिद्धाश्रम के परमाचार्य, परम पूज्य सद्गुरु स्वामी सच्चिदानंद परमहंस के शिष्य बनने के उपरांत उन्होंने समस्त ज्ञान-विज्ञान में पारंगतता प्राप्त की!

बीस वर्षों की कठोर तपश्चर्या के बाद सिद्धि प्राप्त कर, गुरु श्री सच्चिदानंद परमहंस की विशेष आज्ञा से वे पुनः गृहस्थाश्रम का पालन करने हेतु अपने घर लौट आए। गृह लौटने के पश्चात उन्होंने हिंदी अध्यापक के रूप में भी कार्य किया। भगवती देवी और श्रीमाली जी के यहाँ तीन पुत्रों का जन्म हुआ—नंदकिशोर श्रीमाली, कैलाशचंद्र श्रीमाली तथा अरविंद श्रीमाली।

लुप्तप्राय भारतीय ज्ञान-विज्ञान को पुनर्जीवित कर तथा विद्यमान ज्ञान को अनुसंधान और तपस्या के माध्यम से पूर्ण शास्त्र के रूप में प्रस्तुत करने वाले, श्रीमाली जी बीसवीं सदी के महान ऋषि थे। भारतीय सांस्कृतिक और वैज्ञानिकी परंपरा, सनातन धर्म की शिक्षाओं तथा गूढ़ ज्ञान की विभिन्न धाराओं को प्रकाशित और प्रखर बनाने वाला उनका व्यक्तित्व अत्यंत विलक्षण था। क्रियायोग के रूप में प्रसिद्ध क्रिया कुंडलिनी योग, भारतीय सम्मोहन विज्ञान, मंत्र-तंत्र-यंत्र विद्या, हस्तरेखा शास्त्र, ज्योतिष, अंक ज्योतिष, प्राण विद्या, पारद विज्ञान, स्वर्ण तंत्र, आयुर्वेद तथा सूर्य विज्ञान जैसी गूढ़ ज्ञान-विज्ञान की विधाओं को जनसुलभ बनाने हेतु श्रीमाली जी ने निरंतर प्रयास किया। 1981 में उन्होंने “मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान” नामक पत्रिका का शुभारंभ किया। साथ ही, उन्होंने “सिद्धाश्रम साधक परिवार” नामक संगठन की भी स्थापना की। वे उन दिव्य विद्याओं को, जो भ्रांतियों और अज्ञानता के कारण सामान्य जन के लिए दुर्लभ और अप्राप्य मानी जाती थीं, विधिवत रूप से जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए सदैव तत्पर रहे।

श्रीमाली जी अनेक देशों को सम्मिलित करने वाले वर्ल्ड एस्ट्रोलॉजी कॉन्फ़्रेंस के अध्यक्ष रहे। उन्हें 1987 में "तंत्र शिरोमणि", 1988 में "मंत्र शिरोमणि" की उपाधियाँ प्राप्त हुईं। 1982 में भारत के उपराष्ट्रपति डॉ. बी. डी. जत्ती ने उन्हें "महामहोपाध्याय" की उपाधि से सम्मानित किया। 1989 में भारत के उपराष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें "समाज शिरोमणि" सम्मान प्रदान किया। 1991 में नेपाल के प्रधानमंत्री भट्टराई ने भी उनके उत्कृष्ट सामाजिक एवं आध्यात्मिक योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया।

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Essence of Sakthipat, Ten Mahavidyas, Gopaniya Durlabh Mantrom Ke Rahsya, Himalaya Ke Yogiyom Ki Siddhian, Shishyopanishad, Durlabhopanishad जैसे अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों सहित श्रीमाली जी ने हिंदी और अंग्रेज़ी में विपुल साहित्य की रचना की है।

3 जुलाई 1998 को महासमाधि को प्राप्त हमारे परमगुरु, संपूज्य गुरुदेव श्रीमाली जी, अर्थात् स्वामी निखिलेश्वरानंद परमहंस जी के पावन श्रीचरणों में शत-शत कोटि प्रणाम।

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