22/05/2026
जिन्होंने सत्ता बचाने की भूख में संविधान को बंधक बनाया, लोकतंत्र का गला घोंटा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुचली और पूरे देश पर आपातकाल थोप दिया, वे आज राष्ट्रभक्ति और लोकतंत्र पर ज्ञान बाँटते फिर रहे हैं। यह वही लोग हैं जिन्होंने राजनीतिक विरोध को अपराध बना दिया था, हजारों विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया था, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी थी और जनता की आवाज़ को दबाने का हर संभव प्रयास किया था।
सन् 1975 में लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है। 1976 में कांग्रेस सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान की मूल भावना को कमजोर करने का प्रयास किया, केंद्र की शक्तियों को असामान्य रूप से बढ़ाया गया और लोकतांत्रिक संस्थाओं को नियंत्रित करने की कोशिश हुई। उस दौर में सत्ता को राष्ट्र से ऊपर रखा गया और “इंदिरा इज़ इंडिया” जैसी मानसिकता ने लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाई।
आज वही कांग्रेस और उसके समर्थक दूसरों को “गद्दार” कहने का दुस्साहस कर रहे हैं। देश की जनता सब जानती है लोकतंत्र के असली गुनहगार कौन थे, संविधान पर सबसे बड़ा आघात किसने किया था और किसने सत्ता के लिए पूरे राष्ट्र को भय और दमन के वातावरण में झोंक दिया था।
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि असहमति का सम्मान करने की संस्कृति है। जिन लोगों ने कभी इस देश की जनता से बोलने का अधिकार तक छीन लिया था, उन्हें लोकतंत्र पर उपदेश देने से पहले इतिहास के आईने में स्वयं को देखने की आवश्यकता है।