25/02/2026
गरीबों की आस, वंचितों की आवाज और रसड़ा की शान — आदरणीय उमाशंकर सिंह (विधायक, रसड़ा – जनपद बलिया )आज जिस दौर से गुजर रहे हैं, वह केवल एक जनप्रतिनिधि की पीड़ा नहीं, बल्कि इंसानियत की कसौटी है।
दो वर्षों से अधिक समय से वे जीवन और मृत्यु के बीच मौन तपस्या कर रहे हैं। जिसने अपना जीवन जनता के दुःख-दर्द को कम करने में लगा दिया, आज वही जननायक अपनी ही सांसों के लिए संघर्षरत है। जिनके दरवाज़े पर कभी सैकड़ों ज़रूरतमंदों की भीड़ लगी रहती थी, आज वही घर एकांत और चिकित्सा संघर्ष का साक्षी बना हुआ है।
विधानसभा का सत्र किसी विधायक के लिए केवल औपचारिकता नहीं होता — वह जनता की आवाज़, उनके अधिकारों और सपनों का मंच होता है। परंतु स्वास्थ्य की ऐसी विकट परिस्थिति है कि वे एक घंटे के लिए भी सदन में उपस्थित नहीं हो सके। यह अनुपस्थिति नहीं, बल्कि एक कर्तव्यनिष्ठ जनसेवक की विवशता है।
आज स्थिति यह है कि उनके आवास पर नर्स या डॉक्टर तक का प्रवेश सीमित है। उनके लिए अब राजनीति नहीं, व्यवसाय नहीं, कोई पद नहीं — केवल जीवन की डोर को थामे रखना ही सबसे बड़ा संघर्ष बन गया है। समस्त समय, समस्त साधन, समस्त ऊर्जा — सब कुछ केवल सांसों को बचाने में समर्पित है।
ऐसे समय में यदि कोई संस्था या व्यक्ति असंवेदनशील होकर उन्हें मानसिक या प्रशासनिक पीड़ा देने का प्रयास करे, तो यह केवल अन्याय नहीं बल्कि मानवता के मूल्यों का हनन है। जब माननीय न्यायालय भी दया और मानवीय आधार पर दुर्लभ मामलों में राहत प्रदान करते हैं, तब एक जनसेवक के जीवन-संघर्ष में संवेदना और करुणा की अपेक्षा करना क्या अनुचित है?
यह समय आरोपों का नहीं, बल्कि आशीर्वाद का है। यह समय आलोचना का नहीं, बल्कि प्रार्थना का है।
प्रभु से यही प्रार्थना है कि वे उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य लाभ दें, और जो भी हृदय कठोर हो गए हैं, उनमें करुणा का संचार करें।
रसड़ा की धरती, बलिया की माटी और हजारों गरीब परिवारों की दुआएं उनके साथ हैं।
संघर्ष की इस घड़ी में भी विश्वास अडिग है —
जनसेवक की सांसों की यह लड़ाई अवश्य विजय में बदलेगी।
fans Uma Shankar Singh