03/02/2026
एपस्टीन फाइल को लेकर आजकल भारत में हाहाकार मचा हुआ है.. यहां के लोग हैरान हैं कि विदेश के अमीर पुरुष कितने दरिंदे हैं।
गरीब लोग दरिंदगी को अमीरी से जोड़ रहे,
आस्तिक लोग दरिंदगी को नास्तिकता से जोड़ रहे..
कुछ तथाकथित राष्ट्रवादी दरिंदगी को वेस्टर्न कल्चर से जोड़ रहे..
ताकि एक बात आराम से कही जा सके कि हम उनके जैसे नहीं हैं।"
जैसे भारत में कोई गरीब, कोई आस्तिक धार्मिक, कोई संस्कृति रक्षक किसी नाबालिग बच्ची का कभी रेप ही न किया हो।
सच्चाई ये है कि दरिंदगी की कोई क्लास, कोई धर्म, कोई संस्कृति नहीं होती। पितृसत्ता दुनिया में हर जगह है, बस कहीं थोड़ा कम, थोड़ा ज्यादा है।
भारत में रोज बच्चियों से बलात्कार होता है। मंदिरों में, घरों की चारदीवारी में, देवी पूजक समाज में और अपराधी कोई विदेशी अमीर नहीं, बल्कि अक्सर पिता, भाई, चाचा, गुरु, मौलवी, पुजारी, पड़ोसी होता है। यह पितृसत्तात्मक मानसिकता का ही परिणाम है।
और एपस्टीन फाइल में बच्चियों का मांस खाने की जो बात है, वो हमारे भारत के लिए नया नहीं है। निठारी कांड के नरभक्षी सुरेंद्र कोली को भूल गए क्या? कितनी बच्चियां अपहरण करके खा ली गईं यहां! भूल गए?
आज ही एक खबर सामने आई है कि 14 साल की नाबालिग बच्ची के साथ उसके ही बाप ने बलात्कार किया।
अब इसे किस कल्चर में डालेंगे?
वेस्टर्न? नास्तिक? अमीरों की साज़िश?
सच ये है कि यहां एपस्टीन फ़ाइल की इसलिए ज्यादा चर्चा हो रही है क्योंकि वो उन्हें आईना नहीं, पर्दा देती है।
वो कहने का मौका देती है "देखो, बुराई बाहर है।"
जबकि असली सवाल ये होना चाहिए कि बच्चियां हमारे घरों में क्यों सुरक्षित नहीं हैं?
हमारा धर्म, हमारी संस्कृति, हमारी नैतिकता उन्हें क्यों नहीं बचा पाई?
जब तक हम दरिंदगी को दूसरों की पहचान बनाते रहेंगे और अपने समाज की संरचना पर सवाल नहीं उठाएंगे तब तक हर एपस्टीन फ़ाइल सिर्फ़ एक तमाशा होगी और हर बच्ची एक संभावित शिकार।