22/10/2025
ओबीसी आयोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और पहुंचते ही चिल्लाने लगा।
कि "शोषण के नाम 35% आरक्षण दे न बाबा" , बहुत तगड़ा शोषण हो गया बाबा ...
कोर्ट ने चश्मा उतारकर पूछा “क्या शोषण हुआ है बेटा?”
ओबीसी आयोग - "मत पूछिए माई लाड़, हम बोल देंगे तो धरती फट जाएगी आसमान गिर जाएगा...
कोर्ट- अबे भूमिका न बनाओ सीधा सीधा बताओ क्या शोषण हुआ है।
ओबीसी आयोग - माईबाप जब घर के सामने से जनरल कास्ट वाले निकलते हैं तो हमे खड़ा होना पड़ता है।
कोर्ट - हें , क्यों खड़ा होना पड़ता है, जनरल वाला बोलता है क्या खड़े होने को , नाम बताओ उसका ,अभी वारंट जारी करते हैं।
ओबीसी आयोग - नही बोलता तो नही है! लेकिन माईलाड़ जनरल वाले हमे पढ़ाई से वंचित रखते हैं।
कोर्ट - लेकिन सरकारी स्कूल तो सरकार चलाती है,और प्रायवेट स्कूलों मे तो जिसके पास भी देने के लिए फीस हो वो सभी जा सकते हैं ! तुमको पढने से कौन जनरल रोक सकता है।
ओबीसी आयोग - माईलाड आप समझ नही रहे हैं , हमको अछूत बोलकर मारा पीटा जाता है ! इसलिए हमे 35 प्रतिशत दो।
कोर्ट - “अच्छा... लेकिन ये जौनपुर का रामखेलावन हरिजन तो कह रहा है ! कि यादव जी हमें अछूत कह के मारे हैं ; और मेरा घर जला दिए हैं।
ये कौन-सा लाचारी है ओबीसी की?”
ओबीसी आयोग हकलाकर— "माईबाप, वो... वो तो... सामाजिक समरसता और जातिए एकता के लिए हम खाली रामखेलावन को प्यार से समझा रहे थे कि ! पूजा-पाठ सब ढोंग है, हिंदू देवियां गंदी हैं और देवता लंपट हैं।
इनका पूजा पाठ न करके बौद्ध बनो।
कोर्ट मुस्कुराया — तो उसके लिए सबको मारते फिरोगे?
और अभी ले चल रहे हैं ! रामखेलावन को तुम्हारे घर ,उसको अपने साथ मे बिठाकर अपने बर्तनों मे खिलाओगे?
ओबीसी आयोग- 🤔अम्मा नही मानेंगी माईलाड😐
कोर्ट -फिर किस समानता कि बात कर रहे हो और किस शोषण की भरपाई मांग रहे हो?”
ओबीसी आयोग ने तुरंत जवाब दिया —“माईबाप, बात सामाजिक न्याय की है।
“हमारे समाज के लोग बहुत पिछड़े हैं!”
हमारा राजनीतिक नेतृत्व बहुत कम है।
कोर्ट — वर्तमान मे पूरे देश मे सत्रह मुख्यमंत्री पिछड़े समुदाय से आते हैं।
यहां तक कि प्रधानमंत्री भी ओबीसी समुदाय से हैं।
और बहुत जगह OBC ही स्थानीय शक्ति-संरचना (प्रधान, ठेकेदार, थानेदार, नेता) में हैं।
और कौन सा राजनीतिक नेतृत्व चाहते हो भाई।
सब खामोश।
कोर्ट ने कलम रख दी और बोला - तुम कहते हो कि “जनरल निकलते हैं तो OBC खड़े हो जाते हैं” ! जबकि सच्चाई पूरी तरह से उल्टी है।
हकीकत ये है कि गाँवों में सामाजिक आर्थिक प्रभुत्व OBC जातियों (यादव, कुर्मी, जाट, लोध, पटेल आदि) का ही है।
दलितों की रोज़मर्रा की दिक्कतें इन्हीं वर्गों से ज्यादा हैं।
और टकराव भी इनसे ही ज़्यादा दिखती है।
तुम कहते हो कि “OBC पर छुआछूत होती है”! जो कि ऐतिहासिक रूप से असत्य है।
क्योंकि लगभग सभी ओबीसी जातियों के राजा रहे हैं ! और खुद को क्षत्रिय ही मानती हैं।
सिर्फ आरक्षण के लिए पिछड़ा बन जाती हैं।
छुआछूत का सीधा निशाना SC समुदाय रहा है ! जैसे कि चमार, खटिक, मुसहर,आदि जो भी चमड़ा या सफाई व्यवसाय से जुड़े थे।
संविधान और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े भी यही बताते हैं —
SC/ST अत्याचारों के मामलों में आरोपी प्रायः OBC या स्थानीय प्रभुत्वशाली जातियों से होते हैं।
जो वाकई मे छुआछूत के शिकार हैं, शोषित हैं उनको उस दलदल से निकालने के बजाय ! अपने स्वार्थ मे अंधे होकर तुमने बहस का मुद्दा ही मोड़ दिया।
मतलब जो आरक्षण पिछड़ापन दूर करने के लिए दिया जा रहा था उसको जनसंख्या आधारित कर दिया।
ताकी तुम जैसे लठैत और अमीर हो जाएं ! और जो वाकई मे पिछड़ा है वो पिछड़ा ही रह जाए।
और इसके लिए तुम असली पीड़ित (SC,st) की जगह “OBC को पीड़ित” दिखाकर आरक्षण के विस्तार के लिए नैरेटिव गढ़ रहे हो।
ओबीसी आयोग - “हमने क्या किया ! हमारी क्या गलती है माईलाड?”
कोर्ट - “तुमने शोषण के नाम पर सत्ता पायी और अपना पेट भरने मे लग गये।
गरीब उसी हालत में रहा ! जाति बदल गयी , पर भूख नही मिटी।”
अब देश में सिर्फ दो ही जातियाँ बची हैं।
पहला जो खाता है, और दूसरा जो "खाए जाने के लिए" आंकड़े बनता है।
35%, 27%, 15% ये सब सिर्फ सियासी शेयर मार्केट के इंडेक्स हैं।
जहाँ इंसान की कीमत, वोटबैंक से तय होती है।
और अंत में कोर्ट का आदेश - “अब जो भी खुद को अगला शोषित घोषित करेगा,
वो फॉर्म भरते समय अपनी जाति के साथ बैंक बैलेंस भी लगाएगा।”
क्योंकि अब जाति नहीं, इनकम स्लिप ही असली प्रमाणपत्र है।
नोट- ऐसे मुद्दों पर बिना एग्रेसिव हुए या बिना गाली दिए लिखना बड़ा ही मुश्किल है भाई।
खैर होई हैं सोई जे राम रचि राखा