27/06/2025
कानपुर चलो.... कानपुर चलो.... 27 जून स्मृति दिवस सती चौरा घाट, कानपुर* चलो..
सम्मानित मेरे वीर, संघर्षशील, आत्मगौरव से भरे निषाद समाज के भाइयों और बहनों,
मैं हर वर्ष इस घाट पर सिर झुकाने नहीं आता प्रतिज्ञा निभाने आता हूँ।
मैं आप सभी से आह्वान करता हूँ की
• हर निषाद परिवार यह इतिहास अपने बच्चों को सुनाए।
• हर युवा इस घाट की मिट्टी को माथे पर लगाए।
• हर गांव, हर टोला, हर नदी किनारा — इतिहास से वर्तमान तक की लड़ाई का केंद्र बने।
*हम स्मारक बनाएँगे, इतिहास पढ़ाएँगे, अधिकार दिलाएँगे*
• सती चौरा और मेसकर घाट को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की माँग करेंगे।
• क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट की सच्चाई को स्कूलों के पाठ्यक्रम में लाएंगे।
• और निषाद समाज को उसका राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक न्याय दिलाएँगे।
आज हम उस पवित्र धरती की बात कह रहा हूं, जहाँ केवल गंगा नहीं बहती — यहाँ बहता है हमारे पूर्वजों का बलिदान, शौर्य, और वो इतिहास जिसे कभी दबा दिया गया, मिटा दिया गया, लेकिन अब हम उसे *फिर से लिखने आए हैं। सती चौरा घाट: जहाँ अंग्रेज डुबोए गए, क्रांति जगी* साल था 1857 — जब देश की आजादी की पहली चिंगारी सुलगी। कानपुर का यह सती चौरा घाट सिर्फ एक घाट नहीं — यह क्रांति का तीर्थ है।
जब अंग्रेजों की सेना गंगा पार करने पहुंची, तो हमारे निषाद पूर्वजों ने उन्हें नावों में बैठाया लेकिन पार नहीं कराया। *बल्कि उन्हें गंगा में डुबोकर मौत दी।* नाविक नहीं, वे योद्धा थे। गंगा की लहरों में उन्होंने स्वतंत्रता की आग जलाई।
*मेसकर घाट: प्रतिशोध में हुआ नरसंहार*
इस क्रांति से ब्रिटिश सत्ता बौखला गई। उन्होंने देखा कि यदि निषाद समाज उनके साथ नहीं है, तो भारत में उनकी हुकूमत का अंत तय है। और फिर उन्होंने रचा भयानक षड्यंत्र *मेसकर घाट पर सैकड़ों निषादों को बिना मुकदमा चलाए फाँसी दे दी गई।* कोई वकील नहीं, कोई सुनवाई नहीं, कोई आँकड़ा नहीं है। उनका गुनाह सिर्फ इतना था — उन्होंने भारत माता से प्रेम किया, स्वराज की नैया को खेने का साहस किया।
*स्टीफन और क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट: बदनामी की साजिश*
फिर ब्रिटिश संसद में स्टीफन नाम के सांसद ने एक बिल प्रस्तुत किया:
*❝ये मछुआ, केवट, बिंद, मल्लाह — ये जल, जंगल, जमीन को जानते हैं। अगर संगठित हो गए तो अंग्रेज़ी हुकूमत खत्म हो जाएगी। इन्हें ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित किया जाए।❞* और वहीं से बना — *क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871* जिसने हमारे पूरे समाज को कानूनी रूप से अपराधी घोषित कर दिया। ये कोई कानून नहीं था — ये बदले की भाषा थी, दमन की योजना थी, और समाज को सदियों तक गुलाम बनाए रखने की साजिश थी।
*इतिहास ने हमें मिटाया, पर हम मिटे नहीं*
*कितने निषादों की हत्या हुई — कोई आँकड़ा नहीं।*
*कितनी माताओं ने बेटे खोए — कोई लेख नहीं।*
*कितने परिवार उजड़े — कोई किताब नहीं।*
लेकिन क्या हम भूल सकते हैं? नहीं! हमारे पुरखे इतिहास की किताबों में नहीं, हमारी नसों में हैं, हमारे लहू में हैं।
*आज की हमारी लड़ाई:* 1857 में हमने नाव से लड़ाई लड़ी थी, आज 2025 में हम संविधान, कलम और वोट से लड़ रहे हैं।
• आज निषाद समाज OBC में पृथक पहचान और आरक्षण के लिए लड़ रहा है।
• मत्स्य विभाग की योजनाएं — इंजनबोट, बीज, बीमा, अनुदान — मछुआ समाज की रीढ़ बन रही हैं।
• तालाबों, नदियों की नीलामी में मछुआ समाज को वरीयता मिल रही है।
• हमारी बात अब विधानसभा से लेकर संसद तक पहुंच रही है।
जिस समाज को “क्रिमिनल” कहा गया था, वही अब “क्रांतिकारी” बनकर नेतृत्व कर रहा है।
*यह केवल श्रद्धांजलि नहीं — यह चेतावनी है* जो समाज अपने इतिहास को भूल जाता है, वह मिट जाता है। लेकिन निषाद समाज *जाग चुका है, उठ चुका है और नेतृत्व के लिए आगे बढ़ रहा है।*
गंगा की धार में जो बहे, वो सिर्फ पानी नहीं था — वो निषादों का लहू था, जो भारत की आज़ादी की नींव बना। जिन्होंने फाँसी झूलकर डर को मारा, अब उन्हीं के वारिस लोकतंत्र में नया सूरज उगाएँगे। हम मिटे नहीं हैं, हम अब नेतृत्व कर रहे हैं — *और जबतक निषाद समाज जीवित है, तबतक न इतिहास दबेगा, न अधिकार रुकेगा।*
"जब बहादुरी लहू में होती है,
तब ज़ंजीरें भी आज़ादी का रास्ता बन जाती हैं।"
आज हम उस इतिहास को नमन करते हैं, जिसे जानबूझकर भुला दिया गया।
उन वीर सपूतों को याद करते हैं, जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में
अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, पर इतिहास की किताबों में जगह नहीं मिली।
*लोचन निषाद*
*समाधान निषाद*
और उन हज़ारों गुमनाम निषाद सेनानियों को
हम सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
जिनका जुर्म सिर्फ इतना था कि:
वो नदी पुत्र थे,
*वो स्वाभिमानी थे,*
वो अंग्रेजों के सामने झुके नहीं।
*1857 की क्रांति में सती चौरा घाट की धरती पर*
इन वीरों ने फिरंगियों को गंगा की धार में बहा दिया था।
नतीजा बिना मुकदमा, बिना सुनवाई, " *कच्ची फांसी* " दे दी गई।
लेकिन उनकी कुर्बानी की लौ, आज भी सती चौरा घाट की हवाओं में ज़िंदा है।
*अब हमारी ज़िम्मेदारी है*
कि हम न सिर्फ अपने पुरखों को याद करें,
बल्कि उनकी कुर्बानी को नई पीढ़ी तक पहुँचाएँ।
*27 जून 2025, शुक्रवार* सती चौरा घाट, कानपुर
इस दिन आइए
हम मिलकर लोचन निषाद और समाधान निषाद की शहादत को नमन करें,
और यह संकल्प लें कि हम
*अपने अधिकारों की लड़ाई को जारी रखेंगे,*
*अपने इतिहास को कभी नहीं भूलेंगे।*
*"जो अपने इतिहास को भूल जाते हैं,*
*वो अपना भविष्य भी खो देते हैं।"*
आइए, एकजुट हों
अपने इतिहास को जानें,
अपने गौरव को पहचानें,
और अपने हक के लिए आवाज़ उठाएँ।
*श्रद्धांजलि कार्यक्रम में सभी की उपस्थिती अपेक्षित है।*
आपका एक कदम, एकता की नई मिसाल बन सकता है।
*संघर्ष से सफलता की उड़ान*
मैं हूँ निषाद क्रांति का सिपाही!
निषाद बोलेगा, भारत बदलेगा!
मछुआरों की आज उठाने वाले दर्जनों नेताओं की हत्या और संदिग्ध मोंते हुई हैं।
देखना है मछुआ समुदाय की आवाज उठाने वाले डॉक्टर #संजय निषाद जी कब तक जिंदा रहते हैं.
समाज कब तक डॉक्टर संजय जी जिंदा रख पाता है इन राजनीतिक भेड़ियों से..
कोई बहाना नहीं – सिर्फ़ परिणाम
*आइए!*
*हम मिलकर इतिहास रचें!*
आपका
निषाद राज का सेनानी...,
आपका साथी
आपका सिपाही
आपका प्रतिनिधि
आपका मार्गदर्शक
निषाद राज वंशज, डॉ. संजय कुमार निषाद पॉलिटिकल गॉडफादर ऑफ फिशरमैन,
राष्ट्रीय अध्यक्ष, निषाद पार्टी
मत्स्य मंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार
विस्तृत जानकारी के लिए 8840 499 545 पर एसएमएस या संपर्क करें
https://youtu.be/L-XuqUULQho?si=WnFMNPczbjGwAoAu
https://youtu.be/jbMeyDBqrTs?si=f9-urPatrA2-OlF-
https://youtu.be/9hylQ_1ag_8?si=lKhSH5jB0f1cdvcr
https://youtu.be/OXXqk0QqAYg?si=dCBdZeuHi5esLxEO
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