04/06/2026
मोकामा शटल का 100 साल-
हम लोग बचपन में जब पटना जाया करते थे, तब सबसे पहले प्रायोरिटी होती थी कि मोकामा शटल पकड़े और बिल्कुल ही टाइम पर पटना पहुँच जाएं। बिल्कुल ही फ़िक्स टाइम था। उस वक़्त कभी ख़याल नहीं आया कि ये ट्रेन इतनी पुरानी है।
अभी हाल में एक दस्तावेज़ पलटते हुए पता चला कि 1 जून 1926 को मोकामा से पटना के लिए शटल ट्रेन शुरू हुई। पहले बार बार लगता था कि मोकामा से ही क्यों ? लेकिन अब पता है कि मोकामा की अहमियत उसके घाट की वजह कर है।
गंगा नदी के एक किनारे बसा मोकामा पटना ज़िला का हिस्सा है, और मोकामा शब्द maqaam मक़ाम مَقام से आया है, जिसका मतलब होता है, जगह, स्थान, पड़ाव, ठिकाना। यानी सफ़र के दौरान आराम करने के लिए ठहरने की जगह। पुरानी उर्दू किताब में भी मोकामा को मुक़ामा कह कर ही ख़िताब किया गया है।
मोकामा की दूसरी जानिब तिरहुत का बेगूसराय है, जिसके नाम में सराय जुड़ा हुआ है, जो कभी किसी बेगम या बेग के नाम पर बसा एक सराय था।
जब मोकामा के हथिदह पर सिमरिया (राजेंद्र सेतु) पुल नहीं बना था, तब लोग नाव और स्टीमर से गंगा नदी पार किया करते थे। और अधिकतर स्टीमर रेलवे द्वारा चलाया जाता था। ये जगह नार्थ और साउथ बिहार के इलाक़े को जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण जगह थी। इसलिए यहाँ पर राजेंद्र सेतु नामक पुल बनाया गया, इसके बाद पटना के अंदर गांधी और जेपी सेतु बना।
मोकामा शटल का मोकामा से चलने की असल वजह ये है कि राजधानी पटना जाने के लिए लोग बेगूसराय से नाव और स्टीमर से मोकामा आयेंगे और फिर ट्रेन पकड़ पटना जाएँगे। और इसी वजह कर इस इलाक़े मंडी, बाज़ार और कारख़ाने काफ़ी फले फूले। आज मोकामा शटल का रूट पूरे 100 साल का हो चुका है तो एक पोस्ट तो बनता ही है।
अब तो मोकामा शटल हर हॉल्ट पर रुकती है, पहले मोकामा से खुलने के बाद बाढ़, बख़्तियारपुर, फ़तुहा, पटना सिटी और फिर पटना जंक्शन जाती थी। उस वक़्त वो सुबह 9 बजे खुलती थी और 12:55 में पहुँचा देती थी।