28/01/2022
लहरदार रेत के सागर में खिला है एक फूल सा ,
जिसकी जङें तक आँधी नें उघाङ दी है !
हम #थळियों को जीना सिखाता आ रहा सदियों से ,
हर मुश्किल से टकराना , सीना तान खङे रहना !
पानी की खोज में जङों को भेज देता है पाताल तक ,
कहता सा लगता है सरे राह :-
निर्जन , निर्जल , बियाबान , सुनसान इस रेत के सागर में
लू - आँधी के थपेङे सहकर , मुर्झाने का नाम न लेता !
मैं सदियों से अपने देहार्पण से , जीवन नया बसाता हूँ !
छिन्न - भिन्न , क्षत - विक्षत होकर , फिर से चमन हो जाता हूँ !
#खींप तुम अमर हो सदियों से ! #जङें_गहरी_होने का #ओखाणा कदाचित तुम्हें और तुम्हारी जीवटता को देखकर ही कहा गया होगा ! अनेंकों बार काटे जाने के बावजूद तुम तुम्हारी जीने की ललक नहीं छोङते ! कितने जहीन हो तुम ? कितने जीवट हो तुम ? तुम्हारी ये प्रबलता , जीने की उत्कट अभिलाषा थार को जीना सिखाती है ! #बङियों में , #साँपङियों में , #सूथियों में किसी अल्हङ नारी की गुंथी केशराशि से तुम कितने खूबसूरत हो जाते हो !
मिलाप और एकता का संदेश देते ओ प्यारे खींप ! तुम #काईयों और #छज को एकसूत्र में बाँधे रखते हो ! सर्वस्व अर्पण करके भी प्रीत निभाना तुझे ही आया ! आबाद रहो तुम , जिंदाबाद रहो तुम , कि तुम हमारी प्रेरणा हो ! तुम्हारा उगना , फूलना और फलना कभी व्यर्थ नहीं गया , तुमनें जी मरकर अपने थार की #मरजाद को जीवित रखा है ! यूँ ही खिले रहो प्यारे खींप !!
#धरा_सुरंगी_ढाट
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