20/05/2022
यदि सत्ताधारियो को उर्दू या अरबी में बसाए नामावलियो से दिक्कत है तो उन्हें निराशा हाथ लगेगी उन्हे यह जान लेना चाहिए लखनऊ शब्द में किसी भी प्रकार से उर्दू या अरबी शब्द नही है राजा लाखन पासी से "लखन"और पासियो के बस्तियों "मऊ" शब्द से संबोधित किया जाता रहा है इसलिए यहां शुरुवाती नाम लखनमऊ था ,जो हिंदी भाषा शब्दावलियों में भी फिट बैठती है , लखनमऊ लखनऊ यह समयावधि में बदला नाम है जो यहीं के भाषा भाषी का है तो नाम से दिक्कत क्यों..?
लखनऊ में हैबतमऊ हैबत पासी द्वारा बसाया गया , अहिमामऊ, मवईया जितने भी मऊ शब्द से गांव दिखेंगे वहां आज भी पासी बिरादरी की बसाहट है लखनऊ के जीतने पुराने कस्बे जेसे संडीला मलिहाबाद, कन्समंडी हैबत मऊ पुराने कस्बे है सब पासी शाशको द्वारा कभी ना कभी शासित रहे है और उन्ही के ज़माने से वह नाम है
यदि यह लक्ष्मण के नाम से होता तो "लक्ष्मण मऊ" होना चाहिए था बल्कि ऐसा भी नही है बात गले से उतरे जो जबकि लक्ष्मण का संबध सुल्तानपुर के एक जगह लक्ष्मण पुर है वहां से भी बताया जाता हैं , जो तर्क देते है की लुटेरों द्वारा बदले गए नाम बदलेंगे ठिक है हमारा भी समर्थन पर
लखनऊ किसी भी प्रकार से लुटेरे या उर्दू अरबी शब्द नहीं है ना ही यह नाम किसी लुटेरे ने रखा है यह महाराज लाखन पासी के नाम से हैं यह पहले लखनमऊ हुआ करता था मऊ का मतलब पासियो के नगर,इलाहाबाद और फैजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या और प्रयागराज किया कोई दिक्कत नही पर लखनऊ का नही बदलना चाहिए क्योंकि इस नाम कुछ भी ऐसा नही जो बदला जाए
( पुराना लखनऊ एक झलक ब्रिटिश चित्रकार ने बनाया था , शायद समय 1803 के आसपास )
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