CPI बेगूसराय

CPI बेगूसराय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (जिला परिषद्, बेगूसराय)

48 साल पहले आज के दिन ही शहीद हुए थे #शहीदों_के_रास्ते    1.. #शहीद_कामरेड_सीताराम_मिश्र" #चला_जनाजा_जब_शहीद_का, #देख_सि...
23/08/2026

48 साल पहले आज के दिन ही शहीद हुए थे
#शहीदों_के_रास्ते
1.. #शहीद_कामरेड_सीताराम_मिश्र
" #चला_जनाजा_जब_शहीद_का, #देख_सितारे_झूम #उठे।
#मिट्टी_कहने_लगी_कब्र_की, ी_हमें_निहाल #शहादत"।
कवि भारद्वाज कि उक्त पंक्ति चरितार्थ नजर आ रही है। 24 अगस्त 1978 का दिन बिहट के ऐतिहासिक शहीद स्मारक पर मिश्र जी की लाश पड़ी थी। हजारों -हजार लोगों की अपार भीड़ अपने दिवंगत नेता को अंतिम विदाई देने हेतु जमा थे । हाथ में फूल, आंख में आंसू लिए स्तब्ध थे। हर कोई बिना जुबान खोलें एक दूसरे से कुछ पूछ रहा था। पूरे औद्योगिक क्षेत्र बेगूसराय से मोकामा तक सन्नाटा छाया था। स्कूल कॉलेज, हॉट बाजार स्वत: बंद थे। सभी कल कारखानों में हड़ताल थी। मिश्रा जी धूमकेतु की तरह संसदीय राजनीतिक आकाश में चमकते हुए आए और जाते जाते लाखों आंखों का तारा बन गए। कुर्बानी करने वालों की सदा से यही कहानी रही है। समाज को सर्वस्व देकर उनकी पीड़ा से जुड़ गए जिससे एक नई दिशा का बोध लोगों को हुआ। क्षेत्र के भू स्वामियों, शोषकों, बिचौलियों एवं अपराध कर्मियों के खिलाफ संघर्ष कर जो नया कीर्तिमान स्थापित किया, हर मोर्चे पर इन तत्वों को पीछे हटाया, उसी का नतीजा था की 23 अगस्त 1978 की संध्या अपने ही गांव में राष्ट्रीय उच्च पथ पर गोलियों से भून दिया गया।
इनका जन्म 14 मई 1928 को बेहट गांव के मक्ससपुर टोला में एक गरीब, ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल में हुई। इनके पिता स्वर्गीय यमुना मिश्र रामलीला मंडली के संचालक थे। वे काफी सज्जन ,सुसंस्कृत एवं कला प्रेमी थे। मिश्र जी जब मिडिल स्कूल के छात्र थे, उसी समय देश में "भारत छोड़ो" का नारा गूंज रहा था। आम जनता" करो या मरो "नारे के साथ सड़क पर उतर चुकी थी। बिहट गांव का वीर-सपूत उचित सिंह अंग्रेजों की गोलियों से मौत के घाट उतार दिए गए। कई लोग गिरफ्तार किए गए। बिहट बिहार का "बारदोली" बन गया था। बालक सीताराम अपने सहपाठियों के साथ इस आंदोलन में भाग लिए । राधाकृष्ण चमरिया उच्च विद्यालय, बरौनी में नामांकन करवाएं। यहीं से सन 1947 में मैट्रिक पास किए। मैट्रिक पास करने के बाद कुछ दिनों तक गांधी उच्च विद्यालय, बिहट में बिना वेतन का अंशदान दिए। उस समय यह गांव के बापू क्लब से संबंधित थे। यह वॉलीबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे। इन्हें पिता से ही स्वाभिमान की रक्षा तथा कला के प्रति सांस्कृतिक मंचों के लिए अभिरुचि विरासत में मिली थी। ये अच्छे बांसुरी वादक थे तथा तबला, हारमोनियम ,नाटक से भी लगाव रखते थे। जी डी कॉलेज बेगूसराय में स्नातक के छात्र थे तभी पिता की मृत्यु हो गई और इन्हें पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी। चाहकर भी स्नातक द्वितीय भाग की परीक्षा ये नहीं दे सके। पूरे परिवार के भरण पोषण की जवाबदेही इनके कंधे पर थी। समाज के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार, कुत्सा एवं उत्पीड़न को इन्होंने देखा, और स्वयं परखा, जिससे इनके अंदर असंतोष के अंकुर पनपने लगे तथा विद्रोह की आग धड़कने लगी। इसी पृष्ठभूमि में गांव के ही कॉमरेड नागेश्वर सिंह के संपर्क में आकर 1950 में कम्युनिस्ट बन गए। गरीबों को संगठित करके आंदोलन शुरू किया।
सन 1951 में बिहट गांव के इब्राहिमपुर मोची टोले पर स्वर्गीय सियाराम सिंह महंत के द्वारा जुल्म ढाया जा रहा था। जागो मोची को पीट कर घायल कर दिया गया। न्यायालय में मुकदमा चला। मिश्र जी, साथी राम प्रताप सिंह जो इस केस में मोची के तरफ से गवाह थे उनके साथ कोर्ट जाना एवं केस की देखरेख कर रहे थे। जिसमें मजदूरों की जीत हुई।
परिवार का बोझ, गरीबी की लाचारी ने इन्हें मजबूर कर दिया। पोस्टर समय के थपेड़े ने इन्हें रोटी की तलाश में मरांची उच्च विद्यालय में शिक्षक बना दिया। लेकिन यहां भी मजदूरों और गरीब किसानों के बीच पार्टी के पैगाम को पहुंचाने एवं संगठन करने में लगे रहे। धीरे धीरे इनकी मौजूदगी गांव सामंतों को खटकने लगी। फलता ही स्कूल की प्रबंध समिति इन्हें "खतरनाक कम्युनिस्ट" कहकर स्कूल से निकाल दिया। जिंदगी के इस चौराहे पर मिश्र जी यह सोच कर की मानव परिवर्तन का चक्र कभी रुका नहीं, सृजन का स्रोत कभी रुका नहीं, मृत्यु जीवन को निकल सकी ना अंधकार प्रकाश को निकल सका, इसी आशा के सहारे नए संकल्प के साथ मजदूरों और किसानों की जिंदगी में एक नया सवेरा लाने के लिए अपने को समर्पित कर दिया। पटना जिला के बाढ़ सब डिवीजन में किसानों और मजदूरों को संगठित करने एवं समस्याओं के निदान हेतु संघर्ष विकसित करने की जिम्मेदारी पार्टी ने दिया। अथक परिश्रम कर पार्टी विकास में गति पैदा कर लोकप्रियता हासिल की। अपने गांव की बढ़ती आबादी के बीच महिलाओं में शिक्षा का अभाव एक प्रश्न बन के सामने खड़ा था। मिश्र जी के नेतृत्व में कम्युनिस्ट साथियों का पूरा ग्रुप मिलकर 1 अगस्त 1955 को गांव में बालिका मध्य विद्यालय की स्थापना। गंगा पर पुल, गरारा में रेलवे यार्ड आदि का कार्य प्रारंभ हो चुका था। बरौनी औद्योगिक विकास के नक्शे पर आ चुका था। मिश्र जी का इसी क्षेत्र में जमीन का उचित मुआवजा स्थानीय लोगों को रोजगार तथा मजदूरों की संगठित करने के काम में पार्टी ने लगाया। उस समय हैजा एक प्राण लेवा बीमारी थी। आमतौर पर बरसात के पहले दौर में गांव के घनी आबादी वाले गंदे मोहल्ले में बड़े पैमाने पर यह बीमारी फैल जाती थी। मिश्र जी के नेतृत्व में साथियों ने स्कूल पर कैंप लगाकर रोगियों की सेवा करने का काम किया। साथ ही डी०पी० गुप्ता के निर्देशन में उचित इलाज करवा कर बड़े पैमाने पर लोगों को मौत से बचाने का काम किया।
सन 1962 में बरौनी रिफायनरी के मजदूरों को संगठित करने की जिम्मेवारी कॉमरेड चंद्रशेखर सिंह, कॉमरेड योगेंद्र शर्मा, कॉमरेड सूर्य नारायण सिंह, कॉमरेड देवकीनंदन सिंह के साथ सीताराम मिश्र को भी दी गई। कंपनी की हठधर्मिता और जायज मांगों को नहीं मानने के कारण देश में इमरजेंसी रहते हुए भी मजदूरों को हड़ताल करना पड़ा। 21 दिनों की इस लंबी हड़ताल में उनकी सुरक्षा एवं रोटी का इंतजाम करने में मिश्र जी की बड़ी भूमिका रही। अधिकांश मजदूर दूसरे इलाके, जिले और राज्य के थे। अगल बगल के गांव और पंचायतों से स्वयंसेवक एवं भोजन सामग्री इकट्ठा करना इनका मुख्य काम था। प्रबंधन, पुलिस, गुंडा एवं इंटक यूनियन आंदोलन को कुचलना चाहती थी लेकिन उन्हें कामयाबी ना मिली अंततोगत्वा जीत मजदूर की हुई। बिहट गांव में बालिका उच्च विद्यालय की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इनके पहल पर जमीन दाता के नाम से सन 1963 में वैदेही बल्लभशरण बालिका उच्च विद्यालय का निर्माण किया गया। सन 1965 का छात्र आंदोलन बिहार के जनमानस को झकझोर दिया। कांग्रेसी हुकूमत के खिलाफ विपक्ष की सभी पार्टी मैदान में उतर गई। बड़े पैमाने पर कम्युनिस्टों गिरफ्तार किए गए। काफी प्रयास के बावजूद भी मिश्र जी पुलिस के हाथ नहीं लगे तथा भूमिगत रहकर कार्य करते रहें।
सन 1967 विधानसभा चुनाव बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया। सुबह में संविद की सरकार बन गई। बरौनी औद्योगिक क्षेत्र के विकास की गति कुछ और तेज हो गई। खाद कारखाना के लिए अर्जित की जा रही जमीन के मुआवजे की लड़ाई तेज हुई। बड़े पैमाने पर किसान संगठित होकर संघर्ष में उतरे। मिश्र जी के नेतृत्व में प्रदर्शन घेराव करते हुए अनेक लोग जेल यात्रा भी किए। दमन का कोई हथियार जब कारगर साबित ना हो सका तो सरकार पीछे हटी। जीत किसानों की हुई। 5000 रुपए एकड़ घोषित कीमत की जगह 15000 रुपए एकड़ कीमत से भुगतान हुआ।
तानाशाह महाप्रबंधक रंजीत सिंह कुशवाहा की मनमानी के खिलाफ लड़ाई चली। अंततोगत्वा उसे बरौनी से भागना पड़ा। बरौनी लघु उद्योग की स्थापना की प्रक्रिया तेज हुई। लेकिन उस क्षेत्र में पर रही आबादी पूरे देवना जमरा गांव को विस्थापित होकर पुनर्वासित होने का था। संघर्ष के फलस्वरूप गांव को मुआवजे के साथ पुनर्वासित कराने में सफलता मिली। लघु उद्योग के विकास एवं विस्तार के साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार एवं रोजगार में लगे मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी और कानूनी सुविधा की लड़ाई प्रारंभ हो गई। इसी लड़ाई के गर्भ से बरौनी लघु उद्योग मजदूर यूनियन पैदा हुई।
देवना जेमरा पुनर्वास की लड़ाई लगभग 9 वर्षों की लंबी प्रक्रिया है स्थानीय स्तर पर कॉमरेड शकूर खान, देवना एवं ब्रह्मदेव सिंह (शिक्षक) जेमरा के नेतृत्व में आम जनता को संगठित कर मिश्र जी लगातार धरना प्रदर्शन घेराव करते रहे। आवश्यकता आ पड़ी प्रशासन के मुकाबले की तो जेल जाने से भी है साथी पीछे नहीं हटे।
सन 1968 में बालिका उच्च विद्यालय बीहट के सहायतार्थ पैसे जमा करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती का चैरिटी शो करवाया। जबकि गांव के राजनीतिक विरोधियों ने समानांतर आयोजन किया, लेकिन उसे मकसद में सफलता नहीं मिल सकी। इनका आयोजन जो गांधी उच्च विद्यालय के प्रांगण में किया गया था काफी सफल रहा।
बिहट गांव जहां सामंतों का वर्चस्व था, बैठ बेगारी, बंधुआ मजदूरी की प्रथा चल रही थी। सामाजिक अत्याचार छुआछूत आम बात थी। कम्युनिस्ट पार्टी के विकास के साथ उपरोक्त बंधन टूटते गए। प्रतिक्रिया स्वरूप कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को अपमानित करना, तंग और तबाह करना विरोधी तत्वों का मुख्य धंधा बन गया था। एक वक्त ऐसा भी आया जब दिन के उजाले में गांव के सामंती, प्रतिक्रियावादी शक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाले मुट्ठी भर लोग हथियार के साथ एक तरफ खड़े थे, दूसरी तरफ गांव की आम जनता कई सौ की संख्या में मुकाबले के लिए खड़ी थी। जन बल से टकराने का साहस तो उन्हें ना हो सका लेकिन षड्यंत्र कर फसाने का और दमन करने का सिलसिला तेज हो गया। 7 अप्रैल 1969 को गांव के एक व्यक्ति के हत्याकांड में मिश्र जी सहित कई नेताओं को फंसाया गया। कई महीनों तक जेल में रहने के बाद छूटकर आए। पुनः दिसंबर में एक दूसरे हत्याकांड में ने फंसा दिया गया। दिसंबर में ये पुनः जेल गए। बेगूसराय जेल प्रशासन एवं अपराधी की सांठगांठ के खिलाफ वहां भी संघर्ष किए। जिसके कारण इन्हें बेगूसराय जेल से मुंगेर जेल भेज दिया गया। वहां भी बंधुओं पर हो रहे अत्याचार एवं जेल की कुव्यवस्था के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी।। फलत: मुंगेर से मुजफ्फरपुर जेल स्थानांतरित कर दिए गए।
उसी समय ग्राम पंचायत का चुनाव होने वाला था। यह वर्ष 1970 का था।का० सीताराम मिश्र जेल से ही नामांकन दाखिल किए और अपने पंचायत के मुखिया निर्वाचित हुए। जुलाई 1970 में ये जेल से छूटकर आए। प्रयोजना भत्ता के सवाल पर 1971 में गढ़हरा बरौनी रेल कर्मचारियों का 33 दिनों की ऐतिहासिक हड़ताल का संचालन मिश्र जी कर रहे थे। इनके साथ रामप्रवेश राम, श्री चंद्र प्रसाद,के एन० सिंह, जगदीश बाबू, मिश्रा जी, गार्ड साहब, शर्मा जी आदि थे।
सन 1971 में होने वाले प्रमुख चुनाव के सिलसिले में जब क्षेत्र का भ्रमण कर रहे थे तब उनकी जीप दुर्घटनाग्रस्त हो गई। मिश्र जी को घायल अवस्था में बेगूसराय लाया गया। जहां लगातार तीन महीने तक इलाज में रहना पड़ा। इसके बावजूद भी इनका एक पांव पूर्ण कारगर ना हो सका।
सन 1972 विधानसभा का चुनाव एक महत्वपूर्ण राजनीतिक युद्ध था दिसंबर में बिहार महिला समाज का द्वितीय सम्मेलन बिहट में करवाएं। सन 1973 में 1800 सौ रेलवे के पलटी या मजदूर को कैजुअल बहाल करवाएं। लगभग डेढ़ महीने के बाद रेल प्रशासन इन मजदूरों को काम से हटाने लगा तब सबों को संगठित कर 3 दिनों का हड़ताल चला। पूना समझौता कर 1200 मजदूरों का स्थायीकरण हुआ।
खेल जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। यह उनकी सोच थी। सोच ही नहीं वे हर सोच को व्यवहार में उतारते थे। सन 1973 में स्वतंत्रता सेनानी बिहार के विद्युत एवं सिंचाई मंत्री स्वर्गीय राम चरित्र सिंह के स्मृति में राज्य स्तरीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता का सफल आयोजन करवाए। इतनी ही अभिरुचि सांस्कृतिक कार्यक्रम से भी थी। इसलिए हर वर्ष पूरे 1 सप्ताह का आयोजन करवाते थे। जिससे आम लोग अपने ज्वलंत सवालों को परदा पर देखते थे। साथ ही निदान के रास्ते का भी दिशा निर्देश पाते थे। सीबीज बाटा मजदूर यूनियन (मोकामा) का महासचिव चुने गए। बरौनी डेयरी के निर्माण के साथ ही कर्मचारी यूनियन बनाने के कार्य इन्होंने किया। बरौनी खाद कारखाना कर्मचारी यूनियन का आजीवन महामंत्री रहे।
सन 1974 में अखिल भारतीय स्तर पर उर्वरक कर्मचारियों का संघ बनाने का पहला इन्होंने ही किया। और जून में राष्ट्रीय बैठक बरौनी में बुलाई गई।
8 मई 1974 से 23 दिनों तक रेल मजदूरों की चलने वाली अखिल भारतीय हड़ताल में भी गरहरा बरौनी रेल क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभाई। राज्य की राजनीति काफी गर्म थी। जे०पी० के नेतृत्व में छात्र नौजवान का उग्र आंदोलन चल रहा था। विरोध में मिश्र जी जैसे नेता मजबूती के साथ डटे हुए थे।
सन 1976 में पार्टी के जन नेता कॉमरेड चंद्रशेखर सिंह अलविदा हो गए। भोला सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। राजनीतिक विरोधियों का मंसूबा था कि यह लाल झंडा समाप्त होगा। लेकिन 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता दल के बावजूद भी कम्युनिस्ट पार्टी को विशाल वोट मिला। पुनः विधानसभा चुनाव में पार्टी अपनी परंपरागत सीट के साथ साथ नए निर्वाचन क्षेत्र मटिहानी पर भी अपना कब्जा जमाया। इस नए क्षेत्र के नए एवं प्रथम विधायक के रुप में कामरेड सीताराम मिश्र शपथ ग्रहण किए। मिश्र जी निर्भीक एवं जुझारू राजनीतिक योद्धा थे।
दुश्मन हमेशा इनकी हत्या की साजिश में लगे रहते थे। कॉमरेड मिश्र जी का सोच एवं व्यवहार कुछ इस तरह का था:-
" #सितम_भी_सहना, #दुआ_भी_करना,
ेकसी_का_गया_जमाना।
ै_जुर्रत_गिराओ_बिजली,
#बना_रहे_हैं_हम_आशियाना।।
#किसी_भी_हालत_में_बागवानों,
#तुम्हारा_एहसान_हम_ना_लेंगे।
#जो_अपनी_गैरत_पर_आंच_आई
#आशियाना।।
मिश्र जी के नेतृत्व में बरौनी खाद कारखाना की उप नगरी में अखिल भारतीय महिला समाज की राष्ट्रीय परिषद की बैठक संपन्न हुई।
विधायक बनने के बाद सबसे पहले इस विधानसभा के सबसे पिछड़ा इलाका साम्हों दियारा का बिजलीकरण की स्वीकृति इन्होंने करवाया।
बिहार प्रदेश ट्रेड यूनियन कांग्रेस के वे ना केवल सचिव थे, बल्कि मुस्तैदी से उस जिम्मेवारी को पूरा भी करते थे। संगठित असंगठित जहां भी मजदूर वही मिश्र जी। खेत -खलिहान,कल- कारखाना, रिक्शा टमटम, मोटर रेल हर जगह मिश्र जी, यही तो उनकी लोकप्रियता का कारण था। पार्टी के राज्य परिषद के सदस्य तथा बेगूसराय जिला के सहायक मंत्री भी थे।

19/08/2026
 #शहीदों_के_रास्ते17..  #शहीद_कॉमरेड_फुलेना_राय            इनका जन्म बछवारा प्रखंड के रानी गांव में 9 अक्टूबर सन 1964 को...
19/08/2026

#शहीदों_के_रास्ते
17.. #शहीद_कॉमरेड_फुलेना_राय
इनका जन्म बछवारा प्रखंड के रानी गांव में 9 अक्टूबर सन 1964 को हुआ। इनके पिता श्री रामचंद्र राय गांव के एक साधारण किसान हैं इनके तीन पुत्रों में फूलेना राय सबसे बड़े थे उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव की पाठशाला में हुई। अपने ही गांव के उच्च विद्यालय से सन 1982 में इन्होंने मैट्रिक पास किया। अपने ही सीमावर्ती जिला समस्तीपुर के आर०एन०आर० कॉलेज में नामांकन करवाया। 1984 में इंटर की परीक्षा पास की पुन: 1986में बी०ए०द्वितीय वर्ष की परीक्षा पास की। इसी दौर में छात्रों की समस्याओं को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन में साथी भी फुलेना आगे बढ़कर हिस्सा लेने लगे। यह आंदोलन कॉलेज प्रबंधन के साथ- साथ विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ आंदोलन चला इस बीच नेतृत्व कारी छात्रों के बीच कुछ मतभेद पैदा हो गया स्थानीय कुछ मनचले छात्रों की हरकत से पढ़ाई का माहौल बिगड़ गया। जातीय एवं क्षेत्रीय आधार पर दल बनाकर कॉलेज के वातावरण को अशांत बना दिया गया। ऐसी परिस्थिति में साथी फुलेना ने बी०ए० तृतीय वर्ष में अपना स्थानांतरण आर०बी० कॉलेज दलसिंगसराय में करवा लिया। 1982 में इनकी शादी बेगूसराय प्रखंड के इटवा निवासी श्री रामविलास कुवॅर की पुत्री मुन्नी कुमारी के साथ संपन्न हुई।जब यह नवी कक्षा के छात्र थे उसी समय उन्होंने गांव के" #बजरंगबली_संगीत_संघ" की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। कॉलेज पहुंचते-पहुंचते संगीत संघ में इनका सक्रिय भागीदारी होने लगा। 1 मई 1985 कोई संगीत संघ का नाम बदलकर " #सरस्वती_ #संगीत_संघ"कर दिया गया। यह छात्र नौजवानों का एक अनुशासित एवं क्रियाशील संगठन था। उस समय इस गांव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की छोटी शाखा चलती थी जो गांव के गरीबों मजदूरों एवं दलितों पर हो रहे जुल्म अत्याचार के खिलाफ लड़ती थी। उस समय इस गांव के पार्टी के नेता कॉमरेड रामचंद्र राय उर्फ राजा जी थे। काफी होशियारी से धीरे-धीरे इस सरस्वती संघ में घुसपैठ कर नौजवानों को कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ मोड़ने लगे। छात्र नौजवान कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रम एवं स्थानीय साथियों के व्यवहार से प्रभावित होकर लगभग 50 नौजवान कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर लिए। पार्टी का कार्यक्रम काफी प्रभावी होने लगा। अपनी पहली परीक्षा में यह तब सफल साबित हो गए जब 5 सितंबर 1985 को पेट्रोकेमिकल्स की स्थापना हेतु बेगूसराय जिला बंद का आवाहन किया गया। यह बंद दूसरा जिले के विकास पसंद छात्र नौजवानों एवं वहशी जिला प्रशासन के बीच खुला युद्ध था। उस दिन एक तरफ जिले के सारे स्कूल कॉलेज हाट बाजार सभी बंद थे। आम लोग हर चौक चौराहे एवं सड़कों पर सैकड़ों एवं हजारों की संख्या में डटे थे।दूसरी तरफ पूरी ताकत के साथ जिला पदाधिकारी एवं आरक्षी अधीक्षक दल बल के साथ हमला कर रहे थे। दर्जनों जगह लाठीचार्ज किया गया दो जगह गोली चली कई जगह धरणार्थी के शरीर पर घोड़े दौराये गए। सैकड़ों साथी घायल हुए कई 100 साथी गिरफ्तार हुए बावजूद इसके दमन की ताकत जनबल की ताकत को दबाना सकी। सफल एवं ऐतिहासिक बंद हुआ इस संग्राम के पश्चिमी सीमा द्वार के सेनापति थे साथी फुलेना।
जब नौजवान संघ के नेतृत्व में रूढ़िवादी परंपरा के खिलाफ संघर्ष छिड़ा तो उसकी अगली कतार में साथी फुलेना और रानी के छात्र -नौजवान थे। विधवा बालाओं के सिसकते जीवन को संवारने का ऐलान जब किया गया तो रानी के साथियों ने आगे बढ़कर भाग लिया और समाज को एक नई दिशा दी। ठीक है इसी तरह जब दहेज विरोधी आंदोलन तेज हुआ साथी फुलेना की पेश- कदमी पर रानी के साथ ही दहेज मुक्त शादी किए।
साथी फुलेना की पहचान धीरे-धीरे प्रखंड के विभिन्न गांवों में नौजवान नेता के रूप में होने लगी। अब साथी फुलेना आम लोगों की समस्याओं को लेकर संघर्ष के मैदान में उतरने लगे, प्रखंड मुख्यालय, थाना एवं पुलिस प्रशासन, बैंक आदि जगहों पर धरना प्रदर्शन चलने लगा। फलत:आम जनता का भरोसा भी बढ़ने लगा। गांव के गरीब जो जमीन से बेदखल किए जाते थे जिनके ऊपर अत्याचार होता था, जिनको मजदूरी न मिलती थी, जिन्हें आपस में लड़ाया जाता था,इन तमाम सवालों पर गरीबों की तरफ से न्याय के पक्ष में बोलने वालों लड़ने वाले साथी का ही नाम फुलेना राय था। राजनीतिक विरोधी एवं अपराधी सांठगांठ के मुकाबले की आवश्यकता महसूस कर साथ ही फुलेना स्वयं दर्जनों साथियों के साथ जन सेवा दल में भर्ती हुए।
जब जिला का एक बड़ा हिस्सा बाढ़ के पानी में डूब गया था, स्वयं इनके गांव का भी हिस्सा पानी में डूबा हुआ था।उस परिस्थिति में भी दर्जनों साथियों के साथ राहत सामग्री इकट्ठा कर पीड़ितों के गांव एवं शिविर में पहुंचने का काम मुस्तैदी से किए थे। जब पड़ोस में अगलगी की घटना हुई तब भी अपने जन सेवा दल के साथियों के साथ सुरक्षा में तैनात रहे। इनकी पेसकदमी पर सरस्वती संगीत संघ के सभी साथी "भारतीय जन नाट्य संघ"में शामिल हो गए। इनकी पेसकदमी ने इन्हें जिला नौजवान नेता के रूप में पहचान बना दी। जहां रानी के अंदर साथी अरुण कुमार मिश्र, शंभू राय, राजकुमार आदि साथी नेतृत्व संभालने लगे, वहीं ये जिला नौजवान संघ के पदाधिकारी बन गए। ज्यों-ज्यों नौजवानों के बीच इनकी ख्याति बढ़ती गई संगठन का कुछ विस्तार होता गया। साथ ही कुछ ऐसे दुश्मन भी तैयार हुए, जो इन्हें समाप्त करने की योजना बनाने लगे। जब यह पार्टी अंचल मंत्री के सहयोगी के रुप में पूरे अंचल का नेतृत्व संभालने लगे तब राजनीतिक विरोधियों के कलेजे पर सांप लोटने लगा। अंत्तोगत्वा 15 जुलाई 1997 को जब पार्टी कार्यक्रम की तैयारी के सिलसिले में अंचल मंत्री कॉमरेड राम लखन सिंह के साथ जा रहे थे तो रास्ते में अपराधियों ने इन्हें गोलियों से मार डाला एवं अंचल मंत्री को घायल कर दिया।
आज इनके परिवार में बूढ़े पिता, जवान भाई कॉमरेड राम पुकार राय जो पंचायत के मुखिया भी हैं। दूसरा भाई संजीव कुमार, विधवा पत्नी 2 पुत्र जितेंद्र एवं रविंद्र साथ ही दो पुत्री गुड़िया एवं स्वाति है। एक मजबूत भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की शाखा जो उनकी मिसालों को लेकर चल रही है संकल्प के साथ की " #फुलेना_हम #तुम्हारे_अरमानों_को_मंजिल_तक_पहुंचाएंगे"।

#क्रमश:-
#लेखक:- #चंदेश्वरी_प्रसाद_सिंह
#फेसबुक_रूपांतरण_चंदन_कुमार_मिश्रा

- क्या वाकई में भोगेन्द्र झा के सिर में बंदर की खोपड़ी लगी थी?- जब भोगेन्द्र झा से रक्षा के लिए जनेऊ लेकर गांव में घूमे ...
19/08/2026

- क्या वाकई में भोगेन्द्र झा के सिर में बंदर की खोपड़ी लगी थी?

- जब भोगेन्द्र झा से रक्षा के लिए जनेऊ लेकर गांव में घूमे महंथ

- जब बौकू महतो ने भूखे भोगेन्द्र झा से कहा - ‘कामरेड अहाँ खाउ, आब गोहि मरै कि मुसहर... देख लेबै हमे सब’

- जब भोगेन्द्र झा की हत्या के लिए 100–150 हथियारबंद लोग पहुंच गए!

- भोगेन्द्र झा को बचाने वाला 3–4 साल का वह बच्चा आखिर कौन था?

- कम्युनिस्ट नेता भोगेन्द्र झा की मदद करने अस्पताल पहुंचे सोशलिस्ट नेता डॉ. बैद्यनाथ झा

- जब मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने संदेश भेजा.... ‘भाई भोगेन्द्र... मैं आ रहा हूं, बात करूंगा, तब तक अपना हाथ पैर समेट कर रहिए’

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बेनीपट्टी की मिट्टी ने कई ऐसे किरदार पैदा किए, जिनकी कहानियां इतिहास के बड़े पन्नों में भले दब गईं, लेकिन गांवों की स्मृतियों में आज भी जिंदा हैं।

एक सिर पर बंदर की खोपड़ी… एक महंथ के हाथ में जनेऊ… मदद के लिए पहुंचा विरोधी विचारधारा का नेता… और कौन था वह 3–4 साल का बच्चा! आखिर क्या है भोगेन्द्र झा की इस कहानी का सच? जानते हैं इस कड़ी में...

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भारत छोड़ों आंदोलन के बाद पनपा आक्रोश नियंत्रण में था, लेकिन आज़ादी की लड़ाई के साथ जमींदारी उन्मूलन का संघर्ष अंजाम की तरफ अग्रसर था। 1946 में कम्युनिस्टों ने जोरदार तरीके से भूमि–संघर्ष किया। अब तक कांग्रेस व सीपीआई की राहें अलग हो चुकी थी। कम्युनिस्टों के लिए जमीन पर चढ़ना, केवल नारा देने तक सीमित नहीं था, बल्कि चढ़ने का मतलब खेतिहर मजदूर गरीबों के द्वारा कब्जा करना था। यह लड़ाई 1946 में काफी उग्र हो गई। भारत छोड़ो आंदोलन के क्रम में दरभंगा से गिरफ्तार हुए भोगेन्द्र झा जेल से बाहर आ चुके थे। बेनीपट्टी प्रखंड के दामोदरपुर गांव से सटे अंधरी गांव में महंथाना था। महंथ आम तौर पर भूमिहार जाति के होते थे, लेकिन अंधरी महंथ ब्राह्मण थे। मूल रूप से सतलखा गांव के थे और वह परंपरागत रूप से महंथ बनने के बाद ‘झा’ से ‘दास’ बन गये थे। 1945 में हरभजन दास के बाद महंथी रामवेद दास को मिला। उनका मूल नाम वेदानंद झा था जो कि पहले से इस क्षेत्र से परिचित थे।

बात दिसंबर 1946 की है, सीपीआई कांग्रेस से अलग हो चुकी थी। अंधरी गांव के बौकू महतो, भोगेन्द्र झा के पास पहुंचे और बताया कि हमारी जोती हुई जमीन अंधरी के महंथ ने छीन ली है। गिरधारी महतो नाम के बुजुर्ग किसान की शिकायत थी कि महंथ जी रुपया में 26 सेर दूध लेते हैं और अगल–बगल में भाव 1 रुपया में 14–15 सेर है, कुछ कीजिये।

अंधरी महंथ व भोगेन्द्र झा के अच्छे संबंध थे। दोनों का आपस में कोई विद्वेष नहीं था, महंथ भोगेन्द्र झा की काफी इज्जत करते थे। 1942 में जब भोगेन्द्र झा जेल में थे तो उनके विद्यार्थी साथियों के जत्थे को महंथ हरभजन दास ने अपने यहां ठहरने का प्रबंध किया, भोजन कराया। जिसके कारण महंथ और उनके मैनेजर गिरफ्तार भी हुए थे।

अंधरी के बौकू महतो व गिरधारी महतो की बात सुन भोगेन्द्र झा जुलूस के साथ अंधरी पहुंचे, महंथ को बुलाया। महंथ व भोगेन्द्र झा एक दूसरे से परिचित थे। ऐसे में उस दिन जो जो भोगेन्द्र झा कहते,—महंथ मानते गये। जैसे कि जमीन वापस कर दीजिए, उन्होंने माना। गिरधारी महतो की शिकायत पर भोगेन्द्र झा ने कहा- ऐसा क्यों करते हैं ?

महंथ ने जबाब दिया- मेरे पोखरे में पानी पीता है, मेरे ही खेत में इसकी भैंस घास चरती है, मैं कौन कम कीमत देता हूं ? मैं तो ज्यादा देता हूं। और जगह तो महंथ जमींदार कुछ नहीं देते हैं।

भोगेन्द्र झा को यह जवाब रास नहीं आया। उन्होंने वहीं नारा दे दिया। बोले- ठीक है, ना हम आपका पोखरा रहने देंगे, ना जमीन रहने देंगे, तो दूध का भाव तय हो जायेगा।

टकराव की शुरुआत यहीं से हुई। उस समय गांव में ब्राह्मण दो–चार घर ही थे, अधिसंख्य खतबे, मलाह, मुसलमान, जोलहा, कुर्मी, दुसाध, रंगरेज, धुनियां, यादव, सूड़ी थे। इधर भोगेन्द्र झा के नेतृत्व में हुजूम बनाकर महंथ की जमीन पर चढ़ाई की कोशिश हुई, भोगेन्द्र झा के साथ जितने लोग थे, उस समय सभी बचने के लिए इधर–उधर बिखर गये। भोगेन्द्र झा अकेले पड़ गये। भिड़ंत के बीच पास में 3–4 साल का एक नन्हा बच्चा रो रहा था, भोगेन्द्र झा ने बच्चे को कंधे पर ले लिया। वह गड़ांसा–भाले को देखकर इतना घबड़ा गया कि बंदर के बच्चे की तरह उसने भोगेन्द्र झा की गर्दन पकड़ ली। नागा बाबाजी लोग महंथ की हसेड़ी में काफी संख्या में थे। नागा हाथ से बच्चे को खींचने की कोशिश करता रहा, लेकिन बच्चे ने गर्दन नहीं छोड़ी। लाठी डंडों के सामने गड़ांसा–भाले की लड़ाई में सारे मर्द असहाय होकर भाग चुके थे।—इतने में औरतों ने मर्दों को गाली देते हुए—घरों से खपड़ी, घड़ा, मिट्टी फेंकना शुरू किया। हमलावर वापस चले गए। बाद में मालूम हुआ कि वह बच्चा महंथ के मैनेजर का पोता था। इसी वजह से उस दिन भोगेन्द्र झा की जान बच गई।

बाद में जो कुछ गांव के प्रमुख लोग थे, बौकू महतो सहित और लोग, उन लोगों ने भोगेन्द्र झा से हाथ जोड़ कर कहा कि हमारे गांव की किस्मत में यही लिखा है, आपको हम लोग बचा नहीं सकते, आप चले जाइए, कुछ हो जाएगा, मार देंगे तो कलंक लग जाएगा। तब तक राजकुमार पूर्वे भी पहुंच गये, उन्होंने भी गांव वालों की हां में हां मिलाई और बोले- महंथ 50 एकड़ दे रहा हेे, तो उसी को ले लीजिये, 5–5 कट्ठा 200 परिवार में बांट दीजिए, फिर बाद में देखा जाएगा। क्योंकि आप मारे जाएंगे तो फिर पार्टी का जिला में अस्तित्व खत्म हो जाएगा। इतने में गुस्से में भोगेन्द्र झा ने राजकुमार पूर्वे से कहा- दूसरे लोग भी भागे हैं, आप भी भाग जाइए। यहां से मैं या तो जीतकर जाऊंगा या मरकर जाऊंगा।

रात में भोगेन्द्र झा बौकू महतो के आंगन में खाना खाने बैठे, 10 परिवारों का एक आंगन था। भोगेन्द्र झा के कहने पर 20–25 औरतें आ गर्इं। भोगेन्द्र झा के आंखों से ओट होकर सभी बैठी। भोगेन्द्र झा ने उन महिलाओं से उस गांव के कुछ पुराने दास्तान, संस्मरण सुनाया। कैसे अमुक औरत की साड़ी खींची गई, कैसे अमुक को मारा गया, कैसे जुर्म हुआ। उन्होंने कहा पिछले कुछ दिनों में एक बुजुर्ग मरे हैं, आप लोगों में से कोई अमर नहीं है और मुझे बुलाया गया है तो मैं आया हूं सब अत्याचार समाप्त करने के लिए। आपके सभी मर्द आज भाग गये तो ऐसी हालत में मैं भाग नहीं जाऊंगा। ये मुझे कहने गये हैं कि आप हट जाइये, तो मैं हटूंगा नहीं। हो सकता है कल मर जाऊं। जब कल मर ही जाऊंगा तो आज खाने में क्या रखा है। इसलिए मै आज़ खाना नहीं खाऊंगा।

इतने में बौकू महतो की पत्नी मैथिली में बोली-‘कामरेड आहाँ खाउ, काल्हि हम सभ हथियार लेबै, मरदाबा सभ चूड़ी पहिरतै।’ इतने में दर्जनों युवतियां भी आंगन में आ गई, युवतियों ने भी कहा- ‘हमहूं चलब अहाँ सब संग’। सबों ने कहा कि आप खाइए खाना, कल हमलोग हथियार उठा लेंगे। तब बौकू महतो ने जोश में गाली देते हुए कहा- तोरे सब खातिर हम डरा रहल छलुओ..... जखनि तू सन छे त आब हमरा की डर। आगे उसनें भोगेन्द्र झा की तरफ देखते हुए कहा- ‘कामरेड अहाँ खाउ, आब गोहि मरै कि मुसहर।’

यह सुनने के बाद भोगेन्द्र झा ने दूसरे ग्रामीणों को भी बैठाने के लिए कहा, गांव में सभी सो गये थे। उनके कहने पर बौकू महतो सभी को जगाने गये। इतने में भोगेन्द्र झा ने भोजन किया। लोग जुटे, लेकिन सभी उदास थे। दिन में महंथ पर चढ़ाई के समय सभी भाग गये थे, उस शर्म से सभी सिर झुकाए थे। भोगेन्द्र झा ने सभी को जागृत करने का प्रयास किया और जैसे ही उन्होंने अपनी बात खत्म की। पहले व्यक्ति पल्टू यादव ने शपथ लेते हुए कहा-‘काल्हि जे भागए से अपन बेटीक मूत पीअए।’ बारी–बारी से लोग कसम लेने लगे। सुबह में फिर दूसरा नजारा था। सैकड़ों लोग हथियारों के साथ जोश–खरोश में तैयार थे। सुबह में पल्टू यादव, जिसकी घराड़ी जबर्दस्ती महंथ ने ले ली थी, चढ़ गये। महंथ या पुलिस वाले कुछ नहीं कर सके।

इस तरह से 3–4 बार महंथ की जमीन पर चढ़ाई हुई, धीरे–धीरे जमीनों पर कब्ज़ा होना शुरू हुआ। इसी क्रम में एक दिन गांव में जुलूस निकला तो जुलूस पर महंथ के लठैतों ने हमला बोल दिया। जुलूस तितर–बितर हो गया। बरहा गांव के रामेश्वर झा और घूरन झा के साथ राज कुमार पूर्वे को महंथ के लठैत घसीट कर महंथ के पास ले गये। नसीहत देकर बाद में छोड़ दिया गया।

इस जमीन की लड़ाई में महंथ की तरफ से रायबहादुर सुशील कुमार राय और 3–4 वकील थे। महंथ का महंथाना 700 एकड़ का था। जिसमें 75 एकड़ जमीन ऐसी थी, जिससे महंथ ने किसानों को बेदखल कर दिया था, लेकिन कागज पर कानूनन नीलाम नहीं करा सके थे। इसलिए 75 एकड़ को उन्होंने किसानों का मान लिया, अब बाकी 625 एकड़ पर उन्होंने अपना दावा कर दिया।

भोगेन्द्र झा ने उनसे मांग रखी कि पहले यह 75 एकड़ की डिग्री दे दीजिए। महंथ का कहना था कि 75 एकड़ की डिग्री दे देंगे, लेकिन बांकी बचे 625 एकड़ जमीन पर कोई विवाद ना हो। भोगेन्द्र झा का कहना था-—बाकी तो विवाद रहा, माने जप्त हो गया। भोगेन्द्र झा के जिद के आगे महंथ अपनी महंथाना वाली जमीन पर लगी धान की एक छंटाक नहीं काट सके।

भोगेन्द्र झा की हत्या की योजना इसके बाद से बनने लगी थी। रायबहादुर सुशील कुमार राय, एक रईस बंगाली, मधुबनी के वरिष्ठतम और अंधरी महंथाना के पुस्तैनी अधिवक्ता थे। भोगेन्द्र झा की हत्या के षड्यंत्र को रोकने में विफल होने पर उन्होंने यह कह कर त्यागपत्र दे दिया कि इस युवक का जीवन मेरी वकालत और आपकी जमींदारी से ज्यादा कीमती है। और यह भी नहीं है कि सभी अधिकारी भोगेन्द्र झा की हत्या के पक्ष में थे, क्योंकि एक दिन भोगेन्द्र झा बेनीपट्टी में ठहर गये, शाम हो गई थी। सिद्धेश्वर प्रसाद, मधुबनी के एक पुलिस इंस्पेक्टर थे, उन्होंने भोगेन्द्र झा से बातचीत करते–करते बहुत देर कर दी। रात के 9–10 बजे रहे होंगे, नबंबर का महीना था। देर हो गई तो उन्होंने कहा कि अब अंधेरे में मत जाइये, आपकी जान पर खतरा है, यहीं रह जाइए।

भोगेन्द्र झा ने कहा- मैं तो जाऊंगा ही।

जब वे अड़ गये तो इंस्पेक्टर ने कहा- ठीक है। आप यहीं बैठिये, मैं आता हूं, यह कहते हुए इंस्पेक्टर उठ गये।

उसी थाने का थानेदार थे श्रीकृष्ण सिंह, जो भोगेन्द्र झा की हत्या की योजना में शामिल थे। इतने में थानेदार कई बार उनके पास आता और पूछता- कब जाएंगे अंधरी ?

भोगेन्द्र झा कहते थोड़ी देर में––—जब देर हो गयी तो भोगेन्द्र झा ने हवलदार से पूछा कि कब आयेंगे इंस्पेक्टर साहब ?—मुझे देर हो रही है।

जवाब मिला- वो अब नहीं आयेंगे, कल ही आएंगे।

यह सुन भोगेन्द्र झा ने कहा- तो मैं जाता हूं।

हवलदार ने कहा- आप गिरफ्तार हैं, आप नहीं जा सकते।

हवलदार ने उन्हें जबर्दस्ती गिरफ्तार कर लिया और सुबह होते ही छोड़ भी दिया। तब मालूम चला कि भोगेन्द्र झा बचाने ही के लिए गिरफ्तार किया गया था, ताकि रात में वह अंधरी नहीं जाएं। उनकी हत्या को लेकर बन रही योजना की बातें हवा में पहले से आ रही थी।

अब तक महंथ को इस बात की भनक लग गई थी कि जमीन पर कभी भी चढ़ाई हो सकती है, ऐसे में महंथ ने नागा बाबाओं के जत्थों को को खबर कर अंधरी बुला लिया। दरअसल महंथ अपने महंथाना क्षेत्र से गुजरने वाले नागा साधुओं की खूब आवोभगत सेवा सत्कार करते थे। उनमें धार्मिक उन्माद को जगाया गया था कि अंधरी नागा लोगों का अड्डा है, स्थान खत्म हो जाएगा तो फिर उनका एक खूंटा खत्म हो जाएगा। महंथ को इस बात का एहसास हो गया था कि यह आंदोलन उनके अस्तित्व को ख़त्म करने की शुरुआत कर चुकी है। छिटपुट झगड़े, शिकार, फसल–लूटबाजी आदि आम बात थी।

ऐसा होते–होते जब बहुत ज्यादा होने लगा तो महंथ दामोदरपुर गांव पहुंचे, आहपुर–दामोदरपुर के सभी चारों टोले में जनेऊ हाथ में लेकर हाथ जोड़ते हुए लोगों के दालान–दरबज्जा पर घुमने लगे। बोले- हमेशा से इस गांव ने हमारी रक्षा की है, वे लोग हमें उखाड़ना चाह रहे हैं, आप लोग मेरी मदद कीजिये। अगर ऐसा ही चलता रहा तो मैं यहां से चला जाऊंगा। जब महंथाना का संपत्ति ही नही रहेगी, उपर से मार–दंगा, फिर क्यों रहना यहां। रुंधे गले से निकले महंथ के स्वर ने दामोदरपुर गांव के लोगों को उद्देलित कर दिया। महंत को सदमे में देख पूरे गांव ने उनकी मदद करने का फैसला किया। गांव वाले बोलने लगे- ‘अंधरी आब अन्हेर क’ रहलैए, बहुत गलत क’ रहलैए! अरे धर्मे–कर्म पर त’ ई संसार टिकल छै। ई महंथाना हमर सभक क्षेत्रक गुमान छी!’ आदि–आदि। अब तो आर पार की लड़ाई हो गई—

# अंधरी में मरकर जिंदा हुए भोगेन्द्र झा!

भोगेन्द्र झा 3 जनवरी की शाम को मधुबनी से अंधरी गांव जाने वाले थे, लेकिन महंथ के वकील रहे रायबहादुर सुशील कुमार राय, जिन्हें भोगेन्द्र झा सुशील बाबू कहते थे। वह मधुबनी में रहते थे और ठीक 9 बजे सोने के आदी थे, लेकिन उन्होंने भोगेन्द्र झा को 1 बजे रात तक बातचीत में लगाये रखा। इस मंशा से कि भोगेन्द्र झा शाम को ही अंधरी जाने के लिए तैयार थे, उन्हें कैसे भी रोका जाय, इन्हें नींद लग जाएगी तो सो जायेंगे। लेकिन भोगेन्द्र झा पर तो अलग ही धुन सवार थी।

4 जनवरी 1947 की सुबह भोगेन्द्र झा मधुबनी से साईकिल से निकले। सूड़ी स्कूल के छात्रावास से छात्र नेता कामरेड राजकुमार पूर्वे को बुलाकर बोले- शायद यह जिंदगी की आखिरी भेंट हो। राजकुमार पूर्वे ने नाश्ता का आग्रह किया लेकिन वे नहीं रूके। उसी साईकिल से अंधरी पहुंच गये। अभी पहुंचे ही थे कि बौकू महतो की पत्नी ने कहा-—कामरेड खेने त नय हेब ? चूड़ा ध’ दय छिये पइन में फूलय लेल!—भोगेन्द्र झा बोले- हाँ, भुखले छी।

पहले भोगेन्द्र झा अंधरी की तरफ जाते थे तो कैंप पर पुलिस पार्टी के लोग इज्जत में खड़े हो जाते थे, बात करते थे। उस दिन सब तैयारी कर रहे थे कोई उनसे बात नहीं कर रहा था। अंधरी गांव के पूरब एक तालाब था और उसके चारों ओर एक जगह थी। मालूम हुआ कि हंसेड़ी आ रहा है भोगेन्द्र झा की हत्या करने के लिए। इतने में हथियारबंद लोग आते हुए दिखे। तब तक भोगेन्द्र झा के कुछ कामरेड साथी कटैया गांव के श्रीमोहन झा, माझी साह पहुंचे। ये लोग भोगेन्द्र झा को पकड़कर पीछे करना चाहे। भोगेन्द्र झा से 20–25 गज सामने 100–150 लोग हथियारबंद गंड़ासे के साथ, सैनिकों और नागाओं का समूह और उनके साथ पूरा दामोदरपुर, 22 राइफलधारी, बाकी सभी भाला वगैरह से लैस हसेड़ी आगे की तरफ बढ़ रही थी।

20–30 गज पीछे गरीबों की बस्ती थी। भोगेन्द्र झा के साथ पीछे कुछ औरत–मर्द थे। रोकने वाले भी 2–4 ही थे, वहीं दूसरी तरफ हमलावर की हसेड़ी बढ़ते ही जा रही थी। हरिदेव ठाकुर, बगल के दामोदरपुर गांव के किसान थे, जिनकी जमीन पोखरौनी महंथ से लड़कर भोगेन्द्र झा के कारण ही हासिल हुई थी, ऐसे में वह एहसानमंद थे। हालांकि उनका भतीजा उसी में सिपाही था। उन्होंने भोगेन्द्र झा का पैर पकड़कर रोकने की कोशिश की और बोले कि पीछे हो जाइए अब बचना संभव नहीं है, ये लोग कब्ज़ा रोकने नहीं, आपकी हत्या करने आ रहे हैं। यह सुन भोगेन्द्र झा बोले-—मैं दूसरों को कहता हूं तैयार होने के लिए और मैं खुद हट जाऊं ?

यह कहते हुए उन्होंने पैर झाड़ दिया, छोड़िये पैर। हरिदेव ठाकुर के नाक में चोट लग गयी, खून गिरने लंगा। वह हाथ से नाक झांपे अपने गांव भाग गये, ताकि महंथ का आदमी खून बहते हुए नहीं देख लें और आक्रोशित होकर भोगेन्द्र झा पर हमला न कर दे। एक तरफ भोगी झा के नेतृत्व में अंधरी गांव का जनसमूह दूसरी तरफ महंथ के सिपाही, नागा बाबाओं का जत्था और दामोदरपुर गांव।

अंधरी तरफ से नारेबाजी शुरू हुई-

खटतै कोइ, खयतै कोइ, नै चलतै..... नै चलतै!

हर जोर–जुलुम के टक्कर में, संघर्ष हमारा नारा है!

अब सभे भूमि गोपाल के, तखन किए महंथान के!

आने–माने नै जानै छी, हम जोतइ छी, हक माँगै छी!

दुनिया के मजदूरों, एक हो, एक हो!

भोगेन्द्र झा वहीं धरने पर बैठ गये। इतने में महंथ के हमलावरों ने उन पर लाठी, फरसा, गंड़ासे से एक साथ हमला कर दिया।—लाठी सिर पर लगा, गंड़ासे को उन्होंने रोकने की कोशिश की। गंड़ासा उनके हाथ पर लगते हुए हाथ को दो भाग में चीर दिया। खून की धारा पानी की तरह बहने लगी। बाएं हाथ की दो अंगुली एक तरफ, तीन अंगुली एक तरफ लटक गई।

खून से सने हुए भोगेन्द्र झा बेसुध होकर गिर पड़े। गिरने के बाद भी हमलावरों का बड़ा गुट उन पर ताबड़तोड़ वार करता रहा। बाकी भोगेन्द्र झा के पीछे खड़े अंधरी के महिला पुरुषों पर हमला करने लगे। अंधरी वालों के पास अधिक लाठियां थी ऐसे में फरसा, गंड़ासे के सामने खून की धारा तेज हो गई। भोगेन्द्र झा जहां गिरे वहां खून से जमीन की मिट्टी लाल हो गई। फिर भी हमला जारी था। भोगेन्द्र झा को बचाने के लिए संत खतबे ने मोर्चा संभाला। भोगेन्द्र झा पर हो रहे हमले को अपने उपर लेते हुए आगे बढ़े लेकिन फरसे की वार से वह भी मरणासन्न हो गये। इधर भोगेन्द्र झा का सिर से लेकर पैर तक कोई हिस्सा नहीं बचा, जहां फरसा और लाठी से हमला नहीं हुआ। भोगेन्द्र झा होश कर उठने को कोशिश करते, खड़े होते लेकिन फिर लुढ़क जाते। जब एक बार अधिक समय तक जमीन पर पड़े रहे तो भीड़ से आवाज आई- मरि गेले भोगेन्द्र....

भोगेन्द्र झा को यह आवाज सुनाई दी। चैंक कर वह फिर से उठने की कोशिश करने लगे इतने में उनकी सांसें चलता देख फिर से हमला हुआ। पल्टू यादव, भोगेन्द्र झा को उठाने की कोशिश कर रहे थे। महंथ के तरफ से हुजूम में चुल्हाई झा नाम के एक व्यक्ति थे। जो भोगेन्द्र झा के रिश्ते में आते थे, वह यह कहते हुए भोगेन्द्र झा के तरफ बढ़े कि... हे–हे... जानसँ नै मारहक, छोड़ि दै जाहक! मरि जेतै.... मरि जेतै।

चुल्हाई झा को भोगेन्द्र झा की तरफ आता देख पल्टू यादव उन्हें दुश्मन मान उनके गर्दन पर फरसा से वार कर दिया। फरसा गर्दन पर नहीं लगके चुल्हाई झा के कंधे पर लगी। वो जमीन पर गिरे, खून का फव्वारा निकलने लगा, जिसे देख तेजू झा ने पल्टू यादव पर लकड़ी का चेरा फेंका। जब तक पल्टू यादव प्रतिकार करते तब तक नागा बाबा ने मौका देख उसके पेट में भाला घोंप दिया। पल्टू यादव की मौत मौके पर ही हो गई।

फिर भी खून खराबा मार काट जारी था। इसी बीच महंथ के हसेड़ी में से किसी ने भोगेन्द्र झा को मरा हुआ समझ उन पर गोइठा जलावन रख आग लगाने की बात कही। मार–काट मचाने के बाद महंथ के हमलावर लौटने लगे तो कुछ ही दूरी तय हुई होगी। भोगेन्द्र झा उठते, फिर गिरते। यह सिलसिला कुछ देर तक चला, जिसे दूर से देख महंथ के लोगों ने प्राण छूटने से पहले शरीर की क्रिया बताया और चलते चले गये। अंधरी के लोग भी उन्हें मृत समझ चुके थे। इधर गांव के लोग चुल्हाई झा को उठा ले गये। वहीं अंधरी के लोग पल्टू यादव व भोगेन्द्र झा को मरा हुआ समझ उठाने आये तो किसी ने देखा उनका शरीर हिल रहा था हल्ला हुआ- भोगी बाबू जिंदा हैं, सांस चल रही है, हिल रहे हैं। जिसके बाद खून से लथपथ भोगेन्द्र झा टांगकर बेनीपट्टी अस्पताल लाये गये। कई दिनों तक आंखें नहीं खुली। सिर के उपर सैकड़ों लाठियां, गंड़ासे लगे थे। सिर की हड्डी चकनाचूर हो गई थी।

इस घटना को याद करते हुए भोगेन्द्र झा ‘क्रांति योग’ में बताते हैं 4 तारीखकेँ हमला भेलै। संज्ञाशून्य भेला बाद हल्का होश सन बुझायल कि सुनलिए- मरि गेलौ, चलै चल! कि हमरा मोनमे आयल, अरे के मरि गेलै ?

से आँखि फुजल त’ देखलिऐ लोक गराँस, लाठी, भाला संग भागल जा रहल छै! त’ ई सभ कोना भ’ गेलै! हम त’ खून–खराबा नै चाहैत रही!

हम फेर उठक चेष्टा कयलौं, मुदा नै उठल भेल! लागल जे आब शरीर माटि संग बन्हा गेल अछि! माथ टिका क जमीन पर पड़ल रही। तैयो उठबाक प्रयास करिते रहलिऐ कि माथ पर तखने दू–तीन गंड़ास फेर लागल।

तैयो साहस कैलिऐ पर खूने–खून! फेर ओंघरा गेलिऐ! फेर त’ निष्प्राण सन! आ से बड़ी काल धरि!

फेर त’ जेना ओ सभ बुझि गेलै जे भोगी झा गेलौ, काल टरलौ। फेर जानि नै कोना, हमरा प्रज्ञा घुरल! हम उठी, खसी, ओंघरा जाइ—फेर।

एना होइत देखि, जे किछु लोक तखनो अंतिम खेल देख’ चाहै, कहब शुरू क’ देलकै, आब बाइ पर एना करै छौ, आब जएह घड़ी सएह घड़ी! आब एक पाँत गोरहा लेने आबै! सलाइ त’ अछिये, एखने खरड़ि दय छिये—

तखने एकटा बूढी माई राम चिचियाइत बजलीह- कते गेलय मरदवा सभ ? महंथकेँ आदमीसँ कामरेड के लाश फूंके लेल आबय हय।

कानमे ई आवाज गूंजल त’ बेसुध देहमे चेतना जागल, ककर लाश ? होशमे एबाक कोशिश केलहुँ।

कोशिश करैत–करैत, उठिक’ ठाढ़ भ’ गेलिऐ! आब त’ सभक अन्दर आदंक ध’ लेलकै! कियो कहै भूत, त’ कियो भगवान! फेर वएह सभ भगवान छौ, भोगी भगवान छौ, अनघोल करब शुरू क’ देलकै—आ फेर हमर भक् टूटल अस्पतालमे।

भोगेन्द्र झा का इलाज बेनीपट्टी अस्पताल में होना शुरू हुआ, उन्हें देख किसी को एहसास नहीं था कि यह अब बच पाएंग। आंखें बंद थी। इशारों में बातें कर रहे थे। घटना की जानकारी आम होते ही दूर–दूर से लोग इकट्ठा होने लगे। उनके गांव बरहा, नानी गांव जरैल तक खबर पहुंची। अगल बगल के गांवों के सैकड़ों लोग बेनीपट्टी में उमड़ पड़े। सभी के मन में आक्रोश था। सभी प्रतिकार में महंथ की हत्या करने व अंधरी दामोदरपुर गांव को फूंक देने की योजना बनाने लगे।

जब भोगेन्द्र झा होश में आये तो उन्हें पल्टू यादव व संत खतबे के मौत की खबर दी गई। साथ ही इस घटना के प्रतिकार में बन रही योजना के बारे में जानकारी मिली।

भोगेन्द्र झा बोले- अगर किसी ने गांव को फूंका या किसी की हत्या हुई तो मैं सिर पटक कर, जो–भी बचने की आशा है, मर जाऊंगा। भोगेन्द्र झा की जिद के आगे सभी चुप हो गये। बेनीपट्टी में भोगेन्द्र झा तीन दिनों तक रहे, लोगों का जमावड़ा लगता रहा। हर गांव चैक चैराहों पर इसी घटना की चर्चा। और चर्चा यह भी होनी शुरू हो गई थी कि अब महंथाना अधिक दिन नहीं चलने वाली है। इसी दौरान अस्पताल में दामोदरपुर के हरिदेव ठाकुर उनकी जिज्ञासा करने पहुंचते थे। उनके जरिए भोगेन्द्र झा महंथ के लिए खबर देते कि ‘अब भी महंथ से कहिए कि जो समझौते की बात पहले चल रही थी, उसको वह मान लें, तब मैं मुकदमा ही नहीं करूंगा’।

वहीं इस घटना को लेकर नालिसी 6 तारीख, यानी तीन दिन बाद हुई। भोगेन्द्र झा ‘क्रांति योग’ में बताते हैं, जब मेरी नालिसी हुई उस समय मैं लिखने लायक नहीं था। आखें देख नहीं सकती थीं, सूजन भी आ गया था और थोड़ा सा पस भी हो गया था। सोशलिस्ट नेता डॉ बैद्यनाथ झा मेरी मदद करने पहुंचे, उन्होंनें मेरा बयान लिखा और लिखने में अपने दो–तीन दुश्मनों का भी नाम घुसेड़ दिया। दस्तखत तो मेरा हो गया। उसमें जो नाम घुसेड़ दिया उसमें एक थे रामेश्वर जी। जिंदगी में उन्होंने कभी मेरा समर्थन नहीं किया। वह मेरे पास अस्पताल पहुंच गये और मेरे पास आकर बोले- भोगेन्द्र जी, आपने मुझको खून करने वालों में देखा है ? तब तो मैं आंख से देख नहीं सकता था, आवाज से पहचाना। मेरे मुंह से गलत नाम कहलाया जायेगा, यह उलझन मेरे दिमाग में थी। आदमी ये बड़े # # # थे, मगर वह उसमें थे नहीं। इसलिए मैं चाहता था और स्वभाविक भी है कि झूठ नहीं कहना पड़े। नालिसी से किसी का नाम छांट दूंगा तो केस ही कमजोर हो जायेगा, यह उलझन थी।

इस बीच उन्हें इलाज के लिए बेनीपट्टी से मधुबनी अस्पताल भेजा गया, जहां कांग्रेस मिनिस्टरी बनने के बाद पंडित विनोदानंद झा, अब्दुल कयूम अंसारी, दोनों तत्कालीन मंत्री, उन्हें देखने आये। पंडित विनोदानंद झा बाद में बिहार के मुख्यमंत्री भी बनें। उन लोगों को डॉक्टरों ने बताया कि सिर में काफी चोट है, ठीक होगा भी नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। ऐसे में तत्काल भोगेन्द्र झा को पटना में नामी सर्जन कर्नल भार्गव के यहां भेजा गया, जहां उनका इलाज शुरू हुआ।

इधर भोगेन्द्र झा अस्पताल में थे, उधर इस घटना के विरोध में अंधरी गांव में सभा की घोषणा उनके साथियों ने कर दी। सभा पर सरकारी रोक लगा दी गई। बावजूद सभा का आयोजन हुआ, जिसके कारण आदेश उल्लंघन के आरोप में श्रीमोहन झा, तेज नारायण झा, राजकुमार पूर्वे, माझी साह, गोकुलानंद चैधरी को गिरफ्तार कर पुलिस ने बेनीपट्टी थाना हाजत में बंद कर दिया। दूसरे दिन सभी को मधुबनी जेल भेज दिया। रास्ते में कई जगहों पर रोक कर लाल झंडों के साथ लोगों ने इन सभी को जेल जाने के क्रम में स्वागत किया। बरहा गांव के गोकुलानंद चैधरी बाद के वर्षों में रघेपुरा पंचायत के मुखिया व माझी साह मधवापुर प्रखंड के प्रमुख निर्वाचित हुए।

भोगेन्द्र झा ठीक होकर पटना से अगस्त 1947 से पहले लौटे। लेकिन कई सालों तक वह ठीक से बोल नहीं पाते थे। इशारों में ही बातें करते थे। बावजूद उनकी क्रांति मंद नहीं पड़ी थी। इस घटना के बाद ठीक होकर क्षेत्र में लौटे भोगेन्द्र झा के बारे में यह चर्चाएं आम थी कि उनके सिर में बंदर की हड्डी लगी हुई है। अक्सर भोगेन्द्र झा इस घटना को याद कर अपना सर दिखाते हुए कहते थे- ‘मेरे सिर पर हाथ रखने से धड़कन सुनाई देती है। धूप में जाने से मनाही है, सिर पर बर्फ बर्दाश्त कर सकता हूं लेकिन धूप नहीं’ जिसकी वजह से वह सोलर हैट पहना करते थे।

इस घटना ने उन्हें ‘भोगी भगवान’ के नाम से अलग पहचान दिया। ‘भोगी भगवान’ ना सिर्फ उनके चाहने वाले उन्हें कहा करते थे, बल्कि विरोधियों ने भी यह चलाया। जिसमें सबसे अधिक फैलाव बिहार के प्रधानमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह के एक कार्यक्रम से हुआ। दरअसल श्रीकृष्ण सिंह पंडौल आये हुए थे, जब व्यापक आंदोलन फैल गया था तो एक खत श्रीकृष्ण सिंह ने पंडित धनराज शर्मा के जरिए भोगेन्द्र झा को भेजा था कि भाई भोगेन्द्र... मैं आ रहा हूं, बात करूंगा, तब तक अपना हाथ पैर समेट कर रहिए।

इस बीच भोगेन्द्र झा गिरफ्तार कर लिये गये। बाद में श्रीकृष्ण सिंह पंडौल आये, वहां की रैली में भोगेन्द्र झा के स्वयंसेवक लाल पैंट, लाल शर्ट, लाल टोपी पहन गये थे, इन लोगों ने नारा लगाया- भोगेन्द्र झा को रिहा करो, जमींदारी मिटाओ, वीर भोगेन्द्र जिंदाबाद।

यह सुन श्रीकृष्ण सिंह ने डीएम से पूछा, तो डीएम ने बताया- हमनें गिरफ्तार कर लिया है।

तब श्रीकृष्ण सिंह ने सभा में मंच से कहा- भोगेन्द्र झा अपने आप को मार्क्सवाद का विद्वान कहते हैं, मगर ‘भोगी भगवान’ कहलाते हैं, अंधविश्वास फैलाते हैं।—उस रैली से ‘भोगी भगवान’ बात और फैल गयी। भोगेन्द्र झा के नेतृत्व में अंधरी गांव में हुए जमींदारी विरोधी आंदोलन का असर अभूतपूर्व हुआ, जो कि बाद के दशकों तक इसकी चिंगारी आग का रूप लेती रही। अंधरी से हुआ यह आंदोलन सलेमपुर, कटैया, धकजरी होते हुए कई गांवों तक पहुंची।

भोगेन्द्र झा की जिंदगी से जुड़े ये प्रसंग जितने रोचक हैं, उतने ही सवाल छोड़ जाते हैं। इन सवालों के जवाब बेनीपट्टी के उसी स्थानीय इतिहास में छिपे हैं, जिसे धीरे-धीरे आधुनिकता के इस युग में स्थानीय इतिहास के प्रति जिज्ञासा की कमी सहित अन्यन्य कारणों से हमारी स्मृति से दूर होता जा रहा है।

मैंने ‘बेनीपट्टी 0 KM’ पुस्तक में ऐसे ही अनेक प्रसंगों, घटनाओं, संघर्षों और बेनीपट्टी के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास को दस्तावेज के रूप में संकलित करने का प्रयास किया है।

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