23/08/2026
48 साल पहले आज के दिन ही शहीद हुए थे
#शहीदों_के_रास्ते
1.. #शहीद_कामरेड_सीताराम_मिश्र
" #चला_जनाजा_जब_शहीद_का, #देख_सितारे_झूम #उठे।
#मिट्टी_कहने_लगी_कब्र_की, ी_हमें_निहाल #शहादत"।
कवि भारद्वाज कि उक्त पंक्ति चरितार्थ नजर आ रही है। 24 अगस्त 1978 का दिन बिहट के ऐतिहासिक शहीद स्मारक पर मिश्र जी की लाश पड़ी थी। हजारों -हजार लोगों की अपार भीड़ अपने दिवंगत नेता को अंतिम विदाई देने हेतु जमा थे । हाथ में फूल, आंख में आंसू लिए स्तब्ध थे। हर कोई बिना जुबान खोलें एक दूसरे से कुछ पूछ रहा था। पूरे औद्योगिक क्षेत्र बेगूसराय से मोकामा तक सन्नाटा छाया था। स्कूल कॉलेज, हॉट बाजार स्वत: बंद थे। सभी कल कारखानों में हड़ताल थी। मिश्रा जी धूमकेतु की तरह संसदीय राजनीतिक आकाश में चमकते हुए आए और जाते जाते लाखों आंखों का तारा बन गए। कुर्बानी करने वालों की सदा से यही कहानी रही है। समाज को सर्वस्व देकर उनकी पीड़ा से जुड़ गए जिससे एक नई दिशा का बोध लोगों को हुआ। क्षेत्र के भू स्वामियों, शोषकों, बिचौलियों एवं अपराध कर्मियों के खिलाफ संघर्ष कर जो नया कीर्तिमान स्थापित किया, हर मोर्चे पर इन तत्वों को पीछे हटाया, उसी का नतीजा था की 23 अगस्त 1978 की संध्या अपने ही गांव में राष्ट्रीय उच्च पथ पर गोलियों से भून दिया गया।
इनका जन्म 14 मई 1928 को बेहट गांव के मक्ससपुर टोला में एक गरीब, ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल में हुई। इनके पिता स्वर्गीय यमुना मिश्र रामलीला मंडली के संचालक थे। वे काफी सज्जन ,सुसंस्कृत एवं कला प्रेमी थे। मिश्र जी जब मिडिल स्कूल के छात्र थे, उसी समय देश में "भारत छोड़ो" का नारा गूंज रहा था। आम जनता" करो या मरो "नारे के साथ सड़क पर उतर चुकी थी। बिहट गांव का वीर-सपूत उचित सिंह अंग्रेजों की गोलियों से मौत के घाट उतार दिए गए। कई लोग गिरफ्तार किए गए। बिहट बिहार का "बारदोली" बन गया था। बालक सीताराम अपने सहपाठियों के साथ इस आंदोलन में भाग लिए । राधाकृष्ण चमरिया उच्च विद्यालय, बरौनी में नामांकन करवाएं। यहीं से सन 1947 में मैट्रिक पास किए। मैट्रिक पास करने के बाद कुछ दिनों तक गांधी उच्च विद्यालय, बिहट में बिना वेतन का अंशदान दिए। उस समय यह गांव के बापू क्लब से संबंधित थे। यह वॉलीबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे। इन्हें पिता से ही स्वाभिमान की रक्षा तथा कला के प्रति सांस्कृतिक मंचों के लिए अभिरुचि विरासत में मिली थी। ये अच्छे बांसुरी वादक थे तथा तबला, हारमोनियम ,नाटक से भी लगाव रखते थे। जी डी कॉलेज बेगूसराय में स्नातक के छात्र थे तभी पिता की मृत्यु हो गई और इन्हें पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी। चाहकर भी स्नातक द्वितीय भाग की परीक्षा ये नहीं दे सके। पूरे परिवार के भरण पोषण की जवाबदेही इनके कंधे पर थी। समाज के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार, कुत्सा एवं उत्पीड़न को इन्होंने देखा, और स्वयं परखा, जिससे इनके अंदर असंतोष के अंकुर पनपने लगे तथा विद्रोह की आग धड़कने लगी। इसी पृष्ठभूमि में गांव के ही कॉमरेड नागेश्वर सिंह के संपर्क में आकर 1950 में कम्युनिस्ट बन गए। गरीबों को संगठित करके आंदोलन शुरू किया।
सन 1951 में बिहट गांव के इब्राहिमपुर मोची टोले पर स्वर्गीय सियाराम सिंह महंत के द्वारा जुल्म ढाया जा रहा था। जागो मोची को पीट कर घायल कर दिया गया। न्यायालय में मुकदमा चला। मिश्र जी, साथी राम प्रताप सिंह जो इस केस में मोची के तरफ से गवाह थे उनके साथ कोर्ट जाना एवं केस की देखरेख कर रहे थे। जिसमें मजदूरों की जीत हुई।
परिवार का बोझ, गरीबी की लाचारी ने इन्हें मजबूर कर दिया। पोस्टर समय के थपेड़े ने इन्हें रोटी की तलाश में मरांची उच्च विद्यालय में शिक्षक बना दिया। लेकिन यहां भी मजदूरों और गरीब किसानों के बीच पार्टी के पैगाम को पहुंचाने एवं संगठन करने में लगे रहे। धीरे धीरे इनकी मौजूदगी गांव सामंतों को खटकने लगी। फलता ही स्कूल की प्रबंध समिति इन्हें "खतरनाक कम्युनिस्ट" कहकर स्कूल से निकाल दिया। जिंदगी के इस चौराहे पर मिश्र जी यह सोच कर की मानव परिवर्तन का चक्र कभी रुका नहीं, सृजन का स्रोत कभी रुका नहीं, मृत्यु जीवन को निकल सकी ना अंधकार प्रकाश को निकल सका, इसी आशा के सहारे नए संकल्प के साथ मजदूरों और किसानों की जिंदगी में एक नया सवेरा लाने के लिए अपने को समर्पित कर दिया। पटना जिला के बाढ़ सब डिवीजन में किसानों और मजदूरों को संगठित करने एवं समस्याओं के निदान हेतु संघर्ष विकसित करने की जिम्मेदारी पार्टी ने दिया। अथक परिश्रम कर पार्टी विकास में गति पैदा कर लोकप्रियता हासिल की। अपने गांव की बढ़ती आबादी के बीच महिलाओं में शिक्षा का अभाव एक प्रश्न बन के सामने खड़ा था। मिश्र जी के नेतृत्व में कम्युनिस्ट साथियों का पूरा ग्रुप मिलकर 1 अगस्त 1955 को गांव में बालिका मध्य विद्यालय की स्थापना। गंगा पर पुल, गरारा में रेलवे यार्ड आदि का कार्य प्रारंभ हो चुका था। बरौनी औद्योगिक विकास के नक्शे पर आ चुका था। मिश्र जी का इसी क्षेत्र में जमीन का उचित मुआवजा स्थानीय लोगों को रोजगार तथा मजदूरों की संगठित करने के काम में पार्टी ने लगाया। उस समय हैजा एक प्राण लेवा बीमारी थी। आमतौर पर बरसात के पहले दौर में गांव के घनी आबादी वाले गंदे मोहल्ले में बड़े पैमाने पर यह बीमारी फैल जाती थी। मिश्र जी के नेतृत्व में साथियों ने स्कूल पर कैंप लगाकर रोगियों की सेवा करने का काम किया। साथ ही डी०पी० गुप्ता के निर्देशन में उचित इलाज करवा कर बड़े पैमाने पर लोगों को मौत से बचाने का काम किया।
सन 1962 में बरौनी रिफायनरी के मजदूरों को संगठित करने की जिम्मेवारी कॉमरेड चंद्रशेखर सिंह, कॉमरेड योगेंद्र शर्मा, कॉमरेड सूर्य नारायण सिंह, कॉमरेड देवकीनंदन सिंह के साथ सीताराम मिश्र को भी दी गई। कंपनी की हठधर्मिता और जायज मांगों को नहीं मानने के कारण देश में इमरजेंसी रहते हुए भी मजदूरों को हड़ताल करना पड़ा। 21 दिनों की इस लंबी हड़ताल में उनकी सुरक्षा एवं रोटी का इंतजाम करने में मिश्र जी की बड़ी भूमिका रही। अधिकांश मजदूर दूसरे इलाके, जिले और राज्य के थे। अगल बगल के गांव और पंचायतों से स्वयंसेवक एवं भोजन सामग्री इकट्ठा करना इनका मुख्य काम था। प्रबंधन, पुलिस, गुंडा एवं इंटक यूनियन आंदोलन को कुचलना चाहती थी लेकिन उन्हें कामयाबी ना मिली अंततोगत्वा जीत मजदूर की हुई। बिहट गांव में बालिका उच्च विद्यालय की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इनके पहल पर जमीन दाता के नाम से सन 1963 में वैदेही बल्लभशरण बालिका उच्च विद्यालय का निर्माण किया गया। सन 1965 का छात्र आंदोलन बिहार के जनमानस को झकझोर दिया। कांग्रेसी हुकूमत के खिलाफ विपक्ष की सभी पार्टी मैदान में उतर गई। बड़े पैमाने पर कम्युनिस्टों गिरफ्तार किए गए। काफी प्रयास के बावजूद भी मिश्र जी पुलिस के हाथ नहीं लगे तथा भूमिगत रहकर कार्य करते रहें।
सन 1967 विधानसभा चुनाव बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया। सुबह में संविद की सरकार बन गई। बरौनी औद्योगिक क्षेत्र के विकास की गति कुछ और तेज हो गई। खाद कारखाना के लिए अर्जित की जा रही जमीन के मुआवजे की लड़ाई तेज हुई। बड़े पैमाने पर किसान संगठित होकर संघर्ष में उतरे। मिश्र जी के नेतृत्व में प्रदर्शन घेराव करते हुए अनेक लोग जेल यात्रा भी किए। दमन का कोई हथियार जब कारगर साबित ना हो सका तो सरकार पीछे हटी। जीत किसानों की हुई। 5000 रुपए एकड़ घोषित कीमत की जगह 15000 रुपए एकड़ कीमत से भुगतान हुआ।
तानाशाह महाप्रबंधक रंजीत सिंह कुशवाहा की मनमानी के खिलाफ लड़ाई चली। अंततोगत्वा उसे बरौनी से भागना पड़ा। बरौनी लघु उद्योग की स्थापना की प्रक्रिया तेज हुई। लेकिन उस क्षेत्र में पर रही आबादी पूरे देवना जमरा गांव को विस्थापित होकर पुनर्वासित होने का था। संघर्ष के फलस्वरूप गांव को मुआवजे के साथ पुनर्वासित कराने में सफलता मिली। लघु उद्योग के विकास एवं विस्तार के साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार एवं रोजगार में लगे मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी और कानूनी सुविधा की लड़ाई प्रारंभ हो गई। इसी लड़ाई के गर्भ से बरौनी लघु उद्योग मजदूर यूनियन पैदा हुई।
देवना जेमरा पुनर्वास की लड़ाई लगभग 9 वर्षों की लंबी प्रक्रिया है स्थानीय स्तर पर कॉमरेड शकूर खान, देवना एवं ब्रह्मदेव सिंह (शिक्षक) जेमरा के नेतृत्व में आम जनता को संगठित कर मिश्र जी लगातार धरना प्रदर्शन घेराव करते रहे। आवश्यकता आ पड़ी प्रशासन के मुकाबले की तो जेल जाने से भी है साथी पीछे नहीं हटे।
सन 1968 में बालिका उच्च विद्यालय बीहट के सहायतार्थ पैसे जमा करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती का चैरिटी शो करवाया। जबकि गांव के राजनीतिक विरोधियों ने समानांतर आयोजन किया, लेकिन उसे मकसद में सफलता नहीं मिल सकी। इनका आयोजन जो गांधी उच्च विद्यालय के प्रांगण में किया गया था काफी सफल रहा।
बिहट गांव जहां सामंतों का वर्चस्व था, बैठ बेगारी, बंधुआ मजदूरी की प्रथा चल रही थी। सामाजिक अत्याचार छुआछूत आम बात थी। कम्युनिस्ट पार्टी के विकास के साथ उपरोक्त बंधन टूटते गए। प्रतिक्रिया स्वरूप कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को अपमानित करना, तंग और तबाह करना विरोधी तत्वों का मुख्य धंधा बन गया था। एक वक्त ऐसा भी आया जब दिन के उजाले में गांव के सामंती, प्रतिक्रियावादी शक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाले मुट्ठी भर लोग हथियार के साथ एक तरफ खड़े थे, दूसरी तरफ गांव की आम जनता कई सौ की संख्या में मुकाबले के लिए खड़ी थी। जन बल से टकराने का साहस तो उन्हें ना हो सका लेकिन षड्यंत्र कर फसाने का और दमन करने का सिलसिला तेज हो गया। 7 अप्रैल 1969 को गांव के एक व्यक्ति के हत्याकांड में मिश्र जी सहित कई नेताओं को फंसाया गया। कई महीनों तक जेल में रहने के बाद छूटकर आए। पुनः दिसंबर में एक दूसरे हत्याकांड में ने फंसा दिया गया। दिसंबर में ये पुनः जेल गए। बेगूसराय जेल प्रशासन एवं अपराधी की सांठगांठ के खिलाफ वहां भी संघर्ष किए। जिसके कारण इन्हें बेगूसराय जेल से मुंगेर जेल भेज दिया गया। वहां भी बंधुओं पर हो रहे अत्याचार एवं जेल की कुव्यवस्था के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी।। फलत: मुंगेर से मुजफ्फरपुर जेल स्थानांतरित कर दिए गए।
उसी समय ग्राम पंचायत का चुनाव होने वाला था। यह वर्ष 1970 का था।का० सीताराम मिश्र जेल से ही नामांकन दाखिल किए और अपने पंचायत के मुखिया निर्वाचित हुए। जुलाई 1970 में ये जेल से छूटकर आए। प्रयोजना भत्ता के सवाल पर 1971 में गढ़हरा बरौनी रेल कर्मचारियों का 33 दिनों की ऐतिहासिक हड़ताल का संचालन मिश्र जी कर रहे थे। इनके साथ रामप्रवेश राम, श्री चंद्र प्रसाद,के एन० सिंह, जगदीश बाबू, मिश्रा जी, गार्ड साहब, शर्मा जी आदि थे।
सन 1971 में होने वाले प्रमुख चुनाव के सिलसिले में जब क्षेत्र का भ्रमण कर रहे थे तब उनकी जीप दुर्घटनाग्रस्त हो गई। मिश्र जी को घायल अवस्था में बेगूसराय लाया गया। जहां लगातार तीन महीने तक इलाज में रहना पड़ा। इसके बावजूद भी इनका एक पांव पूर्ण कारगर ना हो सका।
सन 1972 विधानसभा का चुनाव एक महत्वपूर्ण राजनीतिक युद्ध था दिसंबर में बिहार महिला समाज का द्वितीय सम्मेलन बिहट में करवाएं। सन 1973 में 1800 सौ रेलवे के पलटी या मजदूर को कैजुअल बहाल करवाएं। लगभग डेढ़ महीने के बाद रेल प्रशासन इन मजदूरों को काम से हटाने लगा तब सबों को संगठित कर 3 दिनों का हड़ताल चला। पूना समझौता कर 1200 मजदूरों का स्थायीकरण हुआ।
खेल जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। यह उनकी सोच थी। सोच ही नहीं वे हर सोच को व्यवहार में उतारते थे। सन 1973 में स्वतंत्रता सेनानी बिहार के विद्युत एवं सिंचाई मंत्री स्वर्गीय राम चरित्र सिंह के स्मृति में राज्य स्तरीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता का सफल आयोजन करवाए। इतनी ही अभिरुचि सांस्कृतिक कार्यक्रम से भी थी। इसलिए हर वर्ष पूरे 1 सप्ताह का आयोजन करवाते थे। जिससे आम लोग अपने ज्वलंत सवालों को परदा पर देखते थे। साथ ही निदान के रास्ते का भी दिशा निर्देश पाते थे। सीबीज बाटा मजदूर यूनियन (मोकामा) का महासचिव चुने गए। बरौनी डेयरी के निर्माण के साथ ही कर्मचारी यूनियन बनाने के कार्य इन्होंने किया। बरौनी खाद कारखाना कर्मचारी यूनियन का आजीवन महामंत्री रहे।
सन 1974 में अखिल भारतीय स्तर पर उर्वरक कर्मचारियों का संघ बनाने का पहला इन्होंने ही किया। और जून में राष्ट्रीय बैठक बरौनी में बुलाई गई।
8 मई 1974 से 23 दिनों तक रेल मजदूरों की चलने वाली अखिल भारतीय हड़ताल में भी गरहरा बरौनी रेल क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभाई। राज्य की राजनीति काफी गर्म थी। जे०पी० के नेतृत्व में छात्र नौजवान का उग्र आंदोलन चल रहा था। विरोध में मिश्र जी जैसे नेता मजबूती के साथ डटे हुए थे।
सन 1976 में पार्टी के जन नेता कॉमरेड चंद्रशेखर सिंह अलविदा हो गए। भोला सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। राजनीतिक विरोधियों का मंसूबा था कि यह लाल झंडा समाप्त होगा। लेकिन 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता दल के बावजूद भी कम्युनिस्ट पार्टी को विशाल वोट मिला। पुनः विधानसभा चुनाव में पार्टी अपनी परंपरागत सीट के साथ साथ नए निर्वाचन क्षेत्र मटिहानी पर भी अपना कब्जा जमाया। इस नए क्षेत्र के नए एवं प्रथम विधायक के रुप में कामरेड सीताराम मिश्र शपथ ग्रहण किए। मिश्र जी निर्भीक एवं जुझारू राजनीतिक योद्धा थे।
दुश्मन हमेशा इनकी हत्या की साजिश में लगे रहते थे। कॉमरेड मिश्र जी का सोच एवं व्यवहार कुछ इस तरह का था:-
" #सितम_भी_सहना, #दुआ_भी_करना,
ेकसी_का_गया_जमाना।
ै_जुर्रत_गिराओ_बिजली,
#बना_रहे_हैं_हम_आशियाना।।
#किसी_भी_हालत_में_बागवानों,
#तुम्हारा_एहसान_हम_ना_लेंगे।
#जो_अपनी_गैरत_पर_आंच_आई
#आशियाना।।
मिश्र जी के नेतृत्व में बरौनी खाद कारखाना की उप नगरी में अखिल भारतीय महिला समाज की राष्ट्रीय परिषद की बैठक संपन्न हुई।
विधायक बनने के बाद सबसे पहले इस विधानसभा के सबसे पिछड़ा इलाका साम्हों दियारा का बिजलीकरण की स्वीकृति इन्होंने करवाया।
बिहार प्रदेश ट्रेड यूनियन कांग्रेस के वे ना केवल सचिव थे, बल्कि मुस्तैदी से उस जिम्मेवारी को पूरा भी करते थे। संगठित असंगठित जहां भी मजदूर वही मिश्र जी। खेत -खलिहान,कल- कारखाना, रिक्शा टमटम, मोटर रेल हर जगह मिश्र जी, यही तो उनकी लोकप्रियता का कारण था। पार्टी के राज्य परिषद के सदस्य तथा बेगूसराय जिला के सहायक मंत्री भी थे।