21/08/2026
कफ़न सिर्फ़ एक कपड़ा नहीं, ज़िंदगी की उस विडंबना का नाम है जहाँ इंसान जीते-जी अपनी ज़रूरतों के लिए जूझता रहता है और मरने के बाद भी उसके हिस्से में कुछ नहीं आता।
जिसने कफ़न बनाया, उसके लिए वह रोज़गार था;
जिसने खरीदा, उसके लिए आख़िरी फ़र्ज़;
और जिसके लिए खरीदा गया, उसे दुनिया से कोई मतलब ही नहीं रहा।
शायद प्रेमचंद कहना चाहते थे—
इंसान पूरी उम्र जिन चीज़ों को अपना समझकर जोड़ता है, अंत में वही चीज़ें किसी और के काम आती हैं।
इसलिए ज़िंदगी को चीज़ों से नहीं, इंसानियत और रिश्तों से भरना चाहिए।