05/08/2026
इतिहास केवल विजेताओं की कथा नहीं, बल्कि उन आवाज़ों का भी दस्तावेज़ होना चाहिए जिन्हें सदियों तक सुनने से इंकार किया गया।
सवाल आज भी वही है—इतिहास किसने लिखा? क्या लिखा? किसके लिए लिखा? और सबसे ज़रूरी, किसे इतिहास से बाहर रखा?
आदिवासी समाज को इतिहास के निर्माता के रूप में नहीं, बल्कि 'जंगली', 'आदिम', 'पिछड़ा' या 'जन्मजात अपराधी' जैसी संज्ञाओं में बाँध दिया गया। यह कोई भूल नहीं थी, बल्कि ज्ञान और सत्ता की एक सुनियोजित राजनीति थी। जिन समुदायों ने जल, जंगल, ज़मीन, प्रकृति और लोकतांत्रिक जीवन मूल्यों की सबसे लंबी लड़ाइयाँ लड़ीं, उन्हें इतिहास की किताबों में अक्सर फुटनोट तक सीमित कर दिया गया।
"आदिवासी इतिहास नहीं, इतिहास के निर्माता हैं।"
"जल-जंगल-ज़मीन केवल संसाधन नहीं, आदिवासी सभ्यता की आत्मा हैं।"
ऐसे समय मेंआदरणीय डॉ. DrJitendra Meena की पुस्तक "संविधान सभा में आदिवासी" केवल एक किताब नहीं, बल्कि इतिहास के छूटे हुए पन्नों को वापस जोड़ने का गंभीर वैचारिक प्रयास है। यह पुस्तक हमें बताती है कि संविधान निर्माण में आदिवासी प्रतिनिधियों की आवाज़, उनके विचार और उनके योगदान को समझे बिना भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की कोई भी व्याख्या अधूरी रहेगी।
"आदिवासी विमर्श दया का नहीं, बराबरी और न्याय का विमर्श है।"
"जिस इतिहास में आदिवासी नहीं, वह इतिहास अधूरा है।"
इस महत्त्वपूर्ण कृति के लिए लेखक और हमारे वैचारिक मित्र डॉ. जितेंद्र मीणा जी को हार्दिक बधाई। ऐसी किताबें केवल पढ़ी नहीं जातीं, वे हमारी ऐतिहासिक चेतना को नए सिरे से गढ़ती हैं और स्थापित धारणाओं से सवाल पूछने का साहस देती हैं।
मेरी दोनों पुस्तकों के प्रकाशक Unbound Script को भी विशेष बधाई, जो लगातार ऐसे गंभीर वैचारिक साहित्य का प्रकाशन कर भारतीय बौद्धिक परंपरा को समृद्ध कर रहे हैं। प्रकाशक अलिंद माहेश्वरी और संपादक आशीष ने जिस संवेदनशीलता, सौंदर्यबोध और पेशेवर गुणवत्ता के साथ इस पुस्तक को प्रकाशित किया है, वह अपने आप में सराहनीय है। किसी गंभीर पुस्तक को केवल छाप देना पर्याप्त नहीं होता, उसे इस तरह प्रस्तुत करना भी एक वैचारिक जिम्मेदारी है कि पाठक उसके भीतर प्रवेश करने के लिए प्रेरित हो।
"किताबें केवल शब्द नहीं बदलतीं, वे समाज की स्मृति बदलती हैं।"
"जब हाशिये की आवाज़ें किताबों में दर्ज होती हैं, तभी इतिहास सच के करीब पहुँचता है।"
आज ज़रूरत केवल आदिवासियों पर लिखी गई किताबें पढ़ने की नहीं, बल्कि आदिवासी दृष्टि से भारत को पढ़ने की है। क्योंकि जब तक इतिहास, संविधान, साहित्य और लोकतंत्र की हमारी समझ में आदिवासी समाज का ज्ञान, संघर्ष और दृष्टि बराबरी से शामिल नहीं होगी, तब तक भारत की कहानी भी अधूरी रहेगी और उसका भविष्य भी। यही आदिवासी विमर्श का सबसे बड़ा संदेश है।
#दिल्ली_यूनिवर्सिटी_के_प्रोफेसर_आदरणीय Dr. Laxman Yadav सर की कलम से
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