Sandeep Kakodiya Betul

Sandeep Kakodiya Betul जीवन ही संघर्ष है ,*सामाजिक कार्यकर्ता, अन्याय अत्याचार के खिलाफ जंग , सॉफ्टवेयर इंजीनियर

इतिहास केवल विजेताओं की कथा नहीं, बल्कि उन आवाज़ों का भी दस्तावेज़ होना चाहिए जिन्हें सदियों तक सुनने से इंकार किया गया।...
05/08/2026

इतिहास केवल विजेताओं की कथा नहीं, बल्कि उन आवाज़ों का भी दस्तावेज़ होना चाहिए जिन्हें सदियों तक सुनने से इंकार किया गया।
सवाल आज भी वही है—इतिहास किसने लिखा? क्या लिखा? किसके लिए लिखा? और सबसे ज़रूरी, किसे इतिहास से बाहर रखा?

आदिवासी समाज को इतिहास के निर्माता के रूप में नहीं, बल्कि 'जंगली', 'आदिम', 'पिछड़ा' या 'जन्मजात अपराधी' जैसी संज्ञाओं में बाँध दिया गया। यह कोई भूल नहीं थी, बल्कि ज्ञान और सत्ता की एक सुनियोजित राजनीति थी। जिन समुदायों ने जल, जंगल, ज़मीन, प्रकृति और लोकतांत्रिक जीवन मूल्यों की सबसे लंबी लड़ाइयाँ लड़ीं, उन्हें इतिहास की किताबों में अक्सर फुटनोट तक सीमित कर दिया गया।

"आदिवासी इतिहास नहीं, इतिहास के निर्माता हैं।"
"जल-जंगल-ज़मीन केवल संसाधन नहीं, आदिवासी सभ्यता की आत्मा हैं।"

ऐसे समय मेंआदरणीय डॉ. DrJitendra Meena की पुस्तक "संविधान सभा में आदिवासी" केवल एक किताब नहीं, बल्कि इतिहास के छूटे हुए पन्नों को वापस जोड़ने का गंभीर वैचारिक प्रयास है। यह पुस्तक हमें बताती है कि संविधान निर्माण में आदिवासी प्रतिनिधियों की आवाज़, उनके विचार और उनके योगदान को समझे बिना भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की कोई भी व्याख्या अधूरी रहेगी।

"आदिवासी विमर्श दया का नहीं, बराबरी और न्याय का विमर्श है।"
"जिस इतिहास में आदिवासी नहीं, वह इतिहास अधूरा है।"

इस महत्त्वपूर्ण कृति के लिए लेखक और हमारे वैचारिक मित्र डॉ. जितेंद्र मीणा जी को हार्दिक बधाई। ऐसी किताबें केवल पढ़ी नहीं जातीं, वे हमारी ऐतिहासिक चेतना को नए सिरे से गढ़ती हैं और स्थापित धारणाओं से सवाल पूछने का साहस देती हैं।

मेरी दोनों पुस्तकों के प्रकाशक Unbound Script को भी विशेष बधाई, जो लगातार ऐसे गंभीर वैचारिक साहित्य का प्रकाशन कर भारतीय बौद्धिक परंपरा को समृद्ध कर रहे हैं। प्रकाशक अलिंद माहेश्वरी और संपादक आशीष ने जिस संवेदनशीलता, सौंदर्यबोध और पेशेवर गुणवत्ता के साथ इस पुस्तक को प्रकाशित किया है, वह अपने आप में सराहनीय है। किसी गंभीर पुस्तक को केवल छाप देना पर्याप्त नहीं होता, उसे इस तरह प्रस्तुत करना भी एक वैचारिक जिम्मेदारी है कि पाठक उसके भीतर प्रवेश करने के लिए प्रेरित हो।

"किताबें केवल शब्द नहीं बदलतीं, वे समाज की स्मृति बदलती हैं।"
"जब हाशिये की आवाज़ें किताबों में दर्ज होती हैं, तभी इतिहास सच के करीब पहुँचता है।"

आज ज़रूरत केवल आदिवासियों पर लिखी गई किताबें पढ़ने की नहीं, बल्कि आदिवासी दृष्टि से भारत को पढ़ने की है। क्योंकि जब तक इतिहास, संविधान, साहित्य और लोकतंत्र की हमारी समझ में आदिवासी समाज का ज्ञान, संघर्ष और दृष्टि बराबरी से शामिल नहीं होगी, तब तक भारत की कहानी भी अधूरी रहेगी और उसका भविष्य भी। यही आदिवासी विमर्श का सबसे बड़ा संदेश है।
#दिल्ली_यूनिवर्सिटी_के_प्रोफेसर_आदरणीय Dr. Laxman Yadav सर की कलम से

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04/08/2026

पहले का कोयतोर कोया बिंडदा—यानी इकोसिस्टम में रहने वाले सभी सगा जीव, वनस्पति, पक्षी और टोटम—अपनी-अपनी जिम्मेदारियों और क...
02/08/2026

पहले का कोयतोर कोया बिंडदा—यानी इकोसिस्टम में रहने वाले सभी सगा जीव, वनस्पति, पक्षी और टोटम—अपनी-अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को अनुशासन में जीते थे। वे ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते थे और इसी कारण उन्हें मिले कोया नत्तूर (खून), यानी जीवन के आधार और खून के कर्ज़ को चुकाना अपना धर्म समझते थे।

वे स्वयं को कोया नत्तूर का मालिक नहीं, बल्कि उसी जीवन-धारा का एक हिस्सा मानते थे। वे खुद को कोया बिंडदा, यानी पूरे इकोसिस्टम का हिस्सा समझकर जीते थे। इसलिए उनमें घमंड नहीं था कि वे प्रकृति से अलग या उससे ऊपर हैं। वे अपने हिस्से की जिम्मेदारी और अपने ऊपर चढ़े जीवन के कर्ज़ को भूलकर अकेले अपने सुख के पीछे नहीं भागते थे, बल्कि अपने कर्तव्यों को निभाकर उस कर्ज़ को चुकाते थे।

लेकिन अब मैं देख रहा हूँ कि आज का कोया बिंडदा धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारियों को भूलता जा रहा है। आज का इंसान खुद को उस पूरे जीवन-जाल का एक हिस्सा मानने के बजाय उसका मालिक समझने लगा है। वह कोया नत्तूर को केवल लेने की चीज़ समझता है, लौटाने की जिम्मेदारी नहीं।

वह जंगल से लेता है, लेकिन जंगल को लौटाता नहीं। नदी से पानी लेता है, लेकिन नदी को जीवित रखने का कर्तव्य भूल जाता है। मिट्टी से अन्न लेता है, लेकिन मिट्टी की उर्वरता लौटाने की जिम्मेदारी भूल जाता है। जीव-जंतुओं और वनस्पतियों से जीवन पाता है, लेकिन उनके अस्तित्व की रक्षा करना भूल जाता है।

यही वह जगह है जहाँ कोया बिंडदा का संतुलन टूटने लगता है।

मेरे लिए अपने पुरखों की परंपरा का अर्थ केवल उनकी पूजा करना या उनके नाम को याद करना नहीं है। इसका अर्थ है—उनकी तरह अपने हिस्से की जिम्मेदारी को पहचानना, कोया नत्तूर के कर्ज़ को स्वीकार करना और अपने जीवन, श्रम, ज्ञान और कर्म से उसे चुकाते रहना।

क्योंकि मैं इस कोया बिंडदा का मालिक नहीं हूँ।

मैं भी उसी जीवन-धारा का एक हिस्सा हूँ। मैंने भी इस धरती से लिया है, इसलिए मुझे लौटाना भी है। मुझे भी अपना कर्तव्य निभाना है। यही मेरा कोया नत्तूर का कर्ज़ है, और यही उसे चुकाने का मेरा रास्ता है।

~ कोयतोर अजयरावेन वट्टी
Ajay Varti 🌊 🐟

आज आपकी पुण्यतिथि है...हमे अफसोस है कि तमाम प्रयासों के बाबजूद हम आपकी मौत की CBI जांच नहीं करा पाए, आपको नगरनिगम भोपाल ...
02/08/2026

आज आपकी पुण्यतिथि है...
हमे अफसोस है कि तमाम प्रयासों के बाबजूद हम आपकी मौत की CBI जांच नहीं करा पाए, आपको नगरनिगम भोपाल के श्मशान में जला दिया गया जबकि आप अपनी मातृभूमि अमरवाड़ा में 2 गज जमीन के हकदार थे...
हम मरते दम तक आपकी हत्यारी सरकार और उस विचारधारा से समझौता नहीं करेंगे
#गोंड़वाना का शेर
#मनमोहन शाह बट्टी
Devraven Bhalavi

02/08/2026
31/07/2026

बैतूल के वाहन चालक राष्ट्रपति नही है,राष्ट्रपति वाहन के लिए जिन ब्रेकरो को हटाया गया था तनिक वापस बनवा दिजिए वरना गड्डी ठूक जाऐंगी😂
#कॉपी_पेस्ट_मुकदम_सरकार_बैतूल

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