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भगवान श्री देवनारायण जी की  जन्म भूमि मालासेरी डुंगरी की विस्तृत जानकारी-मालासेरी डूंगरी राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की आस...
04/09/2026

भगवान श्री देवनारायण जी की जन्म भूमि मालासेरी डुंगरी की विस्तृत जानकारी-
मालासेरी डूंगरी राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की आसींद तहसील में स्थित है खारी नदी सवाई भोज मंदिर से करीब 5 किलोमीटर यह भीलवाड़ा जिले से 60 किलोमीटर और सवाई भोज मंदिर से 5 किलोमीटर पूर्व दिशा में आसींद शाहपुरा रोड पर स्थित है। मालासेरी डुंगरी प्राकृतिक की गोद में हरियाली की छठा बिखरती हुयी बहुत ही सुंदर रमणीय स्थान है इस डुंगरी की ऊंचाई लगभग 350 फुट की ऊंचाई हें।।
मालासेरी डूंगरी पर माता साडू की अखंड तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु देवनारायण के रूप में शंक सवंत 968 माघ महीनेकी छठ-सातम की शामी रात शनिवार को चट्टान फाड़कर कमल फूल की नाभि से अवतार लिया। उसी क्षण मालासेरी डूंगरी कुछ पलों के लिए पूरी सोने की हुई राजा इंद्र ने नन्हीं बूंदों से बरसात की और 33 करोड़ देवी देवताओं ने पुष्प वर्षा की।स्वर्ग से पांच कामधेनु गाय उत्तरी। देव जी के अवतार से 6 माह पूर्व भादवी छठ पर इसी डूंगरी पर एक अन्य सुरंगसे देव जी के घोड़े लीलाधर का अवतार हुआ और इसी के पास एक और सुरंग से नाग वासक राजा का अवतार हुआ।जिस जगह कमल का फूल निकला उस जगह अनन्त सुरंग हे जो वर्तमान में उस सुरंग पर देवजी की मूर्ति विराजमान हे । मंदिर की छत प्राकृतिक चट्टान से बनी हुई है। मंदिर में अखंड ज्योत है। जहां पवित्र गुफा मानव संसाधनों से आज भी दूर है जैसे कि अंदर कोई विद्युत उपकरण कामनहीं करता है।
मालासेरी डूंगरी का पत्थर है जो दुनिया के किसी भी पत्थर से मिलान नहीं होता।वैज्ञानिक शोधकर्ताओं का भी मानना है कि इस जगह हकीकत में भूकंप आया था और पत्थर जमीन से बाहर पर आए थे।
मालासेरी डूंगरी के मंदिर के ऊपर एक नीम का पेड़ स्थित है जो सैकड़ों साल पुराना है इस नीम के पेड़ की विशेषता है कि दो पत्ते एक साथ तोड़ने पर एक पत्ता कड़वा लगता है जबकि एक पत्ता कड़वा नहीं लगता है।
यहां पर हर रोज नाग वासक राजा को देसी गौ माता का दूध रखा जाता है जोकि वासक राजा हर रोज दूध पीने आते हैं भाग्यशाली भक्तो को आज भी दर्शन देते हे इसमें भादवि छठ और माहि सातम को विशेष महत्व रहता हे।
यहां पर पुजा कई सैकड़ों सालों से एक ही परिवार के गुर्जर समाज से पोसवाल गोत्र परिवार के भोपाजी करते आ रहे हैं। जिसमे हेमराज पोसवाल सक्रिय पुजारी हें।
यहां पर भगवान नारायण के दरबार में लाखों लोग आते हैं जिनकी हर मनोकामना पूरी होती है इनके कई जीवित उदाहरण हैं। भक्ति के बड़े महीने श्रावण और भाद्रपद महीने में यहां पर लाखों श्रद्धालु कई प्रदेशों व जिलों से ध्वज लेकर पदयात्रा आते हैं और बारह महीनों में यहां पर देव भक्तों के सहयोग से अखंड निशुल्क भंडारा 24 घंटो चालू रहता है।यह गुर्जर समाज का सबसे बड़ा अंतररास्ट्रीय तीर्थ स्थल है और सर्व समाज का आस्था केंद्र है।
यहां हर वर्ष समाज के भामाशाह के सहयोग से कई बड़े आयोजन किए जाते हैं।
यहां पर श्री देवनारायण जन्म स्थली विकास समिति मालासेरी डूंगरी में भारतवर्ष से देवभक्त,
समाजसेवी और भामाशाह जुड़े हुए हें।
मालासेरी मंदिर परिसर की 270 बीघा जमीन है। 🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
अन्य स्थान
-5 km पश्चिम की और आसीन्द रोड पर खारी नदी के किनारे सवाईभोज

*पहाड़ी* (कामां) नगरपालिका के वार्ड नंबर 10 से शिक्षित युवा *मंगल सिंह गुर्जर* को अपना मत देकर विजयी बनाये।वार्ड का विका...
23/08/2026

*पहाड़ी* (कामां) नगरपालिका के वार्ड नंबर 10 से शिक्षित युवा *मंगल सिंह गुर्जर* को अपना मत देकर विजयी बनाये।
वार्ड का विकास, जनता का विश्वास ❤️
हर कदम जनहित के लिए
🤝 आपके सुख-दुःख का साथी
🗳️ पार्षद पद हेतु

विक्रम देव गुर्जर जी आमेर कोजिला कांग्रेस कमेटी जयपुर देहात ईस्ट मेंसबसे कम उम्र में लगातार दूसरी बार जिम्मेदारी मिलने प...
22/08/2026

विक्रम देव गुर्जर जी आमेर को
जिला कांग्रेस कमेटी जयपुर देहात ईस्ट में
सबसे कम उम्र में लगातार दूसरी बार जिम्मेदारी मिलने पर
हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
यह दायित्व आपके नेतृत्व कौशल, संगठन के प्रति समर्पण और निरंतर मेहनत का प्रमाण है।
हमें पूर्ण विश्वास है कि आपके मार्गदर्शन में कांग्रेस संगठन और अधिक मजबूत होगा।
आपका भविष्य उज्ज्वल हो — यही कामना है

अवतार सिंह गुर्जर सुन्द्रावली थाना अधिकारी बयाना लगाने पर हार्दिक शुभकामनाएं
20/08/2026

अवतार सिंह गुर्जर सुन्द्रावली थाना अधिकारी बयाना लगाने पर हार्दिक शुभकामनाएं

शिक्षा जगत में क्रांति लाने वाले अध्यापक एवं राजस्थान TOPPER विद्यालय के संस्थापक मंगल सिंह गुर्जर जी (PML एवं विजय श्री...
04/08/2026

शिक्षा जगत में क्रांति लाने वाले अध्यापक एवं राजस्थान TOPPER विद्यालय के संस्थापक मंगल सिंह गुर्जर जी (PML एवं विजय श्री विद्यालय के संस्थापक)को अवतरण दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
ईश्वर आपको जीवन की हर खुशी, हर सफलता और हमेशा मुस्कुराने की वजह देता रहे। ❤️🎂

-: संत श्री गुर्जर कनीरामजी महाराज की जीवनी :-​इसी परम्परा में मेवाड़ के ग्राम गोरख्या जो वर्तमान में, राजस्थान के भीलवा...
19/07/2026

-: संत श्री गुर्जर कनीरामजी महाराज की जीवनी :-
​इसी परम्परा में मेवाड़ के ग्राम गोरख्या जो वर्तमान में, राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के करेड़ा के पास में भीलवाड़ा - पाली रोड़ पर स्थित है। ग्राम गोरख्या भी एक बहुत बड़ी तपोभूमि है, जहां भगवान शिव के रूप गोरखनाथजी महाराज ने तपस्या की थी। उनका धूणा आज भी चमत्कारिक रूप में विद्यमान है, जहां हर वर्ष बैसाख सुदी पूर्णिमा के दिन धूणा के ऊपर कपड़ा में, सवा मण कच्चा ( 25 किलो ) आटे का रोट प्रसाद के रूप में पकाया जाता है। जिस दिशा से रोट कच्चा रहता है, उस दिशा में बारिश खूब होती है। जिस दिशा में रोट तेज पकता है, उस दिशा में बारिश कम होती है। इनके अलावा यहां महान संत रूपनाथजी, मोतीपुरीजी, लाडूरामजी व पदमरामजी ने इस पावन धरा पर जन्म लिया। इसी पावन भूमि पर संत श्री कनीरामजी गुर्जर जिनकी गौत्र मोटर है, इनका जन्म ग्राम गोरख्या में श्री पीथारामजी मोटर के बड़े बेटे, लाडूरामजी के सुपुत्र के रूप में हुआ था। लाडूरामजी पांच भाई थे । बड़े लाडूरामजी, रतनारामजी, मोटारामजी, भीयारामजी, पदमरामजी। एक किंवदन्ती के अनुसार लाडूरामजी के घर पर सत्संग हो रही थी, प्रातः चार बजे आरती पूर्ण होने के बाद सुबह सवा चार बजे भगवान की कृपा से लाडूरामजी की पत्नि चन्दा बाई की कोख से श्री कनीरामजी महाराज ने जन्म लिया। विक्रम सम्वत् 1891 का माघ सुदी सातम शनिवार के दिन ग्राम-गोरख्या में जन्म हुआ था। आपकी माता का नाम चन्दाबाई तथा पिताजी का नाम लाडूरामजी गुर्जर गोत्र मोटर था, माताजी चन्दाबाई की गोत्र तेड़वा गांव तगरिया की थी। माता-पिता दोनों ही धर्म परायण व्यक्ति थे, जो हमेशा हरिभजन व हरि स्मरण चिन्तन में रहते थे। पिता श्री 1008 श्री लाडूरामजी भी महान संत हुए थे, तथा इन्होंने ही दस नाम का उपदेश बावजी कनीरामजी को दिया था । जिसका प्रमाण निम्न पंक्तियों में मिलता है, आपके एक भजन में लिखा कि - "पदमरामजी परवाणी मिलिया लाडूरामजी पिताजी गुर्जर गरीबीऊ कनीरामजी बोले गुरू केऊं के बाजी (पिताजी)" तथा बीस नाम का उपदेश आपके काकाजी श्री 1008 श्री पदमरामजी महाराज का था, जो संत परम्परा में परवाणी संत थे ये अपने समय के सिद्ध पुरूष थे। संत कनीरामजी इनके चरणों में बैठकर, इनको अपना गुरू मानकर आत्म साक्षात्कार किया था। जिसे आपने अपने भजनों में इस प्रकार बताया है "पदमरामजी गुरू परवाणी मलिया, चरणा में राख ऊबारिया म्हारा धणियां।" आप चार भाई थे। उनमें सबसे बड़े आप स्वयं कनीरामजी, छोटे भाई दूगारामजी, नन्दारामजी व दूदारामजी थे। आपका विवाह गोरख्या के पास ही धूवाला गांव में रूकमणी बाई खारी गोत्र के साथ हुआ था। ये भी धर्म परायण थी। इनका साथ भी लम्बे समय तक नहीं रहा तथा इनके स्वर्गवास के बाद दूसरा विवाह ग्राम चान्दरास में चम्पादेवी गोत्र असवार के साथ हुआ था। ये भी धर्म परायण थी, तथा बावजी के साथ हरिचर्चा में रहती थी। वर्तमान में उनके रिश्ते में पोत्र के रूप में श्री भोजारामजी महाराज है। जिन्होंने अथक प्रयास से ग्राम गोरख्या में संत श्री कनीरामजी महाराज का विशाल शिखर बंद मन्दिर उन्हीं के निवास स्थान ( घर ) की जगह में बनवाया। विक्रम संवत् 2066 बेसाख सुदी 13 गुरूवार के दिन मन्दिर में मूर्ति स्थापना व यज्ञ पूर्णाहुति ओर संता का मेला का आयोजन करवाया। जिसमें बाबजी कनीरामजी महाराज की प्रतिमा की स्थापना कराई गई एवं इसी मन्दिर में शिव-परिवार तथा बाबा रामदेवजी व हनुमानजी की प्रतिमा की स्थापना कराई गई । वर्तमान में पुजारी भोजारामजी गुर्जर है, जो नियमित रूप से प्रातः व सायं काल आरती (सेवा) करते है, यह एक अच्छा स्थान है, जहां बावजी के दर्शन के लिए दूर-दूर से हमेशा कई लोग आते हैं। बाबजी का आशीर्वाद लेते है। संत श्री कनीरामजी महाराज हर समय तीर्थराज पुष्कर जाते थे। तीर्थराज पुष्कर में संत श्री कनीरामजी महाराज का एक आश्रम है, जिसे आज संत श्री कनीरामजी महाराज की बाड़ी के नाम से जाना जाता है।

भोजा, पायरा एवं चौबीस बगड़ावतों का संक्षिप्त इतिहासबगड़ावतों के पूर्वज हरिराम जी चौहान का विवाह लीला शेवड़ी के साथ संपन्...
17/07/2026

भोजा, पायरा एवं चौबीस बगड़ावतों का संक्षिप्त इतिहास

बगड़ावतों के पूर्वज हरिराम जी चौहान का विवाह लीला शेवड़ी के साथ संपन्न हुआ। लीला शेवड़ी और हरिराम जी चौहान (गुर्जर) के पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम बाघा जी रखा गया। बाघा, जिनका सिर शेर (बाघ) का और बाकी शरीर इंसान के रूप में था। इस कारण गांव के दूसरे बच्चे बाघा जी से डरते थे। अजमेर के राजा बीसल देव जी ने हरिराम जी को बुलाकर कहा कि, आपके बच्चे बाघा जी से बहुत डरते हैं, आप इनको लेकर पुष्कर की घाटी में चले जाओ। हरिराम जी बाघा जी को लेकर पुष्कर की घाटी में चले गए। बाघा जी ने बाग में झूला झूलना शुरू कर दिया, जिसके कारण गांव की कई लड़कियां झूला झूलने आने लगीं। इस प्रकार बाघा जी ने बारह लड़कियों के साथ विवाह कर लिया। बाघा जी की बारह रानियों से चौबीस पुत्रों का जन्म हुआ। कालांतर में चौबीसों भाई वीर बगड़ावत कहलाए। इन सभी में श्रेष्ठ भोजाजी थे, जिनको सवाई की उपाधि मिली, जिस कारण से सवाई भोज कहलाए। सवाई भोज ने भगवान शंकर की तपस्या (भक्ति) की, जिस पर भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर सवाई भोज को बारह वर्ष की काया और बारह वर्ष की अटूट माया का वरदान दिया।

भगवान शिव के वरदान से बगड़ावतों के पास अटूट धन हो गया, जो खर्च करने पर भी कम नहीं हो रहा था। बगड़ावतों के धन और गुणों से संपन्न होने के कारण बड़े-बड़े रजवाड़ों के साथ उनके मैत्री संबंध स्थापित हो गए। इन्हीं में राण (भीनाय) के राजा दुर्जनसाल भी प्रमुख थे। सवाईभोज और राण के राजा दुर्जनशाल आपस में पगड़ी बदल भाई थे। दोनों ठिकानों में अटूट संबंध था। उसी समय की बात है, बुआल के राजा इडदे जी सोलंकी के घर एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम जयमंती था। जयमंती जब विवाह योग्य हुई तो उसने स्वयं अपने पिताजी से उसका संबंध का दस्तूर गोठा के वीर बगड़ावतों के श्रेष्ठ भाई सवाई भोज के पास भेजने को कहा। सवाई भोज ने अपने चौबीस भाइयों से सलाह की, "हम तो गुर्जर हैं, राजपूत के घर जन्मी बाईसा से विवाह नहीं करके यह टीका राण के राजा दुर्जनशाल के पास भेज देते हैं, जिससे राजा प्रसन्न होंगे।" इस प्रकार से टीका राण में भेज दिया गया। तय समय अनुसार राण से बारात बुआल ठिकाने के लिए प्रस्थान हो गई। बारात बुआल ठिकाना पहुंची तो रानी जयमंती ने बूढ़े राजा को देखकर उसके साथ शादी करने से मना कर दिया। और रानी ने कहा, "मैंने..."

तो सवाई भोज के लिए टीके का नारियल भेजा है, तो मैं शादी भी सवाई भोज से ही करूंगी। इसके बाद रानी जयमंती का विवाह जबरदस्ती दुर्जन शाल के साथ करवा दिया। और बरात विदाई के बाद भीनाय का रास्ता जहां से अलग होता है, बगड़ावतों ने मिलकर राजा के साथ हुक्का पानी पीने के बाद गोठा के रास्ते पर चलने लगे। तब रानी ने बगड़ावतों के साथ जाने की ज़िद की, और कहा कि राणा जी के साथ फेरे लेने से पहले मैंने सवाई भोज की तलवार के साथ सात फेरे ले लिए हैं, मैं तन से और मन से अपना पति भोज को मानती हूं। इस पर बगड़ावतों ने रानी को छह महीने का समय दिया और कहा कि छह महीने के अंदर आपको भीनाय से गोठा (सवाई भोज) के पास ले आएंगे। जैसे ही छह महीने का समय पूरा होने पर रानी जयमंती ने हीरा दासी के साथ कागज लिखकर अपना कौल वचन निभाने के लिए सवाई भोज को पत्र लिखकर कहा, इस पर बगड़ावतों ने अपने दिए वचन को निभाने के लिए वीर चौबीस भाइयों के साथ मिलकर राण पहुंच कर राजा दुर्जनशाल को परास्त कर रानी जयमती को गोठा लेकर आ गए। और इसके बाद में राण और उनके राजवाड़ों ने मिलकर गोठा और चौबीस बगड़ावतों पर आक्रमण कर दिया। काफी लंबे समय तक

युद्ध चला और धीरे-धीरे एक-एक करके बगड़ावत वीरगति को प्राप्त होते गए। इस पर सवाई भोज ने सोचा कि, मेरे मरने के बाद रानी की देखभाल कौन करेगा जिसके लिए यह रण संग्राम हो रहा है। ऐसा सोचकर सवाई भोज बुली घोड़ी पर सवार होकर करेड़ा के बीड़ जहां पर आज भोजा पायरा स्थित है, वहां आने के लिए रवाना हो गए तब राणी जी ने देखा कि सवाई भोज दिखाई नहीं दे रहे हैं। तब रानी ने चील का रूप धारण करके आकाश में उड़कर देखा तो सवाई भोज करेड़ी के बीड़ की तरफ जाते हुए दिखाई दिए तो राणी सवाई भोज के पीछे-पीछे करेड़ा के बीड़ में पहुंच गई। जहां पर राणी ने भोजाजी के साथ में जेलू बैरी के स्थान पर प्यास लगने पर बैरी खोदकर पानी निकालकर पानी पिया। उस जेलू बैरी में बारहों महीने पानी रहता है। कितने भी अकाल पड़ गए लेकिन जैर का पानी कभी समाप्त नहीं हुआ। उसके बाद राणी ने अपने हाथ से दूल्हे के रूप में सवाई भोज के शरीर पर हल्दी पीठी बेगर (उबटन) का लेप किया वो स्थान यही भोजा पायरा है। इस स्थान पर आज भी पिठी (उबटन) की खुशबू आती है, यह इस जगह का आज भी चमत्कार दर्शाता है। इसी भोजा पायरा पर रानी जयमंती जो की साक्षात मां

जगदंबा का अवतार थी, उन्होंने भोज को विराट स्वरूप में जगदंबा के दर्शन देकर आशीर्वाद दिया और सवाई भोज को समझाया कि, मैं साधारण नारी नहीं हूं। मैं, तेरे से शादी करने के लिए नहीं आई। मैं तो भगवान शंकर ने आपको दिए वचन "बारह वर्ष की माया और बारह वर्ष की काया" के वरदान का समय पूरा हो गया है। मैंने आपको और संपूर्ण बगड़ावतों के वंश को खत्म करने के लिए अवतार लिया है और सवाई भोज तेरा नाम अमर रहेगा और भोज के नाम की कोई मन्नत मांगेगा तो वह मैं पूरी करूंगी। और इसके बाद जयमंती ने सवाई भोज को वचन में लेकर वापस गोठा (आसींद) युद्ध भूमि में चली गई। भोजा पायरा से आसींद जाते समय यहां से 500 मीटर दूरी पर चंद्रावती खाण्डा (भोजाजी की तलवार) को राणी जयंती ने रास्ते में डाल दिया। क्योंकि वह खंडा स्वयं शंकर भगवान ने सवाईभोज को दिया और वरदान था कि, यह खांडा हाथ में रहेगा तब तक भोज की कभी हार नहीं होगी। वह स्थान आज भी खाण्डा जी के नाम से प्रसिद्ध है। और इस जगह पर चबूतरा बना हुआ है। एवं भोजा पायरा के समीप ही सवाई भोज और सभी चौबीस वीर बगडावतों के गुरु बाबा रूपनाथ जी की चमत्कारी धूणी स्थित है। तथ

जिस रात्रि में भोजाजी के साथ राणी जयमन्ती इस स्थान पर आई, उसी दिन प्रेम के प्रतीक यहाँ सालर के पेड़ एक साथ उनके स्वागत के लिए उग गए। बाद में शक्ति ने सवाई भोज को रण भूमि आसींद, जहाँ पर अब सवाईभोज का अंतरराष्ट्रीय मंदिर स्थित है, वहाँ पर ले जाकर वचन में सवाई भोज का शीश दान में माँग लिया। और इस तरह सवाई भोज वीरगति को प्राप्त हुए। राणी जयमंती, सवाई भोज और चौबीस वीर बगडावतों की रूण्ड माला पहनकर राठोला तालाब की पाल पर बैठ गई। इस पायरा को बगड़ावतों ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था।

यहाँ पर भोजा पायरा के आसपास गायों के बाड़े मौजूद थे। उनके अवशेष आज भी मौजूद हैं। बगड़ावत गोठा से गाय चराने यहाँ आते थे और यहीं लम्बे समय तक रुकते। इसी पायरे पर बैठकर सवाई भोज गायों की निगरानी करते थे। इस भोजा पायरा का चमत्कार यह भी है कि इसको बने हुए करीब 1200 वर्ष हो गए हैं, लेकिन सूखे पत्थरों का चबूतरा जैसा था वैसा ही मौजूद है। इसको सूखे पत्थरों में बनाया गया लेकिन इसमें से एक भी पत्थर बाहर नहीं निकलता है। इस पायरा से

अभी भी हल्दी उबटन (बेघर) की खुशबू आज भी आती है। सबसे बड़ा चमत्कार तो यह है कि इस पायरे का नवीनीकरण और जीर्णोद्धार करने का प्रयास कई बार भक्तों द्वारा किया गया लेकिन अलग-अलग प्रकार से चमत्कार दिखाए गए। श्रद्धालुओं द्वारा इसके बाद इसमें कोई छेड़छाड़ नहीं की गई और हिम्मत भी नहीं करते हैं। इस पायरे से कुछ ही दूरी पर सवाई भोज की बूवली घोड़ी के खुर (पैर के नाखून) के निशान हैं। मान्यता है कि रानी जयमंती को रण से सवाई भोज सीधे ही घोड़ी पर बैठाकर यहां ले आए और बूवली घोड़ी पवन वेग से उड़कर आई और इस स्थान पर उसके पैर टिके जो अमर निशानी हो गई। उस निशान को घोड़े के खुर के नाम से पुकारते हैं। आसींद से भोजा पायरा की दूरी लगभग 25 किलोमीटर है और करेड़ा उपखंड मुख्यालय से भोजा पायरा 7 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यह स्थान हरियाली और घने वृक्षों से आच्छादित है। वर्षा ऋतु में हरियाली से इस स्थान की सुंदरता में और भी चार चांद लग जाते हैं।

डॉ महेश जी कसाना MD INTERNAL MEDICINE (सुपुत्र श्री रामस्वरूप जी कसाना सरपंच) चेयरमैन:-महेश ट्रांसपोर्ट कम्पनी कोटपुतली,...
15/07/2026

डॉ महेश जी कसाना MD INTERNAL MEDICINE (सुपुत्र श्री रामस्वरूप जी कसाना सरपंच) चेयरमैन:-महेश ट्रांसपोर्ट कम्पनी कोटपुतली,महेश मोटर्स इंडियन ऑयल को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ🇮🇳

गुर्जर समाज का सर गर्व से ऊंचा कर दिया आप ने,,एड नीरज कुमार गुर्जर जोधपुर,,,बार काऊंसिल ऑफ़ राजस्थान का चुनाव प्रथम और द्...
13/07/2026

गुर्जर समाज का सर गर्व से ऊंचा कर दिया आप ने,,
एड नीरज कुमार गुर्जर जोधपुर,,,
बार काऊंसिल ऑफ़ राजस्थान का चुनाव प्रथम और द्वित्य वरियता दोनों में जीते।
सभी सहयोगियों का आभार,,,
दोगले राजनीतिज्ञयो तुम जातिवाद कर एक गुर्जर को AAG से हटा सकते हों पद खत्म कर सकते हों पर लोकप्रियता खत्म नहीं कर सकते। आज सिद्ध हों गयीं उनकी राज्य स्तर पर काबिलियत और तुम झूठे हों,,,,
सेल्यूट नीरज जी,,, चेयरमेन कि अग्रिम बधाई।
पुनः सभी समर्थको का 🙏🙏🙏🙏 आभार।

Adv KS Gurjar Adv Atar Singh Gurjar Adv Kanwar Pal Bidhudi Adv Bharat Adhana Gurjar Adv Yogesh Pradhan Adv Vinod Bokan

भारतीय सेना के जांबाज कमांडो राधाकिशन जी छावड़ी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं🌹🌹🌹🌹🌺🌺
06/07/2026

भारतीय सेना के जांबाज कमांडो राधाकिशन जी छावड़ी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं🌹🌹🌹🌹🌺🌺

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