17/07/2026
भोजा, पायरा एवं चौबीस बगड़ावतों का संक्षिप्त इतिहास
बगड़ावतों के पूर्वज हरिराम जी चौहान का विवाह लीला शेवड़ी के साथ संपन्न हुआ। लीला शेवड़ी और हरिराम जी चौहान (गुर्जर) के पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम बाघा जी रखा गया। बाघा, जिनका सिर शेर (बाघ) का और बाकी शरीर इंसान के रूप में था। इस कारण गांव के दूसरे बच्चे बाघा जी से डरते थे। अजमेर के राजा बीसल देव जी ने हरिराम जी को बुलाकर कहा कि, आपके बच्चे बाघा जी से बहुत डरते हैं, आप इनको लेकर पुष्कर की घाटी में चले जाओ। हरिराम जी बाघा जी को लेकर पुष्कर की घाटी में चले गए। बाघा जी ने बाग में झूला झूलना शुरू कर दिया, जिसके कारण गांव की कई लड़कियां झूला झूलने आने लगीं। इस प्रकार बाघा जी ने बारह लड़कियों के साथ विवाह कर लिया। बाघा जी की बारह रानियों से चौबीस पुत्रों का जन्म हुआ। कालांतर में चौबीसों भाई वीर बगड़ावत कहलाए। इन सभी में श्रेष्ठ भोजाजी थे, जिनको सवाई की उपाधि मिली, जिस कारण से सवाई भोज कहलाए। सवाई भोज ने भगवान शंकर की तपस्या (भक्ति) की, जिस पर भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर सवाई भोज को बारह वर्ष की काया और बारह वर्ष की अटूट माया का वरदान दिया।
भगवान शिव के वरदान से बगड़ावतों के पास अटूट धन हो गया, जो खर्च करने पर भी कम नहीं हो रहा था। बगड़ावतों के धन और गुणों से संपन्न होने के कारण बड़े-बड़े रजवाड़ों के साथ उनके मैत्री संबंध स्थापित हो गए। इन्हीं में राण (भीनाय) के राजा दुर्जनसाल भी प्रमुख थे। सवाईभोज और राण के राजा दुर्जनशाल आपस में पगड़ी बदल भाई थे। दोनों ठिकानों में अटूट संबंध था। उसी समय की बात है, बुआल के राजा इडदे जी सोलंकी के घर एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम जयमंती था। जयमंती जब विवाह योग्य हुई तो उसने स्वयं अपने पिताजी से उसका संबंध का दस्तूर गोठा के वीर बगड़ावतों के श्रेष्ठ भाई सवाई भोज के पास भेजने को कहा। सवाई भोज ने अपने चौबीस भाइयों से सलाह की, "हम तो गुर्जर हैं, राजपूत के घर जन्मी बाईसा से विवाह नहीं करके यह टीका राण के राजा दुर्जनशाल के पास भेज देते हैं, जिससे राजा प्रसन्न होंगे।" इस प्रकार से टीका राण में भेज दिया गया। तय समय अनुसार राण से बारात बुआल ठिकाने के लिए प्रस्थान हो गई। बारात बुआल ठिकाना पहुंची तो रानी जयमंती ने बूढ़े राजा को देखकर उसके साथ शादी करने से मना कर दिया। और रानी ने कहा, "मैंने..."
तो सवाई भोज के लिए टीके का नारियल भेजा है, तो मैं शादी भी सवाई भोज से ही करूंगी। इसके बाद रानी जयमंती का विवाह जबरदस्ती दुर्जन शाल के साथ करवा दिया। और बरात विदाई के बाद भीनाय का रास्ता जहां से अलग होता है, बगड़ावतों ने मिलकर राजा के साथ हुक्का पानी पीने के बाद गोठा के रास्ते पर चलने लगे। तब रानी ने बगड़ावतों के साथ जाने की ज़िद की, और कहा कि राणा जी के साथ फेरे लेने से पहले मैंने सवाई भोज की तलवार के साथ सात फेरे ले लिए हैं, मैं तन से और मन से अपना पति भोज को मानती हूं। इस पर बगड़ावतों ने रानी को छह महीने का समय दिया और कहा कि छह महीने के अंदर आपको भीनाय से गोठा (सवाई भोज) के पास ले आएंगे। जैसे ही छह महीने का समय पूरा होने पर रानी जयमंती ने हीरा दासी के साथ कागज लिखकर अपना कौल वचन निभाने के लिए सवाई भोज को पत्र लिखकर कहा, इस पर बगड़ावतों ने अपने दिए वचन को निभाने के लिए वीर चौबीस भाइयों के साथ मिलकर राण पहुंच कर राजा दुर्जनशाल को परास्त कर रानी जयमती को गोठा लेकर आ गए। और इसके बाद में राण और उनके राजवाड़ों ने मिलकर गोठा और चौबीस बगड़ावतों पर आक्रमण कर दिया। काफी लंबे समय तक
युद्ध चला और धीरे-धीरे एक-एक करके बगड़ावत वीरगति को प्राप्त होते गए। इस पर सवाई भोज ने सोचा कि, मेरे मरने के बाद रानी की देखभाल कौन करेगा जिसके लिए यह रण संग्राम हो रहा है। ऐसा सोचकर सवाई भोज बुली घोड़ी पर सवार होकर करेड़ा के बीड़ जहां पर आज भोजा पायरा स्थित है, वहां आने के लिए रवाना हो गए तब राणी जी ने देखा कि सवाई भोज दिखाई नहीं दे रहे हैं। तब रानी ने चील का रूप धारण करके आकाश में उड़कर देखा तो सवाई भोज करेड़ी के बीड़ की तरफ जाते हुए दिखाई दिए तो राणी सवाई भोज के पीछे-पीछे करेड़ा के बीड़ में पहुंच गई। जहां पर राणी ने भोजाजी के साथ में जेलू बैरी के स्थान पर प्यास लगने पर बैरी खोदकर पानी निकालकर पानी पिया। उस जेलू बैरी में बारहों महीने पानी रहता है। कितने भी अकाल पड़ गए लेकिन जैर का पानी कभी समाप्त नहीं हुआ। उसके बाद राणी ने अपने हाथ से दूल्हे के रूप में सवाई भोज के शरीर पर हल्दी पीठी बेगर (उबटन) का लेप किया वो स्थान यही भोजा पायरा है। इस स्थान पर आज भी पिठी (उबटन) की खुशबू आती है, यह इस जगह का आज भी चमत्कार दर्शाता है। इसी भोजा पायरा पर रानी जयमंती जो की साक्षात मां
जगदंबा का अवतार थी, उन्होंने भोज को विराट स्वरूप में जगदंबा के दर्शन देकर आशीर्वाद दिया और सवाई भोज को समझाया कि, मैं साधारण नारी नहीं हूं। मैं, तेरे से शादी करने के लिए नहीं आई। मैं तो भगवान शंकर ने आपको दिए वचन "बारह वर्ष की माया और बारह वर्ष की काया" के वरदान का समय पूरा हो गया है। मैंने आपको और संपूर्ण बगड़ावतों के वंश को खत्म करने के लिए अवतार लिया है और सवाई भोज तेरा नाम अमर रहेगा और भोज के नाम की कोई मन्नत मांगेगा तो वह मैं पूरी करूंगी। और इसके बाद जयमंती ने सवाई भोज को वचन में लेकर वापस गोठा (आसींद) युद्ध भूमि में चली गई। भोजा पायरा से आसींद जाते समय यहां से 500 मीटर दूरी पर चंद्रावती खाण्डा (भोजाजी की तलवार) को राणी जयंती ने रास्ते में डाल दिया। क्योंकि वह खंडा स्वयं शंकर भगवान ने सवाईभोज को दिया और वरदान था कि, यह खांडा हाथ में रहेगा तब तक भोज की कभी हार नहीं होगी। वह स्थान आज भी खाण्डा जी के नाम से प्रसिद्ध है। और इस जगह पर चबूतरा बना हुआ है। एवं भोजा पायरा के समीप ही सवाई भोज और सभी चौबीस वीर बगडावतों के गुरु बाबा रूपनाथ जी की चमत्कारी धूणी स्थित है। तथ
जिस रात्रि में भोजाजी के साथ राणी जयमन्ती इस स्थान पर आई, उसी दिन प्रेम के प्रतीक यहाँ सालर के पेड़ एक साथ उनके स्वागत के लिए उग गए। बाद में शक्ति ने सवाई भोज को रण भूमि आसींद, जहाँ पर अब सवाईभोज का अंतरराष्ट्रीय मंदिर स्थित है, वहाँ पर ले जाकर वचन में सवाई भोज का शीश दान में माँग लिया। और इस तरह सवाई भोज वीरगति को प्राप्त हुए। राणी जयमंती, सवाई भोज और चौबीस वीर बगडावतों की रूण्ड माला पहनकर राठोला तालाब की पाल पर बैठ गई। इस पायरा को बगड़ावतों ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था।
यहाँ पर भोजा पायरा के आसपास गायों के बाड़े मौजूद थे। उनके अवशेष आज भी मौजूद हैं। बगड़ावत गोठा से गाय चराने यहाँ आते थे और यहीं लम्बे समय तक रुकते। इसी पायरे पर बैठकर सवाई भोज गायों की निगरानी करते थे। इस भोजा पायरा का चमत्कार यह भी है कि इसको बने हुए करीब 1200 वर्ष हो गए हैं, लेकिन सूखे पत्थरों का चबूतरा जैसा था वैसा ही मौजूद है। इसको सूखे पत्थरों में बनाया गया लेकिन इसमें से एक भी पत्थर बाहर नहीं निकलता है। इस पायरा से
अभी भी हल्दी उबटन (बेघर) की खुशबू आज भी आती है। सबसे बड़ा चमत्कार तो यह है कि इस पायरे का नवीनीकरण और जीर्णोद्धार करने का प्रयास कई बार भक्तों द्वारा किया गया लेकिन अलग-अलग प्रकार से चमत्कार दिखाए गए। श्रद्धालुओं द्वारा इसके बाद इसमें कोई छेड़छाड़ नहीं की गई और हिम्मत भी नहीं करते हैं। इस पायरे से कुछ ही दूरी पर सवाई भोज की बूवली घोड़ी के खुर (पैर के नाखून) के निशान हैं। मान्यता है कि रानी जयमंती को रण से सवाई भोज सीधे ही घोड़ी पर बैठाकर यहां ले आए और बूवली घोड़ी पवन वेग से उड़कर आई और इस स्थान पर उसके पैर टिके जो अमर निशानी हो गई। उस निशान को घोड़े के खुर के नाम से पुकारते हैं। आसींद से भोजा पायरा की दूरी लगभग 25 किलोमीटर है और करेड़ा उपखंड मुख्यालय से भोजा पायरा 7 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यह स्थान हरियाली और घने वृक्षों से आच्छादित है। वर्षा ऋतु में हरियाली से इस स्थान की सुंदरता में और भी चार चांद लग जाते हैं।