Mr. Arpit Mudgal

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✊ आवाज़ युवा भारत की
मुद्दे उठाने वाला, हल सुझाने वाला। Youth of Bharat 🇮🇳 | Political Thinker
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| 📍Ground Zero

“भीड़ का हिस्सा बनकर मंज़िल नहीं मिलती,अपनी पहचान बनानी पड़ती है।जो रास्ते मुश्किल लगते हैं,अक्सर वही रास्ते इतिहास लिखत...
20/08/2026

“भीड़ का हिस्सा बनकर मंज़िल नहीं मिलती,
अपनी पहचान बनानी पड़ती है।
जो रास्ते मुश्किल लगते हैं,
अक्सर वही रास्ते इतिहास लिखते हैं।
मैं हालातों से समझौता नहीं करता,
मैं हालातों को बदलने का हुनर रखता हूँ।” 🔥

🔥

श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।अटल जी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, सुशास...
16/08/2026

श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।

अटल जी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, सुशासन, सिद्धांत और संवेदनशीलता की जीवंत मिसाल थे।
उनकी वाणी में राष्ट्र का स्वाभिमान था, विचारों में भारत का भविष्य और कर्मों में माँ भारती की सेवा।

उनका जीवन हमें सिखाता है कि सत्ता से बड़ा सिद्धांत, राजनीति से बड़ा राष्ट्र और जीवन से बड़ा राष्ट्रधर्म होता है।
आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें शत्-शत् नमन।

अटल जी के विचार और आदर्श सदैव भारत की युवा पीढ़ी को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करते रहेंगे।
“हार नहीं मानूँगा,
रार नई ठानूँगा।”
🙏 भावपूर्ण श्रद्धांजलि एवं कोटि-कोटि नमन। 🇮🇳

🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 🇮🇳15 अगस्त केवल आज़ादी का पर्व नहीं, बल्कि उन अनगिनत वीरों के त्याग, तपस्या और ...
15/08/2026

🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 🇮🇳

15 अगस्त केवल आज़ादी का पर्व नहीं, बल्कि उन अनगिनत वीरों के त्याग, तपस्या और बलिदान को याद करने का दिन है, जिन्होंने हमें स्वतंत्र भारत का सपना दिया।

आइए, आज हम संकल्प लें कि देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता को सदैव सर्वोपरि रखेंगे और अपने कर्मों से भारत को और मजबूत, समृद्ध एवं आत्मनिर्भर बनाएँगे।
देश पहले — सदैव पहले।

🇮🇳 जय हिन्द! वंदे मातरम्! 🇮🇳
स्वतंत्रता दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।

14/08/2026
मेरा नाम विवेक शर्मा है। उम्र 32 साल। लोग जब पूछते हैं, तुम क्या करते हो, तो मैं कहता हूँ, किराना दुकान चलाता हूँ। वे हँ...
01/08/2026

मेरा नाम विवेक शर्मा है। उम्र 32 साल। लोग जब पूछते हैं, तुम क्या करते हो, तो मैं कहता हूँ, किराना दुकान चलाता हूँ। वे हँसते हैं, क्योंकि उन्हें पता है मैं आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में गोल्ड मेडलिस्ट था, और मेरे पास सैन फ्रांसिस्को की एक कंपनी का ऑफर लेटर आज भी अलमारी में रखा है, जिस पर सैलरी लिखी है 2,40,000 डॉलर सालाना।

मैंने वह लेटर कभी फाड़ा नहीं, पर कभी इस्तेमाल भी नहीं किया।

कहानी 1998 से शुरू होती है, कानपुर के किदवई नगर में। दो कमरे का घर, ऊपर टीन। पापा रेलवे में क्लर्क, माँ ट्यूशन पढ़ातीं। मैं इकलौता बेटा। पापा की सैलरी 8,000 रुपये। माँ की ट्यूशन से 2,000। हम मिडिल क्लास भी नहीं थे, लोअर मिडिल।

पर पापा का एक सपना था, बेटा बड़ा आदमी बने। उन्होंने कभी मुझसे नहीं कहा डॉक्टर बन, इंजीनियर बन। वह सिर्फ कहते, बेटा, जितना पढ़ना है पढ़, पैसे की चिंता मत कर।

मैं पढ़ता गया। दसवीं में 95 प्रतिशत, बारहवीं में 97। कोचिंग की फीस 1 लाख थी। पापा ने पीएफ निकाला। माँ ने अपनी चूड़ियाँ बेचीं। मैं कोटा गया। दो साल पंखे के नीचे पढ़ा, मच्छर खाए। 2012 में रिजल्ट आया, AIR 147। आईआईटी बॉम्बे, कंप्यूटर साइंस।

जिस दिन लेटर आया, पापा मिठाई का डिब्बा ले कर पूरे मोहल्ले में बाँट आए। माँ रो पड़ी। बोली, अब मेरा बेटा अमेरिका जाएगा।

आईआईटी में मैं उड़ा। कोडिंग, हैकाथॉन, इंटर्नशिप। तीसरे साल में गूगल समर इंटर्न, 1 लाख स्टाइपेंड। मैंने पहली सैलरी से पापा को फोन दिलाया, माँ को वॉशिंग मशीन। पापा ने फोन पर कहा, बेटा, अब तो रिटायरमेंट में आराम करूँगा।

फाइनल ईयर में प्लेसमेंट। मैं दिन रात तैयारी करता। दिसंबर 2015, मेरा इंटरव्यू हुआ एक कंपनी से, नाम था स्ट्राइप जैसी पेमेंट स्टार्टअप, बेस सैन फ्रांसिस्को। चार राउंड, आखिरी में सीटीओ ने कहा, वी वांट यू। ऑफर आया, 240k डॉलर, H1B, रीलोकेशन।

मैंने हॉस्टल में चिल्ला कर दोस्तों को बताया। रात को पापा को फोन किया। पापा चुप रहे, फिर बोले, बेटा, बहुत बड़ी बात है। माँ ने कहा, पासपोर्ट बनवा ले।

मैंने टिकट देखना शुरू किया, अगस्त 2016 जॉइनिंग।

मार्च 2016 में होली पर घर आया। पापा कमजोर लग रहे थे। खाँसी। मैंने कहा, डॉक्टर को दिखाओ। बोले, कुछ नहीं, ठंड लग गई। माँ भी थकी थकी। मैंने सोचा, उम्र है।

अप्रैल में फोन आया, माँ का। पापा गिर गए, अस्पताल में। मैं भागा। डॉक्टर ने कहा, लंग्स में इंफेक्शन, साथ में हार्ट की प्रॉब्लम। एंजियोप्लास्टी करनी पड़ेगी। खर्च, 3 लाख।

पापा के पास मेडिकल था, पर आधा ही कवर। मैंने अपनी इंटर्नशिप के पैसे, 2 लाख, निकाल कर दिए। ऑपरेशन हुआ। पापा बच गए।

मैं वापस बॉम्बे गया, फाइनल प्रोजेक्ट। मई में फिर फोन, माँ को चक्कर आए। जांच हुई, ब्रेस्ट कैंसर, स्टेज 2। डॉक्टर ने कहा, कीमो शुरू करो, 6 साइकल, हर साइकल 80 हजार। कुल 5 लाख, प्लस सर्जरी।

मैं सुन्न। पापा रिटायर हो चुके थे, पेंशन 12 हजार। घर में सेविंग खत्म। मैंने दोस्तों से उधार माँगा, 1 लाख मिला। बाकी।

जून में मैं घर बैठा था, ऑफर लेटर हाथ में। वीजा इंटरव्यू 15 जुलाई को था। फ्लाइट 10 अगस्त की। माँ की पहली कीमो 20 जून को।

मैंने पापा से कहा, मैं लोन लेता हूँ। पापा बोले, कौन देगा, घर गिरवी रखना पड़ेगा। मैंने कहा, रख देंगे। पापा ने मना किया, बोले, ये घर तेरी माँ की निशानी है।

उस रात मैं छत पर बैठा। आसमान में प्लेन जा रहा था। मैंने सोचा, यही प्लेन मुझे ले जाएगा। दूसरी तरफ माँ नीचे दर्द में।

मैंने अपने मेंटर को मेल किया, क्या जॉइनिंग डिफर हो सकती है, 6 महीने। रिप्लाई आया, सॉरी विवेक, वी नीड पीपल नाउ। यू कैन रीअप्लाई नेक्स्ट ईयर।

मैंने फिर मेल किया, रिमोट पॉसिबल। नो।

14 जुलाई की रात। वीजा इंटरव्यू कल। माँ की दूसरी कीमो परसों। पापा दवाई लेने गए थे, लौटे तो पर्ची गिर गई, झुक कर उठा नहीं पाए। मैंने उठाई। उस वक्त समझ आया, मैं अगर चला गया तो ये दोनों कैसे रहेंगे।

पापा रिटायर्ड, बीमार। माँ कीमो पर। कोई भाई बहन नहीं। रिश्तेदार मदद नहीं करते। कौन अस्पताल ले जाएगा, कौन दवाई लाएगा, कौन रात को पानी देगा।

मैंने सुबह वीजा इंटरव्यू कैंसिल किया। कंपनी को मेल लिखा, थैंक यू फॉर ऑफर, ड्यू टू फैमिली मेडिकल इमरजेंसी आई एम अनेबल टू जॉइन।

दोस्तों ने फोन किया, पागल है क्या, 1.6 करोड़ की जॉब छोड़ रहा है। मैंने कहा, हाँ।

माँ को नहीं बताया। पापा को बताया। वह चुप रहे, फिर बोले, बेटा तेरा करियर। मैंने कहा, करियर फिर बन जाएगा, आप फिर नहीं मिलोगे।

मैंने कानपुर में ही नौकरी ढूंढी। एक लोकल सॉफ्टवेयर कंपनी, सैलरी 35 हजार। मैंने जॉइन कर ली। सुबह 9 से शाम 6 ऑफिस, शाम को अस्पताल। कीमो में माँ के बाल गए, वह रोती। मैं विग ले आया। पापा की दवाई टाइम पर देता।

2016 से 2018, दो साल ऐसे निकले। माँ की सर्जरी हुई, रिकवरी हुई। कैंसर रिमिशन में आया। पापा की तबीयत स्थिर। पर पैसे खत्म। मैंने लोन लिया, 7 लाख।

2018 में कंपनी बंद हो गई। मैं बेरोजगार। इंटरव्यू दिए, बेंगलुरु से ऑफर आया, 18 लाख। मैंने मना किया। पापा बोले, जा बेटा। मैंने कहा, अब नहीं छोड़ सकता। माँ को हर तीन महीने चेकअप, पापा को डायबिटीज। कौन देखेगा।

दोस्त बोले, तू अपना करियर मार रहा है। मैंने कहा, करियर मेरा है, माँ बाप भी मेरे।

मैंने घर के नीचे छोटी सी दुकान खोली, पापा के नाम पर, शर्मा जनरल स्टोर। कंप्यूटर छोड़ कर दाल चावल बेचने लगा। पहले दिन शर्म आई। आईआईटी का लड़का दुकान पर। फिर एक आंटी आईं, बोलीं, बेटा तुम्हारी माँ ने मुझे पढ़ाया था, तुम दुकान खोलो, हम यहीं से लेंगे।

धीरे धीरे दुकान चली। मैं सुबह 6 बजे होलसेल मंडी जाता, सामान लाता, दिन में दुकान, रात को फ्रीलांस कोडिंग। 500 डॉलर की वेबसाइट बनाता।

2019 में माँ पूरी तरह ठीक। डॉक्टर ने कहा, क्लियर। उस दिन मैं दुकान बंद कर के मंदिर गया। प्रसाद चढ़ाया। घर आया तो पापा बोले, बेटा, तूने हमारे लिए सब छोड़ दिया। मैंने कहा, छोड़ा नहीं, बदला है।

2020 लॉकडाउन। दुकान एसेंशियल में खुली। लोगों को राशन चाहिए था। मैंने होम डिलीवरी शुरू की। साइकिल पर जाता। पापा हिसाब लिखते। माँ पैकिंग करती। उस लॉकडाउन में हमने 2 लाख कमाए। मैंने लोन का आधा चुका दिया।

2021 में मैंने दुकान के साथ एक छोटा कंप्यूटर क्लास शुरू किया, बच्चों को कोडिंग सिखाने। फीस 500 महीना। 20 बच्चे आए। मुझे फिर से कोडिंग का मजा आया।

2022 में एक बच्चा, अंश, जो मेरे पास पढ़ता था, उसने नेशनल ओलंपियाड जीता। न्यूज में आया, 'कानपुर के किराना वाले आईआईटीयन से सीख कर जीता'। वह आर्टिकल वायरल हुआ।

उसी हफ्ते मुझे मेल आया, स्ट्राइप के उसी सीटीओ से। लिखा था, विवेक, आई सॉ योर स्टोरी। वी आर ओपनिंग इंडिया ऑफिस। वुड यू लाइक टू लीड एजुकेशन इनिशिएटिव, रिमोट, पार्ट टाइम।

मैंने हाँ कहा। अब मैं सुबह दुकान, दोपहर क्लास, शाम को यूएस टीम के साथ काम। सैलरी डॉलर में नहीं, पर इज्जत में बहुत।

पिछले महीने पापा 68 के हुए। मैंने छोटा सा फंक्शन रखा। दोस्त आए, वही जो कहते थे तूने करियर बर्बाद किया। पापा ने माइक ले कर कहा, मेरा बेटा अमेरिका नहीं गया, पर मेरे पास रहा। जब मैं अस्पताल में था, उसने मेरा हाथ पकड़ा। जब इसकी माँ के बाल गए, इसने चोटी बनाई। करियर तो बहुत लोग बनाते हैं, बेटा कोई कोई बनता है।

माँ ने धीरे से कहा, मुझे आज भी वह ऑफर लेटर याद है। तूने अलमारी में क्यों रखा। मैंने कहा, ताकि याद रहे मैंने क्या छोड़ा। बोली, तूने छोड़ा नहीं, तूने चुना।

आज दुकान पर बैठा हूँ। सामने स्कूल के बच्चे टॉफी ले रहे हैं। लैपटॉप पर कोड चल रहा है। पापा बगल में अखबार पढ़ रहे हैं, माँ काउंटर पर बैठी हैं।

कभी कभी रात को वह ऑफर लेटर निकालता हूँ। 240,000 डॉलर। फिर माँ की हँसी सुनता हूँ, पापा की खाँसी कम हुई है, देखता हूँ। और लेटर वापस रख देता हूँ।

लोग पूछते हैं, पछतावा होता है। मैं सच कहता हूँ, पहले होता था। जब दोस्त बेंगलुरु से फोटो डालते, यूएस ट्रिप की। अब नहीं। क्योंकि मैंने करियर का त्याग नहीं किया, मैंने करियर को रीडिफाइन किया।

मेरा करियर अब सिर्फ कोड नहीं, केयर है।

मैंने माता पिता के लिए अमेरिका छोड़ा, पर उनके साथ जिंदगी जी ली। पापा को हर सुबह चाय दे पाता हूँ, माँ के पैर दबा पाता हूँ। ये 2.4 करोड़ में नहीं मिलता।

अगर फिर से मौका मिले, तो मैं फिर वही करूँगा। वीजा कैंसिल, जॉब छोड़, दुकान खोल। क्योंकि कुछ त्याग घाटा नहीं होते, वे निवेश होते हैं, प्यार में।

और आज जब कोई बच्चा पूछता है, भैया आप आईआईटी करके दुकान क्यों, मैं हँस कर कहता हूँ, क्योंकि मेरे माता पिता मेरी सबसे बड़ी कंपनी हैं, और मैं उनका फुल टाइम सीईओ हूँ।

#अच्छे_लोग_अच्छे_काम #माता_पिता #परिवार_सबसे_पहले #संस्कार #त्याग #प्रेरणादायक_कहानी #जीवन_की_सीख

वर्ण व्यवस्था पर इतिहास में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन एक प्रश्न आज भी प्रासंगिक है।यदि हमारा लक्ष्य जातिविहीन समाज है, तो...
18/07/2026

वर्ण व्यवस्था पर इतिहास में मतभेद हो सकते हैं,
लेकिन एक प्रश्न आज भी प्रासंगिक है।
यदि हमारा लक्ष्य जातिविहीन समाज है, तो फिर शासन, राजनीति और प्रशासन में आज भी जाति क्यों एक प्रमुख आधार बनी हुई है?

जाति प्रमाणपत्र, आरक्षण, जातिगत आंकड़ों की मांग और चुनावी समीकरण—क्या ये सब हमें जाति से ऊपर ले जा रहे हैं या उसे और स्थायी बना रहे हैं?

सवाल किसी वर्ग के अधिकारों का विरोध नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर विचार का है जिसमें हर नागरिक की पहचान बार-बार उसकी जाति से तय होती है।

क्या समय नहीं आ गया कि भारत जाति की जगह समान अवसर, शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण पर अधिक केंद्रित बहस करे?

आपकी राय क्या है?
#जाति #संविधान #सामाजिक_न्याय #समानता #भारत

सोनम वांगचुक की आवाज़: क्या हम सुन रहे हैं?किसी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं होती कि सरकार कितनी शक्तिशाली है, बल्...
15/07/2026

सोनम वांगचुक की आवाज़: क्या हम सुन रहे हैं?

किसी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं होती कि सरकार कितनी शक्तिशाली है, बल्कि यह होती है कि वह अपने नागरिकों की आवाज़ कितनी गंभीरता से सुनती है। जब एक शिक्षक, वैज्ञानिक, नवप्रवर्तक और समाजसेवी अपनी बात मनवाने के लिए अनशन जैसे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक माध्यम का सहारा लेने को मजबूर हो जाए, तो यह केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं रह जाता—यह व्यवस्था के सामने खड़ा एक प्रश्न बन जाता है।

सोनम वांगचुक ने वर्षों तक लद्दाख, शिक्षा, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों से जुड़े मुद्दों पर काम किया है। उनके विचारों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन उनकी बात को सुना जाना लोकतांत्रिक मूल्यों का हिस्सा है।

जब समाज का एक सम्मानित नागरिक अपनी मांगों के समर्थन में अनशन करता है, तब सबसे पहली आवश्यकता संवाद की होती है। मतभेद लोकतंत्र में स्वाभाविक हैं, लेकिन संवाद का अभाव लोकतंत्र को कमजोर करता है।

आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम किसी पक्ष या विपक्ष में खड़े हों। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और संबंधित पक्ष बातचीत की मेज़ पर आएँ। समाधान टकराव से नहीं, बल्कि विश्वास और संवाद से निकलते हैं।

हर नागरिक का जीवन मूल्यवान है। किसी भी आंदोलन की परिणति ऐसी नहीं होनी चाहिए कि स्वास्थ्य या जीवन पर गंभीर संकट उत्पन्न हो। इसलिए सरकार से अपेक्षा है कि वह संवेदनशीलता, धैर्य और लोकतांत्रिक भावना का परिचय देते हुए शीघ्र संवाद स्थापित करे और यदि संभव हो तो व्यावहारिक समाधान की दिशा में आगे बढ़े।

यह समय किसी की जीत या हार का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परिपक्वता दिखाने का है। इतिहास उन्हीं सरकारों को याद रखता है जो विरोध की आवाज़ को पूरा दबाती नहीं, बल्कि सुनती हैं; और उन्हीं आंदोलनों को सम्मान देता है जो संवाद के रास्ते समाधान तक पहुँचते हैं।

आइए, हम सब यह आग्रह करें कि असहमति का उत्तर मौन नहीं, संवाद बने। यही लोकतंत्र की आत्मा है, यही भारत की शक्ति है।
#लोकतंत्र #संवाद #लद्दाख #सोनमवांगचुक #जनआवाज़ #जनसंवेदना #भारत #लोकतांत्रिकअधिकार

आधुनिक युग का सबसे बड़ा संकट: 'पुरुषार्थ' का पतनपिछले 4-5 दशकों में पुरुषों ने अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमता का एक बहुत ...
10/07/2026

आधुनिक युग का सबसे बड़ा संकट: 'पुरुषार्थ' का पतन

पिछले 4-5 दशकों में पुरुषों ने अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमता का एक बहुत बड़ा हिस्सा खो दिया है। अफ़सोस की बात यह है कि आज की पीढ़ी ने 'मर्दानगी' को सिर्फ एक संकुचित और सतही परिभाषा में समेट कर रख दिया है। लेकिन सत्य इससे कहीं परे है।

ब्रह्मचर्य और युवा शक्ति

"मर्दानगी का वास्तविक अर्थ है—पुरुषार्थ। क्या हम एक पुरुष होने का उत्तरदायित्व सच में निभा पा रहे हैं?"

आज का कड़वा सच यह है कि बहुतायत युवा मानसिक और आत्मिक रूप से कमज़ोर हो चुके हैं। उनके भीतर न तो कोई युद्ध जीतने की ललक है, न कोई बड़ा लक्ष्य, न ज़िम्मेदारी उठाने का साहस, और न ही परिवार व समाज को सुरक्षा देने का जज़्बा। भरोसे, समर्पण और प्रेम के मोर्चे पर आज का पुरुष शून्य की ओर बढ़ रहा है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे भीतर की मूल चेतना ही सुप्त हो चुकी है।

पतन के मुख्य कारण: गुलामी के नए रूप

वासना की गुलामी: कुछ पुरुष स्त्रियों के सौंदर्य के पीछे अपनी आत्म-गरिमा खो चुके हैं।

व्यसन और आलस्य: नशा, स्क्रीन एडिक्शन और ख़राब जीवनशैली ने शरीर को खोखला कर दिया है।

स्त्रीत्व का अंधानुकरण: अपनी मूल मर्दाना ऊर्जा (Masculine Energy) को छोड़कर, स्वभाव में एक अजीब सा खोखलापन और ढुलमुल रवैया घर कर गया है।

आधुनिक चक्रव्यूह को भेदकर 'मर्दाना' कैसे बनें?

यदि इस मायाजाल से बाहर निकलकर अपनी खोई हुई ऊर्जा को वापस पाना है, तो इन बुनियादी सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारना ही होगा:

स्वाध्याय (अच्छी किताबें): दिमाग को कचरे से नहीं, बल्कि महापुरुषों के विचारों और ज्ञान से भरें।

शारीरिक श्रम (Workout): पसीना बहाएं। एक सशक्त मस्तिष्क केवल एक सशक्त शरीर में ही निवास कर सकता है।

दृष्टि और वीर्य की रक्षा: अश्लीलता (Porn/Masturbation) के दलदल से तुरंत बाहर निकलें। यह आपकी मानसिक शक्ति को दीमक की तरह चाट रही है।

पूर्ण विश्राम: शरीर और मस्तिष्क की मरम्मत के लिए कम से कम 7-8 घंटे की गहरी नींद लें।

आत्म-केंद्रित बनें (Focus on Self): स्त्रियों के पीछे भागना बंद करें। जब आप खुद को सक्षम बनाएंगे, तो सम्मान अपने आप पीछे आएगा।

परम लक्ष्य की याद: रोज़ सुबह उठकर खुद से पूछें कि आपका मक़सद क्या है? बिना लक्ष्य का पुरुष बिना पतवार की नाव जैसा है।

याद रखें: "पुरुष का वास्तविक सौंदर्य महलों के आराम में नहीं, बल्कि कठिनाइयों, संघर्षों और विपरीत परिस्थितियों से टकराकर निखरने में है।"

यदि आपको इस विचार की गंभीरता समझ आई हो और आप युवाओं को जगाने के इस अभियान का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो आइए, मिलकर भारत के युवाओं को भटकाव से बचाएं और उन्हें उनके वास्तविक गौरव व पुरुषार्थ की ओर वापस लाएं! 🇮🇳🙏

मैं छिपाना जानता तो जग मुझे साधू समझता,शत्रु मेरा बन गया है छल-रहित व्यवहार मेरा!
16/06/2026

मैं छिपाना जानता तो जग मुझे साधू समझता,
शत्रु मेरा बन गया है छल-रहित व्यवहार मेरा!

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