27/04/2015
जम्भवाणी प्रचार सेवा
" जाम्भोजी के अपने भावी "
'पंथ' मेँ 'हवन'
*ही मान्य है*
¤ ¤ ¤ ¤
~ गुरु : श्री जम्भवाणी का आरम्भ ' गुरु ' शब्द से हुआ है ।
इससे ' वाणी ' की विषयवस्तु विषयक महत्वपूर्ण संकेत मिलते है । महाभारत मेँ एक विशिष्ट प्रसंग मेँ आए ' गुरु ' शब्द से इसका विशेष साम्य है । प्रसंगानुसार , वहाँ जो उपदेश और सन्देश देकर इस शब्द का प्रयोग किया गया है , कथानान्तर से वह उपदेश और सन्देश भी श्री जाम्भोजी इस शब्द से देना चाहते हैँ । महाभारत ( शान्तिपर्व , अध्याय 398-399 ) के अनुसार, नारदजी ने एकाग्रचित से निर्गुण - सगुण रुप विश्वात्मा भगवान नारायण ( विष्णु ) की 200 नामोँ से स्तुति की । तब भगवान ने उनको विशवरुप धारण करके दर्शन दिए , ज्ञानोपदेश दिया और कहा :
- अर्थात , ' मैँ निर्गुण , निष्कल , द्धन्द्दोँ से अतीत ओर परिग्रह से शून्य हुँ । तुम ऐसा न समझ लेना कि ये रुपवान है , इसलिए दिखाई देते हैँ , क्योकि मैँ इच्छा करते ही एक क्षण मेँ अदृश्य हो सकता हूँ क्योकि मैँ सम्पूर्ण जगत् का ईश्वर और गुरु हुँ ! तुम जो मुझे देख रहे हो , इस रुप मेँ मैने माया रची है '..... ' मैँ सर्वव्यापी और समस्त प्राणी - समुदाय का अन्तरात्मा हूँ । सम्पूर्ण भूत समुदाय ओर शरीरोँ के नष्ट हो जाने पर भी मेरा नाश नहीँ होता है ' ।
यहाँ मुख्यत: आत्मा -परमात्मा का सम्बन्ध तथा निर्गुण - सगुण का तात्विक अन्तर स्पष्ट किया है । इस सबद मेँ दोनोँ का यह सम्बन्ध स्पष्टरुपेण बताया गया है । निर्गुण-सगुण का अन्तर भी अन्य्त्र स्पष्ट किया गया है :
' निरगुण रुप अम्हे पतियांणी , थल सिरि रह्रो , अगोचरि बांणी ' और ' म्हेई अवगति केवलन्यांनी ' , अन्ततोगत्वा अपनी आत्मा ही अपना गुरु है । - ' गुरु ' की यह परिभाषा याद रखनी चाहिए : समस्त प्राणियोँ का - विशेष कर मनुष्य की आत्मा अपने हित और अहित का उपदेशक गुरु है ।
' गुर चीन्हू ' से प्रकट है कि श्री जम्भवाणी परमात्मा -तत्व का ज्ञान कराने वाली ज्ञानवाणी और धर्मवाणी है ।
' गुर ध्याय रे ग्यांनी ' तथा गुर मुखी ' धरम वखांणी ' से भी इसकी पुष्टि होती है ।
' गुर चीन्हू ' से यह ज्ञानवाणी और यहाँ , ' धरम-वखांणी ' से यह ' धर्मवाणी ' सिद्ध होती है ।
~ जाम्भोजी " निर्गुण विष्णु है , उन्होने अपने भावी ( पंथ ) मेँ निर्गुण विसंन की उपासणा ~ " हवन " ( यज्ञ ) और नाम जप सुमरिण से बताई है ।
¤ ¤ ¤ ¤
नोट - " हवन -यज्ञ "केवल देशी गाय के घी से और नियम पूर्वक ( घी ) से बनाया गया ही मान्य है ।
¤ ¤ ¤ ¤ ¤ ¤ ¤
~ यह लेख श्री जम्भवाणी : टीका से लिया गया है ~
लेखक - डाँ. हीरालाल माहेशवरी
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" जाम्भोजी के अपने भावी "
'पंथ' मेँ 'हवन'
*ही मान्य है*
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~ गुरु : श्री जम्भवाणी का आरम्भ ' गुरु ' शब्द से हुआ है ।
इससे ' वाणी ' की विषयवस्तु विषयक महत्वपूर्ण संकेत मिलते है । महाभारत मेँ एक विशिष्ट प्रसंग मेँ आए ' गुरु ' शब्द से इसका विशेष साम्य है । प्रसंगानुसार , वहाँ जो उपदेश और सन्देश देकर इस शब्द का प्रयोग किया गया है , कथानान्तर से वह उपदेश और सन्देश भी श्री जाम्भोजी इस शब्द से देना चाहते हैँ । महाभारत ( शान्तिपर्व , अध्याय 398-399 ) के अनुसार, नारदजी ने एकाग्रचित से निर्गुण - सगुण रुप विश्वात्मा भगवान नारायण ( विष्णु ) की 200 नामोँ से स्तुति की । तब भगवान ने उनको विशवरुप धारण करके दर्शन दिए , ज्ञानोपदेश दिया और कहा :
- अर्थात , ' मैँ निर्गुण , निष्कल , द्धन्द्दोँ से अतीत ओर परिग्रह से शून्य हुँ । तुम ऐसा न समझ लेना कि ये रुपवान है , इसलिए दिखाई देते हैँ , क्योकि मैँ इच्छा करते ही एक क्षण मेँ अदृश्य हो सकता हूँ क्योकि मैँ सम्पूर्ण जगत् का ईश्वर और गुरु हुँ ! तुम जो मुझे देख रहे हो , इस रुप मेँ मैने माया रची है '..... ' मैँ सर्वव्यापी और समस्त प्राणी - समुदाय का अन्तरात्मा हूँ । सम्पूर्ण भूत समुदाय ओर शरीरोँ के नष्ट हो जाने पर भी मेरा नाश नहीँ होता है ' ।
यहाँ मुख्यत: आत्मा -परमात्मा का सम्बन्ध तथा निर्गुण - सगुण का तात्विक अन्तर स्पष्ट किया है । इस सबद मेँ दोनोँ का यह सम्बन्ध स्पष्टरुपेण बताया गया है । निर्गुण-सगुण का अन्तर भी अन्य्त्र स्पष्ट किया गया है :
' निरगुण रुप अम्हे पतियांणी , थल सिरि रह्रो , अगोचरि बांणी ' और ' म्हेई अवगति केवलन्यांनी ' , अन्ततोगत्वा अपनी आत्मा ही अपना गुरु है । - ' गुरु ' की यह परिभाषा याद रखनी चाहिए : समस्त प्राणियोँ का - विशेष कर मनुष्य की आत्मा अपने हित और अहित का उपदेशक गुरु है ।
' गुर चीन्हू ' से प्रकट है कि श्री जम्भवाणी परमात्मा -तत्व का ज्ञान कराने वाली ज्ञानवाणी और धर्मवाणी है ।
' गुर ध्याय रे ग्यांनी ' तथा गुर मुखी ' धरम वखांणी ' से भी इसकी पुष्टि होती है ।
' गुर चीन्हू ' से यह ज्ञानवाणी और यहाँ , ' धरम-वखांणी ' से यह ' धर्मवाणी ' सिद्ध होती है ।
~ जाम्भोजी " निर्गुण विष्णु है , उन्होने अपने भावी ( पंथ ) मेँ निर्गुण विसंन की उपासणा ~ " हवन " ( यज्ञ ) और नाम जप सुमरिण से बताई है ।
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नोट - " हवन -यज्ञ "केवल देशी गाय के घी से और नियम पूर्वक ( घी ) से बनाया गया ही मान्य है ।
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~ यह लेख श्री जम्भवाणी : टीका से लिया गया है ~
लेखक - डाँ. हीरालाल माहेशवरी
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