indin sekh Abbasi alapsakhyk mahasabh

indin sekh Abbasi alapsakhyk mahasabh Indian Sheikh Abbasi Alpasankhyak Mahasabha-623 is a national social organization working for education, unity, employment, and social welfare across India.

I am serving as National Vice President and am committed to strengthening our society through awar

Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Ikramudden Abbasi, Gulfam Gulfam
22/07/2026

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22/07/2026
पोस्ट -33🌹मुझको वहाँ से पढ़िए जहाँ ख़ामोश हूँ मैं,यह हँसना-हँसाना तो वक़्त की बातें हैं।"🌹हर मुस्कुराहट ख़ुशी की गवाह नह...
06/07/2026

पोस्ट -33
🌹मुझको वहाँ से पढ़िए जहाँ ख़ामोश हूँ मैं,
यह हँसना-हँसाना तो वक़्त की बातें हैं।"🌹
हर मुस्कुराहट ख़ुशी की गवाह नहीं होती, और हर ख़ामोशी लाचारी का नाम नहीं होती। कुछ लोग अपने आँसुओं को आँखों तक आने नहीं देते, उन्हें मुस्कुराहट की चादर में छुपाकर ज़िंदगी का सफ़र तय करते हैं।
अगर किसी इंसान को सचमुच समझना हो, तो उसके क़हक़ों से नहीं, उसकी ख़ामोशियों से मुलाक़ात कीजिए। क्योंकि अल्फ़ाज़ अक्सर चेहरे का परिचय देते हैं, लेकिन ख़ामोशी रूह का हाल बयान करती है।
वक़्त के साथ हँसना आसान है, मगर दर्द को सीने में दफ़्न करके मुस्कुराना हर किसी के बस की बात नहीं। इसलिए किसी की ज़िंदगी का फ़ैसला उसके चंद लम्हों की हँसी देखकर मत कीजिए। हो सकता है, वह अपने भीतर एक ऐसी जंग लड़ रहा हो जिसका शोर सिर्फ़ उसका रब सुनता हो।
जो लोग ख़ामोश होकर भी मुस्कुराते हैं, वही अक्सर ज़िंदगी के सबसे बहादुर मुसाफ़िर होते हैं।

पोस्ट -31🌹इन्डियन शेख अब्बासी अल्पसंख्यक महासभा🌹   1. समाजिक एकता – हर परिवार को जोड़ना, मतभेद मिटाना और भाईचारे को मजबू...
29/06/2026

पोस्ट -31
🌹इन्डियन शेख अब्बासी अल्पसंख्यक
महासभा🌹

1. समाजिक एकता – हर परिवार को जोड़ना, मतभेद मिटाना और भाईचारे को मजबूत करना।

2. शिक्षा सर्वोपरि – हर बच्चा और हर बच्ची गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करे, यही समाज की असली ताकत है।

3. रोजगार और स्वरोजगार – युवाओं को कौशल प्रशिक्षण, व्यवसाय और रोजगार के अवसरों से जोड़ना।

4. बुजुर्गों का सम्मान – समाज के वरिष्ठजनों का आदर, मार्गदर्शन और आवश्यक सहयोग सुनिश्चित करना।

5. विधवा एवं जरूरतमंद महिलाओं का सम्मानजनक जीवन – आत्मनिर्भर बनने में हर संभव सहयोग देना।

6. अल्लाह की राह में जान और माल खर्च करने की आदत – सेवा, दान और जरूरतमंदों की मदद को जीवन का हिस्सा बनाना।

7. नशामुक्त समाज – नशे, जुए और अन्य सामाजिक बुराइयों से दूर रहकर स्वस्थ समाज का निर्माण।

8. चरित्र निर्माण और अच्छे संस्कार – ईमानदारी, अनुशासन, जिम्मेदारी और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना।

9. स्वास्थ्य और स्वच्छता – नियमित स्वास्थ्य जांच, रक्तदान, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना।

10. संगठन की मजबूती – हर परिवार को संगठन से जोड़कर शिक्षा, सेवा और विकास की साझा मुहिम को आगे बढ़ाना।

संकल्प: "शिक्षित समाज – संगठित समाज – आत्मनिर्भर समाज – सम्मानित समाज। यही इन्डियन शेख अब्बासी अल्पसंख्यक महासभा का लक्ष्य है।"
इन्डियन शेख अब्बासी अल्पसंख्यक महासभा -623
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शेर मोहम्मद बीकानेर

🌹ग़ौर फ़रमाइए — निकाह, मदद और हमारी सामाजिक ज़िम्मेदारी 🌹ज़बाब देना हर एक की जिम्मेदारी है पूरा पढ़ें इन्शाअल्ला आप का ज...
16/01/2026

🌹ग़ौर फ़रमाइए — निकाह, मदद और हमारी सामाजिक ज़िम्मेदारी 🌹
ज़बाब देना हर एक की जिम्मेदारी है पूरा पढ़ें इन्शाअल्ला आप का ज़मीर जिन्दा होगा

समाज में बरसों से एक रवायत चली आ रही है कि शादी के वक़्त मदद का मतलब सिर्फ़ “लड़की की शादी” समझ लिया जाता है। चंदा, इमदाद, ऐलान—सबका रुख़ एक ही तरफ़। मगर अगर ग़ौर से देखें तो हक़ीक़ी और दाइमी ज़िम्मेदारी किस पर बढ़ती है? जवाब साफ़ है—लड़के पर।
निकाह के बाद घर, रोज़ी, खाने का इंतज़ाम, बीवी-बच्चों की ज़रूरतें—ये सब बोझ नहीं, मगर अमानत हैं, और ये अमानत लड़के के कंधों पर आती है।

हमारे नबी ﷺ की सीरत इस बाबत रोशन मिसाल है। आपने अपनी बेटी को सादगी के साथ रुख़्सत किया। वलीमे के लिए सहाबा से फरमाया—जिसके घर जो बना हो, ले आए। जो आया, सब एक बड़े बर्तन में मिला दिया गया और फरमाया—यही मेरी बेटी का वलीमा है।
यह पैग़ाम था: नुमाइश नहीं, साझेदारी; तफ़रीक़ नहीं, सादगी; बोझ नहीं, बरकत।

आज सवाल यह है कि हम किस दिशा में मदद कर रहे हैं?
अगर लड़के को रोज़गार, हुनर या कारोबार में सहारा मिल जाए—तो सिर्फ़ एक शादी नहीं, आने वाली नस्लें आत्मनिर्भर बनेंगी। तब हर शादी चंदे की मोहताज नहीं होगी, हर घर अपनी जिम्मेदारी खुद उठाएगा, और इज़्ज़त के साथ जिंदगी चलेगी।

सोचिए—अगर हर मोहल्ला, हर जमाअत, हर संगठन यह तय कर ले कि:

शादी से पहले लड़के के रोज़गार की व्यवस्था प्राथमिकता होगी,

हुनर सिखाया जाएगा, काम से जोड़ा जाएगा,

और वलीमे को सामूहिक सादगी से मनाया जाएगा—
तो समाज में कर्ज़, दिखावा और दबाव खुद-ब-खुद कम होंगे।

याद रखिए, क़यामत के दिन अल्लाह सवाल करेगा—
“जो मदद ली, उसे कहाँ और कैसे खर्च किया?”
यह सवाल देने वाले से भी होगा और लेने वाले से भी। इसलिए इमदाद ऐसी हो जो इज़्ज़त बनाए, आत्मनिर्भरता बढ़ाए, और बरकत पैदा करे।

आज ज़रूरत है कि सामाजिक रहबर अपनी सोच का दायरा बदलें।
लड़की की शादी में दिखावे की इमदाद नहीं,
बल्कि लड़के के पैरों तले ज़मीन मज़बूत करने की कोशिश करें।
यही नबी ﷺ की सुन्नत की रूह है,
यही समाज की असली तरक़्क़ी है।

आइए, निकाह को बोझ नहीं—बरकत बनाएं।
इमदाद को ख़ैरात नहीं—इंतज़ाम बनाएं।
और समाज को मोहताज नहीं—ख़ुददार बनाएं।

— इन्डियन शेख अब्बासी अल्पसंख्यक महासभा - 623
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष: शेर मोहम्मद, बीकानेर

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