16/01/2026
🌹ग़ौर फ़रमाइए — निकाह, मदद और हमारी सामाजिक ज़िम्मेदारी 🌹
ज़बाब देना हर एक की जिम्मेदारी है पूरा पढ़ें इन्शाअल्ला आप का ज़मीर जिन्दा होगा
समाज में बरसों से एक रवायत चली आ रही है कि शादी के वक़्त मदद का मतलब सिर्फ़ “लड़की की शादी” समझ लिया जाता है। चंदा, इमदाद, ऐलान—सबका रुख़ एक ही तरफ़। मगर अगर ग़ौर से देखें तो हक़ीक़ी और दाइमी ज़िम्मेदारी किस पर बढ़ती है? जवाब साफ़ है—लड़के पर।
निकाह के बाद घर, रोज़ी, खाने का इंतज़ाम, बीवी-बच्चों की ज़रूरतें—ये सब बोझ नहीं, मगर अमानत हैं, और ये अमानत लड़के के कंधों पर आती है।
हमारे नबी ﷺ की सीरत इस बाबत रोशन मिसाल है। आपने अपनी बेटी को सादगी के साथ रुख़्सत किया। वलीमे के लिए सहाबा से फरमाया—जिसके घर जो बना हो, ले आए। जो आया, सब एक बड़े बर्तन में मिला दिया गया और फरमाया—यही मेरी बेटी का वलीमा है।
यह पैग़ाम था: नुमाइश नहीं, साझेदारी; तफ़रीक़ नहीं, सादगी; बोझ नहीं, बरकत।
आज सवाल यह है कि हम किस दिशा में मदद कर रहे हैं?
अगर लड़के को रोज़गार, हुनर या कारोबार में सहारा मिल जाए—तो सिर्फ़ एक शादी नहीं, आने वाली नस्लें आत्मनिर्भर बनेंगी। तब हर शादी चंदे की मोहताज नहीं होगी, हर घर अपनी जिम्मेदारी खुद उठाएगा, और इज़्ज़त के साथ जिंदगी चलेगी।
सोचिए—अगर हर मोहल्ला, हर जमाअत, हर संगठन यह तय कर ले कि:
शादी से पहले लड़के के रोज़गार की व्यवस्था प्राथमिकता होगी,
हुनर सिखाया जाएगा, काम से जोड़ा जाएगा,
और वलीमे को सामूहिक सादगी से मनाया जाएगा—
तो समाज में कर्ज़, दिखावा और दबाव खुद-ब-खुद कम होंगे।
याद रखिए, क़यामत के दिन अल्लाह सवाल करेगा—
“जो मदद ली, उसे कहाँ और कैसे खर्च किया?”
यह सवाल देने वाले से भी होगा और लेने वाले से भी। इसलिए इमदाद ऐसी हो जो इज़्ज़त बनाए, आत्मनिर्भरता बढ़ाए, और बरकत पैदा करे।
आज ज़रूरत है कि सामाजिक रहबर अपनी सोच का दायरा बदलें।
लड़की की शादी में दिखावे की इमदाद नहीं,
बल्कि लड़के के पैरों तले ज़मीन मज़बूत करने की कोशिश करें।
यही नबी ﷺ की सुन्नत की रूह है,
यही समाज की असली तरक़्क़ी है।
आइए, निकाह को बोझ नहीं—बरकत बनाएं।
इमदाद को ख़ैरात नहीं—इंतज़ाम बनाएं।
और समाज को मोहताज नहीं—ख़ुददार बनाएं।
— इन्डियन शेख अब्बासी अल्पसंख्यक महासभा - 623
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष: शेर मोहम्मद, बीकानेर