23/04/2020
दुर्गों का बून्दी के परिप्रेक्ष्य में एक परिचय - बूंदी का तारागढ़
तारागढ का दुर्ग अरावली पर्वत पर स्थित है। इसे 'बुंदी का किला' भी कहा जाता है। १४वीं शताब्दी में बूंदी के संस्थापक राव देव हाडा ने इस सुदृढ किले का निर्माण कराया था।
बूंदी एक दुर्गनगर है, जिसमें गिरि दुर्ग और स्थल दुर्ग की विशेषताएं जुड़ी हैं। इसके चार द्वार पाटनपोल, भैरवपोल, शुकुलवारी पोल एवं चौगान हैं। एक तरह से यह दुर्ग दो भागों में बंटा है। ऊपरी भाग को तारागढ़ कहा जाता है। नीचे के भाग को गढ़ कहते हैं। शहर का मुख्य आकर्षण तारागढ़ फोर्ट है। लगभग पांच सौ फुट ऊंची एक पहाड़ी पर स्थित यह फोर्ट सैलानियों को दूर से ही आकर्षित करने लगता है। इसकी स्थापना 1352 में राव बरसिंह ने शत्रुओं के हमलों से बचाव के लिए की थी। आज यह दुर्ग राजपूत वास्तुशैली का एक भव्य उदाहरण माना जाता है। तारागढ़ परिसर में चार पक्के विशाल जलाशय है। किले के झरोखों से शहर का विहंगम दृश्य देखते ही बनता है, जिसमें नवलसागर झील का सुंदर रूप अलग ही नजर आता है। दुर्ग के परकोटे में कोई बुर्ज नहीं है, बल्कि मध्य में भीमबुर्ज स्थित है। परिसर में 84 स्तम्भों की छतरी किले का गौरव है। इस छतरी के मध्य पावन शिवलिंग अवस्थित है।
दूसरे भाग गढ़ में प्रवेश के लिए हजारीपोल, हथियापोल और गणेशपोल प्रमुख हैं। यहां आकर सैलानियों को महलों की भव्यता देखने को मिलती है। इनमें छत्र महल, अनिरुद्ध महल, रतन महल, फूल महल, बादल महल एवं उम्मेद महल महत्वपूर्ण हैं। महलों में दीवान ए आम, चित्रशाला, दरीखाना और रतन गुम्मट की शोभा अलग ही नजर आती है। छत्रमहल यहां का सबसे पुराना महल है।
सभी महलों की कलात्मक छवि और भितिचित्र इनकी विशेषता कहे जाते हैं। मेहराबों, छज्जों, तिबारों, बारादरियों और चौकियों की निर्माण शैली वास्तव में दर्शनीय है। यहां चित्रशाला जैसा एक कलाधाम है। दरअसल छत्रमहल और चित्रशाला में भित्तिचित्रों का दुर्लभ खजाना छिपा है। इनमें रागमाला और रासलीला के अलावा शिकार आदि के भी चित्र हैं। शहर से किले और महलों तक जाने के लिए बाजार, चौगान, दरवाजे और बहुत सी पुरानी इमारतों के मध्य से गुजर कर जाना होता है। पर्यटकों को उस समय ऐसा प्रतीत होता है जैसे विपरीत दिशा से बूंदी के इतिहास के पन्ने पलट कर देख रहे हैं।
बूंदी में प्राचीन समय में जलसंरक्षण एवं संवर्धन की खास परम्परा रही है। इसका प्रमाण हैं यहां की झीलें। यह प्राकृतिक झीलें नहीं हैं, बल्कि इनका निर्माण यहां के राजाओं ने करवाया था। यह झीलें आज बूंदी की खूबसूरती का खास हिस्सा हैं। दुर्ग पहाड़ी के साये में स्थित नवलसागर उनमें से एक है। चतुर्भुज आकार की इस झील के मध्य वरुण देवता का मंदिर है।
कुछ दूर सुखसागर झील एक हरे भरे उद्यान के मध्य पसरी है। जहां राजाओं की ग्रीष्म विश्रामगाह सुख महल भी बना है। इसी तरह फूलसागर में भी 20वीं शताब्दी में निर्मित यहां का नवीनतम महल स्थित है। शहर से करीब तीन किलोमीटर दूर जैतसागर पहाड़ियों के साये में स्थित ङील है। इस झील में लगे फव्वारे के चलने पर झील का झिलमिलाता पानी अधिक सुंदर लगता है।
राजस्थान के हड़ौती क्षेत्र का इतिहास भी गौरवशाली रहा है। यहां के प्रमुख शहर बूंदी का एक अलग ही आकर्षण है, क्योंकि तीन दिशाओं में अरावली की छोटी-छोटी पहाड़ियों से घिरा यह शहर एक घाटी के रूप में बसा दिखता है।
राजस्थान के अन्य क्षेत्रों के समान राज्य के हड़ौती क्षेत्र का इतिहास भी गौरवशाली रहा है। यही कारण है कि यहां के प्रमुख शहर बूंदी में महल, दुर्ग, मंदिर, झीलों जैसे सभी पर्यटन आकर्षण मौजूद हैं। फिर भी न जाने क्यूं हड़ौती का बूंदी शहर पर्यटन की दृष्टि से अभी अछूता सा प्रतीत होता है। बूंदी की भौगोलिक स्थिति इसका एक अलग आकर्षण कही जा सकती है। क्योंकि तीन दिशाओं में अरावली की छोटी-छोटी पहाड़ियों से घिरा यह शहर एक घाटी के रूप में बसा दिखता है। मौहम्मद गौरी से पराजय के बाद पृथ्वीराज चौहान के कुछ अनुयायी चम्बल घाटी के इस भाग में आ बसे थे। उन्हीं चौहान राजपूतों द्वारा बून्दी शहर को राजधानी बनाने के बाद इसका इतिहास शुरू हुआ। उसी समृद्ध इतिहास के अनेकों प्रतीक यहां आज भी मौजूद हैं। जो शूरवीरों की वीरता और बलिदान के मूक गवाह रहे हैं। जिन्हें देखने यहां अनेक देशी विदेशी सैलानी आते हैं।