Bundi Riyasat

Bundi Riyasat ●Glorious History of Bundi & Hadauti
●City of Stepwells ● Vintage Bundi
●Hada Chauhan Dynasty ● Invincible Hadendra

Fort Dugari
24/08/2026

Fort Dugari

Bundi Palace ❤️
23/08/2026

Bundi Palace ❤️

हंसादेवी माताजी मंदिर, आजाद पार्क, बून्दी - मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार सम्वत 1812 (1755 ईसवी) में बूंदी के शासक राव...
21/08/2026

हंसादेवी माताजी मंदिर, आजाद पार्क, बून्दी -

मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार सम्वत 1812 (1755 ईसवी) में बूंदी के शासक राव राजा रतन सिंह जी का विवाह बांसवाड़ा रियासत में हुवा था। राव रतनसिंह की रानी और बांसवाड़ा की राजकुमारी, माताजी की मूर्ति बांसवाड़ा से अपने साथ में लाइ थी। हंसादेवी माताजी की मूर्ति को पीताजी माली (धीवर माली) गोत्र रूवाला जो रामा के पुत्र और चतरा के भाई थे साथ लेकर आये।

इस मन्दिर के लिए बून्दी नरेश द्वारा दी हुई 'डोहली कि जमीन' केसरी दौलत मैरिज गार्डन के बिलकुल बगल में गणेश बाग रोड़ पर स्थित है।
जिस पर किसी व्यक्ति ने कब्जा किया हुआ है। मन्दिर कि समिति इतनी असहाय है कि विरोध भी नही कर पा रही।
उन पर मातेश्वरी कि कृपा बनी रहे।

बून्दी चित्रशाला में भी हंसा माता मन्दिर के चित्र उकेरे हुए है।

वंश भास्कर के अनुसार राव रतन सिंह के विवाह का सम्वत 1612 (1555 ईसवी) होना चाहिए। मध्यकाल में रियासतों में विवाह में राजकुमारियों द्वारा अपने आराध्य की प्रतिमा और उसकी पूजा अर्चना करने वालो को अपने साथ लाने की प्रथा सामान्य थी।

बून्दी गढ़ रजवाड़ो के राजप्रासादो में बून्दी के महलों का सौन्दर्य सर्वश्रेष्ट है - कर्नल जेम्स टॉड
20/08/2026

बून्दी गढ़
रजवाड़ो के राजप्रासादो में बून्दी के महलों का सौन्दर्य सर्वश्रेष्ट है
- कर्नल जेम्स टॉड

1960-70 के दशक में बून्दी बायपासPhotos को enhance किया गया है।
20/08/2026

1960-70 के दशक में बून्दी बायपास

Photos को enhance किया गया है।

20/08/2026

BUNDI 🚩

ऐतिहासिक दरवाजे का सौन्दर्य बढ़ाता बैनर और बदहाल दरवाजा -ज़ब बैनर -होर्डिंग के लिए व्यवस्था उपलब्ध है तो ऐतिहासिक धरोहर के...
20/08/2026

ऐतिहासिक दरवाजे का सौन्दर्य बढ़ाता बैनर और बदहाल दरवाजा -
ज़ब बैनर -होर्डिंग के लिए व्यवस्था उपलब्ध है तो ऐतिहासिक धरोहर के साथ खिलवाड़ क्यों?
पर्यटक धरोहर देखने आते है, बैनर देखने नही।
बून्दी की क्या छवि लेकर जाते होंगे।

औरंगजेब से मथुराधीश जी (वर्तमान कोटा) व गोपाल जी बून्दी की प्रतिमाओं की रक्षा-मथुराधीश जी वल्लभ सम्प्रदाय के सात स्वरूपो...
19/08/2026

औरंगजेब से मथुराधीश जी (वर्तमान कोटा) व गोपाल जी बून्दी की प्रतिमाओं की रक्षा-

मथुराधीश जी वल्लभ सम्प्रदाय के सात स्वरूपों में सर्वप्रथम माने जाते हैं।सन 1669 को औरंगजेब से बचाने के गुसाईं सेवक (गोस्वामी) मथुरा से वल्लभ सम्प्रदाय की प्रतिमाओं को लेकर राजपूताने की ओर आया।

औरंगजेब के भय से कोई भी उन्हें शरण देने को राजी नही था।

वहीं राजपूताने में बून्दी व मेवाड़ ऐसे राज्य थे जो अपने स्वाभिमान के लिए जाने जाते थे।
बून्दी में इससे पूर्व में राव राजा भाव सिंह जी के शासनकाल में बून्दी के वीरों ने केशवराय मन्दिर को तोड़ने आयी औरंगजेब की सेना को परास्त कर भागने पर विवश कर दिया था। अतः गुसाईं ने सर्वप्रथम प्रवेश हठीले हाड़ाओ की धरती बून्दी में किया। बून्दी के हाड़ा शासक ने गुसाईं को बून्दी में शरण दी। गुसाईं ने मथुराधीश जी व गोपाल लाल जी की प्रतिमा बून्दी नरेश को सौप दि।

इनका वर्तमान मन्दिर(हवेली) बालचन्द पाड़ा में कटकोन हवेली के पास बना हुआ है।इन दोनों के नाम 12 गाँवो की जागीर दि गयी थी।
इसके बाद गुसाईं बून्दी से कोटा चले गए जहाँ के शासक जगत सिंह हाड़ा ने उन्हें शरण दी।

अन्य मूर्तियां - श्री नाथ जी व चारभुजानाथ जी की प्रतिमाएं मेवाड़ में व मदनमोहन जी की करोली में स्थापित की गई।

सन 1740/1744 को कोटा नरेश दुर्जनशाल मथुराधीश जी को कोटा ले गए व वही स्थापित किया गया और गोपाल लाल जी की प्रतिमा बून्दी में स्थापित की गई।

इसीलिए बून्दी नरेश उम्मेद सिंह जी से पूर्व बून्दी के हाड़ा नरेश वल्लभ सम्प्रदाय की दीक्षा ग्रहण करते थे। उम्मेद सिंह जी ने रामानुज सम्प्रदाय की दीक्षा ग्रहण की थी।

औरंगजेब के कारण इन प्रतिमाओं को हवेलियों में ही स्थापित किया गया था। गोपाल जी की हवेली बहुत विशाल बनी हुई है।इसी प्रकार अन्य रियासतों में भी प्रतिमाएं हवेलियों में स्थापित की गई।
राजस्थान कला संस्कृति का प्रमुख प्रश्न "हवेली संगीत" इसी पर आधारित है।
इन हवेलियों में होने वाले भजन कीर्तन हवेली संगीत कहलाये।

हाड़ोती के शासको ने अपने इतिहास को प्रचारित नही किया जबकि मेवाड़ ने चित्रों आदि के माध्यम से खूब प्रचारित किया इसलिए सबको श्री नाथ जी की जानकारी है परन्तु प्रथम पीठ मथुराधीश जी और गोपाल जी की नही।
महलों के कमरे खाली पड़े है यदि उनमे हमारे धार्मिक इतिहास को पेंटिंग्स के माध्यम से दर्शाया जाए तो पर्यटकों का उस स्थल से जुड़ाव बना रहेगा और हमारे गौरवशाली इतिहास की जानकारी भी सबको उपलब्ध होगी।

मेनाल/महानाल -मेनाल लकुलीश संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।8वीं से 12वीं शताब्दी ई. के बीच के कई मंदिर यहां उपलब...
18/08/2026

मेनाल/महानाल -
मेनाल लकुलीश संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
8वीं से 12वीं शताब्दी ई. के बीच के कई मंदिर यहां उपलब्ध हैं।

चाहमानों/चौहानों के राज में यह शैव धर्म के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान था। मेनाल, पृथ्वीराज-II (1164-69) के समय में मिडिल एज में पूरा इलाका शाकंभरी चौहानों के अंडर था।

शिव का मुख्य मंदिर मेनाल नदी के पूर्वी किनारे पर एक नीची ज़मीन पर है और इसे महानालेश्वर के नाम से जाना जाता है।

महानालेश्वर (मेनाल) के भव्य शिव मंदिर का निर्माण "पृथ्वीराज चौहान द्वितीय" द्वारा करवाया गया था। उनकी रानी सुहाव देवी ने मेनाल झरने के समीप सुहावेश्वर शिव मंदिर का निर्माण करवाया (अंतिम फोटो) तथा संत भावब्रह्मा ने मठ का निर्माण करवाया था।

पृथ्वीराज चौहान द्वितीय ने विदेशी आक्रांता खुसरो मलिक को हराया था तथा विदेशी आक्रमणकारियो को भारत में प्रवेश से विफल कर दिया था।

मेनाल क्षेत्र से मिले महादेव हाडा के शिलालेख के अनुसार महादेव हाडा कि तलवार शत्रु कि आँखों में चकाचोंद उत्पन्न कर देती थी।
चुंकि मेनाल हाड़ाओ के तत्कालीन राज्य गढ़ बम्बावदा और मांडलगढ़ के क्षेत्र में स्थित था।

अभयनाथ मन्दिर बून्दी -इतिहास के अनुसार मूर्ति की स्थापना एक छोटे धार्मिक स्थल के रूप में बून्दी स्थापना से पूर्व हो चुकी...
17/08/2026

अभयनाथ मन्दिर बून्दी -
इतिहास के अनुसार मूर्ति की स्थापना एक छोटे धार्मिक स्थल के रूप में बून्दी स्थापना से पूर्व हो चुकी थी।

राव राजा शत्रुशाल हाडा ने संवत 1692 में यहाँ भव्य मन्दिर बनवाकर इन्हे मन्दिर में स्थापित किया। उनकी धाय माँ प्रथा देवी ने यहाँ एक कुंड का निर्माण करवाया।

मन्दिर में सती की एक छतरी है जिस पर बून्दी को सती का श्राप लिखा है -
श्यामखोरा क धक्का
हरामखोरा का दूना पट्टा

Address

तारागढ़ बूंदी
Bundi
323001

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