13/02/2026
मैं हमेशा नरेंद्र मोदी जी की आलोचना करता रहा हूँ,
लेकिन आज सोचा — क्यों न उनकी महानता पर भी कुछ प्रकाश डाल दिया जाए।
क्योंकि भाई साहब… महान लोग एक बार नहीं, दो बार जन्म लेते हैं।
पहला जन्म — 29 अगस्त 1949 (उनकी डिग्री के अनुसार)
और दूसरा जन्म — 17 सितंबर 1950 (जो सार्वजनिक रूप से बताया जाता है)।
अब इतने महान व्यक्ति के लिए दो जन्म तो बनते ही हैं!
कहा जाता है कि 1950 में जन्मे मोदी जी ने 6 साल की उम्र में वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेची —
जबकि असली रेलवे स्टेशन बना 1973 में…
यानि जब मोदी जी 23 साल के हो चुके थे।
मतलब दूरदर्शिता ऐसी कि स्टेशन आने से पहले ही चाय बेचनी शुरू कर दी!
आपातकाल के दौरान वे भूमिगत रहे,
लेकिन उसी समय पढ़ाई भी पूरी कर ली —
और 1978 में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक भी बन गए।
इसके बाद बिना स्नातक प्रमाणपत्र के सीधे
गुजरात विश्वविद्यालय से
“संपूर्ण राजनीति विज्ञान” में परास्नातक कर लिया —
ऐसा अनोखा विषय, जिसके बारे में प्रोफेसरों को भी 2014 के बाद पता चला!
इतना ही नहीं —
इस कोर्स में वे अकेले छात्र थे,
अकेले परीक्षा दी,
अकेले डिग्री ली —
और आज तक कोई सहपाठी या शिक्षक सामने नहीं आया।
क्योंकि महानता भी सोलो परफॉर्मेंस मांगती है!
भारत में कंप्यूटर आने से पहले ही
उनकी डिग्री कंप्यूटर से छपी हुई थी,
जबकि उस दौर में बाकी डिग्रियाँ हाथ से लिखी जाती थीं।
इतना ही नहीं —
जिस फ़ॉन्ट से उनकी डिग्री छपी थी,
वो माइक्रोसॉफ्ट ने कई साल बाद पेटेंट कराया!
और कमाल तो ये कि
डिग्री रविवार को छपी —
जब दफ्तर बंद रहते हैं।
लगता है महान लोगों के लिए छुट्टी भी काम करती है!
इसी बीच समय निकालकर
उन्होंने 1971 के आंदोलन में भी हिस्सा लिया,
35 साल भिक्षाटन किया,
देशाटन किया —
और घूमते-घूमते
एफिल टावर के सामने कोट पहनकर फोटो भी खिंचवा ली,
और यूनिवर्सल स्टूडियोज हॉलीवुड भी पहुँच गए।
इतनी उपलब्धियाँ एक जीवन में नहीं —
दो जीवन में भी मुश्किल से मिलती हैं!
अगर अब भी कोई न माने कि मोदी जी अलौकिक हैं,
तो उसे तुरंत देशद्रोही घोषित कर देना चाहिए!
क्योंकि याद रखिए —
नशा चाहे शराब का हो
या अंधभक्ति का…
एक दिन उतरता ज़रूर है।
🇮🇳 भारत माता की जय।