27/05/2026
“हम वर्षों से हिंदू-मुस्लिम की बहसों में उलझे रहे,
लेकिन क्या कभी उतनी शक्ति से अपनी आस्था, अपने मंदिरों और अपने धामों में फैलते भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़े हुए?
आज बदरी-केदार जैसे सनातन धर्म के सर्वोच्च आस्था केंद्रों में यदि दान के धन पर वीआईपी संस्कृति पल रही हो, श्रद्धालुओं के पैसे से नेताओं की मेहमाननवाज़ी हो रही हो, मंदिर संपत्तियों पर कब्ज़े और सौदों की चर्चाएँ सामने आ रही हों — तो यह केवल आर्थिक भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सनातन की आत्मा पर प्रहार है।
जिस धन को भक्त अपनी मेहनत, विश्वास और श्रद्धा से भगवान के चरणों में अर्पित करते हैं, वह धन यदि सत्ता, विशेषाधिकार और भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ जाए, तो यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था के साथ विश्वासघात है।
सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि धर्म के नाम पर सबसे अधिक शोर मचाने वाले अनेक संगठन भी ऐसे मामलों में मौन दिखाई देते हैं।
क्या धर्म केवल नारों के लिए है?
क्या सनातन केवल राजनीति का मंच बनकर रह जाएगा?
क्या मंदिरों की पवित्रता, पारदर्शिता और श्रद्धालुओं का सम्मान अब किसी की प्राथमिकता नहीं?
यदि आज भी हिंदू समाज नहीं जागा,
यदि आज भी श्रद्धालु एकजुट नहीं हुए,
तो आने वाला समय हमारे धामों को आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और वीआईपी संस्कृति के अड्डों के रूप में याद करेगा।
अब समय आ गया है —
मौन तोड़ने का।
प्रश्न पूछने का।
दान के हर पैसे का हिसाब मांगने का।
और अपने धामों, अपनी संस्कृति और अपनी सनातन परंपरा की रक्षा के लिए एकजुट होकर खड़े होने का।”