11/05/2025
बात दिसम्बर 1971 के भारत-पाक युद्ध की है. इस युद्ध का तात्कालिक कारण 1970 का पाकिस्तानी आम चुनाव था जोकि पाकिस्तान का पहला प्रत्यक्ष आम चुनाव था जिसमें अवामी लीग को पूर्ण बहुमत मिला. अवामी लीग ने कुल 300 सीटों में से पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) की 162 सामान्य सीटों में से 160 सामान्य सीटें व सभी 7 महिला सीटें जीत ली थी पीपीपी को केवल 81 सामान्य सीटें और 5 महिला सीटें मिली जो सभी पश्चिमी पाकिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) में थी. चूंकि पाकिस्तान का नियंत्रण पश्चिमी पाकिस्तान अर्थात आज के पाकिस्तान के पास था इसलिए पाकिस्तान के तत्कालीन नेताओं ने इस चुनाव परिणाम को मानने से इनकार कर दिया और पाकिस्तान की सेना ने उस वक्त बांग्लादेश के आम लोगों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया. एक अनुमान के मुताबिक करीबन 30 लाख से ज्यादा लोगों की हत्या और 2 लाख से ज्यादा महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया. इन अत्याचारों से तंग आकर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रही शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश के लोग आजादी के लिए आन्दोलन करने लगे. इससे पाकिस्तानी सेना का अत्याचार और बढ़ गया. बांग्लादेश के लोग अपनी जान बचाने के लिए भारत में घुसने लगे. भारी संख्या में बांग्लादेशी भारत में घुसते देख भारत ने अपने संप्रभुता की रक्षा के लिए और बांग्लादेशी लोगों को पाकिस्तान अत्याचारों से बचाने के लिए मजबूरी में युद्ध में कूदना पड़ा. उस वक्त रूस को छोड़कर तकरीबन सभी मजबूत राष्ट्र भारत के खिलाफ थे. 1971 के युद्ध में अमेरिका ने मजबूती से पाकिस्तान का हथियारों व पैसे से साथ दिया. अमेरिका द्वारा USS इंटरप्राइजेज नाम का परमाणु शक्ति से संचालित बेड़ा पाकिस्तान की मदद के लिए रवाना कर दिया गया था. यह उस वक्त का दुनिया का सबसे शक्तिशाली बेड़ा था जो एक बार तेल भरने के बाद पूरी दुनिया का चक्कर लगा सकता था. 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद चीन भी भारत को दोबारा घेरने की फ़िराक में था, उसने भी खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया. श्रीलंका को भी डर था कि भारत, पाकिस्तान को तोड़कर जिस प्रकार से बांग्लादेश बनाना चाहता है, वैसे ही श्रीलंका को भी तोड़कर अलग से तमिल राष्ट्र बना सकता है. श्रीलंका ने भी अपने भंडारनायके अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे से पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों को उतरने और तेल भरने की इजाज़त दे दी थी. भारत कई तरफ़ से घिरा हुआ था. उसके बावजूद भी पाकिस्तान के टुकड़े करके पाकिस्तानी लेफ्टिनेंट जनरल अमीर अब्दुल्ला खान नियाज़ी के नेतृत्व में भारतीय सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने मात्र 13 दिन में 90000 पाकिस्तानी सैनिकों का दुनियां का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण करवाया था. इस कामयाबी के पीछे सोवियत संघ (रूस) का बड़ा सहयोग था. इसके साथ-साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी ने अदम्य साहस के साथ तत्कालीन रक्षा मंत्री व मजबूत प्रशासक बाबू जगजीवन राम जी को इस पूरे अभियान की कमान सौंप दी थी. बाबूजी ने अपनी ज़बरदस्त रणनीति से पाकिस्तान को मात्र 13 दिनों में घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया लेकिन देश ने उनके योगदान को सिर्फ इसलिए भुला दिया क्योंकि देश आतंकवाद के साथ साथ जातंकवाद से भी ग्रस्त है. बाबू जगजीवन राम जी चमार जाति से थे और जातंकवादियों को यह कतई पसंद नहीं कि कथित दलित समाज के व्यक्ति की बहादुरी का महिमामंडन किया जाए क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो जातंकवाद खतरे में पड़ जाएगा. भारत की सेना विश्व की चौथी सबसे शक्तिशाली सेना है. हमें अपनी सेना पर पूर्ण भरोसा व गर्व है. वर्तमान में भारत-पाक के युद्ध के हालातों में सिर्फ़ 3 दिन में आधे-अधूरे सीजफायर से बाबू जगजीवन राम जी की याद आ गई. अगर आज वो होते तो यक़ीनन पाकिस्तान का इन 3 दिनों में ही नक्शा बदल गया होता. आज भारत कूटनीतिक रूप से कहां खड़ा है? दलितों-मुस्लिमों व कमज़ोरों को भेड़ियों की तरह झुण्ड बनाकर कूटने को कूटनीति नहीं कहते. जब तक वोटनीति जिंदा रहेगी तब तक कूटनीति मजबूत नहीं हो सकती. एक देश का दूसरे देश के साथ व्यवहार ही कूटनीति होता है. क्या 1971 की अपेक्षा आर्थिक रूप से काफ़ी मजबूत भारत की कूटनीति उतनी ही कामयाब है?
✍️ एड. जगमोहन बोधि बेगमपुरिया