Vanvasi Kalyan Ashram, Delhi

Vanvasi Kalyan Ashram, Delhi Vanvasi Kalyan Ashram, Delhi is a social service organization catering to the socio-cultural-economic development of vanvasi (janjati) people in India
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भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु वह शक्ति है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान, विवेक और स...
29/07/2026

भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु वह शक्ति है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान, विवेक और संस्कार का प्रकाश फैलाती है। इसी महान परंपरा के तहत आषाढ़ मास की शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जाता है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, गुरु-शिष्य संबंध और जीवन मूल्यों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है।

वर्षा ऋतु के प्रारंभ में मनाया जाने वाला यह पर्व प्रकृति और अध्यात्म के सुंदर समन्वय का प्रतीक है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि वर्षा ऋतु में एक स्थान पर निवास करते थे और अपने शिष्यों को वेद, उपनिषद, योग, दर्शन तथा जीवन-दर्शन का ज्ञान प्रदान करते थे। इसी परंपरा ने गुरु पूर्णिमा को भारतीय सभ्यता के सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पर्वों में स्थान दिलाया।

गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास का जन्म हुआ था। उन्होंने विशाल वैदिक ज्ञान को चार वेदों में विभाजित कर मानव समाज के लिए सरल और व्यवस्थित बनाया। महाभारत, अठारह पुराण तथा ब्रह्मसूत्र जैसे महान ग्रंथों की रचना कर उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को अमर बना दिया।

महर्षि वेदव्यास ने यह समझ लिया था कि आने वाले युगों में मनुष्य की स्मरण शक्ति और अध्ययन क्षमता सीमित होगी। इसलिए उन्होंने ज्ञान को सरल भाषा और व्यवस्थित स्वरूप में प्रस्तुत किया।

आदिगुरु शिव से बुद्ध तक ज्ञान की अखंड परंपरा

भारतीय परंपरा में भगवान शिव को आदिगुरु कहा गया है। उन्होंने सप्तऋषियों को योग और अध्यात्म का ज्ञान देकर मानव सभ्यता को दिशा दी। इसी प्रकार भगवान गौतम बुद्ध ने सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश आषाढ़ पूर्णिमा के दिन देकर करुणा, अहिंसा और मध्यम मार्ग का संदेश दिया। इस दृष्टि से गुरु पूर्णिमा भारतीय ज्ञान, योग और आध्यात्मिक चेतना का वैश्विक पर्व भी है।

गुरु का वास्तविक अर्थ

संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ अंधकार और ‘रु’ का अर्थ प्रकाश माना गया है। गुरु वह है जो अज्ञान को दूर कर विवेक और ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

संत कबीर ने भी गुरु को ईश्वर से श्रेष्ठ बताते हुए कहा –

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाँय।

बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय॥

इन पंक्तियों में गुरु को ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम बताया गया है।

माता-पिता हमारे प्रथम गुरु होते हैं। वे जीवन के प्रारंभिक संस्कार देते हैं। विद्यालय में शिक्षक ज्ञान देते हैं, जबकि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक गुरु हमारे व्यक्तित्व को निखारते हैं। एक सच्चा गुरु केवल विषय नहीं पढ़ाता, बल्कि चरित्र निर्माण, अनुशासन, नैतिकता और आत्मविश्वास का विकास भी करता है।

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है और शिक्षा व्यवस्था की आत्मा उसके गुरु होते हैं। यदि गुरु संस्कारवान, ईमानदार और समर्पित होंगे तो समाज भी उतना ही सशक्त बनेगा।

गुरु-शिष्य परंपरा के प्रेरक उदाहरण

भारतीय इतिहास गुरु-शिष्य संबंधों के अनेक प्रेरक प्रसंगों से भरा हुआ है। विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र की कथाओं के माध्यम से राजकुमारों को नीति और व्यवहार का ज्ञान दिया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के मार्गदर्शन में स्वामी विवेकानंद ने विश्व मंच पर भारतीय संस्कृति का गौरव बढ़ाया।

योग्य गुरु साधारण व्यक्ति के जीवन को असाधारण बना सकता है।

आज इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में जानकारी प्राप्त करना सरल हो गया है, लेकिन सही और गलत का विवेक, नैतिकता, मानवीय संवेदनाएँ और जीवन के मूल्य केवल गुरु ही सिखा सकते हैं। आधुनिक तकनीक ज्ञान का साधन हो सकती है, लेकिन जीवन का मार्गदर्शन गुरु ही प्रदान करते हैं।

सच्चा गुरु वही है जो स्वयं के आचरण से प्रेरणा दे, निष्काम भाव से ज्ञान बाँटे और शिष्य को आत्मनिर्भर, विवेकशील तथा समाजोपयोगी बनाए। ऐसे गुरु ही समाज और राष्ट्र के वास्तविक निर्माता होते हैं।

गुरु पूर्णिमा हमें अपने माता-पिता, शिक्षकों, मार्गदर्शकों और उन सभी व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञ होने की प्रेरणा देती है, जिन्होंने जीवन के किसी मोड़ पर हमें सही दिशा दिखाई। यह पर्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं, बल्कि ज्ञान, विनम्रता, अनुशासन और सेवा के मूल्यों को अपनाने का संकल्प भी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम गुरु-शिष्य परंपरा की गरिमा बनाए रखें और ज्ञान को केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण का आधार मानें। यही गुरु पूर्णिमा की वास्तविक सार्थकता है।

सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब वनराज।

सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय॥

कातकरी समाज के प्रथम डॉक्टरेट बने डॉ. रविंद्र भुरकुंडेमहाराष्ट्र के पालघर जिले के वाड़ा तहसील स्थित सापने गांव के निवासी...
27/07/2026

कातकरी समाज के प्रथम डॉक्टरेट बने
डॉ. रविंद्र भुरकुंडे
महाराष्ट्र के पालघर जिले के वाड़ा तहसील स्थित सापने गांव के निवासी श्री रविंद्र भुरकुंडे ने कातकरी समाज के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ते हुए पीएचडी (डॉक्टरेट) की उपाधि प्राप्त की है। वे कातकरी समाज के प्रथम व्यक्ति हैं जिन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि अर्जित कर इस विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के लिए एक प्रेरणादायी कीर्तिमान स्थापित किया है।
मुंबई विद्यापीठ से एम.ए. की शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात उन्होंने पहले राज्य पात्रता परीक्षा (SET) उत्तीर्ण की और उसके बाद पीएचडी के लिए प्रवेश लिया। वर्षों के कठोर परिश्रम, गंभीर अध्ययन और अनुसंधान के फलस्वरूप उन्होंने "आधुनिक महाराष्ट्र का कातकरी समुदाय : एक ऐतिहासिक अध्ययन (इ.स. 1972 से 2006)" विषय पर मराठी भाषा में अपना शोधकार्य पूर्ण कर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।
डॉ. रविंद्र भुरकुंडे का व्यक्तित्व केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। उनका मूल स्वभाव सामाजिक कार्य का रहा है। कातकरी समाज के स्थानांतरित (माइग्रेंट) परिवारों के बच्चों की शिक्षा बाधित न हो, इसके लिए उन्होंने छात्रावास की स्थापना कर शिक्षा और संस्कार का महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभ किया।
इसी सेवा-कार्य के दौरान उनका परिचय वनवासी कल्याण आश्रम से हुआ। वर्तमान में वे वनवासी कल्याण आश्रम, महाराष्ट्र की प्रांत कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में सक्रिय दायित्व निभा रहे हैं।
हाल ही में मध्य प्रदेश के करेली में संपन्न वनवासी कल्याण आश्रम की जागरण श्रेणी की बैठक में आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सत्येंद्र सिंह जी ने डॉ. रविंद्र भुरकुंडे जी को उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए सम्मानित किया।

जागरण श्रेणी बैठक समापन सत्र
25/07/2026

जागरण श्रेणी बैठक समापन सत्र

अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम की जागरण श्रेणी की बैठक,मध्यप्रदेश में सांगठनिक योजनानुसार महाकौशल प्रांत के संयोजन में ...
24/07/2026

अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम की जागरण श्रेणी की बैठक,मध्यप्रदेश में सांगठनिक योजनानुसार महाकौशल प्रांत के संयोजन में करेली में आज आरम्भ हुई

मेधा का सम्मान, संस्कार का अभिनंदन और राष्ट्र निर्माण का संकल्प।झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, रांची के शैक्षणिक भवन-4 स...
21/07/2026

मेधा का सम्मान, संस्कार का अभिनंदन और राष्ट्र निर्माण का संकल्प।
झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, रांची के शैक्षणिक भवन-4 स्थित सभागार में श्रीहरि वनवासी विकास समिति संबद्ध ववनवासी कल्याण केन्द्र झारखण्ड द्वारा आयोजित "मेधावी छात्र अभिनंदन समारोह" अत्यंत गरिमामय एवं प्रेरणादायी वातावरण में संपन्न हुआ।
समारोह में झारखंड के विभिन्न जिलों से आए मेधावी छात्र-छात्राओं को उनकी उत्कृष्ट शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया। यह केवल प्रतिभाओं का सम्मान नहीं था, बल्कि शिक्षा, संस्कार और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पित नई पीढ़ी के निर्माण का उत्सव था।
मुख्य अतिथि झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति प्रो. सारंग मेढेकर, विशिष्ट अतिथि भारत सरकार के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल श्री प्रशांत पल्लव, मुख्य वक्ता अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष मान्यवर श्री सत्येंद्र सिंह एवं कार्यक्रम की अध्यक्ष डॉ. तनुजा मुंडा की गरिमामयी उपस्थिति ने समारोह को विशेष ऊँचाई प्रदान की।
स्वागत संबोधन में समिति के मंत्री श्री शिवेंद्र लाल माणिक ने बताया कि श्रीहरि वनवासी विकास समिति आज झारखंड के 11 जिलों, 46 प्रखंडों और लगभग 2,000 गाँवों के 18,000 से अधिक विद्यार्थियों तक शिक्षा एवं संस्कार की ज्योति पहुँचा रही है। इस वर्ष संस्था के विद्यार्थियों का 98 प्रतिशत परीक्षा परिणाम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं सतत प्रयासों का प्रमाण है।
अपने उद्बोधन में श्री प्रशांत पल्लव ने शिक्षा के क्षेत्र में समिति के उल्लेखनीय कार्यों की सराहना करते हुए समाज और कॉरपोरेट जगत से अधिक सहयोग का आह्वान किया, ताकि यह अभियान और अधिक व्यापक बन सके।
मुख्य अतिथि प्रो. सारंग मेढेकर ने कहा कि प्रतिभाओं को उचित मंच देना समाज का दायित्व है तथा झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय ऐसे प्रेरणादायी आयोजनों के लिए सदैव प्रतिबद्ध रहेगा।
मुख्य वक्ता मान्यवर श्री सत्येंद्र सिंह ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्रवान, संस्कारित और राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों का निर्माण करना है। उन्होंने गर्व के साथ बताया कि संस्था के अनेक पूर्व विद्यार्थी आज इसरो सहित देश के प्रतिष्ठित संस्थानों, पूर्वोत्तर भारत के विकास कार्यों तथा विदेशों में अपनी प्रतिभा से भारत का गौरव बढ़ा रहे हैं।
समारोह में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को नगद पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र एवं स्मृति-चिह्न प्रदान किए गए। साथ ही वनवासी कल्याण केंद्रों से जुड़े 85 प्रतिशत या उससे अधिक अंक प्राप्त करने वाले सभी मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गया। विशेष गौरव का विषय रहा कि समिति के विद्यालयों के छात्र ओम कुमार ने 98.4% अंक प्राप्त कर राज्य में पाँचवाँ स्थान अर्जित किया।
जब शिक्षा संस्कारों से जुड़ती है, तब केवल सफल विद्यार्थी नहीं, बल्कि संवेदनशील, सक्षम और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक तैयार होते हैं। यही ऐसे आयोजनों की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
विद्या • संस्कार • सेवा • राष्ट्र निर्माण
#मेधावी_छात्र_अभिनंदन #श्रीहरि_वनवासी_विकास_समिति

"वनवासी समाज हमारी राष्ट्रीय जीवनधारा का अभिन्न अंग है; उसके बिना भारत की आत्मा अधूरी है।" - वनयोगी बालासाहब देशपांडे सं...
20/07/2026

"वनवासी समाज हमारी राष्ट्रीय जीवनधारा का अभिन्न अंग है; उसके बिना भारत की आत्मा अधूरी है।"
- वनयोगी बालासाहब देशपांडे
संस्थापक
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम

“जनजाति समाज की सेवा और जनजाति समाज हेतु सुरक्षित अधिकार के संवर्धन करने हेतु आपको विधायक सदस्य के नाते पश्चिम बंगाल में...
19/07/2026

“जनजाति समाज की सेवा और जनजाति समाज हेतु सुरक्षित अधिकार के संवर्धन करने हेतु आपको विधायक सदस्य के नाते पश्चिम बंगाल में काम करने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ है और आप अपना यह दायित्व भलीभांति निभाएंगे यह मुझे विश्वास है” ।
श्री सत्येंद्र सिंह जी
माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम

कोलकाता दिनांक 17 जुलाई 2026

पश्चिम बंगाल विधानसभा में अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षित क्षेत्र से जीत कर आए सभी विधानसभा विधायक एवं विधायिकों का पूर्वांचल कल्याण आश्रम दक्षिण बंग द्वारा आयोजित अभिनंदन समारोह में मुख्य अतिथि के नाते अपना मनोगत व्यक्त करते समय अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सत्येंद्र सिंह ने सभी का अभिनंदन एवं स्वागत करते हुए कहा पश्चिम बंगाल में इतिहास बनाने वाले सभी अनुसूचित जनजाति सदस्यों को अभिनंदन करते हुए । जनजाति समाज की उन्नति हेतु अपने कर्तव्य को सदैव स्मरण करते हुए इस स्वर्ण अवसर का पल-पल उपयोग करें । जनजाति समाज हेतु कार्यरत अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम आपको इस कार्य में हमेशा मदद करने के लिए तत्पर रहेगा ।

मई 2026 में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी बहुमत वाली सरकार गठित की है ।
कुल जीते हुए 207 उम्मीदवारों में से
जो 16 जगह अनुसूचित जनजाति हेतु आरक्षित है । उन सभी जगह पर भारतीय जनता पार्टी के 16 विधायक (2 महिला)
चुनकर आए हैं । अनुसूचित जनजाति समुदाय का एक विधायक अनारक्षित जगह से चुनकर आया है ।
ऐसे सभी 17 विधायकों का अभिनंदन एवं स्वागत कार्यक्रम वनवासी क्षेत्र में कार्यरत पूर्वांचल कल्याण आश्रम दक्षिण बंग द्वारा
दिनांक 17 जुलाई को कोलकाता स्थित आश्रम के मुख्य कार्यालय 'कल्याण भवन' में संपन्न हुआ ।
मंगलमय और गौरवपूर्ण कार्यक्रम में
12 जन प्रतिनिधि उपस्थित रहे ।
घर आया वह देवतुल्य है । उसका स्वागत करना परम भाग्य है ।इस जनजाति परंपरा अनुसार सभी के चरण धोते हुए । उन्हें सम्मान से मंच पर विराजित किया गया ।
पश्चिम बंगाल सरकार के अनुसूचित जनजाति मंत्री श्री. खुदीराम टुडू सहित लगभग सभी ने इस हृदय स्पर्शी कार्यक्रम से भाव विभोर होते हुए इस अद्भुत कार्यक्रम की सराहाना की ।
इस कार्यक्रम में विशेष रूप से अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री अतुल जोग जी, जनजाति सुरक्षा मंच के सह संयोजक डॉ राजकिशोर हांसदा, भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल के संगठन महामंत्री श्री. अमिताभ चक्रवर्ती के साथ कही गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहें ।
प्रभु श्रीराम, भारत माता और भगवान बिरसा मुंडा के चित्र मालिका को पुष्पांजलि अर्पण करते हुए कार्यक्रम का प्रारंभ हुआ ।
पश्चिम बंगाल में चल रहे वनवासी कल्याण आश्रम के बारे में प्रांत संगठन मंत्री श्री. सुशील सोरेनने वक्तव्य रखा । विपरीत परिस्थिति में भी लगातार कल्याण आश्रम जनजाति समाज के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अधिकार हेतु लगभग 1000 स्थान पर विभिन्न प्रकल्प के माध्यम से कार्यरत रहा । आने वाले दिनों में आपके द्वारा सरकार का सहयोग प्राप्त होने से हमारा जो मुख्य उद्देश्य है जनजाति समाज का सर्वांगीण विकास की गति बढ़ने में मदद होगी ।
जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक डॉक्टर हांसदा ने अपने वक्तव्य में सनातन हिंदू धर्म और जनजाति उच्चतम परंपरा कैसे एक दूसरे से बंदी है इसका विश्लेषण करते हुए जनजाति समाज को अलग करने के लिए चल रहे षड्यंत्र के बारे में भी सभी को अवगत किया ।
साथ ही धर्मान्तरित जनजाति की समस्या को लेकर हाल ही दिल्ली में संपन्न हुई जनजाति सांस्कृतिक रैली के बारे में भी जानकारी दी । साथ ही इस गंभीर विषय में चल रहे जनजाति सुरक्षा मंच के आंदोलन में सहयोग देने का आवाहन किया ।
पूर्वांचल कल्याण आश्रम द्वारा सभी को कुमकुम तिलक, पौधा, शाल, उपहार, एवं श्रीराम और हनुमान जी मिलाप की प्रतिमा भेंट दी ।
स्वागत अवसर पर
विधायकों ने अपने वक्तव्य में इस कार्यक्रम द्वारा
जनता के बीच समन्वय एवं संवाद बनाने में कल्याण आश्रम की उपयोगिता कारगिर साबित हो सकती है ऐसे विश्वास से कहा ।
अनुसूचित जनजाति विभाग मंत्री टुडू जी ने वनवासी कल्याण आश्रम का इस क्षेत्र का अनुभव और चल रहा कार्य सरकार के साथ मुझे भी अपने दायित्व निभाने में मदद रूप होगा । यह भरोसा जताया । आगे उन्होंने कहां "कल्याण आश्रम नई-नई योजना तथा कार्यक्रम सरकार के पास अवश्य लेकर आए हम उनका स्वागत करते हैं" ।
सभी का आभार पूर्वांचल कल्याण आश्रम के प्रांत के अध्यक्ष डॉक्टर चूनाराम मुर्मू जी ने किया ।
नगरवासी ग्रामवासी वनवासी हम सब भारतवासी इसका अनुभव देने वाले इस कार्यक्रम में कल्याण आश्रम के अखिल भारतीय, क्षेत्र, प्रांत पदाधिकारी एवं महानगर कार्यकर्ताओं के साथ लगभग 300 लोग उपस्थित रहे । सुमधुर स्वागत गीत, वन्देमातरम सहित
सुनियोजित व्यवस्था एवं रुचि पूर्ण भोजन के कारण कार्यक्रम की गरिमा अपने आप में विशेष रही ।

शबर जनजाति के प्रमुख देवता हैं भगवान जगन्नाथ माना जाता है कि भगवान विष्णु जब चारों धामों पर बसे अपने धामों की यात्रा पर ...
16/07/2026

शबर जनजाति के प्रमुख देवता हैं
भगवान जगन्नाथ

माना जाता है कि भगवान विष्णु जब चारों धामों पर बसे अपने धामों की यात्रा पर जाते हैं तो हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने अपने धाम बद्रीनाथ में स्नान करते हैं। पश्चिम में गुजरात के द्वारिका में वस्त्र पहनते हैं। पुरी में भोजन करते हैं और दक्षिण में रामेश्‍वरम में विश्राम करते हैं। द्वापर के बाद भगवान कृष्ण पुरी में निवास करने लगे और बन गए जग के नाथ अर्थात जगन्नाथ। पुरी का जगन्नाथ धाम चार धामों में से एक है। यहां भगवान जगन्नाथ बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं।

हिन्दुओं की प्राचीन और पवित्र 7 नगरियों में पुरी उड़ीसा राज्य के समुद्री तट पर बसा है। जगन्नाथ मंदिर विष्णु के 8वें अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। भारत के पूर्व में बंगाल की खाड़ी के पूर्वी छोर पर बसी पवित्र नगरी पुरी उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से थोड़ी दूरी पर है। आज का उड़ीसा प्राचीनकाल में उत्कल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। यहां देश की समृद्ध बंदरगाहें थीं, जहां जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, थाईलैंड और अन्य कई देशों का इन्हीं बंदरगाह के रास्ते व्यापार होता था।

पुराणों में इसे धरती का वैकुंठ कहा गया है। यह भगवान विष्णु के चार धामों में से एक है। इसे श्रीक्षेत्र, श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र, शाक क्षेत्र, नीलांचल, नीलगिरि और श्री जगन्नाथ पुरी भी कहते हैं। यहां लक्ष्मीपति विष्णु ने तरह-तरह की लीलाएं की थीं। ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसार यहां भगवान विष्णु पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतरित हुए और सबर जनजाति के परम पूज्य देवता बन गए। सबर जनजाति के देवता होने के कारण यहां भगवान जगन्नाथ का रूप कबीलाई देवताओं की तरह है। पहले कबीले के लोग अपने देवताओं की मूर्तियों को काष्ठ से बनाते थे। जगन्नाथ मंदिर में सबर जनजाति के पुजारियों के अलावा ब्राह्मण पुजारी भी हैं। ज्येष्ठ पूर्णिमा से आषाढ़ पूर्णिमा तक सबर जाति के दैतापति जगन्नाथजी की सारी रीतियां करते हैं।

पुराण के अनुसार नीलगिरि में पुरुषोत्तम हरि की पूजा की जाती है। पुरुषोत्तम हरि को यहां भगवान राम का रूप माना गया है। सबसे प्राचीन मत्स्य पुराण में लिखा है कि पुरुषोत्तम क्षेत्र की देवी विमला है और यहां उनकी पूजा होती है। रामायण के उत्तराखंड के अनुसार भगवान राम ने रावण के भाई विभीषण को अपने इक्ष्वाकु वंश के कुल देवता भगवान जगन्नाथ की आराधना करने को कहा। आज भी पुरी के श्री मंदिर में विभीषण वंदापना की परंपरा कायम है।

स्कंद पुराण में पुरी धाम का भौगोलिक वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार पुरी एक दक्षिणवर्ती शंख की तरह है और यह 5 कोस यानी 16 किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। माना जाता है कि इसका लगभग 2 कोस क्षेत्र बंगाल की खाड़ी में डूब चुका है। इसका उदर है समुद्र की सुनहरी रेत जिसे महोदधी का पवित्र जल धोता रहता है। सिर वाला क्षेत्र पश्चिम दिशा में है जिसकी रक्षा महादेव करते हैं। शंख के दूसरे घेरे में शिव का दूसरा रूप ब्रह्म कपाल मोचन विराजमान है। माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा का एक सिर महादेव की हथेली से चिपक गया था और वह यहीं आकर गिरा था, तभी से यहां पर महादेव की ब्रह्म रूप में पूजा करते हैं। शंख के तीसरे वृत्त में मां विमला और नाभि स्थल में भगवान जगन्नाथ रथ सिंहासन पर विराजमान है।

इस मंदिर का सबसे पहला प्रमाण महाभारत के वनपर्व में मिलता है। कहा जाता है कि सबसे पहले सबर जनजाति विश्‍ववसु ने नीलमाधव के रूप में इनकी पूजा की थी। आज भी पुरी के मंदिरों में कई सेवक हैं जिन्हें दैतापति के नाम से जाना जाता है।

राजा इंद्रदयुम्न ने बनवाया था यहां मंदिर : राजा इंद्रदयुम्न मालवा का राजा था जिनके पिता का नाम भारत और माता सुमति था। राजा इंद्रदयुम्न को सपने में हुए थे जगन्नाथ के दर्शन। कई ग्रंथों में राजा इंद्रदयुम्न और उनके यज्ञ के बारे में विस्तार से लिखा है। उन्होंने यहां कई विशाल यज्ञ किए और एक सरोवर बनवाया। एक रात भगवान विष्णु ने उनको सपने में दर्शन दिए और कहा नीलांचल पर्वत की एक गुफा में मेरी एक मूर्ति है उसे नीलमाधव कहते हैं। ‍तुम एक मंदिर बनवाकर उसमें मेरी यह मूर्ति स्थापित कर दो। राजा ने अपने सेवकों को नीलांचल पर्वत की खोज में भेजा। उसमें से एक था ब्राह्मण विद्यापति।

विद्यापति ने सुन रखा था कि सबर कबीले के लोग नीलमाधव की पूजा करते हैं और उन्होंने अपने देवता की इस मूर्ति को नीलांचल पर्वत की गुफा में छुपा रखा है। वह यह भी जानता था कि सबर कबीले का मुखिया विश्‍ववसु नीलमाधव का उपासक है और उसी ने मूर्ति को गुफा में छुपा रखा है। चतुर विद्यापति ने मुखिया की बेटी से विवाह कर लिया। आखिर में वह अपनी पत्नी के जरिए नीलमाधव की गुफा तक पहुंचने में सफल हो गया। उसने मूर्ति चुरा ली और राजा को लाकर दे दी।

विश्‍ववसु अपने आराध्य देव की मूर्ति चोरी होने से बहुत दुखी हुआ। अपने भक्त के दुख से भगवान भी दुखी हो गए। भगवान गुफा में लौट गए, लेकिन साथ ही राज इंद्रदयुम्न से वादा किया कि वो एक दिन उनके पास जरूर लौटेंगे बशर्ते कि वो एक दिन उनके लिए विशाल मंदिर बनवा दे। राजा ने मंदिर बनवा दिया और भगवान विष्णु से मंदिर में विराजमान होने के लिए कहा। भगवान ने कहा कि तुम मेरी मूर्ति बनाने के लिए समुद्र में तैर रहा पेड़ का बड़ा टुकड़ा उठाकर लाओ, जो द्वारिका से समुद्र में तैरकर पुरी आ रहा है। राजा के सेवकों ने उस पेड़ के टुकड़े को तो ढूंढ लिया लेकिन सब लोग मिलकर भी उस पेड़ को नहीं उठा पाए। तब राजा को समझ आ गया कि नीलमाधव के अनन्य भक्त सबर कबीले के मुखिया विश्‍ववसु की ही सहायता लेना पड़ेगी। सब उस वक्त हैरान रह गए, जब विश्ववसु भारी-भरकम लकड़ी को उठाकर मंदिर तक ले आए।

अब बारी थी लकड़ी से भगवान की मूर्ति गढ़ने की। राजा के कारीगरों ने लाख कोशिश कर ली लेकिन कोई भी लकड़ी में एक छैनी तक भी नहीं लगा सका। तब तीनों लोक के कुशल कारीगर भगवान विश्‍वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धरकर आए। उन्होंने राजा को कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी शर्त भी रखी कि वे 21 दिन में मूर्ति बनाएंगे और अकेले में बनाएंगे। कोई उनको बनाते हुए नहीं देख सकता। उनकी शर्त मान ली गई। लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी। अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी तो राजा को भी ऐसा ही लगा। सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुए राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया।

जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें 3 अधूरी ‍मूर्तियां मिली पड़ी मिलीं। भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे। राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं।

वर्तमान में जो मंदिर है वह 7वीं सदी में बनवाया था। हालांकि इस मंदिर का निर्माण ईसा पूर्व 2 में भी हुआ था। यहां स्थित मंदिर 3 बार टूट चुका है। 1174 ईस्वी में ओडिसा शासक अनंग भीमदेव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। मुख्‍य मंदिर के आसपास लगभग 30 छोटे-बड़े मंदिर स्थापित हैं।
( वेब दुनिया से साभार)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक, प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक, शिक्षाविद् एवं माँ भारती के अनन्य उपासक श्रद्धेय प...
14/07/2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक, प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक, शिक्षाविद् एवं माँ भारती के अनन्य उपासक श्रद्धेय प्रो. राजेन्द्र सिंह 'रज्जू भैया' जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटिशः नमन!

उनके आदर्श, विचार एवं सरल व्यक्तित्व हम सभी को राष्ट्रसेवा, सामाजिक समरसता और चरित्र निर्माण के पथ पर निरंतर प्रेरित करते रहेंगे।

08/07/2026

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