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29/12/2025

जून, साल 1953 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लंदन में बीबीसी को अपना टेलीविज़न इंटरव्यू दिया था. देख...

12/12/2025

प्रोजेक्ट में इन्वेस्ट करने वाला व्यापारी होता है, जबकि इंसान में इन्वेस्ट करने वाला ही असल राजनेता कहलाता है...

अफ़सोस की बात यह है कि आज के दौर में बहुत-से नेता इंसानों को इंसान की तरह नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट की तरह देखने लगे हैं। कहीं कोई इलाक़ा “प्रोजेक्ट” बना दिया जाता है, कहीं कोई क़ौम, कहीं कोई तबक़ा; और फिर उसी के हिसाब से “इन्वेस्टमेंट” तय होता है।

यहाँ नेता व्यक्ति के क़द को नहीं बढ़ाता, बल्कि अपने प्रोजेक्ट के नक़्शे पर लोगों की जगह तय करता है। जहाँ उसका फ़ायदा हो, वहाँ बड़े पैमाने पर संसाधन, वादे और तवज्ज़ो दी जाती है; जहाँ फ़ायदा न दिखे, वहाँ की आवाज़ें खामोश कर दी जाती हैं।

ऐसी सोच न सिर्फ़ जम्हूरियत (लोकतंत्र) के लिए ख़तरनाक है, बल्कि जनता के लिए प्रलयकारी सिद्ध हो सकती है। लोकतंत्र तब ही महफ़ूज़ रहता है जब नेता इंसान को इंसान समझकर उसमें भरोसा, तालीम, जागरूकता और तरक़्क़ी का निवेश करे, न कि उसे किसी प्रोजेक्ट की फ़ाइल की तरह इस्तेमाल करे।

सच्ची सियासत वही है जो दिलों में निवेश करे, न कि डाटा शीट में; जो इंसान गढ़े, प्रोजेक्ट नहीं; जो अवाम की तामीर करे, तिजारत नहीं।

Mohammad Imteyaz (Noorani)

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01/12/2025

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यह यक़ीन रखें कि आपके भीतर एक और बेहतर मैं छुपा है, बस...

मुझ को मालूम था मैं और सँवर जाऊँगा
घर से निकलूँगा तो हर सम्त बिखर जाऊँगा
राज़ मौजों के समुंदर ने बताए हैं मुझे
यहाँ डूबूँगा कहीं और उभर जाऊँगा

~पी. एस. बेताब

हमेशा यह यक़ीन रखें कि आपके भीतर एक और बेहतर मैं छुपा हुआ है; बस उसे पहचानने की ज़रूरत है। यह एक ऐसा स्वरूप है, जो वक़्त की रग-रग पहचानता है, और जो ख़ुद से सँवरने की क़ाबिलियत भी रखता है। बस आपको अपनी दहलीज़ से आगे बढ़ने की देरी है!

यक़ीन मानिए कि अगर अपने घेरा से निकले तो हर सम्त; हर राह, हर मोड़ पर अपनी मेहनत की रौशनी फैला देंगे, अपना असर छोड़ेंगे, और अपनी पहचान खुद गढ़ेंगे।

ज़िंदगी के मौजों वाले समुंदर से एक अहम राज़ सीखना चाहिए कि डूबना हमेशा हार नहीं होता, कभी–कभी यही डूबना इंसान को नई बुलंदियों तक ले जाता है।

जीवन के किसी मोड़ पर गिर भी पड़ें या
किसी लहर में बह जाएं, तो यक़ीन रखिए, कहीं और, किसी नई साहिल पर, आप पहले से ज़्यादा मज़बूत होकर उभर जाएंगे।

क्योंकि
गिरना क़िस्मत है, लेकिन उठना इख़्तियार है;और उभरना एक अज़्म, एक संकल्प है जो दिल की गहराइयों में छुपा होता है।

हर गिरावट एक नई उठान का दरवाज़ा है; जो अपनी क़ुव्वत पहचान लेता है, वह किसी भी समुंदर में डूबकर भी उभर आता है।

हमारे ज़ुनूं का नतीज़ा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा
गिरा दिया है तो साहिल पे इंतिज़ार न कर
अगर वो डूब गया है तो कहीं दूर निकलेगा

~अमीर क़ज़लबाश






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