04/02/2020
DO YOU KNOW THAT? सबसे पहले तो आप सभी से में माफी मांगता हूँ क्योंकि इस बार मेरी यह पोस्ट काफी समय के बाद आ रही है क्योंकि दोस्तो पिछले कुछ महीनों में थोड़ा एग्जाम की तयारी में लगा हुआ था तो आईये शुरू करते है !
आज में आप सभी को अकबर के ख्याबौ के शहर से वाकिफ कराने जा रहा हूँ ! जी हाँ आपने सही समझा आज में आप सभी को फतहपुर सीकरी के बारे में कुछ अनसुने अनजाने रहस्यो तथा तथ्यों से अवगत कराऊंगा !
👉👉 जब बाबर ने जब 1527 में राणा सांगा को खानवा की लड़ाई में हराया तब पहली बार बाबर ने पहली बार "सीकरी" गाँव को देखा तथा उसने इस जगह को शुक्रि(शुक्रिया) की उपाधि दी जिसका अर्थ उसने अपनी जीत का शुक्रिया अदा किया था!
👉 अकबर औलाद न होने की वजह से एक बार ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर अजमेर जा रहा था तब उससे रास्ते में शेख सलीम चिश्ती मिले तथा उन्होंने अकबर से उनके ठहरने का इंतेज़ाम वही सीकरी में कर दे तथा उसके बाद अकबर ने उनके रहने का इंतेज़ाम अच्छे से कर दिया तथा उसके बाद शेख ने उसे औलाद होने का आशीर्वाद दिया तथा उसके बाद अकबर को औलाद के रूप में जहांगीर(सलीम) का जन्म हुआ तभी से ही अकबर के मन में यह एक नगर बसाने का ख्याल आया
👉 अकबर ने फतहपुर सीकरी के किले का निमार्ण कार्य कराना शुरू कर दिया तथा 1569 में इसका निर्माण कार्य पूर्ण हुआ अकबर ने 1571 से 1585 तक इसे मुग़ल राज्य की राजधानी बना कर रखा था तथा इसके बाद अकबर ने राजधानी फतहपुर सीकरी से लाहौर परिवर्तित कर दी
👉 फतहपुर सीकरी से अकबर का बहुत गहरा लगाव था परन्तु वहाँ पर पानी की कमी को पूरा करना सबसे कठिन कार्य था तथा पानी की आपूर्ति सुलभ रूप से न होने की वजह से अकबर का फतहपुर सीकरी से दिल उतर गया तथा कीच राजनीतिक कारणों की वजह से मात्र 15 साल में ही अकबर ने अपनी राजधानी फतहपुर सीकरी से लाहौर स्थानन्तत्रित कर दी
👉फतहपुर सीकरी का महल लाल बलुआ पत्थर से बना हुई कई इमारते शामिल है जिसमे सफेद संगमरमर से बनाई गयी सिख सलीम चिश्ती की दरगाह अलग ही चमकती हुई प्रतीत होती है यह दरगाह की मानता बहुत अधिक है तथा यह पर देश-विदेश से आये सैलानी अपने लिए औलाद की कामना करने के लिए बाबा को चादर चढ़ाते है
👉फतहपुर सीकरी की सर्वोच्च इमारत बुलंद दरवाज़ा है, जिसकी ऊंचाई भूमि से 280 फुट है। 52 सीढ़ियों के पश्चात दर्शक दरवाजे के अंदर पहुंचता है। दरवाजे में पुराने जमाने के विशाल किवाड़ ज्यों के त्यों लगे हुए हैं। शेख सलीम की मान्यता के लिए अनेक यात्रियों द्वारा किवाड़ों पर लगवाई हुई घोड़े की नालें दिखाई देती हैं। बुलंद दरवाजे को, 1602 ई. में अकबर ने अपनी गुजरात-विजय के स्मारक के रूप में बनवाया था। इसी दरवाजे से होकर शेख की दरगाह में प्रवेश करना होता है। बाईं ओर जामा मस्जिद है और सामने शेख का मज़ार। मज़ार या समाधि के पास उनके संबंधियों की क़ब्रें हैं।
❤️ तो यह थे फतहपुर सीकरी के कुछ अनसुने अनजाने रहस्य जिनसे आज मेने आपको रूबरू करवाया है! जल्द ही हाज़िर होंगे ऐसे ही कुछ ऐतिहासिक रहसय व तथ्यों को लेके! जयहिंद