Main Hu Uttar Pradesh

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21/07/2026

मैं हूँ उत्तर प्रदेश । आजमगढ़ की लौंगलता का स्वाद अब तक जुबान पर है परंतु अब इस स्वाद से उभरने का समय आ गया है । आज मैं अपने जिले शामली की पलंगतोड़ मिठाई का स्वाद लेकर आपके समक्ष प्रस्तुत हूँ । इस मिठाई का नाम सुनकर आप चौंकियेगा मत । इस मिठाई का नाम भले ही अटपटा हो पर इसका स्वाद सभी को बहुत भाता है । एक जिला एक व्यंजन योजना में इस मिठाई को शामिल किया गया है । निस्संदेह इस पहल के ज़रिए इस मिठाई की पहचान और पहुँच का दायरा बढ़ेगा ।
पलंगतोड़ मिठाई मेरे पश्चिमी भागों की स्वादिष्ट और पारंपरिक मिठाई है । शामली जिला इस मिठाई के लिए विशेष रूप से जाना जाता है । इस मिठाई को खोया, चीनी, देशी घी और ढेर सारे सूखे मेवे से बनाया जाता है । इसमें बादाम, काजू, पिस्ता, चिरौंजी आदि की प्रचुर मात्रा होने के कारण यह मिठाई भरपूर ताकत और ऊर्जा प्रदान करती है । इसके स्वाद को बढ़ाने के लिए इसमें इलायची और केसर भी डाला जाता है । सामान्य बर्फी की तुलना में यह अधिक मोटी, गाढ़ी और दानेदार होती है । इसलिए इसकी कम मात्रा ही पेट को भर देती है । इसको खाने के बाद सोने का मन करता है शायद इसलिए ही इसका नाम पलंगतोड़ मिठाई पड़ा ।
इस समृद्ध स्वाद वाली मिठाई का जन्म शामली और मुजफ्फ़रनगर से जुड़ा है । इन क्षेत्रों में गन्ना, दूध और डेयरी पदार्थों का उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है । इसलिए यहाँ खोया और चीनी प्रयुक्त होने वाले उत्पाद अधिक बनते हैं । समय बीतने के साथ साथ शामली की पलंगतोड़ मिठाई यहाँ की पहचान बन गई । आज तक शामली की यह मिठाई बनाने की पारंपरिक विधि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को निरंतर हस्तांतरित होती रही है ।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पलंगतोड़ मिठाई का स्वाद और पहचान कुछ स्थानों तक ही सीमित होकर रह गई है । इसलिए जब मेरी इस मिठाई को एक जिला एक व्यंजन योजना में चयनित किया गया तब से मैं इस मिठाई की सुखद भविष्य की कल्पना करने लगा । अब इस मिठाई के कारोबार को बढ़ाने के लिए ऋण के साथ प्रति इकाई को तीन लाख रुपये तक की सब्सिडी मिलेगी । इससे छोटे निवेशकों और हलवाइयों को फायदा मिलेगा । इस मिठाई की ब्रांडिंग बढ़ने से इसकी राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर पहचान बढ़ेगी । बाज़ार में इसकी माँग बढ़ने से रोज़गार के अवसर उपलब्ध होंगे जो यहाँ के युवाओं और महिलाओं के लिए काम के बेहतर विकल्प हो सकते हैं । यह मिठाई लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है । इसलिए ई कॉमर्स प्लेटफार्मों के माध्यम से इसे देश भर में कहीं भी भेजा जा सकता है ।
शामली की पलंगतोड़ मिठाई इस क्षेत्र की पहचान है, इसलिए मैं यह चाहता हूं कि एक जिला एक व्यंजन योजना के जरिये लोगो इसके बारे में जानें । यहाँ आने वाले पर्यटक इस मिठाई के स्वाद को चखें और सराहें । पलंगतोड़ मिठाई की पौष्टिकता और पारंपरिक स्वाद का मेल सदैव ही लोगों को लुभाता रहे ।
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19/07/2026

मैं हूँ उत्तर प्रदेश । खट्टे मीठे रसीले आमों के बाद अब आज़मगढ़ की लौंगलता का स्वाद चख लेते हैं । मेरे एक जिला एक व्यंजन योजना में आज़मगढ़ की इस स्वादिष्ट मिठाई की शामिल किया गया है । यह मेरे पूर्वांचल भागों की प्रसिद्ध मिठाइयों में से एक है । लौंग से बंद की हुई यह मिठाई लोगों को बहुत भाती है । इसमें घुला हुआ लौंग का स्वाद इसे अन्य मिठाइयों से अलग बनाता है ।
यदि अतीत में देखें तो लौंगलता का संबंध मुख्य रूप से मेरे उत्तरी भागों और बंगाल से जुड़ा हुआ है । नवाबों की रसोई में इस मिठाई को विशेष स्थान मिला था । रसगुल्ला और गुलाबजमुन से पहले यह बहुत लोकप्रिय थी । समय के साथ साथ यह पूर्वांचल की मशहूर मिठाई बन गई । आज़मगढ़ के हलवाइयों ने इसमें खोया, देशी घी और मेवे डाल कर इसे स्थानीय स्वाद का बना दिया । धीरे धीरे लौंगलता का स्वाद आसपास के इलाकों तक पहुँचने लगा और इसे पसंद किया जाने लगा । अंततः लौंगलता आज़मगढ़ की पारंपरिक और लाजवाब मिठाई के रूप में विकसित हो गई ।
शुद्ध देशी घी में तैयार की जाने वाली इस मिठाई में खोया और मेवा प्रचुर मात्रा में डाला जाता है । इसका कुरकुरा आवरण और खोया- मेवे का मीठा भरावन स्वाद का अनूठा संतुलन होता है । लौंग की भीनी सुगंध इसके स्वाद को विशिष्ट बनाती है । इसको बनाने की पारंपरिक विधि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित की जाती है । विवाह, त्योहारों और धार्मिक आयोजनों पर इस मिठाई की माँग बढ़ जाती है । वर्तमान समय में आज़मगढ़ शहर और आसपास के कस्बों में लौंगलता बेचने और बनाने के सैंकड़ो प्रतिष्ठान और हलवाई हैं । स्थानीय माँग के साथ साथ इसकी आपूर्ति मऊ, जौनपुर, गाज़ीपुर, वाराणसी, गोरखपुर, लखनऊ और दिल्ली तक होती है । एक जिला एक व्यंजन योजना में शामिल होने के बाद इस मिठाई का विस्तार क्षेत्र बढ़ने की उम्मीद है । यहाँ के लौंगलता की ब्रांड वैल्यू बढ़ने से इसकी लोकप्रियता भी बढ़ेगी । इसे एक विशिष्ट पहचान भी मिलेगी । पर्यटकों के लिए भी यह यहाँ की विशेष मिठाई के तौर पर बनकर उभरेगी । उत्पादन, पैकेजिंग, विपणन और ऑनलाइन बिक्री के विस्तार से लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे । युवाओं और महिलाओं को अपने जिले में काम करने का मौका मिलेगा । आधुनिक फ़ूड ग्रेड पैकेजिंग और अधिक शेल्फ लाइफ विकसित होने से लौंगलता की बिक्री ई कॉमर्स प्लेटफार्मों के माध्यम से देश के अन्य भागों और विदेशों में भी पहुंचाया जा सकता है । इसके अलावा घी, चीनी, सूखे मेवे आदि की मांग बढ़ने से इनसे जुड़े व्यापारियों की आर्थिक स्थिति भी बेहतर होगी ।
मैं उम्मीद करता हूँ कि लौंगलता में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों के बढ़ते दाम, गुणवत्ता मानकों में कमी, बड़े नाम की मिठाइयों से प्रतिस्पर्धा आदि अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए लौंगलता व्यवसाय का प्रगति पथ निरंतर अग्रसर होता रहेगा और इसकी मिठास कभी कम नहीं होगी ।
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मैं हूँ उत्तर प्रदेश । आम का मौसम है तो मैं अमरोहा के आम को भला कैसे भूल सकता हूँ । माना कि मलिहाबाद का दशहरी आम मेरी शा...
13/07/2026

मैं हूँ उत्तर प्रदेश । आम का मौसम है तो मैं अमरोहा के आम को भला कैसे भूल सकता हूँ । माना कि मलिहाबाद का दशहरी आम मेरी शान है तो अमरोहा का चौसा और सफेदा आम भी मेरे दिल के आसपास है । अमरोहा के आम और उसके उत्पादों को एक जिला एक व्यंजन योजना में शामिल किया गया है ।
मेरे जिले अमरोहा का आम अपने स्वाद के कारण देश - विदेश भर में जाना जाता है । मेरे पश्चिमी भागों में उपजाऊ दोमट भूमि की अधिकता होने के कारण यहाँ आम की बागवानी बरसों पुरानी परंपरा रही है । इसके अलावा अनुकूल जलवायु यहाँ उच्चस्तरीय आम के पैदावार होने में सहायक रही है । मलिहाबाद , सहारनपुर, काकोरी सहित अनेक जिलों के साथ अमरोहा का भी आम के उत्पादन में प्रमुख स्थान है । मीठा, रसीला और सुगंध से भरा यह आम देश भर में यहाँ से भेजा जाता है । यहाँ दशहरी, लंगड़ा, चौसा, फ़ज़ली सहित अनेक आम की किस्में उगायी जाती हैं । यहाँ के बागों में पारंपरिक और व्यावसायिक दोनों प्रकार की किस्में उगायी जाती हैं । यहाँ से दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़, जयपुर, बंगलौर सहित अनेक महानगरों में आम भेजे जाते हैं । हाल के वर्षों में अमरोहा से आम का निर्यात बढ़ गया है । इस वर्ष भी अमरोहा में आम के बौर आते ही दुबई से लगभग 250 टन आम का ऑर्डर यहाँ के व्यापारियों को मिला । अमरोहा के आम उत्पादक क्षेत्रों में जोया, अमरोहा सदर, गजरौला क्षेत्र, धनौरा, हसनपुर, गंगेश्वरी आदि महत्वपूर्ण हैं । आज अमरोहा के आम केवल ताजे फल के रूप में ही नहीं बल्कि अनेक उत्पाद बनकर लोगों तक पहुंच रहे हैं । आम का अचार, आमचूर, आम पापड़, मैंगो जूस और सूखे आम के स्लाइस । आपको बता दूँ कि खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय को मेरे जिलों में आम प्रसंस्करण की असीम संभावनाएं दिखी हैं और उन जिलों में से एक अमरोहा भी है जहाँ आम उत्पादों को लेकर उद्योग विकसित किए जा रहे हैं ।
अमरोहा के आर्थिक परिदृश्य की बात करें तो यहाँ आम की खेती इसका महत्वपूर्ण घटक रही है । यहाँ यह एक फल नहीं बल्कि हज़ारों किसानों, मजदूरों, व्यापारियों और प्रसंस्करण से जुड़े लोगों के जीवन की धुरी है । मेरे यहाँ के आम के कुल उत्पादन में अमरोहा की उल्लेखनीय भूमिका रही है । मेरे आम उत्पादन का लगभग 3-4 प्रतिशत हिस्सा अमरोहा का है । बड़ी संख्या में किसान दशहरी, लंगड़ा, चौसा, सफेदा आदि की खेती करते हैं । आम, गन्ना और गेंहू जैसी पारंपरिक फसल की तुलना में अधिक लाभ देने वाली नकदी फसल बन चुका है । इस व्यवसाय में बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार मिलता है । बागों की देखभाल, फल तुड़ाई, छटाई ग्रेडिंग, पैकिंग, परिवहन, मंडी-व्यापार आदि के लिए बड़ी संख्या में लोग इससे जुड़कर अपनी आजीविका चलाते हैं । ग्रामीण अर्थव्यव्स्था मजबूत होती है ।
वर्तमान समय में असमय वर्षा और तेज हवाओं से बौर का नुकसान, जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव, सीमित कोल्ड स्टोरेज व आधुनिक पैक हाउस और निर्यात के लिए गुणवत्ता की मानकों को कायम रखना बड़ी चुनौतियां हैं । जिनके कारण समय समय पर आम के कारोबार में हानि होती रहती है ।
एक जिला एक व्यंजन योजना में यहाँ के आम को शामिल किया जाना एक सराहनीय क़दम है । इससे यहाँ के आम व्यवसाय को एक नयी सशक्त पहचान मिलेगी । इससे जुड़े लोगों की आय बढ़ेगी । आम के उत्पादों का क्षेत्रीय विस्तार होगा । निर्यात और निवेश के क्षेत्र में नयी संभावनाएं जगेंगी । इस योजना के अंतर्गत इस क्षेत्र में आधुनिक पैक हाउस, कोल्ड स्टोरेज, रिपेनिंग चैम्बर और आधुनिक पैकिंग की सुविधायें भी बढ़ेंगी । ब्रांडिंग के बाद अमरोहा के आम और उसके उत्पादों की बिक्री ई कॉमर्स प्लेटफार्म और सोशल मीडिया के माध्यम से देश भर में बढ़ायी जा सकती है । यह पहल सिर्फ़ आम के व्यापार की ही नहीं बल्कि यहाँ के समग्र विकास के क्षेत्र में भी बुनियादी परिवर्तन ला सकती है । यही सोच कर मैं अमरोहा के सुखद भविष्य के प्रति आशावान हूँ ।
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06/07/2026

मैं हूँ उत्तर प्रदेश l अयोध्या के राम मंदिर की चर्चा तो सभी ओर है । प्रभु राम की जन्मभूमि होने के कारण अयोध्या तो सभी के लिये प्रमुख पर्यटक स्थल बन गयी है पर इसके साथ ही यहाँ की कुरकुरी और गर्म जलेबी खट्टे मीठे दही के साथ लोगों को अपनी ओर खींच लाती है । अयोध्या नगरी सिर्फ़ पावन सरयू और मन्दिरों का शहर नहीं है बल्कि यहाँ का खानपान भी बेहद स्वादिष्ट है । बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ आते हैं और मंदिरों में दर्शन के बाद लाजवाब व्यंजनों का स्वाद चखकर तृप्त होकर वापस जाते हैं । अयोध्या में सुबह सुबह नाश्ते में कुल्हड़ में परोसी जाने वाली ताजी गर्मागर्म जलेबी और उसके ऊपर पड़ी मलाईदार दही यात्रियों को मिष्ठान की दुकानों पर रुकने के लिए विवश कर देती है । अयोध्या की कुल्हड़ जलेबी को एक जिला एक व्यंजन योजना में स्थान मिला है । यह नगरी सदैव से ही पर्यटकों के लिए आस्था का केंद्र रही है । यहाँ वर्ष भर लोगों का आना जाना लगा रहता है । इस लिए यहाँ की दही जलेबी का दायरा बहुत बढ़ गया है । देश विदेश से आने वाले श्रद्धालु भी दही जलेबी के मुरीद हो गए हैं । श्रद्धालुओं के लिए दही और जलेबी हमेशा से ही उनका पसंदीदा नाश्ता रहा है । इसको खाने के बाद शरीर में तुरंत ऊर्जा का संचार होता है । कुरकुरी और चाशनी में डूबी जलेबी स्वाद में तो बहुत स्वादिष्ट होती है परंतु स्वास्थ्य के लिए यह थोड़ी नुकसान दायक है । अतः इसका सेवन कम ही करना चाहिए । दही जलेबी अयोध्या की धार्मिक यात्रा का अभिन्न अंग बन चुकी है तो स्थानीय लोगों के लिए सुबह का पारंपरिक नाश्ता ।
अयोध्या की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रही है दही जलेबी । दही जलेबी का व्यवसाय बढ़ने से यहाँ के डेयरी उत्पादकों, हलवाई, कुम्हारों, दुकानदारों और परिवहन से जुड़े लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से काम मिला है । पर्यटकों की संख्या बढ़ने से मिठाई की दुकानों पर दही जलेबी की बिक्री बढ़ गई । यहाँ अनेक ऐसी दुकानें हैं जहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी से यही काम होता आ रहा है ।
अन्य व्यवसायों की तरह दही जलेबी के काम में भी अनेक चुनौतियाँ हैं । देश में दूध, दही, घी, चीनी, मैदा, खाद्य तेल, ईंधन सहित अनेक वस्तुओं के दाम प्रायः बढ़ते ही रहते हैं । ऐसे में छोटे व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं । एक अन्य समस्या यह भी है कि दही जलेबी जल्दी ख़राब होने वाला व्यंजन है इसलिए इसे दूर दराज के इलाकों में नहीं भेजा जा सकता है । इसलिए यह स्थानीय ग्राहकों तक ही सीमित रह गयी है । उच्च गुणवत्ता और स्वच्छता के मानकों पर कायम रहना भी बड़ी चुनौती है । यहाँ की दुकानें भी स्थानीय स्तर तक ही सीमित हैं । डिजिटल मार्केटिंग और ब्रांडिंग के अभाव में यह व्यवसाय राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय होने की होड़ में कहीं पीछे छूट गया है ।
एक जिला एक व्यंजन योजना में शामिल होने के बाद दही जलेबी व्यवसाय की प्रगति आगे बढ़ने की उम्मीदें जगी हैं । इस योजना के अंतर्गत इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को स्वच्छता और गुणवत्ता मानकों संबंधित प्रशिक्षण दिया जाएगा । उच्च स्तरीय ब्रांडिंग का लाभ दिया जाएगा । स्थानीय युवकों और महिला समूहों को इस व्यवसाय से जोड़ कर उन्हें रोजगार देने की दिशा में काम किया जाएगा ।
मैं उम्मीद करता हूं कि एक जिला एक व्यंजन योजना से दही जलेबी की मिठास में गुणवत्ता और स्वच्छता की बढ़ोतरी होने से अयोध्या की पावन यात्रा का आनंद भी बढ़ जाएगा ।
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01/07/2026

मैं हूँ उत्तर प्रदेश । शर्बतों की बात ही रही है तो मैं कन्नौज के गुलाब शर्बत के बारे में चर्चा करना आवश्यक है । कन्नौज देश की इत्र राजधानी है और इसी महक में यहाँ के शर्बत भी डूबे हैं । कन्नौज का गुलाब शर्बत अपनी प्राकृतिक सुगंध, ठंडक और पारंपरिक ढंग से बनाये जाने की वजह से जाना जाता है और यह बिना किसी केमिकल या कृत्रिम रंग के बनाया जाता है । यह शर्बत गर्मियों में शरीर और दिमाग़ को तरोताज़ा कर देता है ।
कन्नौज सिर्फ़ मेरा ही नहीं बल्कि पूरे देश की समृद्ध सुगंध का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है । यह गुलाब की पंखुड़ियों और सुगन्ध से महकता रहता है । इत्र बनाने की पारंपरिक विधियों को जानता है यह शहर । यहाँ के इत्र व्यापार के बारे में कहावत है कि यहाँ की नालियाँ भी इत्र की खुशबू से महकती रहती हैं । अगर अतीत की बात करें तो कन्नौज में गुलाब और इत्र एक दूसरे के पर्याय हैं । मुगलकाल में यहाँ गुलाब जल और इत्र निर्माण को विशेष प्रोत्साहन मिला । धीरे धीरे गुलाब का प्रयोग अन्य चीज़ों में भी होने लगा जैसे शर्बत, इत्र, गुलाब का अर्क, गुलाब जल आदि । गुलाब जल का महत्व अब लोगों को समझ में आने लगा । चाहे चेहरे पर लगाना हो या फिर आंखों में ठंडक पहुंचानी हो….हर घर में गुलाबजल पाया जाने लगा । अब इतने गुणकारी गुलाब से शर्बत भी बनाया जाने लगा । यह शर्बत गर्मियों में ताज़गी और ठंडेपन का एहसास कराता है । गर्मी से बेहाल शरीर में स्फूर्ति भर देता है । भोजन के बाद यदि गुलाब जल का सेवन किया जाता है तो यह पाचन क्रिया को भी दुरूस्त करता है । वैसे भी गुलाब की सुगंध मन को खुश कर देती है । आयुर्वेद में भी गुलाब को शीतल प्रकृति का माना गया है । इसलिए इसका शर्बत शीतलता और ताज़गी का एहसास कराता है ।
वर्तमान में गुलाब शर्बत के व्यवसाय में असीम सम्भावनायें हैं । यह सुखद पहलू है कि आज की भागती दौड़ती ज़िन्दगी में लोग फिर से प्राकृतिक चीज़ों की तरफ़ मुड़ने लगे हैं । यही कारण है कि कन्नौज के गुलाब शर्बत की ऑनलाइन डिमांड तेजी से बढ़ी है । विशेषकर गर्मियों के मौसम में यहाँ के कई गुलाब आधारित उत्पाद ई कॉमर्स प्लेटफार्मों के द्वारा देश भर में भेजे जा रहे हैं । यहाँ आने वाले पर्यटक भी कन्नौज से इत्र और शर्बत लेकर जाते हैं । गुलाब शर्बत कन्नौज की अर्थव्यवस्था का छोटा मगर महत्त्वपूर्ण हिस्सा है । यह छोटे निवेशकों के लिए व्यवसाय का उत्तम साधन है । साथ ही महिलाओं को रोजगार का सुअवसर देता है । यह शर्बत तैयार करने में यहाँ की औरतें बहुत कुशल हैं ।
हालांकि कन्नौज के गुलाब शर्बत को अन्य फ़्लेवर और सस्ते ब्रांड वाले शर्बतों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है । यही कारण है कि एक विशेष वर्ग तक ही गुलाब के शर्बतों की पहुँच है । यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अनेक गुणकारी विशेषताओं से परिपूर्ण होने के बाद भी अभी तक इस शर्बत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और प्रसिद्धि नहीं मिल सकी । इसलिए मैं चाहता हूँ कि एक जिला एक व्यंजन योजना में इन लाभकारी शर्बतों को शामिल किया जाय ताकि इनकी उपलब्धता ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक हो और सभी इनके स्वाद और गुणों का आनंद ले सकें ।
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25/06/2026

मैं हूँ उत्तर प्रदेश l ठंडाई और लस्सी के बाद अब शर्बतों के बारे में भी बात कर लेते हैं l अभी तक एक जिला एक व्यंजन योजना में किसी भी प्रकार के शर्बत को शामिल नहीं किया गया है l हालाँकि इस योजना में बलिया के सत्तू के शर्बत और कन्नौज के गुलाब के शर्बत के चयनित होने की संभावनाएं हैं परंतु अभी इस बारे में ठोस निर्णय नहीं आया है l लेकिन गर्मी के मौसम में ठंडक और ताजगी का एह्सास कराने वाले शर्बतों की चर्चा तो व्यंजनों की श्रृंखला में तो आवश्यक है l इसलिये आज मैं बलिया के सत्तू के शर्बत के बारे में बात करूंगा l
मेरे जिले बलिया का सत्तू शर्बत पूर्वांचल की खाद्य संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है l सत्तू का स्वाद ग्रामीण अंचलों से जोड़ता है l गांव की सोंधी मिट्‍टी का एहसास दिलों में भर जाता है l आपको तो पहले ही बता चुका हूँ कि मेरे देश में सत्तू का प्रयोग लगभग दो हज़ार साल पहले से ही होता आ रहा है l प्राचीन काल से ही यात्रियों, सैनिकों, तीर्थयात्रियों, किसानों, मज़दूरों के लिये यह भोजन का सबसे उपयुक्त आहार था जो लम्बे समय तक खराब नहीं होता है l सत्तू बेहद पौष्टिक होता है l कम मात्रा में ही शरीर में ऊर्जा भर देता है l मेरे पूर्वी भागों विशेषकर बलिया और उसके आसपास के क्षेत्रों में चने और जौ की खेती प्रचुर मात्रा में होती है l इसी वजह से यहाँ सत्तू खाने और इसका शर्बत बनाने का चलन तेजी से बढ़ा l गर्मी के मौसम में चिलचिलाती धूप में खेतों में काम करने वाले किसानों और मजदूरों के लिये यह शर्बत ऊर्जा और शीतलता का प्रमुख स्रोत बन गया l धीरे धीरे इसकी लोकप्रियता आम लोगों तक भी पहुंचने लगी l अब सत्तू का शर्बत घर घर बनने लगा l सत्तू के अनेक लाभकारी गुण हैं l गर्मी में यह शर्बत शरीर के तापमान को संतुलित रख कर शरीर को ठंडक पहुंचाता है l इसमें प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स खूब पाया जाता है जो शरीर की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है और उन्हें विकसित करता है l इसमें पाये जाने वाले फाइबर पाचन क्रिया में सहायक होते हैं l नमकीन सत्तू में नमक और नींबू मिलाकर पीने से गर्मियों में डिहाइड्रेशन नही होता है l बलिया का सत्तू यहाँ का एनर्जी ड्रिंक है l गर्मियों में यह शर्बत मीठे और नमकीन ....दोनो ही स्वादों में बहुत पसंद किया जाता है l सत्तू के मीठे शर्बत में चीनी या गुड़ मिलाया जाता है तो नमकीन शर्बत में काला नमक, भुना जीरा, नींबू और हरी मिर्च मिलाई जाती है l यह तरल पदार्थ लम्बे समय तक पेट को भरा रखता है l
निस्संदेह सत्तू का यह अनूठा शर्बत एक जिला एक व्यंजन योजना में स्थान पाने का हकदार है l सिर्फ स्वाद से ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य की दॄष्टि से यह एक उपयुक्त प्राकृतिक पेय है l यह ब्रांडेड और महंगे पेय पदार्थों की अपेक्षा सस्ता और स्वास्थ्यप्रद पेय है जो सभी वर्गों के लोगों को आसानी से मिल जाता है l यदि यह गुणकारी शर्बत एक जिला एक व्यंजन योजना में शामिल कर लिया जाता है तो निश्चित तौर पर इसकी राष्ट्रीय और वैश्विक पटल पर पहचान बढ़ेगी l इसकी ब्रांडिंग, पैकेजिंग और गुणवत्ता में भी सुधार होगा l मैं जानता हूँ कि बलिया का सत्तू शर्बत – मिट्‍टी की सोंधी खुशबू , परंपरा का स्वाद और सेहत का खजाना है l इसलिये बलिया के सत्तू का स्वाद कभी फीका नहीं पड़ना चाहिए l
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