03/06/2026
कदम आशा सेंटर्स के बच्चों ने अपने हाथों से 14 स्टॉल सजाए। किसी ने नींबू-शिकंजी बेची, किसी ने हाथ के बने गोलगप्पे, किसी ने झालमूड़ी।
डर नहीं, झिझक नहीं — बस आँखों में ग्राहक बुलाने का आत्मविश्वास।
बच्चों का जोश देख पैरेंट्स की छाती चौड़ी हो गई, टीचर्स की मेहनत सार्थक हो गई।
सच कहें तो आज सावदा ने सीखा — 'रोज़ी' तब बनती है जब 'खोज' का हौसला हो।