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अब से 150 वर्षअब से 150 साल बाद, आज इस पोस्ट को पढ़ने वाले हममें से कोई भी जीवित नहीं रहेगा। अभी हम जिस चीज पर लड़ रहे ह...
13/05/2024

अब से 150 वर्ष

अब से 150 साल बाद, आज इस पोस्ट को पढ़ने वाले हममें से कोई भी जीवित नहीं रहेगा। अभी हम जिस चीज पर लड़ रहे हैं उसका 70 प्रतिशत से 100 प्रतिशत पूरी तरह से भुला दिया जाएगा। शब्द को पूरी तरह से रेखांकित करें।

अगर हम अपने से 150 साल पहले की स्मृतियों में जाएं, तो वह 1872 होगा, उस समय दुनिया को अपने सिर पर उठाने वालों में से कोई भी आज जीवित नहीं है। इसे पढ़ने वाले हममें से लगभग सभी को उस युग के किसी भी व्यक्ति के चेहरे की कल्पना करना मुश्किल होगा।

थोड़ी देर रुकें और कल्पना करें कि कैसे उनमें से कुछ ने अपने रिश्तेदारों को धोखा दिया और दर्पण के एक टुकड़े के लिए उन्हें दास के रूप में बेच दिया। कुछ लोगों ने ज़मीन के एक टुकड़े या रतालू या कौड़ियों के कंद या एक चुटकी नमक के लिए परिवार के सदस्यों को मार डाला। वह रतालू, कौड़ी, दर्पण, या नमक कहाँ है जिसका उपयोग वे डींगें हांकने के लिए कर रहे थे? यह अब हमें अजीब लग सकता है, लेकिन हम इंसान कभी-कभी कितने मूर्ख होते हैं, खासकर जब बात पैसे, ताकत या प्रासंगिक बनने की कोशिश की आती है!

यहां तक कि जब आप दावा करते हैं कि इंटरनेट युग आपकी याददाश्त को सुरक्षित रखेगा, उदाहरण के तौर पर माइकल जैक्सन को लें। आज से ठीक 13 साल पहले 2009 में माइकल जैक्सन की मौत हो गई थी. कल्पना कीजिए कि जब माइकल जैक्सन जीवित थे तो उनका पूरी दुनिया पर कितना प्रभाव था। आज के कितने युवा उन्हें विस्मय के साथ याद करते हैं, यानी क्या वे उन्हें जानते भी हैं? आने वाले 150 वर्षों में, जब भी उनके नाम का उल्लेख किया जाएगा, बहुत से लोगों के लिए कोई घंटी नहीं बजेगी।

आइए जीवन को आसान बनाएं, इस दुनिया से कोई भी जीवित नहीं जाएगा। . . जिस भूमि के लिए आप लड़ रहे हैं और मरने-मारने को तैयार हैं, उस भूमि को किसी ने छोड़ दिया है, वह व्यक्ति मर चुका है, सड़ चुका है, और भुला दिया गया है। वही तुम्हारा भी भाग्य होगा. आने वाले 150 वर्षों में, आज हम जिन वाहनों या फ़ोनों का उपयोग डींगें हांकने के लिए कर रहे हैं उनमें से कोई भी प्रासंगिक नहीं रहेगा। बाइको, जीवन को आसान बनाओ!

प्रेम को नेतृत्व करने दो। आइए एक-दूसरे के लिए सचमुच खुश रहें। कोई द्वेष नहीं, कोई चुगली नहीं. कोई ईर्ष्या नहीं. कोई तुलना नहीं। जीवन कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है. दिन के अंत में, हम सभी दूसरी ओर चले जायेंगे। यह सिर्फ एक सवाल है कि वहां पहले कौन पहुंचता है, लेकिन निश्चित रूप से हम सभी एक दिन वहां जाएंगे।

पुरू और सिकंदर (अलेक्जेंडर) विदेशी इतिहासकार की कलम से।।।।सिकन्दर ने नहीं महाराजा पुरु ने सिकन्दर को हराया था...सिकंदर अ...
10/01/2024

पुरू और सिकंदर (अलेक्जेंडर) विदेशी इतिहासकार की कलम से।।।।
सिकन्दर ने नहीं महाराजा पुरु ने सिकन्दर को हराया था...

सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् अपने सौतेले व चचेरे भाइयों को कत्ल करने के बाद मेसेडोनिया के सिंहासन पर बैठा था। अपनी महत्वाकांक्षा के कारण वह विश्व विजय को निकला। अपने आसपास के विद्रोहियों का दमन करके उसने ईरान पर आक्रमण किया, ईरान को जीतने के बाद गोर्दियास को जीता। गोर्दियास को विजय के बाद टायर को नष्ट कर डाला। बेबीलोन को विजय कर पूरे राज्य में आग लगवा दी। बाद में अफगानिस्तान के क्षेत्र को रोंद्ता हुआ सिन्धु नदी तक चढ़ आया।

सिकंदर को अपनी जीतों से घमंड होने लगा था। वह अपने को ईश्वर का अवतार मानने लगा, तथा अपने को पूजा का अधिकारी समझने लगा। परंतु भारत में उसका वो मान मर्दन हुआ जो कि उसकी मृत्यु का कारण बना।

सिन्धु को पार करने के बाद भारत के तीन छोटे छोटे राज्य थे।
१. तक्षशिला जहाँ का राजा अम्भी था,
२. पोरस,
३. अम्भिसार जो कि कश्मीर के चारो और फैला हुआ था। अम्भी का पुरु से पुराना बैर था, इसलिए उसने सिकंदर से हाथ मिला लिया।

अम्भिसार ने भी तटस्थ रहकर सिकंदर की राह छोड़ दी, परंतु पुरु ने सिकंदर से दो दो हाथ करने का निर्णय कर लिया।
आगे के युद्ध का वर्णन में यूरोपीय इतिहासकारों के अनुसार।
सिकंदर ने आम्भी की साहयता से सिन्धु पर एक स्थायी पुल का निर्माण कर लिया।

प्लुतार्च( Plutarch)के अनुसार:- 20,000 पैदल व 15000 घुड़सवार सिकंदर की सेना पुरु की सेना से बहुत अधिक थी, तथा सिकंदर की साहयता आम्भी की सेना ने भी की थी।

कर्तियास(Cartiyas )लिखता है कि:- सिकंदर झेलम के दूसरी और पड़ाव डाले हुए था। सिकंदर की सेना का एक भाग झेलम नदी के एक द्वीप में पहुच गया। पुरु के सैनिक भी उस द्वीप में तैरकर पहुच गए। उन्होंने यूनानी सैनिको के अग्रिम दल पर हमला बोल दिया। अनेक यूनानी सैनिको को मार डाला गया। बचे कुचे सैनिक नदी में कूद गए और उसी में डूब गए। बाकि बची अपनी सेना के साथ सिकंदर रात में नावों के द्वारा हरनपुर से 60 किलोमीटर ऊपर की और पहुच गया। और वहीं से नदी को पार किया। वहीं पर भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में पुरु का बड़ा पुत्र वीरगति को प्राप्त हुआ।

एरियन(Arien )लिखता है कि:-भारतीय युवराज ने अकेले ही सिकंदर के घेरे में घुसकर सिकंदर को घायल कर दिया और उसके घोडे 'बुसे फेलास' को मार डाला।

ये भी कहा जाता है की पुरु के हाथी दल दल में फंस गए थे, तो कर्तियास लिखता है कि:- इन पशुओं ने घोर आतंक पैदा कर दिया था। उनकी भीषण चीत्कार से सिकंदर के घोडे न केवल डर रहे थे बल्कि बिगड़कर भाग भी रहे थे। अनेको विजयों के ये शिरोमणि अब ऐसे स्थानों की खोज में लग गए जहाँ इनको शरण मिल सके। सिकंदर ने छोटे शास्त्रों से सुसज्जित सेना को हाथियों से निपटने की आज्ञा दी। इस आक्रमण से चिड़कर हाथियों ने सिकंदर की सेना को अपने पावों में कुचलना शुरू कर दिया।

वह आगे लिखता है कि:- सर्वाधिक ह्रदयविदारक द्रश्य यह था कि यह मजबूत कद वाला पशु यूनानी सैनिको को अपनी सूंड से पकड़ लेता व अपने महावत को सोंप देता और वो उसका सर धड से तुंरत अलग कर देता। इसी प्रकार सारा दिन समाप्त हो जाता और युद्ध चलता ही रहता।

इसी प्रकार हिरोडोटस (Herodotus )लिखता है कि:- हाथियों में अपार बल था और वे अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुए। अपने पैरों के तले उन्होंने बहुत सारे यूनानी सैनिको को चूर चूर कर दिया।

कहा जाता है की पुरु ने अनाव्यशक रक्तपात रोकने के लिए सिकंदर को अकेले ही निपटने का प्रस्ताव रक्खा था। परन्तु सिकंदर ने भयातुर उस वीर प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।

इथोपियाई महाकाव्यों का संपादन करने वाले श्री इ० ए० दब्ल्यु० बैज लिखते है कि:- जेहलम के युद्ध में सिकंदर की अश्व सेना का अधिकांश भाग मारा गया। सिकंदर ने अनुभव किया कि यदि में लडाई को आगे जारी रखूँगा, तो पूर्ण रूप से अपना नाश कर लूँगा। अतः उसने युद्ध बंद करने की पुरु से प्रार्थना की। भारतीय परम्परा के अनुसार पुरु ने शत्रु का वद्ध नही किया। इसके पश्चात संधि पर हस्ताक्षर हुए और सिकंदर ने पुरु को अन्य प्रदेश जीतने में सहायता की।

बिल्कुल साफ़ है की प्राचीन भारत की रक्षात्मक दीवार से टकराने के बाद सिकंदर का घमंड चूर हो चुका था। उसके सैनिक भी डरकर विद्रोह कर चुके थे। तब सिकंदर ने पुरु से वापस जाने की आज्ञा मांगी। पुरु ने सिकंदर को उस मार्ग से जाने को मना कर दिया जिससे वह आया था। और अपने प्रदेश से दक्षिण की ओर से जाने का मार्ग दिया।

जिन मार्गो से सिकंदर वापस जा रहा था, उसके सैनिको ने भूख के कारण राहगीरों को लूटना शुरू कर दिया। इसी लूट को भारतीय इतिहास में सिकंदर की दक्षिण की ओर की विजय लिख दिया। परंतु इसी वापसी में मालवी नामक एक छोटे से भारतीय गणराज्य ने सिकंदर की लूटपाट का विरोध किया। इस लडाई में सिकंदर बुरी तरह घायल हो गया।

प्लुतार्च लिखता है कि:- भारत में सबसे अधिक खूंखार लड़ाकू जाति मलावी लोगो के द्वारा सिकंदर के टुकड़े-टुकड़े होने ही वाले थे, उनकी तलवारे व भाले सिकंदर के कवचों को भेद गए थे। और सिकंदर को बुरी तरह से आहात कर दिया। शत्रु का एक तीर उसका बख्तर पार करके उसकी पसलियों में घुस गया। सिकंदर घुटनों के बल गिर गया। शत्रु उसका शीश उतारने ही वाले थे की प्युसेस्तास व लिम्नेयास आगे आए। किंतु उनमे से एक तो मार दिया गया तथा दूसरा बुरी तरह घायल हो गया।

इसी भरी बाजार में सिकंदर की गर्दन पर एक लोहे की लाठी का प्रहार हुआ और सिकंदर अचेत हो गया। उसके अंगरक्षक उसी अवस्था में सिकंदर को निकाल ले गए। भारत में सिकंदर का संघर्ष सिकंदर की मृत्यु का कारण बन गया।

अपने देश वापस जाते हुए वह बेबीलोन में रुका। भारत विजय करने में उसका घमंड चूर चूर हो गया। इसी कारण वह अत्यधिक मद्यपान करने लगा और ज्वर से पीड़ित हो गया। तथा कुछ दिन बाद उसी ज्वर (बुखार) ने उसकी प्राण ले ली।

स्पष्ट रूप से पता चलता है कि सिकंदर भारत के एक भी राज्य को नही जीत पाया। परंतू पुरु से इतनी मार खाने के बाद भी इतिहास में जोड़ दिया गया कि सिकंदर ने पुरु पर जीत हासिल की। भारत में भी महान राजा पुरु की जीत को पुरु की हार ही बताया जाता है। यूनान सिकंदर को महान कह सकता है लेकिन भारतीय इतिहास में सिकंदर को नही बल्कि उस पुरु को महान लिखना चाहिए जिन्होंने एक विदेशी आक्रान्ता का मानमर्दन किया।

अधिक जानकारी के पिपासु, शोध संकलनो से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। एवम "ALEXANDER" नामक हॉलीवुड की मूवी भी देख सकते हैं।

श्रीरामचंद्र जी की सेना का वर्णन:1 सेनापति के नीचे = 1100 सैनिक 1 पद्म = 1000000000000000अब श्रीराम सेना में 18 पद्म तो ...
15/12/2023

श्रीरामचंद्र जी की सेना का वर्णन:

1 सेनापति के नीचे = 1100 सैनिक
1 पद्म = 1000000000000000
अब श्रीराम सेना में 18 पद्म तो सिर्फ सेनापति हैं

तो गुणा-भाग कर लो कि भगवान श्रीराम की सेना कितनी विशाल होगी

रावण ने श्रीराम जी की सेना का भेद जानने के लिए जो गुप्तचर भेजे थे, उनका और रावण का संवाद इस प्रकार है।

चौपाई:
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥2॥

भावार्थ: -हे दशग्रीव! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरों के सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेना में ऐसा कोई वानर नहीं है, जो आपको रण में न जीत सके॥2॥

चौपाई:
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥3॥

भावार्थ: -सब के सब अत्यंत क्रोध से हाथ मीजते हैं। पर श्री रघुनाथजी उन्हें आज्ञा नहीं देते। वे कह रहे हैं हम मछलियों और साँपों सहित समुद्र को सोख लेंगे। नहीं तो बड़े-बड़े पर्वतों से उसे भरकर पूर (पाट) देंगे॥3॥

चौपाई:
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥4॥

भावार्थ: -और रावण को मसलकर धूल में मिला देंगे। सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे हैं। सब सहज ही निडर हैं, इस प्रकार गरजते और डपटते हैं मानो लंका को निगल ही जाना चाहते हैं॥4॥

दोहा :
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥55॥

भावार्थ: -सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर हैं फिर उनके सिर पर प्रभु (सर्वेश्वर) श्री रामजी हैं। हे रावण! वे संग्राम में करोड़ों कालों को जीत सकते हैं॥55॥

जय सियाराम जय जय श्रीराम
जय हनुमान जय हनुमान
मंगल ही मंगल जय श्रीराम

बिना किसी सेटेलाइट या बिना किसी दूरबीन के महर्षि पाराशर ने आज से 5700 वर्ष पूर्व इन सप्तर्षि तारा मंडल पर सटीक जानकारी अ...
18/11/2023

बिना किसी सेटेलाइट या बिना किसी दूरबीन के महर्षि पाराशर ने आज से 5700 वर्ष पूर्व इन सप्तर्षि तारा मंडल पर सटीक जानकारी अपने ग्रंथ में दी थी। महर्षि पाराशर ज्योतिष शास्त्र के महान ऋषि थे।
उन्होंने ही सप्तर्षि तारा मंडल की सभी जानकारी दी है। आज तक नासा या दुनिया की कोई स्पेस एजंसी वहां तक नहीं पहुच पाई। पाराशर मुनि ने अपने ग्रंथ में लिखा है कि सप्तर्षि में कश्यप नाम से एक तारा है जिसमें हमारा सूर्य उत्पन्न हुआ है। इसलिए आज भी हिन्दू सूर्य को कश्यपनंदन मानते हैं।
हालांकि आज तक दुनिया की किसी भी वैज्ञानिक संस्था ने इस पर अभी खोज भी शरू नहीं की। यदि भविष्य में सूर्य के बारे में ऐसी बात सामने आती है तो हम भारतीय सनातनियों को आश्चर्य नहीं होगा लेकिन आज भी भारत के कश्मीर व हिमाचल प्रदेश में एक सवंत चलती है जिसे लौकिक सवंत कहते हैं। जो सप्तर्षि तारा मंडल के आधार पर चलती है। लौकिक सवंत यानी सप्तर्षि तारा मंडल एक नक्षत्र में जाते हैं। 27 नक्षत्र का एक चक्र पूर्ण करने में 2700 वर्ष लगते हैं तब यह लौकिक सवंत का एक साल पूरा होता है। यानी कि हमारे पृथ्वी पर 2700 वर्ष निकल जाएं तब सप्तर्षियों का एक वर्ष बनता है।
वर्तमान में सप्तर्षि रोहिणी नक्षत्र में है जो 1948 में रोहिणी नक्षत्र में आए थे। अब 19 जनवरी 2048 रविवार को वसंत पंचमी के दिन अश्विन नक्षत्र में आएंगे। अभी रोहिणी नक्षत्र में हैं जो 27 में से चौथा नक्षत्र है।

सहारा श्री की अंतिम क्रिया में नहीं शामिल हुए उनकी पत्नी व दोनों पुत्र... यह सिर्फ खबर भर नहीं है यह आईना है जीवन का जिस...
18/11/2023

सहारा श्री की अंतिम क्रिया में नहीं शामिल हुए उनकी पत्नी व दोनों पुत्र... यह सिर्फ खबर भर नहीं है यह आईना है जीवन का जिसमें हमें और आपको अपनी छवि गौर से देखनी चाहिए ।

सुब्रत रॉय अर्थात् सहारा श्री आज पंचतत्व में विलीन हो गए । उनके पोते ने उन्हें मुखाग्नि दी । उनके अंतिम क्रिया के वक्त उनके हजारों शुभचिंतक नजर आये । उनके मित्र, स्टॉफ, राजनेता से लेकर फिल्मी दुनिया की हस्तियां तक... अगर कोई उनकी अंतिम यात्रा के वक्त नहीं दिखे तो वे थीं उनकी पत्नी और उनके दोनों बेटे...

यह वही सहारा श्री थे जिनके कारोबार की धाक कभी पूरी दुनिया भर में फैली थी चिट फण्ड, सेविंगस फाइनेंस, मीडिया , मनोरंजन, एयरलाइन, न्यूज़, होटल, खेल,‌ भारतीय क्रिकेट टीम का 11 साल तक स्पान्सर, वगैरह वगैरह...
ये वही सहारा श्री थे जिनकी महफिलों में कभी राजनेता से लेकर अभिनेता और बड़ी बड़ी हस्तियां दुम हिलाते नजर आते थे...
ये वही सहारा श्री थे जिन्होंने अपने बेटे सुशान्तो-सीमांतो की शादी में 500 करोड़ से भी अधिक खर्च किए थे ।

ऐसा भी नहीं था कि सहारा श्री ने अचानक दम तोड़ा ! उन्हें कैंसर था और उनके परिवार के हरेक सदस्य को उनकी मौत का महीना पता होगा लेकिन तब भी अंतिम वक्त में उनके साथ, उनके पास परिवार का कोई सदस्य नहीं था...! बेटों ने उनके शव को कांधा तक नहीं दिया...!
तो, यही सच्चाई है जीवन की । जिनके लिए आप जीवन भर झूठ-सच करके कंकड़-पत्थर जमा करते हैं... जिनके लिए आप जीवन भर हाय-हाय करते रहते हैं... जिनकी खुशी के लिए आप दूसरों की खुशी छीनते रहते हैं... जिनका घर बसाने के लिए आप हजारों घर उजाड़ते हैं... जिनकी बगिया सजाने और चहकाने के लिए आप प्रकृति तक की ऐसी तैसी करने में बाज नहीं आते...
वे पुत्र और वह परिवार आपके लिए, अंतिम दिनों में साथ तक नहीं रह पाते !

* #कभी_ठहरकर_सोचे*☝️

कृष्णावल....!!!यदि आज की आधुनिक शिक्षा प्राप्त पीढ़ी से आप पूछें कि "कृष्णावल" क्या है तो संभव है कि ९८ % तो यही कहेंगे ...
14/11/2023

कृष्णावल....!!!

यदि आज की आधुनिक शिक्षा प्राप्त पीढ़ी से आप पूछें कि "कृष्णावल" क्या है तो संभव है कि ९८ % तो यही कहेंगे कि उन्होंने यह शब्द सुना कभी सुना ही नहीं है।
पर यदि आप दादी नानी से पूछें या पचास वर्ष पूर्व के लोगों से पूछें तो वे आपको बता देंगे कि गाँव में "कृष्णावल" प्याज या पालंडु को कहा जाता है। और यह शब्द ही प्याज के लिए प्रचलित था उस समय में।
प्याज को ग्रामीण क्षेत्रों में कांदा भी कहते हैं।
अंग्रेजी में इसे Onion 🧅 ऑनियन या अन्यन कहते हैं। यह कंद श्रेणी में आता है जिसकी सब्जी भी बनती है और इसे सब्जी बनाने में मसालों के साथ उपयोग भी किया जाता है।
इसे संस्कृत में कृष्णावल कहते थे।
वैसे इस शब्द को विस्मृत कर दिया गया है और आजकल यह शब्द प्रचलन में नहीं है।
कृष्‍णावल कहने के पीछे एक रहस्य छुपा हुआ है।
आईए, देखिए कि प्याज को क्यों कहते हैं कृष्णावल.!

१. दक्षिण भारत में खासकर कर्नाटक और तमिलनाडु के ग्रामीण क्षेत्रों में प्याज को आज भी कृष्णावल नाम से ही जाना जाता है।
२. इसे कृष्णवल कहने का तात्पर्य यह है कि जब इसे खड़ा काटा जाता है तो वह शङ्खाकृति यानी शङ्ख के आकार में दिखता है।
वहीं जब इसे आड़ा काटा जाता है तो यह चक्राकृति यानी चक्र के आकार में दिखाई देता है।
३. आप जानते ही हैं कि शङ्ख और चक्र दोनों श्री हरि विष्णु के आयुधों में से हैं और श्री कृष्ण जी श्री हरि के दशावतार में ही पूर्णावतार (नवें अवतार) हैं।
४. शङ्ख और चक्र की आकृतियों के कारण ही प्याज को कृष्णावल कहते हैं।
कृष्ण और वलय शब्दों को मिलाकर बना "कृष्णावल" शब्द है।
५. कृष्णावल कहने के पीछे केवल यही एक कारण नहीं है ; अपितु यदि आप प्याज को उसकी पत्तियों के साथ उलटा पकड़ेंगे तो वह गदा का भी रूप ले लेता है।
यह भी रोचक है कि यदि पत्तों के काट दिया जाए तो वह पद्म यानी कमल का आकार लेता है।
गदा और पद्म भी भगवान श्री हरि विष्णु के आयुध हैं जिसे वे चक्र और शङ्ख के साथ धारण करते हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना ही है कि आजकल किन्नर जैसा रूप धरे कथित धार्मिक कथावाचक, जो केवल अपने आप को ही धर्म का झण्डावरदार समझते हैं ; इस कृष्णावल की निंदा में अनर्गल बातें करते हैं और घृणित शब्दों से इसे लांछित कर रहे हैं।
साभार/संशोधन/संकलन

17/10/2023

1990 के अंत में एक विकेटकीपर के लिए भारतीय टीम तरसती थी। तीन चार साल तो द्रविड़ से ही कीपिंग करा दी। आज ईशांत किशन जैसे खिलाड़ी तो बाहर बैठे हैं। एक ऑलराउंडर नहीं होता था। बचे हुए 10 ओवर बल्लेबाज फेंकते थे। आज तीन ऑलराउंडर टीम में है।

खेल में हार-जीत होती है 10 साल से हमने भी कोई आईसीसी टूर्नामेंट नहीं जीते। लेकिन भारतीयों का एटीट्यूड बदला है। तीन महीने पहले हम चांद पर जा रहे थे, पिछले महीने हम जी 20 की मेजबानी कर रहे थे, इस महीने पहली बार एशियन गेम्स में 100 से ज्यादा पदक जीते हैं।

यह जावेद मियादांद, आमिर सौहेल या शोएब अख्तर का टाइम नहीं है। पाकिस्तान तब भी हारी थी लेकिन आज मैच हारने के बाद बाबर आजम कोहली की ऑटेग्रॉफ वाली टी शर्ट ले रहा होता है।

भारतीयों को पूरा एटीट्यूड बदल रहा है
वो झुके हुए कंधे वाला, रक्षात्मक रवैये से निकलकर भारतीय हर दिन, हर महीने, हर साल अपनी ताकत पहचान रहे हैं।

100 साल पहले हम इतने आत्महीन थे कि तुर्की के खलीफा के लिए खिलाफत आंदोलन चला रहे थे। मेज पर बैठकर 20-25 नेता हमारी मातृभूमि का बंटवारा कर दे रहे थे और जनता को पता तक नहीं था।

आज फिलस्तीन-इजरायल में जो हो रहा है
उसमें भी भारत से लेकर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया तक बसे भारतीयों को पता है अपना पक्ष कौन सा है।

अगले 25 साल में भारत अलग ही ताकत होगा
बस हम छोटे व्यक्तिगत लालच में बड़े नुकसान न कर बैठे।

रिश्तों को लेकर बहुत कठोर मापदंड मत बनाइए। सामने वाले को एक-एक चीज़ पर परखिये मत। हो सकता है कोई दोस्त बहुत बौद्धिक हो म...
25/08/2023

रिश्तों को लेकर बहुत कठोर मापदंड मत बनाइए। सामने वाले को एक-एक चीज़ पर परखिये मत। हो सकता है कोई दोस्त बहुत बौद्धिक हो मगर तारीफ करना न जानता हो। हो सकता है कोई ईर्ष्या करता है मगर सबसे सही सलाह भी वही देता हो। सामने वाली एक-एक प्रतिक्रिया पर उसे स्कोर मत दीजिए। उसके हर रिएक्शन पर उसका रिपोर्ट कार्ड तैयार मत कीजिए।

संभव है कि जब वो आपकी किसी खुशी पर बहुत खुश न हुआ तब वो खुद किसी गहरे दुख से गुज़र रहा हो। आप ये सोचकर नाराज़ हो गए कि वो इतना खुश क्यों नहीं हुआ और उसने ये सोचकर अपना दुख बयां नहीं किया कि आपकी खुशी में भंग न पड़ जाए। वो दुखी हो कर आपकी खातिर खुश होने का अभिनय कर रहा है और आप इस बात पर नाराज़ हो गए कि आपकी इतनी बड़ी खुशी में भी वो सिर्फ खुश होने का अभिनय कर रहा है।

इंसान सामान भी खरीदता है तो चीज़ बहुत अच्छी लगने पर उसकी कुछ कमियों से समझौता कर लेता है। मोबाइल का कैमरा अच्छा है तो उसे खरीद लिया ये जानते हुए कि उसकी बैटरी वीक है। टी शर्ट के बाजू पर कंपनी का लोगो पसंद नहीं आया मगर टी शर्ट का Colour पसंद है, तो बाजू पर बने लोगो को इग्नोर कर दिया। मगर हम इंसानों के साथ ऐसा कोई समझौता नहीं करते। कपड़ों की तरह उन्हें कोई रियायत नहीं देते।

वो इंसान जो किसी कंप्यूटर प्रोग्राम से नहीं, भावनाओं से चलता है। वो इंसान जो कमज़ोर है। आत्म संशय से घिरा है। उस इंसान को हम किसी संदेह का लाभ नहीं देना चाहते। सारी माफियां खुद के लिए बचाकर रखते हैं। छोटी-छोटी बातें बुरा लगने पर सालों पुराने रिश्तों में पीछे हट जाते हैं। बातचीत बंद कर लेते हैं और खुद ही खुद को अकेला करते जाते हैं। कुछ वक्त बाद नाराज़गी पिघल कर हवा हो जाती है। सामने वाले के साथ गुज़ारा वक्त याद आने लगता है। खाली वक्त में उसे मिस भी करते हैं। मगर उससे बात करने की पहल नहीं कर पाते।

अकेलापन आज दुनिया की सबसे बड़ी बीमारी है। डिप्रेशन सबसे बड़ा रोग है और ये रोग हमने खुद अर्जित किया हैं, क्योंकि हम लोगों को तब तक पास नहीं करते जब तक कि वो रिश्तों में दस बटा दस नंबर न ले आएं।

23/08/2023

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15/08/2023

स्वतंत्रता दिवस की ढेरो शुभकामनाए 🇮🇳

मेरी माँ कहती है एक स्त्री का सौन्दर्य उसके पति के लिए होता है, फिर मुझे आज तक ये समझ नहीं आयी कि ये स्त्रियाँ अपना नग्न...
23/07/2023

मेरी माँ कहती है एक स्त्री का सौन्दर्य उसके पति के लिए होता है, फिर मुझे आज तक ये समझ नहीं आयी कि ये स्त्रियाँ अपना नग्न शरीर अपने पति के अलावा किसको और क्यूँ और किस लिए दिखाती हैं??

हमारे धर्म में तो अपने पति परमेश्वर के अलावा गैर पुरुष के लिए प्रेम होना या सोचना भी पाप माना जाता है या अपने पति के अलावा गैर से नजरें मिलाना भी हमारे लिए पाप है।


लड़कियो के अनावश्यक नग्नता वाली पोशाक में घूमने पर तर्क है, इन कपड़ो के पीछे कुछ लड़किया कहती है कि हम क्या पहनेगे ये हम तय करेंगे, पुरुष नहीं.....जी बहुत अच्छी बात है, आप ही तय करे, लेकिन कुछ पुरुष भी कहते है हम किस लड़कियों का सम्मान/मदद करेंगे ये भी हम तय करेंगे, स्त्रीया नहीं, और हम किसी का सम्मान नहीं करेंगे इसका अर्थ ये नहीं कि हम उसका अपमान करेंगे।

फिर कुछ विवेकहीन लड़किया कहती है कि हमें आज़ादी है अपनी ज़िन्दगी जीने की, जी बिल्कुल आज़ादी है,ऐसी आज़ादी सबको मिले, व्यक्ति को चरस गंजा ड्रग्स ब्राउन शुगर लेने की आज़ादी हो, मांस खाने की आज़ादी हो,वैश्यालय जाने और खोलने की आज़ादी हो, हर तरफ से व्यक्ति को आज़ादी हो हमें औरतो से क्या समस्या है??

लड़को को संस्कारो का पाठ पढ़ाने वाला कुंठित स्त्री समुदाय क्या इस बात का उत्तर देगी, की क्या भारतीय परम्परा में ये बात शोभा देती है की एक लड़की अपने भाई या पिता के आगे अपने निजी अंगो का प्रदर्शन बेशर्मी से करे???

क्या ये लड़किया पुरुषो को भाई/पिता की नज़र से देखती है ??? जब ये खुद पुरुषो को भाई/पिता की नज़र से नहीं देखती तो फिर खुद किस अधिकार से ये कहती है की "हमें माँ/बहन की नज़र से देखो??

?? भारत में तो ऐसा कभी नहीं होता था। सत्य ये है की अश्लीलता को किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता। ये कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधो की तरफ ले जाने वाली एक नशे की दूकान है। और इसका उत्पादन स्त्री समुदाय करती है।

मष्तिष्क विज्ञान के अनुसार 4 तरह के नशो में एक नशा अश्लीलता भी है। अगर ये नग्नता आधुनिकता का प्रतीक है तो फिर पूरा नग्न होकर स्त्रीया अत्याधुनिकता का परिचय क्यों नहीं देती??

गली गली और हर मोहल्ले में जिस तरह शराब की दुकान खोल देने पर बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है उसी तरह अश्लीलता समाज में यौन अपराधो को जन्म देती है।

√मेरा मकसद किसी का दिल दुखना नही है सभी को अपना जीवन अपने तरीके से जीने का अधिकार है बस तरीका सही होना चाहिए। क्योंकि गलत तरीके से इज्जत और सम्मान का आशा नहीं किया जा सकता।

🙏💕
साभार वन्दना सिंह जी

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