28/07/2026
सम्राट पृथ्वीराज चौहान का वास्तविक इतिहास
यह विवरण पृथ्वीराज रासो पर आधारित नहीं है, जिसका वर्तमान स्वरूप कई शताब्दियों बाद सामने आया, बल्कि उन शिलालेखों तथा समकालीन ग्रंथों पर आधारित है जिनका संबंध पृथ्वीराज चौहान के युग से है।
चाहमान वंश : राजपूत या गुर्जर?
यहीं से ऐतिहासिक विमर्श का आरंभ होता है।
सम्राट पृथ्वीराज चौहान चाहमान वंश के शासक थे। प्रश्न यह है कि चाहमान वंश की ऐतिहासिक पहचान क्या थी?
ऐतिहासिक साक्ष्य
हर्ष शिलालेख (961 ईस्वी), जिसे स्वयं चाहमान शासकों द्वारा स्थापित कराया गया, यह उल्लेख करता है कि चाहमान वंश के शासक गुर्जर-प्रतिहार सम्राटों के सामंत थे। अर्थात् उस समय गुर्जर-प्रतिहार सर्वोच्च सत्ता थे और चाहमान उनके अधीन सामंत के रूप में कार्य करते थे।
इतिहासकार डॉ. डी. आर. भंडारकर, डॉ. दशरथ शर्मा तथा कर्नल जेम्स टॉड ने अपने अध्ययनों में प्रतिहार, चौहान, परमार तथा सोलंकी वंशों को अग्निवंशी गुर्जर परंपरा से संबद्ध माना है। उनके अनुसार तेरहवीं शताब्दी के पश्चात इन वंशों के लिए "राजपूत" शब्द का व्यापक प्रयोग होने लगा। उस काल में "राजपूत" शब्द का प्रयोग किसी जाति के रूप में नहीं, बल्कि "राजा के पुत्र" अथवा शासक वर्ग के लिए किया जाता था।
इस आधार पर यह मत प्रस्तुत किया जाता है कि चाहमान वंश मूलतः गुर्जर परंपरा की एक शाखा था।
सम्राट पृथ्वीराज चौहान का जीवन
सम्राट पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1149 ईस्वी में अजमेर में हुआ। उनके पिता गुर्जर सम्राट सोमेश्वर चौहान तथा माता कर्पूरी देवी थीं। वर्ष 1178 ईस्वी में मात्र तेरह वर्ष की आयु में वे अजमेर के सिंहासन पर आसीन हुए।
उस समय अजमेर और दिल्ली दोनों पर चौहानों का अधिकार था। परंपरा के अनुसार उनके नाना गुर्जर सम्राट अनंगपाल तोमर ने दिल्ली का शासन उन्हें सौंपा। उनका राज्य वर्तमान राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक विस्तृत था।
प्रमुख युद्ध
भटिंडा के किले पर अधिकार करने वाले मोहम्मद गौरी के सेनापति को पृथ्वीराज चौहान ने पराजित किया।
तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.)
मोहम्मद गौरी लगभग 1,20,000 घुड़सवारों के साथ भारत आया। पृथ्वीराज चौहान ने उसे निर्णायक रूप से पराजित किया। गौरी युद्धभूमि से घायल अवस्था में भाग निकला। कहा जाता है कि पृथ्वीराज ने उसे जीवनदान दिया, जिसे बाद में उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल माना गया।
तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.)
एक वर्ष बाद मोहम्मद गौरी पुनः पूरी तैयारी के साथ लौटा। उस समय पृथ्वीराज की सेना थकी हुई थी तथा उनके अनेक सामंत असंतुष्ट बताए जाते हैं। इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान पराजित हुए, बंदी बनाए गए और बाद में उनकी हत्या कर दी गई।
'पृथ्वीराज विजय' का उल्लेख
सम्राट पृथ्वीराज के दरबारी कवि जयानक द्वारा रचित पृथ्वीराज विजय उनके जीवनकाल का समकालीन ग्रंथ माना जाता है। इस ग्रंथ में संयोगिता-हरण की कथा का उल्लेख नहीं मिलता। यह कथा बाद के काल में पृथ्वीराज रासो के विस्तृत रूप में दिखाई देती है।
गुर्जरों से संबंध
सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समय "राजपूत" शब्द का अर्थ वर्तमान अर्थ से भिन्न था। गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य के विघटन के पश्चात उसके सामंत—चौहान, परमार और सोलंकी—अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र शासक बने। बाद के काल में इन वंशों ने स्वयं को राजपूत के रूप में अभिहित करना आरंभ किया।
इसी कारण आज भी मेरठ, गाज़ियाबाद तथा राजस्थान सहित अनेक क्षेत्रों में चौहान गोत्र के गुर्जर स्वयं को सम्राट पृथ्वीराज चौहान का वंशज मानते हैं तथा वत्स गोत्र से अपना संबंध बताते हैं।
सार
सम्राट पृथ्वीराज चौहान निःसंदेह भारत के महानतम वीर शासकों में से एक थे। प्रस्तुत ऐतिहासिक मत के अनुसार, उपलब्ध शिलालेखों तथा इतिहासकारों के निष्कर्षों के आधार पर चाहमान वंश को गुर्जर-प्रतिहार परंपरा की एक शाखा माना गया है।