23/05/2020
#वेदों_कि_और_लौटो
इस महामारी जैसी विकट परिस्थिति में हमारे आस पास कुछ ऐसे भी समुदाय हैं जिनसे हमें जीवन जीने कि सीख लेनी चाहिए। जी हां आदिवासी समाज के जनजातीय जीवनशैली इस महामारी के दौर में न सिर्फ अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाए हुए है बल्कि अपनी अनुशासन से इस लॉक डॉउन में सब का दिल भी जीत रहे हैं।
इनके जबरजस्त रोग प्रतिरोधक क्षमता का मुख्य कारण है इनका शुद्ध और प्राकृतिक खान पान जिसके कारण कोरोना जैसी खतरनाक वायरस इनके बीच कोई खास असर नहीं दिखा पाई है।
इनके दिनचर्या कि बात कि जाए तो ये हर मौसम सूर्योदय से पहले जागते हैं और पूरे दिन कड़ी मेहनत के बाद शाम में जल्दी सो जाते हैं।
आदिवासी समाज से हम साफ- सफाई और प्राकृतिक से लगाव के गुड़ भी सीख सकते हैं। इनका आवास ज्यादातर फुस, बांस, और मिट्टी के होते हैं जहां खास तरीके से साफ- सफाई रखा जाता है। ऐसे मकानों में ना तो एसी कि जरूरत होती है और ना हि रूम हीटर कि।
इनके पर्व त्योहारों भी स्वछता और प्रकृति से सीधे जुड़े होते हैं। जिससे इसके आस पास के नदियां और जलाशय स्वच्छ रहते हैं।
आज हम जिस सोशल डीस्टेंसिंग कि बात करते हैं, वो तो हमारे आदिवासी भाई वर्षों से करते आ रहे हैं। विश्वास नहीं होता तो कभी इनके गांव में जा कर देखना, ये कभी बाहरी लोगों से बिना जांच पड़ताल के नहीं घुलते मिलते हैं।
आज समय कि मांग है कि हम अपनी जीवनशैली कि तुलना जनजातीय जीवनशैली से करें। उनकी एक- एक आदतें उनको प्रकृति से जोड़े रखती है और हमारी ठीक उनके उलट है। इसलिए आज प्रकृति मानो हमसे अपना प्रतिशोध ले रही है।
आज समय है आत्ममंथन का। क्या हमें इस संकट को एक मौका के तौर पर लेते हुए मानव जाति के साथ इस धरती को भी बचाय और सजोय रखना नहीं चाहिए।
वेदों कि और लौटो।।