05/01/2026
मैं खुद नीखर ढेगर खाप का गड़रिया हूं लेकिन मुझे नीखर ढेगर होने का कोई अभिमान नहीं हैं क्योंकि इंसान अपने कर्म से महान बनता हैं ना की जन्म से इतना मैं समझता हूं |
लेकिन एक बात जो मुझे नीखरो की पसंद नहीं हैं बिल्कुल वो हैं की इनके दरवाज़े पर अगर हमारा गड़रिया समाज का कोई भूला भटका व्यक्ति आ जाए तो ये लोग उसको हुक्का और पानी बाद में पूछते हैं
पहले इनका सवाल होता हैं उस व्यक्ति से की तुम नीखर हो या ढेंगर??
कितना बटोगे मेरे गड़रिया समाज के भाईयों पहले नीखर और ढेंगर के नाम से, गोत्रों के नाम से, महापुरुषों के नाम से, फिर समाज के अलग-अलग संघठनो के नाम से, फिर राज्य और जिलों के नाम से...एक कोई गड़रिया भाई था जिसकी पोस्ट देखी थी मैंने जिसमें उसने गड़रिया समाज के महापुरुषों को अलग-अलग बाट कर बताया था नीखर खाप और ढेंगर खाप के साथ शर्म नहीं आती क्या बिल्कुल हमारी गड़रिया समाज वैसे ही इतनी पिछड़ी हुई हैं ऊपर से आप लोग ही इसकी जड़े खोदने में लगे हुए हो
प्राचीन समय की एक कहावत हैं जो किसी चरवाहे ने बनाई थी -"तीन गड़रिया,तेरह हुक्का आपस में ही मची हैं थुक्कम थुक्काह"
कहानी: तीन गड़रिया, तेरह हुक्का
किसी समय की बात है एक बड़े मैदान के किनारे तीन गड़रिया रहते थे —
भीमा, रामा और सूरज
तीनों एक ही जाति, एक ही पूर्वज की संतान, और तीनों के पास मिलाकर कुल तीन सौ भेड़ें थीं
अगर तीनों साथ रहते, तो गाँव में उनसे ताक़तवर कोई नहीं होता
लेकिन समस्या कहाँ थी?
• भीमा बोला — मैं असली गड़रिया हूँ, मेरी भेड़ें ज़्यादा दूध देती हैं
• रामा बोला —तेरा गोत्र अलग है, तू हमसे ऊँचा कैसे हो गया ?
• सूरज बोला —मैं पुराने देवता को मानता हूँ, तुम दोनों नक़ली हो
धीरे-धीरे तीन गड़रिया बने तेरह गुट कोई गोत्र पर लड़ा,कोई पूजा-पद्धति पर,कोई इलाके पर
कोई इस बात पर कि कौन पहले बैठता है
अब हालत ये थी: तीन आदमी, तेरह अलग-अलग हुक्के कोई किसी के साथ बैठकर हुक्का तक नहीं पीता थुक्कम-थुक्काह शुरू हो गई
∆ भीमा रामा की पीठ पीछे बुराई करता
∆ रामा सूरज की भेड़ें चोरी से खोल देता
∆ सूरज दोनों को गाँव वालों के सामने नीचा दिखाता
गाँव में लोग तीनों पर हँसने लगे -
“अरे, इनके पास भेड़ें बहुत हैं लेकिन अक़्ल दो कौड़ी की भी नहीं हैं ”