15/04/2020
श्रीमान प्रधानमंत्री जी
महोदय ,
आपको पता होगा कि आपके कल के संबोधन से पहले ही महाराष्ट्र 30 अप्रैल तक लॉक डाउन घोषित कर चुका था लेकिन तब कोई मजदूर घर जाने के लिए स्टेशन पर नहीं आया. फिर महज तीन दिन एक्स्ट्रा होने से इतनी भगदड़ क्यूँ मच गयी? दो कारण समझने होंगे.. पहला मानवीय सहज बुद्धि और घर का महत्व. 22-23 को लॉक डाउन की घोषणा के साथ ही हर महानगर से श्रमिकों का रेला अपने घर जाने निकल पड़ा था. कुछ तो 1000 KM जाने पैदल ही निकल पड़े थे.अचानक हुए लॉक डाउन में हर कोई अपने घर, अपने परिजनों के बीच जाना चाहता था लेकिन सात दिन गुजरते गुजरते इनमें से कईयों ने स्वयं को समझा लिया कि 7 दिन बीत गए हैं, 15 और बीत जायेंगे..और इस तरह पलायन तात्कालिक रूप से रुक गया. अब कल की घोषणा के बाद श्रमिकों की सहज वृत्ति और घर पहुँचने की उत्कंठा उन्हें फिर प्रेरित कर रही है क्यूँ कि अब वे जानते हैं कि शायद 3 मई भी असफल हो इस महामारी के सामने. इस उत्कंठा को हवा दी भारतीय रेलवे ने जिसने मूर्खतापूर्ण व्यवहार कर के और वायरस की गंभीरता पर विचार न कर के टिकट बेचे. कतिपय क्षेत्रीय मीडिया ने इस आग में यह कहकर घी डाला कि 14 से श्रमिकों को घर ले जाने के लिए विशेष ट्रेन्स चलने वाली हैं.
इस पलायन का दूसरा कारण और भी अधिक स्वाभाविक है. आपकी-मेरी तरह ये श्रमिक अपने गाँवों में छुट्टियाँ मनाने नहीं जाते. हमारी तरह ये मॉल से या स्टोर्स से राशन खरीद कर संग्रह नहीं करते. 80% श्रमिक सीमान्त और अत्यंत छोटे किसान होते हैं जो बरसात के ठीक पहले घर जा कर अपना छोटा सा खेत संवारते हैं, उसमें मक्का धान आदि फसल लगाते हैं जिससे उनके परिवार का साल भर भरण-पोषण होता है. उनकी चिंता एक सप्ताह या एक महीना नहीं अपितु परिवार के लिए पूरे एक वर्ष के अनाज की होती है. विपत्ति काल में हर जीव अपने घर पहुँचना चाहता है. मौत सामने हो तो भी परिजनों के सामने मरने और अपनी ज़मीन में दफ़न होने की इच्छा भला किस में न होगी?
दु:खद पहलू यह है कि 15 लाख मध्यम और उच्च मध्यम वर्गीय विदेश से यात्रा कर के 15 फरवरी के बाद लौटे जिनके कारण से मुख्यत: संक्रमण फैला लेकिन यही लोग मज़दूरों के पलायन को देशद्रोह और साज़िश निरुपित कर रहे हैं. और वो लोग भी FB और व्हाट्स एप्प पर इस पलायन को मूर्खतापूर्ण व्यवहार बता रहे हैं.
हमारा पेट भरा है. हमारी चिंता एटीएम से पैसे निकाल कर दूध सब्ज़ी लाने भर की है लेकिन जिनके पेट और एटीएम खाली हैं, जो स्वयं उगा कर खाते हैं और खिलाते हैं; सरकार से निवेदन है कि उन की सुध ले..इस श्रम शक्ति को स्क्रीनिंग कर के अपने अपने घर जाने दिया जाए क्यूँ कि न जाने देने की ज़िद से इनके अकेले परिवार और ये लाखों लोग टूट जाएँगे, बिखर जाएँगे.
आदरणीय मोदी जी! असली भारत गाँवों में बसता है. उसे गाँवों तक पहुँचने दे. शहर के लोग इनका लालन पालन कर भी लें तो भी इनके परिवार भूखे हैं, चिंतित हैं, व्यग्र हैं. मानवीय दृष्टिकोण अपनाइए और एक उच्च स्तरीय अधिकारियों की कमेटी बनाकर इन श्रमिको को उनके घर भेजने के उपाय और उसके बाद गाव में उनको कवारांटीन करने की व्यवस्था करने की कृपा करें।