Neelchameswar Mahadev Shivpuri Nail Chami

Neelchameswar Mahadev Shivpuri Nail Chami shiv shankar

https://youtu.be/pZpJCSrWuywMeri first video jaroor dekhna
14/11/2017

https://youtu.be/pZpJCSrWuyw
Meri first video jaroor dekhna

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Aap sab log invite ho
24/02/2017

Aap sab log invite ho

24/11/2016

Om nanah shivay

03/05/2014

पशुपत्यष्टकम्
इस जगत के सम्पूर्ण चर, अचर प्राणी (पशु) के
स्वामी भगवान शिव ही हैं | उन सहस्त्र नामों से
जाने जाते हैं महेश्वर के आठ प्रमुख नामों में एक है –
पशुपति जो शिव के प्राणीमात्र के स्वामी होने
को इंगित करता है | प्रस्तुत अष्टक शिव के
इन्ही पशुपति स्वरूप की स्तुति है |
पशुपतिं द्युपतिं धरणिपतिं भुजगलोकपतिं च
सतीपतिम्।
प्रणतभक्तजनार्तिहरं परं भजत रे
मनुजा गिरिजापतिम्।।1।।
हे मनुष्यों! स्वर्ग, मर्त्य तथा नागलोक के
जो स्वामी हैं, और जो शरणागत
भक्तजनों की पीड़ा को दूर करते हैं, ऐसे
पार्वतीवल्लभ व पशुपतिनाथ आदि नामों से
प्रसिद्ध परमपुरुष गिरिजापति शंकर भगवान्
का भजन करो।
न जनको जननी न च सोदरो न तनयो न च भूरिबलं
कुलम्।
अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत रे
मनुजा गिरिजापतिम्।।2।।
हे मनुष्यों! काल के गाल में पड़े हुए इस जीव
को माता, पिता, सहोदरभाई, पुत्र, अत्यन्त बल व
कुल; इनमें से कोई भी नहीं बचा सकता है। अत:
परमपिता परमात्मा पार्वतीपति भगवान् शिव
का भजन करो।
मुरजडिण्डिमवाद्यविलक्षणं मधुरपञ्चमनादविश
ारदम्।
प्रमथभूतगणैरपि सेवितं, भजत रे
मनुजा गिरिजापतिम्।।3।।
हे मनुष्यों! जो मृदङ्ग व डमरू बजाने में निपुण हैं,
मधुर पञ्चम स्वर में गाने में कुशल हैं, और प्रमथ
आदि भूतगणों से सेवित हैं, उन पार्वती वल्लभ
भगवान् शिव का भजन करो।
शरणदं सुखदं शरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं
नृणाम्।
अभयदं करुणावरुणालयं भजत रे
मनुजा गिरिजापतिम्।।4।।
हे मनुष्यों! ‘शिव, शिव, शिव’ कहकर मनुष्य
जिनको प्रणाम करते हैं, जो शरणागत को शरण, सुख
व अभयदान देते हैं, ऐसे करुणासागरस्वरूप भगवान्
गिरिजापति का भजन करो।
नरशिरोरचितं मणिकुण्डलं भुजगहारमुदं वृषभध्वजम्।
चितिरजोधवलीकृतविग्रहं भजत रे
मनुजा गिरिजापतिम्।।5।।
हे मनुष्यों! जो नरमुण्ड रूपी मणियों का कुण्डल पहने
हुए हैं, और सर्पराज के हार से ही प्रसन्न हैं, शरीर
में चिता की भस्म रमाये हुए हैं, ऐसे वृषभध्वज
भवानीपति भगवान् शंकर का भजन करो।
मखविनाशकरं शशिशेखरं सततमध्वरभाजिफलप्रदम्।
प्रलयदग्धसुरासुरमानवं भजत रे
मनुजा गिरिजापतिम्।।6।।
हे मनुष्यों! जिन्होंने दक्ष यज्ञ का विनाश किया,
जिनके मस्तक पर चन्द्रमा सुशोभित है, जो निरन्तर
यज्ञ करने वालों को यज्ञ का फल देते हैं, और
प्रलयावस्था में जिन्होने देव दानव व मानव
को दग्ध कर दिया है, ऐसे पार्वती वल्लभ भगवान्
शिव का भजन करो।
मदमपास्य चिरं हृदि संस्थितं मरणजन्मजराभयपीड
ितम्।
जगदुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भजत रे
मनुजा गिरिजापतिम् ।।7।।
हे मनुष्यों! मृत्यु, जन्म व जरा के भय से पीड़ित,
विनाशशील एवं भयों से व्याकुल इस संसार
को अच्छी तरह देखकर, चिरकाल से हृदय में स्थित
अज्ञानरूप अहंकार को छोड़कर भवानीपति भगवान्
शिव का भजन करो।
हरिविरञ्चिसुराधिपपूजितं यमजनेशधनेशनमस्कृतम्।
त्रिनयनं भुवनत्रितयाधिपं भजत रे
मनुजा गिरिजापतिम्।।8।।
हे मनुष्यों! जिनकी पूजा ब्रह्मा, विष्णु व इन्द्र
आदि करते हैं, यम, जनेश व कुबेर जिनको प्रणाम करते
हैं, जिनके तीन नेत्र हैं और जो त्रिभुवन के स्वामी हैं,
उन गिरिजापति भगवान शिव का भजन करो।
पशुपतेरिदमष्टकमद्भुतं विरचितं पृथिवीपतिसूरिणा।
पठति संशृणुते मनुजः सदा शिवपुरीं वसते लभते मुदम्।।
9।।
जो मनुष्य पृथ्वीपति सूरी के द्वारा रचित इस
पशुपति अष्टकम् का पाठ या इसका श्रवण
करता है,वह शिवपुरी में निवास करके आनन्दित
होता है।

02/05/2014

पवन की गति मंद पड़ जाती है,
जब हनुमान उडान भरते है !
आकाश की ऊंचाई नीची लगती है,
जब हनुमान विशाल रूप धरते है !
सागर की गहराई शर्माती है,
जब हनुमान अंजुली मे जल भरते है !
तूफान भय से थराते है,
जब हनुमान हुंकार भरते है !
अगन का तेज शीतल लगता है,
जब हनुमान के नेत्र रुधर भरते है !
जर्रा भी पर्वत बन जाता है,
जब हनुमान दया द्रष्टि धरते है !
राग समस्त एक राम नाम में समाते
है,
जब हनुमान तान भरते है !
हनुमान दुःख भंजन, भक्तो की सब
पीड़ा हरते है
कर मुक्त विकारो से, जीवन
उज्जवल करते है !
समस्त जन जो हनुमान के
श्री चरणों का ध्यान करते है,
हो मुक्त माया के बन्धनों से, प्रभु
की प्रीत से बंधते है !
जीवन मुक्त हो जाता है, संसार
भव सागर तरते है !
फिर क्यूँ न सब मान करे,
बारम्बार प्रणाम करे जिसके
हनुमान भक्त शिरोमणि देवों मे
भी विशिस्ट स्थान रखते
है............................. !
मारुति नंदन नमो नमः
कष्ट भंजन नमो नमः
असुर निकंदन
नमो नमः श्रीरामदूतम नमो नमः

27/02/2014

HAPPY MAHA SHIVRATRY

14/10/2013

अंगना में आओगे कन्हैया तोहे मैं जानेना दूंगीजाने ना दूंगी तोहे, जाने ना दूंगीअंगना में आओगे सावंरिया तोहे मैंजाने ना दूंगीअंगना मैं आओगे तो माखन मैंखिलाउंगीमाखन मैं खिलाउंगी तोहे मैंरिझाउंगीमाखन की भरी है मटकिया तोहे मैंजाने ना दूंगीअंगना मैं आओगे तो दही मैंखिलाउंगीदही मैं खिलाउंगी तोहे मैंरिझाउंगीदही की भरी है मटकिया तोहे मैंजाने ना दूंगीअंगना मैं आओगे तो राधा सेमिलाउंगीराधा से मिलाउंगी तोहे मैंरिझाउंगीसंग मैं होंगी सखिया तोहे मैं जानेना दूंगीअंगना मैं आओगे तो ग्वालो सेमिलाउंगीग्वालो से मिलाउंगी, तोहे मैंरिझाउंगीसंग मैं होंगी गैया तोहे मैं जानेना दूंगीअंगना मैं आओगे तो सत्संग मैंकराउंगीसत्संग मैं कराउंगी, तोहे मैंरिझाउंगीदर्शन मैं हो तेरी सुरतिया तोहेमैंजाने ना दूंगी

20/09/2013

अंगना में आओगे कन्हैया तोहे मैं जाने
ना दूंगी
जाने ना दूंगी तोहे, जाने ना दूंगी
अंगना में आओगे सावंरिया तोहे मैं
जाने ना दूंगी
अंगना मैं आओगे तो माखन मैं
खिलाउंगी
माखन मैं खिलाउंगी तोहे मैं
रिझाउंगी
माखन की भरी है मटकिया तोहे मैं
जाने ना दूंगी
अंगना मैं आओगे तो दही मैं
खिलाउंगी
दही मैं खिलाउंगी तोहे मैं
रिझाउंगी
दही की भरी है मटकिया तोहे मैं
जाने ना दूंगी
अंगना मैं आओगे तो राधा से
मिलाउंगी
राधा से मिलाउंगी तोहे मैं
रिझाउंगी
संग मैं होंगी सखिया तोहे मैं जाने
ना दूंगी
अंगना मैं आओगे तो ग्वालो से
मिलाउंगी
ग्वालो से मिलाउंगी, तोहे मैं
रिझाउंगी
संग मैं होंगी गैया तोहे मैं जाने
ना दूंगी
अंगना मैं आओगे तो सत्संग मैं
कराउंगी
सत्संग मैं कराउंगी, तोहे मैं
रिझाउंगी
दर्शन मैं हो तेरी सुरतिया तोहे मैं
जाने ना दूंगी

20/09/2013

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं
व्रज |
अहं
त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि
||६६||
भगवान श्री कृष्ण ने गीता के १८
वे अध्याय मे सम्पूर्ण
मानवजाती के पापोंके
नाश एवं कल्याण हेतू धर्म और
धर्मकि परिभाषा का सार केवल
एक श्लोक मे
बता दिया है....
सम्पुर्ण धर्मोंको अर्थात
कर्तव्यकर्म ( सारे वो कार्य
जो हम जाने-
अनजाने निरंतर करते रहते है )
ईन्हे मुझमे त्यागकर ( मुझे समर्पित
करके )
तु केवल एक मुझ
सर्वशक्तिमान् ,सर्वाधार,
परमेश्वरकी ही शरणमें आजा.....
( शरण- लज्जा,भय,मान,बढाई और
आसक्ति ईचंछा को त्यागकर एवं
शरीर
व संसार मे अपने लगाव से रहित
होकर केवल एक
परमात्मा को ही अपना
परमआश्रय, परमगती, व सर्वस्व
समझना
तथा अनन्यभावसे अतिशय श्रध्दा
भक्ति और प्रेमपूर्वक निरन्तर
भगवानके नाम, गुण, प्रभाव और
स्वरूपका
चिन्तन करते रहना एवं
भगवानका भजन स्मरण रखते हुए
ही उनके आज्ञानुसार
करतव्य कर्मोका निस्वार्थ
भावसे केवल प्रभू के लीए आचरण
करना यह....
“ सब प्रकारसे
परमात्माको ही शरण होना है " )
ईस प्रकार.....तब.....
" मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त
करदुँगा " " तू शोक मत कर " ||
६६ ||...........“ हरी ॐ तत्सत
"...........

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