09/10/2024
राजद के खिलाफ तमाम भूमिहार बाहुबलियों के बाहुबल का बखूबी इस्तेमाल कर मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार जी ने भाजपा के साथ मिलकर बारी-बारी से उन तमाम बाहुबलियों को ठिकाने लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जिनके बदौलत पौने दो प्रतिशत आबादी वाले नीतीश कुमार जातिय राजनीति की फ़ैक्ट्री कहे जाने वाले बिहार का मुख्यमंत्री बन पाये थे। किसी का नाम लेना उचित नहीं लेकिन नज़र उठाकर देख लीजिए, संघर्ष के दिनों में नीतीश कुमार का साथ देने वाले आज कोई भूमिहार बाहुबली नीतीश के इर्द गिर्द नज़र नहीं आते, नीतीश कुमार के हंटर से अधमरा हो चुके एक आधे लोग अगर आज भी अपनी भलाई देखते हुए नीतीश का गुनगान करते नज़र आ रहे हैं तो यक़ीन मानिए अब वे बाहुबली नहीं रहे बल्कि दोनों हाथ उठाकर सरेंडर कर चुके भीगी बिल्ली बन कर मजबुरी में नीतीश कुमार के चरण पखार रहे हैं। नीतीश यह बख़ूबी जानते हैं कि भूमिहार अब हमें वोट नहीं देंगे और भाजपा यह मान चुकी है की चाहे कोई भी दुर्गति कर दो लेकिन भूमिहार वोट तो हमें ही देंगे। सबसे पहले तो आज के हमारे तथाकथित बाहुबलियों में खुलकर भूमिहार कहने की हिम्मत नहीं होती और मुन्ना शुक्ला जी जैसे एक आध खुलकर भूमिहार कहने की दिलेरी दिखाते भी हैं तो यह लूरगर (ढेर होशियार) समाज के लोग पाकिस्तान, चीन, प्रधानमंत्री, पार्टी और पैसा देखकर चुनाव के समय उस दिलेर के साथ ग़द्दारी कर देते हैं।
तुम्हारे लिए खुलकर बोलने वाले, तुम्हारे हक़ की लड़ाई लड़ने वाले लोगों का यदि साथ नहीं दोगे तो लिख कर रख लो कल तुम्हारा नाम लेने वाला ढूँढने से भी नहीं मिलेगा। पिछले हफ़्ते हमारी बात बड़े भाई मुन्ना शुक्ला जी से हुई थी। हमने व्यवहार में पूछा की भइया क्या हो रहा है तो उन्होंने अपने अंदर के दर्द को छुपाते हुए मजाकिया अंदाज में कहा की क्या होगा भाई अभी तो हम आप दोनों भाई बेरोजगार ही हैं। उन्होंने कहा तो मजाकिया अंदाज में लेकिन उसके पीछे छुपे दर्द को समझना होगा। नीतीश और भाजपा कभी नहीं चाहते की भूमिहार अपने बुद्धि, ताक़त और धन का इस्तेमाल उन्हें छोड़ किसी और दल के लिए करे। उन्हें पता है, बिहार के भूमिहार जब ब्रह्मेश्वर मुखिया जी, पप्पू देव, कृष्णा शाही, समीर सिंह, राजो सिंह जी जैसे सैकड़ों प्रभावशाली लोगों के साथ हुए सलूक को इतनी आसानी से भूल सकते हैं तो मुन्ना शुक्ला जी को भी कुछ दिन में भूल ही जायेंगे। लड़ाई उसी क़ौम की लड़ी जाती है जो ज़िन्दा हो और खुद के वजूद को ज़िन्दा रखना चाहता हो, मरे हुए, बिके हुए गुलामों की लड़ाई लड़ना समय की बर्बादी ही है।