Er. S. P Gautam

Er. S. P Gautam Life is batter rather than long

धम्म चक्क प्रवर्तन दिवस एवं आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) :की सभी धम्म उपाहकों को बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक मंगल कामना...
29/07/2026

धम्म चक्क प्रवर्तन दिवस एवं आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) :
की सभी धम्म उपाहकों को बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक मंगल कामनाएं 💐 💐 💐
धम्म चक्क प्रवर्तन दिवस क्या है?
धम्म चक्क प्रवर्तन दिवस वह ऐतिहासिक दिन है जब तथागत गौतम बुद्ध ने बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद अपना पहला धम्म उपदेश सारनाथ (ऋषिपत्तन, मृगदाय) में अपने पाँच पूर्व साथियों को दिया। इस घटना को "धम्मचक्कप्पवत्तन" (धम्म के चक्र को प्रवर्तित करना) कहा जाता है।
यह घटना आषाढ़ पूर्णिमा के दिन हुई थी, इसलिए यह दिन बौद्ध परंपरा में अत्यंत पवित्र माना जाता है।
धम्मचक्क प्रवर्तन का अर्थ
धम्म = सत्य, नैतिकता और कल्याण का मार्ग।
चक्क (चक्र) = गति, परिवर्तन और निरंतरता।
प्रवर्तन = प्रारम्भ करना।
अर्थात संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए धम्म के चक्र को गति देना।
आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) का महत्व
आषाढ़ पूर्णिमा को भारत में गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है। बौद्ध परंपरा में यह दिन विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन भगवान बुद्ध संसार के प्रथम गुरु बने और उन्होंने मानवता को दुःख से मुक्ति का मार्ग बताया।
इस दिन श्रद्धालु—
बुद्ध, धम्म और संघ की वंदना करते हैं।
त्रिशरण एवं पंचशील ग्रहण करते हैं।
धम्म देशना सुनते हैं।
ध्यान (विपश्यना) करते हैं।
दान एवं सेवा कार्य करते हैं।
प्रथम धम्म उपदेश का सार
भगवान बुद्ध ने अपने प्रथम उपदेश में मानव जीवन के चार महान सत्य बताए—
1. दुःख
जीवन में दुःख है।
2. दुःख समुदय
दुःख का कारण तृष्णा (लालसा) है।
3. दुःख निरोध
तृष्णा समाप्त होने पर दुःख समाप्त हो जाता है।
4. दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा
दुःख से मुक्ति का मार्ग आर्य अष्टांगिक मार्ग है।
आर्य अष्टांगिक मार्ग
सम्यक दृष्टि
सम्यक संकल्प
सम्यक वाणी
सम्यक कर्म
सम्यक आजीविका
सम्यक प्रयास
सम्यक स्मृति
सम्यक समाधि
यही मार्ग शांति, करुणा और निर्वाण की ओर ले जाता है।
पंचशील
प्राणी हत्या न करना।
चोरी न करना।
दुराचार से बचना।
असत्य वचन न बोलना।
नशे से दूर रहना।
गुरु पूर्णिमा का संदेश
बुद्ध ने कहा—
"अप्प दीपो भव"
"स्वयं अपना दीपक बनो।"
गुरु वह है जो अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाए। बुद्ध ने किसी अंधविश्वास का नहीं, बल्कि सत्य, विवेक, करुणा और प्रज्ञा का मार्ग दिखाया।
धम्म चक्क प्रवर्तन दिवस का सामाजिक संदेश
मानवता सर्वोपरि है।
जाति, धर्म और ऊँच-नीच से ऊपर उठें।
करुणा, मैत्री और अहिंसा अपनाएँ।
सत्य और नैतिक जीवन जिएँ।
शिक्षा, समानता और भाईचारे को बढ़ावा दें।
नशामुक्त एवं हिंसामुक्त समाज का निर्माण करें।
प्रेरणादायक संदेश
"बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय"
अर्थात अधिक से अधिक लोगों के हित और सुख के लिए कार्य करना ही धम्म का वास्तविक उद्देश्य है।
"न हि वेरेन वेरानि सम्मन्ति इध कुदाचनम्।
अवेरेन च सम्मन्ति, एष धम्मो सनन्तनो॥"
अर्थ: वैर से वैर कभी समाप्त नहीं होता, केवल मैत्री और प्रेम से ही समाप्त होता है। यही सनातन धम्म है।
शुभकामना संदेश
धम्म चक्क प्रवर्तन दिवस एवं आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) की हार्दिक मंगलकामनाएँ।
आइए, तथागत गौतम बुद्ध के करुणा, मैत्री, प्रज्ञा और समता के संदेश को अपनाकर एक शांतिपूर्ण, समतामूलक और मानवतावादी समाज के निर्माण का संकल्प लें।
भवतु सब्ब मंगलम 🙏🙏
नमो बुद्धाय।
जय भीम।
जय भारत।
जय संविधान। 🙏

इंजी एस पी गौतम (संयोजक)
बहुजन जागरूकता मिशन

समस्त देशवासियों को बहुजन जागरूकता मिशन की ओर से 26 जुलाई यानि कि आरक्षण दिवस की बहुत-बहुत बधाई 💐💐💐💐💐💐💐💐🌷🌷☸️🙏आरक्षण दिवस...
26/07/2026

समस्त देशवासियों को बहुजन जागरूकता मिशन की ओर से 26 जुलाई यानि कि आरक्षण दिवस की बहुत-बहुत बधाई 💐💐💐💐💐💐💐💐🌷🌷

☸️🙏आरक्षण दिवस की शुरुआत और उसके मायने क्या है इसे समझना होंगा हम सभी को🙏☸️ पढ़िए जरूर और शेयर भी करे ।

26 जुलाई यानि कि आरक्षण दिवस, आज से 118 साल पहले 26 जुलाई 1902 में कोल्हापुर नरेश छत्रपति शाहूजी महाराज द्वारा राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले जी के ‘आनुपातिक आरक्षण’ से प्रेरणा लेते हुए सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्य से

पहली बार आधिकारिक शासनादेश के रूप में शुद्रों तथा अति शूद्रों सहित सभी गैर ब्राह्मणों के लिए 50 फ़ीसदी आरक्षण का ऐलान किया था.
इसी आरक्षण की वजह से वर्णवादी व्यवस्था से शोषित समाज के दबे, कुचले, पिछड़े बहुजन समाज को भागीदारी मिलने का सिलसिला शुरू हो सका.

यदि देखा गया है कि भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां पर धार्मिक ठेकेदारों के व्यवहार में ही नहीं बल्कि धर्म शास्त्रों में भी यहां की बहुसंख्यक आबादी को उसके मूलभूत अधिकार जैसे की शिक्षा, संपत्ति, शास्त्र, स्वाभिमान, सम्मान आदि से वंचित रखने को जायज माना गया है.
बहुजन समाज (ओबीसी,SC,ST, आदिवासी) को छत्रपति शाहूजी महाराज द्वारा पहली बार शिक्षा, संपत्ति तथा आत्म सम्मान का अवसर मिला था. त्रावणकोर रियासत में बहुसंख्यकों के साथ भर्ती में किए जा रहे भेदभाव के खिलाफ सरकारी नौकरियों में आरक्षण की जबरदस्त मांग उठी थी.
बड़ौदा और मैसूर की रियासतों में आरक्षण 1902 से पहले से ही था लेकिन तब आरक्षण किसी व्यापक दृष्टिकोण तथा शासनादेश के रूप में नहीं था. इसीलिए 26 जुलाई को बहुजन समाज (OBC,SC,ST,आदिवासी) के लिए सामाजिक परिवर्तन आंदोलन का एक ऐतिहासिक दिन है.

ऐसा भी नहीं है कि 1902 से पहले आरक्षण के विषय पर चर्चा विमर्श नहीं हुआ था. सर्वप्रथम सामाजिक क्रांति के अग्रदूत राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले जी ने 1869 में आरक्षण की जरूरत बताई थी. आगे चलकर 1882 में गठित हंटर कमीशन के समक्ष राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले जी ने नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में भी सभी के लिए आनुपातिक आरक्षण/प्रतिनिधित्व की मांग की.

हमें एक बात ध्यान में रखने की जरूरत है कि राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले जी ने आनुपातिक आरक्षण/प्रतिनिधित्व की वकालत की थी. राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले का मानना था कि आनुपातिक आरक्षण के मांग अपने आप में सामाजिक न्याय को स्थापित करने की दिशा में बहुत ही क्रांतिकारी कदम है.

यह प्रकृति का नैसर्गिक सिद्धांत है कि हर व्यक्ति को उसकी अनुपातिक हिस्सेदारी मिले. यह न्याय की सबसे सरल तथा सहज अवधारणा भी है. उदाहरण के तौर पर जैसे कि एक मां के अगर तीन बेटे हैं तो नैसर्गिक सिद्धांत यही कहता है कि जमीन तीन हिस्सों में बांटी जानी चाहिए.

चूंकि बड़ा बेटा पढ़ा लिखा है डिप्टी कलेक्टर है और छोटा बेटा अनपढ़ है, मजदूर है, इसलिए बड़े बेटे की योग्यता को ध्यान में रखते हुए उसे ज्यादा संपत्ति दिया जाना तथा छोटे बेटे के कम योग्यता को ध्यान में रखते हुए उसे कम संपत्ति दिया जाना न्यायसंगत कभी नहीं कहा जा सकता है.

☸️👉अवसर में समानता के बढ़ते कदम…👈☸️

अवसर में समानता के सिद्धांत को स्वीकारते हुए ब्रिटिश हुकूमत ने 1908 में भारत की अनेक जातियों को आरक्षण उपलब्ध कराने का निर्णय लिया. आगे चलकर आरक्षण को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करते हुए भारत सरकार अधिनियम-1909 में विधिवत कानूनी जामा बनाया गया.

क्रियान्वयन में सुधार करते हुए भारत सरकार अधिनियम-1919 में भी आरक्षण का प्रावधान किया गया, गोलमेज सम्मेलन में बोधिसत्व डॉक्टर बाबासाहेब अम्बेडकर जी ने अछूतों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग किया था लेकिन गांधी ने बोधिसत्व डाक्टर बाबासाहेब आम्बेडकर जी की मांग का विरोध करते हुए यह ऐलान किया कि वह अछूतों को पृथक निर्वाचक मंडल नहीं देने देंगे.

अंततः गांधी जी द्वारा आमरण अनशन का ऐलान किए जाने पर बोधिसत्व डॉक्टर बाबासाहेब अम्बेडकर जी को पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया. पूना पैक्ट में राजनीतिक आरक्षण का प्रावधान किया गया,

हक और अधिकारों के इस कड़ी में भारत सरकार अधिनियम-1935 में दिए गए आरक्षण तथा कैबिनेट मिशन-1946 की अनुपातिक आरक्षण संबंधित सिफारिश भी उल्लेखनीय है.

नमो बुद्धाय जय भीम जय भारत जय संविधान जय छत्रपति शाहूजी महाराज 🙏 🙏

महान संत, समाज सुधारक, राष्ट्रीय कवि और निगुण भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक संत शिरोमणि कबीर दास जी की जयंती की बहुत-बहुत बधा...
29/06/2026

महान संत, समाज सुधारक, राष्ट्रीय कवि और निगुण भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक संत शिरोमणि कबीर दास जी की जयंती की बहुत-बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं 💐 💐 💐 💐

संत कबीर दास जी का जीवन परिचय:-
कबीर दास भारत के महान संत, समाज सुधारक, कवि और निर्गुण भक्ति आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तक थे। उन्होंने जाति-पाँति, ऊँच-नीच, अंधविश्वास, पाखंड और धार्मिक कट्टरता का विरोध किया तथा प्रेम, सत्य, समानता और मानवता का संदेश दिया।
जन्म: प्रचलित मान्यता के अनुसार सन् 1398 ई. (कुछ विद्वान 1440 ई. भी मानते हैं), वाराणसी के लहरतारा क्षेत्र में।
पालन-पोषण: उनका पालन-पोषण एक जुलाहा (बुनकर) दंपति नीरू और नीमा ने किया।
गुरु: रामानंद को उनका गुरु माना जाता है।
व्यवसाय: बुनाई (जुलाहा) का कार्य करते हुए उन्होंने संत जीवन अपनाया।
भाषा: सधुक्कड़ी, अवधी, ब्रज, भोजपुरी, खड़ी बोली आदि लोकभाषाओं का प्रयोग।
रचनाएँ: उनकी वाणी का संग्रह मुख्यतः बीजक, साखी, सबद और रमैनी में मिलता है।
निधन: प्रचलित मान्यता के अनुसार मगहर में लगभग 1518 ई. में।
कबीर दास जी की वाणी की विशेषताएँ:-
सरल और जनभाषा में रचित।
सत्य, प्रेम और मानवता का संदेश।
जातिवाद, छुआछूत और पाखंड का विरोध।
ईश्वर को निराकार और सर्वव्यापी माना।
कर्म, सदाचार और आत्मज्ञान पर बल दिया।
प्रसिद्ध दोहे एवं उनका अर्थ
1.
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥
अर्थ: दूसरों की बुराई देखने से पहले स्वयं को सुधारना चाहिए।
2.
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥
अर्थ: किसी भी अच्छे कार्य को टालना नहीं चाहिए।
3.
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
अर्थ: केवल पुस्तकीय ज्ञान पर्याप्त नहीं, प्रेम और सद्भाव ही सच्चा ज्ञान है।
4.
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥
अर्थ: धैर्य रखने से ही सफलता मिलती है।
5.
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥
अर्थ: मनुष्य का मूल्य उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान और गुणों से होता है।
कबीर दास जी के प्रमुख उपदेश
सभी मनुष्य समान हैं।
ईश्वर एक है और हर जीव में विद्यमान है।
प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है।
अंधविश्वास और पाखंड से दूर रहना चाहिए।
मेहनत और ईमानदारी से जीवन जीना चाहिए।
सत्य, करुणा और दया का पालन करना चाहिए।
आत्मज्ञान और आत्मचिंतन से जीवन सफल बनता है।
जाति, धर्म और ऊँच-नीच के भेदभाव को समाप्त करना चाहिए।
अहंकार का त्याग कर विनम्रता अपनानी चाहिए।
मानव सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है।
समाज के लिए कबीर दास जी का योगदान
भक्ति आंदोलन को नई दिशा दी।
सामाजिक समानता और भाईचारे का संदेश फैलाया।
धार्मिक कट्टरता और पाखंड का विरोध किया।
आम जनता की भाषा में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार किया।
आज भी उनके विचार सामाजिक समरसता, मानवता और राष्ट्रीय एकता के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

संत कबीर दास जी केवल एक महान कवि ही नहीं, बल्कि ऐसे समाज सुधारक थे जिन्होंने सत्य, प्रेम, समानता और मानवता का मार्ग दिखाया। उनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 500 वर्ष पहले थी। उनका संदेश है कि "मनुष्य की पहचान उसकी जाति या धर्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म, ज्ञान और चरित्र से होती है।"
ऐसे महान संत शिरोमणि कबीर दास जी को उनकी जयंती पर कोटि कोटि नमन एवं वंदन 🙏🙏
साहेब बंदगी नमो बुद्धाय जय भीम जय भारत जय संविधान 🙏 🙏
इंजी एस पी गौतम (संयोजक)
बहुजन जागरूकता मिशन

*आरक्षण के जनक छत्रपति शाहू जी महाराज : जीवन, संघर्ष और योगदान*छत्रपति शाहू जी महाराज भारतीय समाज सुधार आंदोलन के महानाय...
26/06/2026

*आरक्षण के जनक छत्रपति शाहू जी महाराज : जीवन, संघर्ष और योगदान*

छत्रपति शाहू जी महाराज भारतीय समाज सुधार आंदोलन के महानायक, सामाजिक न्याय के अग्रदूत और आरक्षण व्यवस्था के जनक माने जाते हैं। उन्होंने अपने पूरे जीवन में शोषित, वंचित, दलित, पिछड़े और महिलाओं के उत्थान के लिए कार्य किया। उनका जीवन संघर्ष, समानता और मानवता का अद्भुत उदाहरण है।

प्रारंभिक जीवन
छत्रपति शाहू जी महाराज का जन्म 26 जून 1874 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के कागल में हुआ था। उनका बचपन का नाम यशवंतराव घाटगे था। कोल्हापुर रियासत की महारानी आनंदीबाई ने उन्हें गोद लिया और बाद में वे कोल्हापुर के शासक बने। शिक्षा के दौरान उन्होंने समाज में व्याप्त ऊँच-नीच, जातिगत भेदभाव और गरीबों की दयनीय स्थिति को करीब से देखा, जिसने उनके जीवन की दिशा तय की।
सामाजिक विषमता के विरुद्ध संघर्ष
शाहू जी महाराज ने देखा कि समाज का एक बड़ा वर्ग शिक्षा, रोजगार और सम्मान से वंचित है। उस समय उच्च जातियों का प्रभुत्व था और दलित तथा पिछड़े वर्गों को आगे बढ़ने के अवसर नहीं मिलते थे। उन्होंने इस अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संकल्प लिया।
वे मानते थे कि किसी भी समाज की प्रगति तभी संभव है जब उसके सबसे कमजोर वर्ग को बराबरी का अधिकार मिले। इसलिए उन्होंने सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने और समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए अनेक ऐतिहासिक कदम उठाए।
आरक्षण की ऐतिहासिक शुरुआत
सन् 1902 में शाहू जी महाराज ने कोल्हापुर राज्य में सरकारी नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। यह भारत के इतिहास में आरक्षण की पहली व्यवस्था थी। इसी कारण उन्हें "आरक्षण का जनक" कहा जाता है।
उनका उद्देश्य किसी वर्ग को विशेष लाभ देना नहीं था, बल्कि उन वर्गों को अवसर प्रदान करना था जिन्हें सदियों से अधिकारों से वंचित रखा गया था। यह निर्णय सामाजिक न्याय की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ।
शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
शाहू जी महाराज का विश्वास था कि शिक्षा ही समाज परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम है। उन्होंने गरीब, दलित और पिछड़े वर्गों के बच्चों के लिए छात्रावास, विद्यालय और छात्रवृत्ति की व्यवस्था शुरू की।
उन्होंने:
निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को बढ़ावा दिया।
पिछड़े वर्गों के छात्रों के लिए छात्रावास स्थापित किए।
गरीब विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता प्रदान की।
शिक्षा में जातिगत भेदभाव का विरोध किया।
उनकी नीतियों के कारण हजारों वंचित बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला।

महिला सशक्तिकरण के लिए प्रयास
शाहू जी महाराज महिलाओं के अधिकारों के समर्थक थे। उन्होंने: बाल विवाह का विरोध किया।
विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया।
महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया।
महिलाओं को सामाजिक सम्मान और अधिकार दिलाने का प्रयास किया।
उनका मानना था कि समाज की उन्नति महिलाओं की उन्नति के बिना संभव नहीं है।

डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रति सहयोग
शाहू जी महाराज ने डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिभा और संघर्ष को पहचाना। उन्होंने बाबा साहेब के सामाजिक आंदोलन को समर्थन दिया और दलित समाज के अधिकारों के लिए उनके प्रयासों की सराहना की।
दोनों महापुरुषों का उद्देश्य एक ही था—समानता, न्याय और मानव सम्मान पर आधारित समाज का निर्माण।
किसानों और मजदूरों के हितैषी
शाहू जी महाराज ने किसानों और मजदूरों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए भी अनेक कदम उठाए। उन्होंने:
किसानों को राहत प्रदान की।
श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा की।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के कल्याण के लिए योजनाएँ बनाईं।
उनकी विचारधारा
शाहू जी महाराज का मानना था कि: "शिक्षा ही वह शक्ति है जो मनुष्य को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाती है।"
उन्होंने सामाजिक न्याय, समान अवसर, शिक्षा और मानवता को अपने शासन का आधार बनाया।

छत्रपति शाहू जी महाराज केवल एक शासक नहीं थे, बल्कि सामाजिक क्रांति के महान योद्धा थे। उन्होंने अपने जीवन को दलितों, पिछड़ों, महिलाओं, किसानों और मजदूरों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। आरक्षण, शिक्षा और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उनका योगदान सदैव याद किया जाएगा।

आज उनकी जयंती पर हम उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं और उनके बताए मार्ग—शिक्षा, संगठन, समानता और सामाजिक न्याय—पर चलने का संकल्प लेते हैं।
नमो बुद्धाय, जय शाहू, जय भीम, जय भारत, जय संविधान। 🙏🌹
इंजी एस पी गौतम (संयोजक) बहुजन जागरूकता मिशन

वीर आदिवासी महान स्वतंत्रता सैनानी, समाज सुधारक एवं जननायक बिरसा मुंडा जी की पुण्यतिथि पर बहुजन जागरूकता मिशन की ओर से क...
09/06/2026

वीर आदिवासी महान स्वतंत्रता सैनानी, समाज सुधारक एवं जननायक बिरसा मुंडा जी की पुण्यतिथि पर बहुजन जागरूकता मिशन की ओर से कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि 🙏 🙏🌹🌷

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, आदिवासी समाज के गौरव, जल-जंगल-जमीन के रक्षक और शोषित-वंचित समाज की आवाज भगवान बिरसा मुंडा का जीवन संघर्ष, साहस, त्याग और बलिदान की अमर गाथा है। उन्होंने अंग्रेजी शासन, जमींदारी प्रथा और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करते हुए आदिवासी समाज को स्वाभिमान और अधिकारों के लिए संगठित किया।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को वर्तमान झारखंड राज्य के उलीहातु गांव में हुआ था। वे मुंडा जनजाति से संबंधित थे। बचपन से ही उन्होंने अपने समाज की गरीबी, शोषण और अन्याय को देखा। आदिवासी समुदाय की जमीनों पर अंग्रेजों और जमींदारों का कब्जा बढ़ता जा रहा था, जिससे लोगों का जीवन संकट में पड़ गया था।
आदिवासी समाज के लिए संघर्ष
बिरसा मुंडा ने आदिवासी समाज को जागरूक किया और उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का संदेश दिया। उन्होंने लोगों से कहा कि वे अपनी संस्कृति, परंपराओं और आत्मसम्मान को बनाए रखें। उनके नेतृत्व में हजारों लोग एकजुट हुए।
उन्होंने अंग्रेजी शासन और जमींदारों के अत्याचारों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया। उनका प्रसिद्ध नारा था:
"अबुआ दिशुम, अबुआ राज"
(हमारी धरती, हमारा शासन)
यह नारा आज भी आदिवासी स्वाभिमान और अधिकारों का प्रतीक माना जाता है।
उलगुलान (महाविद्रोह)
सन् 1899-1900 में बिरसा मुंडा ने उलगुलान (महाविद्रोह) का नेतृत्व किया। यह आंदोलन केवल अंग्रेजों के खिलाफ नहीं था, बल्कि अन्याय, शोषण और गुलामी के विरुद्ध जनक्रांति था। इस आंदोलन ने अंग्रेजी सरकार की नींव हिला दी।
बिरसा मुंडा ने अपने अनुयायियों को संगठित कर अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा दी। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि लोग उन्हें "धरती आबा" (धरती पिता) कहकर सम्मान देने लगे।
गिरफ्तारी और बलिदान
अंग्रेजी सरकार बिरसा मुंडा के बढ़ते प्रभाव से भयभीत हो गई। उन्हें गिरफ्तार कर रांची जेल में बंद कर दिया गया। मात्र 25 वर्ष की आयु में 9 जून 1900 को जेल में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु आज भी कई प्रश्न खड़े करती है, लेकिन उनका संघर्ष और विचार अमर हैं।
प्रेरणा और विरासत
बिरसा मुंडा जी का जीवन हमें अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, आत्मसम्मान, सामाजिक एकता और अपने अधिकारों की रक्षा का संदेश देता है। उनका बलिदान केवल आदिवासी समाज के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
आज भारत सरकार ने उनके सम्मान में 15 नवम्बर को "जनजातीय गौरव दिवस" घोषित किया है, जिससे नई पीढ़ी उनके योगदान को जान सके।
श्रद्धांजलि
"धरती आबा बिरसा मुंडा जी का जीवन हमें साहस, संघर्ष, त्याग और स्वाभिमान का मार्ग दिखाता है। उनके विचार और बलिदान सदैव राष्ट्र को प्रेरित करते रहेंगे।"

इंजी. एस. पी. गौतम (संयोजक)
बहुजन जागरूकता मिशन
📞 9654428646
नमो बुद्धाय | जय भीम | जय भारत | जय संविधान | जय बिरसा मुंडा, जय जोहार🙏🌹

ज्ञान ही मनुष्य के जीवन की सच्ची शक्ति है। ✨आज का दिन इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। 8 जून 1927 को कोल...
08/06/2026

ज्ञान ही मनुष्य के जीवन की सच्ची शक्ति है। ✨
आज का दिन इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। 8 जून 1927 को कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी को पीएच.डी. (Ph.D.) की उपाधि प्रदान की गई थी। 🎓📜
यह ऐतिहासिक दिन बाबासाहेब के उत्कृष्ट शोध, अगाध ज्ञान और वैश्विक बौद्धिक योगदान का प्रतीक है। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन और मानव मुक्ति का सबसे शक्तिशाली साधन माना। उनका यह संघर्ष और सफलता आज भी करोड़ों लोगों को शिक्षा और ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। 🌐📚
इस ऐतिहासिक और गौरवशाली दिन पर युगपुरुष डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी के चरणों में कोटि-कोटि नमन। 🙏💐

बहुजन जागरूकता मिशन Bahujan Ek Awaz TV डॉ बी आर अंबेडकर समिति सेवा नगर - रजि0 गाजियाबाद उत्तर प्रदेश Er. S. P Gautam Akash Anand Er S P Gautam Sudhir Kumar Jatav Mayawati Kaamini Gautam Shalu Gautam

*त्याग और बलिदान की देवी माता रमाबाई जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि* 🙏 🙏 *भारत के इतिहास...
27/05/2026

*त्याग और बलिदान की देवी माता रमाबाई जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि* 🙏 🙏

*भारत के इतिहास में जब भी डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर के महान संघर्ष और उपलब्धियों की चर्चा होती है, तब उनकी जीवनसंगिनी माता रमाबाई आंबेडकर का त्याग, संघर्ष और बलिदान भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है।*
*माता रमाबाई जी केवल बाबासाहेब की पत्नी ही नहीं थीं, बल्कि वे उस संघर्षमय यात्रा की मौन शक्ति थीं, जिन्होंने हर कठिन परिस्थिति में बाबासाहेब का साथ निभाया।*

*माता रमाबाई जी का प्रारंभिक जीवन -*
माता रमाबाई जी का जन्म 7 फरवरी 1898 को एक अत्यंत गरीब परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने गरीबी, भूख, अभाव और सामाजिक अपमान को बहुत करीब से देखा। कम उम्र में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया, जिसके कारण जीवन और भी कठिन हो गया।
उस समय समाज में दलित वर्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। शिक्षा, सम्मान और समान अधिकारों से वंचित समाज में रमाबाई जी ने जीवन बिताया। बचपन में ही उन्होंने संघर्ष करना सीख लिया था।

*बाबासाहेब से विवाह-*
सन् 1906 में उनका विवाह युवा भीमराव आंबेडकर से हुआ। उस समय बाबासाहेब भी आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे थे। घर की स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार भोजन तक के लिए संघर्ष करना पड़ता था।
लेकिन रमाबाई जी ने कभी शिकायत नहीं की। उन्होंने अपने पति के सपनों को अपना सपना बना लिया। वे समझती थीं कि भीमराव केवल अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि करोड़ों शोषित और वंचित लोगों के भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

*संघर्ष और त्याग की अद्भुत मिसाल*
जब बाबासाहेब उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए, तब पूरे परिवार की जिम्मेदारी रमाबाई जी के कंधों पर आ गई। घर में गरीबी थी, बच्चों की बीमारी थी, सामाजिक तिरस्कार था, लेकिन उन्होंने हर परिस्थिति को साहस से सहन किया।
कई बार घर चलाने के लिए उन्हें कठिन परिश्रम करना पड़ा। ऐसा भी समय आया जब खाने के लिए पर्याप्त अन्न नहीं था। फिर भी उन्होंने बाबासाहेब की पढ़ाई और मिशन में कभी बाधा नहीं आने दी।
उनका त्याग इतना महान था कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख-दुख को समाज की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया।

*मातृत्व का दर्द*-
माता रमाबाई जी ने अपने कई बच्चों को बीमारी और गरीबी के कारण खो दिया। यह पीड़ा किसी भी माँ के लिए असहनीय होती है। लेकिन इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी उन्होंने बाबासाहेब का मनोबल टूटने नहीं दिया।
उनका जीवन लगातार दुखों और कठिनाइयों से भरा रहा, फिर भी वे धैर्य और साहस की प्रतिमूर्ति बनी रहीं।

*बाबासाहेब के संघर्ष में सबसे बड़ी शक्ति*-
डॉ. आंबेडकर दिन-रात समाज परिवर्तन के कार्य में लगे रहते थे। वे पढ़ाई, आंदोलन, लेखन और सामाजिक संघर्ष में व्यस्त रहते थे। ऐसे समय में रमाबाई जी ने पूरे परिवार को संभाला और बाबासाहेब को मानसिक शक्ति प्रदान की।
यदि रमाबाई जी का त्याग और सहयोग न होता, तो शायद बाबासाहेब इतने बड़े सामाजिक क्रांतिकारी नहीं बन पाते।
बाबासाहेब स्वयं भी माता रमाबाई जी के त्याग को स्वीकार करते थे। वे जानते थे कि उनकी सफलता के पीछे रमाबाई जी का अपार योगदान है।
*बीमारी और परिनिर्वाण*-

लगातार संघर्ष, गरीबी और कठिन जीवन के कारण माता रमाबाई जी का स्वास्थ्य कमजोर होता गया। उचित इलाज और आराम न मिलने के कारण उनकी स्थिति बिगड़ती चली गई।
27 मई 1935 को माता रमाबाई जी का परिनिर्वाण हो गया। उनके निधन से बाबासाहेब गहरे दुःख में डूब गए। उन्होंने अपनी जीवनसंगिनी ही नहीं, बल्कि अपने संघर्ष की सबसे बड़ी साथी को खो दिया था।

*माता रमाबाई जी का महत्व*-
माता रमाबाई जी का त्याग, धैर्य, नारी शक्ति और समर्पण की जीवंत मिसाल हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि किसी महान परिवर्तन के पीछे एक महान त्याग छिपा होता है।
वे उन करोड़ों महिलाओं की प्रेरणा हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने परिवार और समाज के लिए संघर्ष करती हैं।
*उनके जीवन से मिलने वाली सीख*-
कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोना चाहिए।
महान कार्यों के पीछे त्याग और संघर्ष आवश्यक होता है।
शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के लिए समर्पण जरूरी है।
महिलाओं का योगदान समाज निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
निस्वार्थ प्रेम और सहयोग किसी भी व्यक्ति को महान बना सकता है।

*श्रद्धांजलि*
माता रमाबाई जी का जीवन हमें सिखाता है कि इतिहास केवल मंच पर दिखने वाले नायकों से नहीं बनता, बल्कि उन मौन त्यागियों से भी बनता है जो पीछे रहकर संघर्ष की नींव मजबूत करते हैं।
माता रमाबाई जी को उनके परिनिर्वाण दिवस पर शत-शत नमन।🙏🙏🌷🌷🌹🌹

उनका संघर्ष, साहस और बलिदान सदैव आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
नमो बुद्धाय जय भीम 🙏 🙏
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इंजी एस पी गौतम (संयोजक)
बहुजन जागरूकता मिशन

👉 समस्त देशवासियोंको  #भारत में  #सच्चे_प्रजातंत्रवादी और  #समाज_सुधारक  #आरक्षण_के_जनक   #छत्रपति_शाहूजी_महाराज (26 जून...
06/05/2026

👉 समस्त देशवासियोंको #भारत में #सच्चे_प्रजातंत्रवादी और #समाज_सुधारक #आरक्षण_के_जनक #छत्रपति_शाहूजी_महाराज (26 जून 1874; 6 मई, 1922) के #परिनिर्वाण_दिवस पर बहुजन जागरूकता मिशन की और से कोटिशः #वंदन एवं #नमन..👏👏
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#जीवन :
👉शाहूजी कोल्हापुर के इतिहास में एक अमूल्य मणि के रूप में आज भी प्रसिद्ध हैं। छत्रपति शाहूजी महाराज ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने राजा होते हुए भी दलित और शोषित वर्ग के कष्ट को समझा और सदा उनसे निकटता बनाए रखी। उन्होंने दलित वर्ग के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू की थी। गरीब छात्रों के छात्रावास स्थापित किये और बाहरी छात्रों को शरण प्रदान करने के आदेश दिए। शाहूजी महाराज के शासन के दौरान 'बाल विवाह' पर ईमानदारी से प्रतिबंधित लगाया गया। उन्होंने अंतरजातिय विवाह और विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में समर्थन की आवाज उठाई थी। इन गतिविधियों के लिए महाराज शाहूजी को कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। शाहूजी महाराज ज्योतिबा फुले से प्रभावित थे और लंबे समय तक 'सत्य शोधक समाज', फुले द्वारा गठित संस्था के संरक्षण भी रहे।

#जन्म_परिचय
छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म 26 जून 1874 ई. को हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीमंत जयसिंह राव आबासाहब घाटगे था। छत्रपति शाहूजी महाराज का बचपन का नाम 'यशवंतराव' था। छत्रपति शिवाजी महाराज (प्रथम) के दूसरे पुत्र के वंशज शिवाजी चतुर्थ कोल्हापुर में राज्य करते थे। ब्रिटिश षडयंत्र और अपने ब्राह्मण दीवान की गद्दारी की वजह से जब शिवाजी चतुर्थ का कत्ल हुआ तो उनकी विधवा आनंदीबाई ने अपने जागीरदार जयसिंह राव आबासाहेब घाटगे के पुत्र यशवंतराव को मार्च, 1884 ई. में गोद ले लिया। बाल्य-अवस्था में ही यशवंतराव को शाहूजी महाराज की हैसियत से कोल्हापुर रियासत की राजगद्दी को सम्भालना पड़ा। यद्यपि राज्य का नियंत्रण उनके हाथ में काफ़ी समय बाद अर्थात 2 अप्रैल, सन 1894 में आया था।

#विवाह
छत्रपति शाहूजीहू महाराज का विवाह बड़ौदा के मराठा सरदार खानवीकर की बेटी लक्ष्मीबाई से हुआ था।

#शिक्षा
शाहूजी महाराज की शिक्षा राजकोट के 'राजकुमार महाविद्यालय' और धारवाड़ में हुई थी। वे 1894 ई. में कोल्हापुर रियासत के राजा बने। उन्होंने देखा कि जातिवाद के कारण समाज का एक वर्ग पिस रहा है। अतः उन्होंने दलितों के उद्धार के लिए योजना बनाई और उस पर अमल आरंभ किया। छत्रपति शाहूजी महाराज ने दलित और पिछड़ी जाति के लोगों के लिए विद्यालय खोले और छात्रावास बनवाए। इससे उनमें शिक्षा का प्रचार हुआ और सामाजिक स्थिति बदलने लगी। परन्तु उच्च वर्ग के लोगों ने इसका विरोध किया। वे छत्रपति शाहूजी महाराज को अपना शत्रु समझने लगे। उनके पुरोहित तक ने यह कह दिया कि- "आप शूद्र हैं और शूद्र को वेद के मंत्र सुनने का अधिकार नहीं है। छत्रपति साहू महाराज ने इस सारे विरोध का डट कर सामना किया।

#यज्ञोपवीत_संस्कार
शाहूजी महाराज हर दिन बड़े सबेरे ही पास की नदी में स्नान करने जाया करते थे। परम्परा से चली आ रही प्रथा के अनुसार, इस दौरान ब्राह्मण पंडित मंत्रोच्चार किया करता था। एक दिन बंबई से पधारे प्रसिद्ध समाज सुधारक राजाराम शास्त्री भागवत भी उनके साथ हो लिए थे। महाराजा कोल्हापुर के स्नान के दौरान ब्राह्मण पंडित द्वारा मंत्रोच्चार किये गए श्लोक को सुनकर राजाराम शास्त्री अचम्भित रह गए। पूछे जाने पर ब्राह्मण पंडित ने कहा की- "चूँकि महाराजा शूद्र हैं, इसलिए वे वैदिक मंत्रोच्चार न कर पौराणिक मंत्रोच्चार करते है।" ब्राह्मण पंडित की बातें शाहूजी महाराज को अपमान जनक लगीं। उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया। महाराज शाहूजी के सिपहसालारों ने एक प्रसिद्ध ब्राह्मण पंडित नारायण भट्ट सेवेकरी को महाराजा का यज्ञोपवीत संस्कार करने को राजी किया। यह सन 1901 की घटना है। जब यह खबर कोल्हापुर के ब्राह्मणों को हुई तो वे बड़े कुपित हुए। उन्होंने नारायण भट्ट पर कई तरह की पाबंदी लगाने की धमकी दी। तब इस मामले पर शाहूजी महाराज ने राज-पुरोहित से सलाह ली, किंतु राज-पुरोहित ने भी इस दिशा में कुछ करने में अपनी असमर्थता प्रगट कर दी। इस पर शाहूजी महाराज ने गुस्सा होकर राज-पुरोहित को बर्खास्त कर दिया।

#आरक्षण_की_व्यवस्था
सन 1902 के मध्य में शाहूजी महाराज इंग्लैण्ड गए हुए थे। उन्होंने वहीं से एक आदेश जारी कर कोल्हापुर के अंतर्गत शासन-प्रशासन के 50 प्रतिशत पद पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिये। महाराज के इस आदेश से कोल्हापुर के ब्राह्मणों पर जैसे गाज गिर गयी। उल्लेखनीय है कि सन 1894 में, जब शाहूजी महाराज ने राज्य की बागडोर सम्भाली थी, उस समय कोल्हापुर के सामान्य प्रशासन में कुल 71 पदों में से 60 पर ब्राह्मण अधिकारी नियुक्त थे। इसी प्रकार लिपिकीय पद के 500 पदों में से मात्र 10 पर गैर-ब्राह्मण थे। शाहूजी महाराज द्वारा पिछड़ी जातियों को अवसर उपलब्ध कराने के कारण सन 1912 में 95 पदों में से ब्राह्मण अधिकारियों की संख्या अब 35 रह गई थी। सन 1903 में शाहूजी महाराज ने कोल्हापुर स्थित शंकराचार्य मठ की सम्पत्ति जप्त करने का आदेश दिया। दरअसल, मठ को राज्य के ख़ज़ाने से भारी मदद दी जाती थी। कोल्हापुर के पूर्व महाराजा द्वारा अगस्त, 1863 में प्रसारित एक आदेश के अनुसार, कोल्हापुर स्थित मठ के शंकराचार्य को अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति से पहले महाराजा से अनुमति लेनी आवश्यक थी, परन्तु तत्कालीन शंकराचार्य उक्त आदेश को दरकिनार करते हुए संकेश्वर मठ में रहने चले गए थे, जो कोल्हापुर रियासत के बाहर था।

#स्कूलों व छात्रावासों की स्थापना
मंत्री ब्राह्मण हो और राजा भी ब्राह्मण या क्षत्रिय हो तो किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन राजा की कुर्सी पर वैश्य या फिर शूद्र शख्स बैठा हो तो दिक्कत होती थी। छत्रपति शाहूजी महाराज क्षत्रिय नहीं, शूद्र मानी गयी कुर्मी से आते थे। कोल्हापुर रियासत के शासन-प्रशासन में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व नि:संदेह उनकी अभिनव पहल थी। छत्रपति शाहूजी महाराज ने सिर्फ यही नहीं किया, अपितु उन्होंने पिछड़ी जातियों समेत समाज के सभी वर्गों मराठा, महार, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ईसाई, मुस्लिम और जैन सभी के लिए अलग-अलग सरकारी संस्थाएँ खोलने की पहल की। शाहूजी महाराज ने उनके लिए स्कूल और छात्रावास खोलने के आदेश जारी किये। जातियों के आधार पर स्कूल और छात्रावास असहज लग सकते हैं, किंतु नि:संदेह यह अनूठी पहल थी उन जातियों को शिक्षित करने के लिए, जो सदियों से उपेक्षित थीं। उन्होंने दलित-पिछड़ी जातियों के बच्चों की शिक्षा के लिए ख़ास प्रयास किये थे। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। शाहूजी महाराज के प्रयासों का परिणाम उनके शासन में ही दिखने लग गया था। स्कूल और कॉलेजों में पढ़ने वाले पिछड़ी जातियों के लड़के-लड़कियों की संख्या में उल्लेखनीय प्रगति हुई थी। कोल्हापुर के महाराजा के तौर पर शाहूजी महाराज ने सभी जाति और वर्गों के लिए काम किया। उन्होंने 'प्रार्थना समाज' के लिए भी काफ़ी काम किया था। 'राजाराम कॉलेज' का प्रबंधन उन्होंने 'प्रार्थना समाज' को दिया था।

#कथन
छत्रपति शाहूजी महाराज के कार्यों से उनके विरोधी भयभीत थे और उन्हें जान से मारने की धमकियाँ दे रहे थे। इस पर उन्होंने कहा था कि- "वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से वे पीछे नहीं हट सकते।"
शाहूजी महाराज जी ने 15 जनवरी, 1919 के अपने आदेश में कहा था कि- "उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गाँव पंचायतों में भी दलित-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो, यह सुनिश्चित किया जाये। उनका स्पष्ट कहना था कि- "छुआछूत को बर्दास्त नहीं किया जायेगा। उच्च जातियों को दलित जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए। जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असम्भव है।"
15 अप्रैल, 1920 को नासिक में 'उदोजी विद्यार्थी' छात्रावास की नीव का पत्थर रखते हुए शाहूजी महाराज ने कहा था कि- "जातिवाद का अंत ज़रूरी है. जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा जाति है। जाति आधारित संगठनों के निहित स्वार्थ होते हैं। निश्चित रूप से ऐसे संगठनों को अपनी शक्ति का उपयोग जातियों को मजबूत करने के बजाय इनके खात्मे में करना चाहिए|"

#समानता की भावना
छत्रपति शाहूजी महाराज ने कोल्हापुर की नगरपालिका के चुनाव में अछूतों के लिए भी सीटें आरक्षित की थी। यह पहला मौका था की राज्य नगरपालिका का अध्यक्ष अस्पृश्य जाति से चुन कर आया था। उन्होंने हमेशा ही सभी जाति वर्गों के लोगों को समानता की नज़र से देखा। शाहूजी महाराज ने जब देखा कि अछूत-पिछड़ी जाति के छात्रों की राज्य के स्कूल-कॉलेजों में पर्याप्त संख्या हैं, तब उन्होंने एक आदेश से इनके लिए खुलवाये गए पृथक स्कूल और छात्रावासों को बंद करा करवा दिया और उन्हें सामान्य व उच्च जाति के छात्रों के साथ ही पढने की सुविधा प्रदान की।

#भीमराव_अम्बेडकर_के_मददगार
ये छत्रपति शाहूजी महाराज ही थे, जिन्होंने 'भारतीय संविधान' के निर्माण में महत्त्वपूर्व भूमिका निभाने वाले भीमराव अम्बेडकर को उच्च शिक्षा के लिए विलायत भेजने में अहम भूमिका अदा की। महाराजाधिराज को बालक भीमराव की तीक्ष्ण बुद्धि के बारे में पता चला तो वे खुद बालक भीमराव का पता लगाकर मुम्बई की सीमेंट परेल चाल में उनसे मिलने गए, ताकि उन्हें किसी सहायता की आवश्यकता हो तो दी जा सके। शाहूजी महाराज ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर के 'मूकनायक' समाचार पत्र के प्रकाशन में भी सहायता की। महाराजा के राज्य में कोल्हापुर के अन्दर ही दलित-पिछड़ी जातियों के दर्जनों समाचार पत्र और पत्रिकाएँ प्रकाशित होती थीं। सदियों से जिन लोगों को अपनी बात कहने का हक नहीं था, महाराजा के शासन-प्रशासन ने उन्हें बोलने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी थी।

#परिनिर्वाण
छत्रपति शाहूजी महाराज का निधन 6 मई, 1922 मुम्बई में हुआ। महाराज ने पुनर्विवाह को क़ानूनी मान्यता दी थी। उनका समाज के किसी भी वर्ग से किसी भी प्रकार का द्वेष नहीं था। शाहूजी महाराज के मन में दलित वर्ग के प्रति गहरा लगाव था। उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की दिशा में जो क्रन्तिकारी उपाय किये थे, वह इतिहास में याद रखे जायेंगे।

#अन्य_जानकारी
ब्रिटिश कालीन भारत के 10 सर्वाधिक प्रभावशाली राज्यों मे से एक कोल्हापुर के शासक थे, राजऋषि छत्रपति शाहूजी महाराज। उनके शासनकाल मे लिये गये जनकल्याणकारी फैंसलों की गूंज लंदन तक सुनाई पड़ती थी। उनकी लोककत्याणकारी नीतियों से प्रभावित होकर कैंब्रिज यूनीवर्सिटी ने उन्हें डाॅक्टर ऑफ लाॅ ('LLD) की उपाधि से सम्मानित किया। ऐसे महापुरुष को शत-शत नमन।

सयाजी राजे गायकवाड़, गंगाधर तिलक, गाँधी जी और अंबेडकर पर उनका गहरा प्रभाव था। उन्होंने अपने जीवन काल मे हर एक अपराधी को उचित दंड और हर विद्वान को यथायोग्य सत्कार दिया। धूर्त लोगों की कुटिलता को सही दंड देने मे वह कभी पछे नहीं रहे, भले ही अपराधी शंकराचार्य के पद पर ही क्यों न बैठा हो।

महाराजा कोल्हापुर का यह दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा मे मानव समाज के सभी दुःखों को हरने की अपार शक्ति है। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने अपने राज्यक्षेत्र मे सभी के लिए निशुल्क अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करवाई। माध्यमिक व उच्च शिक्षा केलिए कोल्हापुर शहर मे महाराजा ने 22 छात्रावासों का निर्माण कराया।

कोल्हापुर राज्य को सूखे और बाढ़ से निजात दिलाने के लिए उन्होंने प्रख्यात इंजीनियर विश्वेशरैया जी से एक विशालकाय बांध का निर्माण करवया। इस बाध की सिचाई सुविधाओं का लाभ कोल्हापुर के किसान आज भी ले रहे हैं। कृषि के उचित प्रबंधन केलिए उन्होंने कई यूरोपीय विशेषज्ञों को अपनी राजकीय सेवा में रखा हुआ था।

अछूत समझे जाने वाले समाज के लोगों को समाज की मुख्यधारा जोड़ने के लिए उनका सर्वाधिक क्रांतिकारी निर्णय था उस समाज के लोगों को संपत्ति और भूमि का अधिकार देना। उन्होंने अनेकों दलितों को भूमिधरी स्तर प्रदान किया।

विठ्ठलभाई पटेल का हिंदू कोड बिल नेशनल असेंषली मे अस्वीकृत होने पर भी कोल्हापुर पहला ऐसा राज्य बना जहाँ हिंदू कोड बिल प्रभाव मे आया। इसके माध्यम से महाराजा ने विधवा पुनर्विवाह पर जोर दिया। उनके द्वारा शुरू किये गये अनेकानेक प्रयास आधुनिक भारत के निर्माण मे नींव का पत्थर साबित हुए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, उनके अधिकांश प्रकल्पों को भारत के समग्र विकास के लिये उपयोगी व प्रभावी मानते हुए स्वीकृति प्रदान की गई।

परजीवी समाज के निकम्मेपन को खत्म करने तथा राजकीय सेवाओं मे दक्षता और पारदर्शिता लाने के लिए उन्होंने श्रमजीवी समाज के लोगों को राजकीय सेवा मे लेना सुरू किया। इस उद्देश्य मे अड़चन डालने वालों को किनारे करने के लिए महाराजा ने राजकीय सेवाओं मे श्रमजीवी समाज के लोगों केलिए पहले 50% और फिर बाद मे 90% आरक्षण की व्यवस्था लागू की। लेकिन आरक्षण लागू करते हुए महाराजा ने कभी भी दक्षता और कार्यकुशलता से समझौता नहीं किया। आरक्षण लागू करते समय उन्होंने यह कभी नहीं सोचा होगा कि उनका अपना समाज भी इतना कमजोर और लाचार सो जाएगा कि उसे भी आरक्षण की जरूरत पड़ेगी।

शिक्षा की समुचित व्यवस्था मे अपना सहयोग प्रदान कर हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं। उनका कहना था
ै_होंऊगा, न_आप होंगे, न राजा होंगे, न रजवाड़े होंगे। मगर यह राष्ट्र हमेशा रहेगा और हमे इसको आगे बढ़ाने का काम करते रहना है। समाज मे सबको सम्मान मिले, सभी शिक्षित होकर राष्ट्र के उत्थान मे भागीदार बनें। तभी हमारा जीवन सफल माना जायेगा।"

🔺👉भारत में सच्चे प्रजातंत्रवादी और समाज सुधारक छत्रपति शाहूजी महाराज (26 जून 1874; 6 मई, 1922) की पुण्यतिथि पर साथी मिशन परिवार कोटिशः वंदन एवम नमन करता है..👏👏
नमो बुद्धाय जय भीम जय भारत जय संविधान 🤝🇮🇳🇮🇳
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