28/01/2026
❤️🙏 जय जय श्री राधे कृष्णा मेरे प्यारे भाइयों बहनों ❤️
🙏 जब तक हम जीवात्माएं भगवान की शरणागत ना हो जाएं तब तक भगवान की "माया " हमें मनमाने ढंग से नचाती रहती है
हम जो भी कर्म करते हैं उसमें काम, क्रोध,लोभ, मोह और अहंकार में से किसी एक की भूमिका मुख्य होती है।
🙏जो हम जीवात्माओं को जन्म-जन्मान्तर तक भटकाने के लिए प्रयाप्त है।
🙏 परन्तु जब हम भगवान को सर्वोत्तम सहारा मानकर भगवान के शरणागत हो जाते हैं तो भगवान की यही माया हमें परम शांति और मोक्ष की और ले जाती है।
🙏 भगवान की सर्वश्रेष्ठ कृपाऐं इतनी सहजता से किसी और साधना से नहीं मिलती है।
🙏 इसीलिए श्री भगवान ने भागवत गीता में अर्जुन को अपना अंतिम उपदेश यही दिया कि ~
"अब तक मैंने जितने भी ज्ञान पूजा पाठ साधना की जो भी विधियां बताई हैं सब भूल जाओ
*केवल एक अबोध बालक की भांति मेरी शरण में आ जाओ मैं इतने में ही तुम्हें तुम्हारे समस्त पापों से मुक्त करके शांति और मोक्ष प्रदान कर दूंगा।
🙏 अपने प्रियजनों और बच्चों का जीवन भी भगवान के द्वारा आरक्षित सुरक्षित तथा भटकाव रहित बनाने के लिए
🙏 महीने में एक बार ही सही इस संकल्प को जल अर्पण करते कराते हुए जरूर कीजिए करवाइएग।
🙏"हे भगवान" "हे जगदीश्वर" अब इस जीवन नैया की पतवार आपको सौंपता हूं मुझे अब आप ही संभालिए ।
🙏 क्योंकि हमारी सन्तान भी वास्तव में एक जीवात्मा ही हैं।
जो कलयुगी प्रभाव से अपने ही कर्मानुसार भले-बुरे प्रारब्ध और अवगुणों को भी लेकर जन्मे हैं।
अतः कब कौन सी अनहोनी और दुर्गुण उनके जीवन को प्रभावित करे उससे पूर्व ही उन्हें भगवान के द्वारा आरछित सुरक्षित करा दें।
🙏क्योंकि एक भगवान के अतिरिक्त कोई और हमारे दुर्भाग्य को टाल नहीं सकता।
🙏 बच्चों से ऐसा कराने से बच्चे विवेकशील हो जाते हैं
जिसके कारण उनका अवगुण समाप्त होने लगते हैं तथा कर्म और आचरण शुद्ध होने लगता है।
🙏 ऐसा कई बच्चों में प्रयोग सिद्ध पाया।
🙏 जब तक हम जीवात्माएं अपने अहं अहंकार से जुड़े होते हैं तब तक "श्री भगवान" कुछ नहीं करते हैं।
🙏परंतु जब हम पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से अपने जीवन नैया की पतवार प्रभु जी को सौंप देते हैं तो वहीं से प्रभु जी हमारा हाथ थाम लेते हैं
🙏 फिर वही होता है जो श्री भगवान चाहते हैं।
❤️जो कि हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ होता है♥️
🤔 समर्पण,शरणागति क्या है 🤔 क्या ये कोई पूजा साधना है
🙏 समर्पण तो स्वयं को परमात्मा के प्रति अर्पण करने का एक विशुद्ध भाव मात्र है ।
🙏 जिसमें हमें अपनी संपूर्ण इच्छाएं-कामनाएं, अपने संपूर्ण कर्मों का कर्ता भाव परमात्मा को अर्पण करना होता है😊
🙏 यदि हमारी पूजा साधनाओं में समर्पण भाव का योग हो तो हमारी भक्ति विशुद्ध हो जाती है
🙏जो कि भगवान को अति प्रिय है❤️
❤🙏 प्रेम से बोलो जय श्री हरि 🙏❤