पंक्तिपावन समाज फाउंडेशन

  • Home
  • India
  • Gorakhpur
  • पंक्तिपावन समाज फाउंडेशन

पंक्तिपावन समाज फाउंडेशन इस ग्रुप का उद्देश्य पंक्ति पावन समाज की परंपरा और संस्कार का रक्षण तथा उसे पल्लवित पुष्पित करना है

06/04/2025

नवरात्रि हवन विशेष.. ध्यान दे 🙏
चंडीपाठ में कवच, अर्गला, कीलक और कुंजिका स्तोत्र से हवन नहीं करना चाहिए सप्रमाण प्रस्तुति~

यो मूर्खः कवचं हुत्वा प्रतिवाचं नरेश्वरः । स्वदेह - पतनं तस्य नरकं च प्रपद्यते ।। अन्धकश्चैव महादैत्यो दुर्गाहोम-परायणः । कवचाहुति - प्रभावेण महेशेन निपातितः ।।

कवच में पाहि, अवतु, रक्ष रक्ष, रक्षतु, पातु आदि शब्दों का प्रयोग हुआ रहता है। सप्तशती के चतुर्थ अध्याय के 4 मंत्र से इसी कारण होम नहीं होता है।

#सिद्ध_कुंजिका स्तोत्र का होम न करने की आज्ञा स्वयं महादेव नें दी है इसका प्रथम कारण है की, कुंजिका देवी सिद्धियों की एकमात्र कुंजी है। ओर कुंजी का रक्षण किया जाता है आहूत नहीं किया जा सकता ।

यदि यदि कुंजी का ही लोप हो जाएगा तो सिद्धी के द्वार का खुलना असम्भव हो जाएगा । दूसरा कारण यह की सप्तशती में आता है की याचना स्तोत्र, कवच एवं कवच मन्त्रों की आहुति नहीं की जाती अन्यथा विनाश ही होता है।
|| ्रमाण ||

कवचं वार्गलाचैव,कीलकोकुंजिकास्तथा । स्वप्नेकुर्वन्नहोमं च, जुहुयात्सर्वत्रनष्ट्यतेः ।।

भगवान शिव भैरव स्वरूप में स्थित होकर कहते हैं !

कवच, अर्गला, कीलक, तथा कुंजिका का होम स्वप्न में भी न करें स्वप्न मात्र में भी होम करने से सर्वत्र नाश की संभावनाएँ प्रकट हो जाती है।

बुद्धिनाषोहुजेत् देवि,अर्गलाऽनर्गलोभवेत् ।

सिद्धीर्नाषगतः #होता, विद्यां च विस्मृतोर्भभवेत् ।।

अर्गला के होमकर्म से सिद्धीयों का नाश हो जाता है। तथा होता की समस्त विद्याएँ विस्मृत हो जाती है, अर्गला अनर्गल सिद्ध हो जाती है।

कीलितोजायतेमन्त्रः, होमे वा कीलकस्तथा ।
ममकण्ठसमंयस्यः, कीलकोत्कीलकं हि च ।।

कीलक के होमकर्म से होता के समस्त मन्त्र सदा सर्वदा के लिए कीलित हो जाते हैं ।

इसे मेरा उत्किलित कण्ठ ही जानें जो जो कीलक का कारक है

धनधान्ययुतंभद्रे, पुत्रः प्राणः विनष्यतेः ।
रोगशोकोव्रितेः कृत्वा, कवचंहोमकर्मणः ।।

कवच के होम से धन, धान्य, पुत्र तथा प्राण का विनाश निश्चित है एवं वह होता रोग तथा शोकों से घिर जाता है।

स्वप्ने वा हुज्यते देवि,कुंजिकायं च कुंजिकां ।
षड्मासे च भवेन्मृत्यु, सत्यं सत्यं न संशयः ।
होमे च कुंजिकायास्तु,सकुटुम्बंविनाश्यतीः ।
स्वप्ने वा हुज्यते देवि, कुंजिकायं च कुंजिकां ।

षड्मासे च भवेन्मृत्यु, सत्यं सत्यं न संशयः ।
होमे च कुंजिकायास्तु, सकुटुम्बंविनाश्यतीः ।

कुंजिका के होमकर्म के प्रभाव से होता की छः मास में मृत्यु निश्चित जानें तथा होता का सकूटुंब विनाश हो जाता है यह सत्य है परम सत्य है इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए ।

■ यस्यं च दोषमात्रेण, प्रसन्नामृत्युदेवताः । कुंजिकाहोममात्रेण, रावणःप्रलयंगतः ।।

इसी के दोष से मृत्युदेवता अत्यंत प्रसन्न होकर होता का सकूटुंब भक्षण करते हैं।

कुंजिका के होममात्र के प्रभाव से ही रावण का सम्पूर्ण विनाश सम्भव हुआ ।

भैरवयामले भैरवभैरवी संवादे ।। चतुर्विंश प्रभागे होमप्रकरणे ।।

■मातृकाः बीजसंयुक्ताः, प्राणाप्राणविबोधिनी । प्राणदाः कुंजिकाः मायां, सर्वप्राणः प्रभाविनी ।।

कुंजिका में बीज मातृकाएँ उपस्थित हैं । प्राण को देविप्राण का बोधप्रदान करती हैं। यह प्राणज्ञान प्रदान करने वाली महामाया कुंजिका प्राण को प्रभावित करने वाली हैं।
।। शक्तियामले शक्तिहोमप्रकरणे ।।विदुषामनुचरः ।।
कुछ विद्वानों तांत्रिकों का मानना है कि करना चाहिए उनका अपना प्रकरण है ,तो वह उनकी मनसा है ,

भूपेंद्रानंद महाराज की फेसबुक वाल से उपयोगी जानकारी🌷🙏💐🌹

बहुमूल्य एवम अति आवश्यक जानने योग्य ,🙏🙏💐💐💐🌹🚩
05/04/2025

बहुमूल्य एवम अति आवश्यक जानने योग्य ,🙏🙏💐💐💐🌹🚩

30/03/2025
30/03/2025

🕉️ एक अत्यंत दुखद सूचना -हमारे बड़े भाई श्री अरूणेन्द्र प्रसाद त्रिपाठी जीकी धर्मपत्नी, कृपा शंकर त्रिपाठी मनोज की माता जी का अभी-अभी देहावसान हो गया ! परमपिता परमेश्वर श्री चरणों में स्थान देते हुए मोक्ष प्रदान करें 👏
चंद्रप्रकाश त्रिपाठी मदनपुर वरिष्ठ उपाध्यक्ष फाउंडेशन परिवार !

29/03/2025

#शिखाविचार

*॥ शिखा बन्धनस्य आवश्यकता॥*

*स्नाने दाने जपे होमे सन्ध्यायां देवतार्चने ।*
*शिखाग्रन्थिं सदा कुर्यादित्येतन्मनुरब्रवीत् ॥*
मनुसंहिता

स्नान, दान, जप, होम और देव पूजन में सर्वदा शिखा बाँधना चाहिए ।

*॥शिखाबन्धन - विधिः ॥*
*शिखीवच्छिखया भाव्यं ब्रह्मावर्तनिबद्धया ।*
*प्रदक्षिणं द्विरावर्त्य पाशान्तः सम्प्रवेशनात् ॥*
*प्रथमं द्विगुणं कृत्वा ब्रह्मावर्त मितीरितम् ।*
गायत्रीजपनं निबन्धने ॥

कुर्याच्छिखायाश्च इति कौथुमि:

शिखा को दुगना करके प्रदक्षिण क्रम घुमाकर उसमें ब्रह्मग्रन्थि लगा दे। मयूर के शिखा के समान शिखा होनी चाहिये।
पहले दुगना किया हुआ को ब्रह्मग्रन्थि कहा गया है। गायत्री मन्त्रका जप करते हुए शिखा को बाँधना चाहिये ।

*विप्रादिकानां खलु मुष्टिमेय-*
*केशाः शिखा स्यादधिका न तेन।*
*द्विधा त्रिधा वापि विभज्य बन्धो*
*ह्यल्पास्ततोऽल्पापि न लम्बितानि ॥*

ब्राह्मणों कि शिखा मुष्टि में आने योग्य होनी चाहिये। दुगना या तिगुना करके बाँधना चाहिये। शिखा बहुत अधिक लम्बी और छोटी भी न हो ।

*गायत्र्या तु शिखां बद्धवा नैर्ऋत्यां ब्रह्मरन्ध्रतः ।*
*जूटिकाश्च ततो बद्ध्वा ततः कर्म समारभेत्॥*
*निबद्धशिख आसीनो द्विज आचमनं चरेत् ।*
*कृत्वोपवीतं सव्येंऽशे वाङ्मनःकायसंयतः ॥* मनुः

गायत्री मन्त्र द्वारा शिखा बाँधकर और ब्रह्मरन्ध्रसे नैऋत्यकोण में जटा बाँधकर शुभ कर्म प्रारम्भ करें । द्विज बैठकर शिखा बाँधकर आचमन करें। पश्चात् वाणी मन और शरीर को संयत कर अपने बायें कन्धे में यज्ञोपपवीत धारण करें।

*शिखाबन्धन मन्त्र(वैदिक)*
*मानस्तोक इति मन्त्रस्य कुत्स ऋषिः जगती छन्दः एको रुद्रो देवता शिखा बन्धने विनियोगः ।*

मन्त्रः - *ॐ मानस्तोके तनये मान आयुषिमानो गोषु मानो अश्वेषु रीरिषः । मानोव्वीराननुद्रभामिनो बधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥*

पौराणिक मन्त्रः -
*ॐ चिद्रूपिणि महामाये दिव्य तेजः समन्विते ।*
*तिष्ठ देवि शिखाबन्धे तेजो वृद्धिं कुरुष्व मे ॥*

हाथ में जल लेकर 'मानस्तोक से विनियोग' तक पढ़कर जल छोड़कर ‘ॐ मानस्तोके' इत्यादि मन्त्र अथवा 'ॐ चिद्रूपिणि' मन्त्र पढ़कर शिखा को बाँधे ।

*॥मन्त्रं बिना शिखा बन्धने दोषः॥*
*अमन्त्रो दीयते ग्रन्थिर्जपो होमो वृथा भवेत्* ।
*स्मृत्वोङ्कारञ्च गायत्रीं निबध्नीयाच्छिखां ततः ।*
नागदेवः

प्रणव और गायत्री मन्त्र पढ़कर शिखा बाँधनी चाहिये । बिना मन्त्र पढ़े शिखा बाँधी गयी हो तो जप होम आदि निष्फल होता है।

*॥ मुक्त-शिखस्य स्नान- निषेधः॥*
*मुक्तकेशैर्न कर्तव्यं प्रेतस्नानं क्वचित् ।*
*बिना स्नानं दानं जपं होमं मुक्तकेशं न कारयेत् ॥* वृद्ध वशिष्ठः

खुली हुई शिखा रखकर स्नान, दान, जप, हवन नहीं करना चाहिये । खुली शिखा रखकर जो स्नान किया जाता है, उसे प्रेतस्नान कहते हैं ।

*॥ कुत्र शिखां न बध्नीयात् ॥*

*स्नाने च भोजने चैव तथा मूत्रपुरीषयोः ।*
*मैथुने च शवस्कन्धे शिखा षट्सु विसर्जयेत् ॥*

स्नान, भोजन तथा लघुशंका, पाखाना, मैथुन व मुर्दा ढोने के समय शिखा खोल देनी चाहिए। (मात्र दशगात्र स्नानमें शिखा खोलकर स्नान करना चाहिए)।

*॥ शिखा - मोचन मन्त्रः ॥*

*ब्रह्मपाशसहस्त्रेण रुद्रशूलशतेन च।*
*विष्णुचक्रसहस्त्रेण शिखामुक्तिं शिखामुक्तिं करोम्यहम् ॥*
*गच्छन्तु सकला देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।*
*तिष्ठत्ववाचला लक्ष्मीः शिखामुक्तं करोम्यहम् ॥*
आह्निकतत्त्वम् ॥

*॥ मरण-सूतके शिखा-वपन-विचारः ॥*

*मुण्डयेत् सर्वगात्राणि कक्षोपस्थशिखां न हि ।*

कांख, नीचे का बाल (गुह्य स्थान ) व शिखा को छोड़कर मरणाशौच में शिर का बाल, दाढ़ी मूँछ बनवा देना चाहिए।

*अशौचान्तकृत्ये सर्वेषां वपनं नखलोमयोः ।*
*स्त्रीणां तु मुण्डनं नैव नखच्छेदनकेवलम् ॥* *मुखमूर्ध्निस्थितान् केशान् शिखावर्जन्तु वापयेत् ॥*
बृहस्पतिः

अशौच के अन्त में सभी लोगों को नख और बालों को बनवाना चाहिए। स्त्रियों का मुण्डन न कराकर केवल नख कटवा दे, तथा पुरुषों शिखा को छोड़कर मूछ, दाढ़ी तथा शिर के बाल बनवा देना चाहिए।

*॥ ज्ञानतोऽज्ञानतो वा शिखाच्छेदने विचारः ॥*

*शिखां छिन्दन्ति ये मोहाद् द्वेषादज्ञानतोऽपि वा ।* *तप्तकृच्छ्रेण शुध्यन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥*

इति हारीतेन शिखा नाशे प्रायश्चित्ताभिधानाच्च । मोहात् — प्रमादात् । द्वेषात् स्त्र्यादिकलहे क्रोधाद्यावेशात् । अज्ञानत: - शिखा - नित्यत्वाज्ञानात्' ।

शिखा को जो मोह (प्रमाद) द्वेष (स्त्री आदि से कलह में क्रोधादि आवेश) अज्ञान (शिखा नित्य ही रखनी चाहिए, ऐसा ज्ञान न होने से) कटवा देते हैं, उनको तप्तकृच्छ्र प्रायश्चित्त हारीत महर्षि ने बतलाया है।

*।। शिखाऽभावे प्रतिनिधि-विचारः ॥*

*शिखानाशे तत्-प्रतिनिधिरुक्तः । काठकगृह्ये । अथ चेत् प्रमादान्निः शिखं वपनं स्यात्तदा कौश शिखां ब्रह्मग्रन्थि-समन्वितां दक्षिण कर्णो परिआशिखा बन्धादवतिष्ठेत् ।* शिखा के अभाव में कुश की शिखा ब्रह्मग्रन्थियुक्त दहिने कान पर तबतक रखें, जबतक बाँधने योग्य शिखा न बढ़ जाय ।

*॥ स्त्री-शूद्रयोः शिखा - विचारः ॥*

*स्त्री-शूद्रौ तु शिखां छित्वा क्रोधाद् वैराग्यतोऽपि वा ।* *प्राजापत्यं प्रकुर्यातां निष्कृतिर्नाऽन्यथा भवेत् ।।*
हारीतः

*ततश्च द्विजस्त्रीसच्छूद्रौ देशाचारव्यवस्थया शिखां धारयेताम् ।*

क्रोध या वैराग्य (क्षणिक वैराग्य) से जो स्त्री व शूद्र शिखा को कटवा देते हैं । उनको प्रायश्चित्त के लिए प्राजापत्य व्रत कराना चाहिए। और कोई उपाय नहीं है। अथवा देशाचार से व्यवस्था करनी चाहिए।

*_॥ शिखा-प्रमाणम् ॥_*

*चतुरङ्गुल-विस्तारं शिखा-मूलं द्विजन्मनः ।*
*राज्ञः पञ्चाङ्गुलं न्यासं वैश्यानां वै तथैव च ॥*
*स्थापयेयुः शिरोमध्ये शिखां सर्वे द्विजातयः ।* *स्वऋष्युक्त-स्थले वाऽपि खल्वाटस्य न चोदितः ॥*
भारद्वाज - स्मृति ॥

ब्राह्मण के लिए शिखा का मूल चार अङ्गुल एवं क्षत्रिय वैश्य के लिए पांच अङ्गुल रहना चाहिए। अपने ऋषियों द्वारा कहे गये स्थल पर सभी द्विजातीय शिर के मध्य में शिखा रखें। जिसके शिर पर बाल नहीं उनके लिए नियम नहीं हैं । (विशेष - शिखा के अभाव में प्रतिनिधि विचार में कहा गया है ।)

*॥ शूद्र-शिखा बन्धनस्य- मन्त्रः॥*

*ब्रह्मवाणीसहस्राणि शिववाणी तथैव च।*
*विष्णोर्नामसहस्रेण शिखाबन्धं करोम्यहम् ॥*
आह्निकतत्त्वे ॥

*ब्रह्मवाणी-* इस मन्त्र को पढ़कर समयानुसार शूद्रशिखा को बाँधे।

*॥ अथोपनयने शिखा रहित क्षौर- विचारः ॥*

*'ब्राह्मणान् भोजयेत्तञ्च पर्य्युप्त-शिरसम् अलङ्कृतमानयन्ति । पारस्कर गृह्यसूत्रम् - अत्र कर्काचार्य:- पर्युप्तं शिरोऽस्य इति पर्युप्त-शिराः तम् आनयन्ति जयरामाचार्य्यः - " तत्र कुमारं पर्युप्तशिरसंमुण्डित-मुण्डम् भोजयेत्, "परिपूर्वी वपतिर्मुण्डने "*

यज्ञोपवीत में शिखा रहित क्षौर विचार - उपर्युक्त वचन पारस्कर गृहसूत्र के भाष्यकार कर्काचार्यादि के वचनानुसार उपनयन में शिखा छोड़कर शिर का क्षौर कराना चाहिए ।

*॥ ब्रह्मचारि क्षौर-विचारः ॥*

*मुण्डो वा जटिलो वा स्यादथवास्याच्छिखाजट : ' ॥*

*मुण्ड - मुण्डित - मस्तकः । मनुः ॥ .
*जटिल - शिरः - केश- जटावान् वा ।
*शिखा जट:* - शिखैव या जटा जाता यस्य वा । ।

ब्रह्मचारी मस्तक के सभी बाल तथा दाढ़ी मूँछ के सभी बाल बनवावें । अथवा शिर के सभी बाल रखवाकर जटाधारी रहें । अथवाशिखा ही जटा रखे, शेष बनवा दें। तीन प्रकार का विधान ही ब्रह्मचारियों के लिए है ।

*मासि मासि गृहस्थस्य पक्षे पक्षे च यज्वनः ।*
*ऋतावृतौ यतीनां तु यथेष्टं ब्रह्मचारिणाम् ॥*
वशिष्ठः ॥

गृहस्थों का एक-एक मासों में (शुभ मुर्हत ) अग्निहोत्री को अमावास्या और पूर्णिमा, यति लोगों का प्रत्येक ऋतुओं में तथा ब्रह्मचारी को अपने इच्छानुसार समय से क्षौर कराना चाहिए ।

*॥ गृहस्थ- क्षौर-विचारः ॥*

*गृहस्थानां क्षौरे वर्ज्यकालाः*

*कुम्भे कर्कटके वापि कन्यायां कार्मुके रवौ ।*
*रोम - खण्डं गृहस्थस्य पितॄन् प्राशयते यमः ' ॥*
सुमन्तुः

सूर्य के कुम्भ, कर्क, कन्या, धनु राशिस्थ होने पर गृहस्थों को बाल नहीं बनवाना चाहिए, क्योंकि उन कटे बालों को यमराज पितरों के मुख में डाल देते हैं । उक्त वचन का बाधक वचन-

*कुम्भे पादं धनुष्यर्थं कर्के पादत्रयन्तथा ।*
*सर्वांकन्यां परित्यज्य क्षौरकर्मविधीयते ॥*
सुमन्तुः

पाठान्तरम्--
*सर्वां कन्यां परित्यज्य अर्द्धकर्कटकं त्यजेत् ।*
*धनुः कुम्भौ त्रिधा कृत्वा पूर्वभागं परित्यजेत् ॥*

कुम्भ के प्रथम पाद, धनु के दो पाद, कर्क के तीन पाद तथा कन्या के चारों पादों को छोड़कर बाल बनवाना चाहिए । कुछ विद्वानों का मत है कि यह जीवत्पितृ विषयक नहीं है। पाठान्तर -
कन्या के चारों पाद, कर्क दो पाद, धनु व कुम्भ के चार पादों में तीन भाग करके पूर्व भाग छोड़कर बाल बनवाना चाहिए। न्यायविदोंका मत है कि - सर्व साधारण के लिए उक्त नियम है।

*मासे मासे गृहस्थानां पक्षे पक्षे च यज्वनाम् ।*
*ऋतावृतौ यतीनां क्षौरकर्मविधीयते ॥*
गृहस्थों को प्रत्येक मासों ( शुभ मुहूर्त) अग्रिहोत्रादि कर्ताओं को प्रत्येक पक्षों यतियों को प्रत्येक ऋतुओं (दो-दो मासों) में क्षौर कराना शास्त्र सम्मत है ।

*॥ वानप्रस्थ क्षौर-विचारः ॥*

*होमस्त्रिषवणस्त्रानं जटावल्कलधारणम् ।*
*वन्यस्नेहनिषेवित्वं वानप्रस्थ विधिस्त्वयम् ॥*

अग्निहोत्र होम, त्रिकालस्नान, जटावल्कल धारण वन के इंगुदि आदि फलों के तेल का सेवन करना वानप्रस्थ का यही नियम है।
व्यास उवाच-
*जटाश्च विभृयान्नित्यं नखरोमाणि नो त्यजेत् ।*
*स्वाध्यायं सर्वदा कुर्यात् नियच्छेद्वाचमन्यतः ' ॥*
व्यास का वचन-
नित्य जटा का धारण नख रोम को न कटावें । नित्य स्वाध्याय करें, विधि से अतिरिक्त वाणी पर संयम रखें। (भागवत सप्तम् स्कन्ध, १२ अध्याय, २१ श्लोक व एकादश स्कन्द १८ अध्याय ३ श्लोक देखें)

25/03/2025

*क्या है ब्राह्मणवाद ?*

जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य जी ने भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर में दो व्यवस्थाएं दीं -
प्रथम👉🏻 प्रभु का भोग रोज मिट्टी के नए पात्र में बनेगा, दूसरे👉🏻 प्रभु की रथ यात्रा हर वर्ष नए रथ से होगी।

ढाई हजार वर्ष पहले स्थापित इस परंपरा ने करोड़ो कुंभकार और काष्ठकार परिवार की जीविका सुरक्षित कर दी। आज भी है। दुनिया कोई कारपोरेट, हुकूमत यह कार्य ना कर सकी है और ना कर पाएगी।
*यह ब्राह्मणवाद है।*

देखिए, समझिए अपने आसपास के समाज को। सत्य आपके सामने बिखरा हुआ है।

*ब्राह्मण प्रदत्त अर्थव्यवस्था: * त्योहार और GDP :*
.. देश भर में वर्ष पर्यन्त ब्राह्मणों द्वारा प्रवर्तित 60 महत्वपूर्ण त्योहार मनाए जाते हैं... इन त्योहारों में लगभग 10 लाख करोड़ का व्यापार पूरे देश में होता है और वर्ष पर्यन्त इन त्योहारों की अर्थव्यवस्था से लगभग 10 करोड़ लोगों को रोज़गार मिलता है...... इसीतरह देश में छोटे बड़े मिलाकर कुल 5 लाख हिंदू मंदिर हैं जिनमें प्रत्येक मन्दिर से औसतन 1000 परिवारों का व्यवसाय चलता है और भरण पोषण होता है...! .... इन त्योहारों और मंदिरों से जुड़े व्यवसायों से 90% लाभ कमज़ोर वर्गों के लोगों को ही मिलता है......... ब्राह्मणप्रणीत धर्म समाप्त हो जाय तो इन 25 करोड़ लोगों का भरण पोषण नेता और अधिकारी करेंगे क्या ??. शौचालय बनाइए मगर “देवालय से पहले शौचालय” जैसी विकास विरोधी बातें दिमाग़ से निकाल दीजिए !! ...... इसलिए देश की अर्थव्यवस्था को समृद्ध बनाने वाले और समाज के कमज़ोर वर्गों को वर्ष पर्यन्त रोज़गार दिलाने वाले #ब्रह्मवाद को प्रणाम करना भी सीखिए !!
>>>>>>>.. एते ब्रह्मवादिन: वदंति !!
~~~~~~~~~~~~~
आपने फेसबुक पर बहुत सुना होगा पंडे-पुरोहित समाज को लूट रहे हैं ,इनका बहिष्कार करो आदि आदि ।

*आइये जानते हैं पंडे-पुरोहित सदियों से क्या करते आये हैं ।*

किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होता है अर्थ और पुरोहित इसी अर्थ को मजबूती प्रदान करते आये हैं ,आप कह सकते हैं पुरोहित एक तरह मार्केटिंग का कार्य करते हैं । सत्यनारायण की कथा हो या नूतनगृहप्रतिष्ठा हो अथवा विवाहादि मांगलिक संस्कार पुरोहित आपके अर्थ को मजबूती प्रदान करने का कार्य करते हैं । ...भगवान् सत्यनारायण की कथाका उद्देश्य आत्मरंजन करना है ,इससे हम भगवान् की भक्ति तो करते ही हैं ,साथ ही अर्थ को मजबूती भी प्रदान करते हैं। एक पुरोहित से जब सत्यनारायण की कथा कराते हैं ,तब वे जो सामग्री की सूची देते हैं ,उस पर कभी ध्यान दिया आपने ? सबसे पहले नवीन मिट्टी के कलश लेकर आओ ,उसके ढँकने के लिये मिट्ठी का पात्र लेकर आओ । सत्यनारायण की कथा में ऐसे पांच कलशों की स्थापना होती है -
*"पञ्चभि: कलशैर्जुष्टं कदलीतोरणान्वितम् ।"* (भविष्यपुराण )

जब ये नवीन कलश खरीदे जाएँगे तब किसका लाभ होगा ? *कुम्भकार* का । तो पुरोहित ने किसके अर्थ की मार्केटिंग की ?
*अब पुरोहितजी कहे काष्ठ की चौकी लेकर आओ ।*
किसका अर्थ लाभ होगा उससे ? *काष्ठकारको* । तो किसकी मार्केटिंग की पुरोहित ने ?

पुरोहित कहते हैं चौकी पर बिछाने के लिये पीला
वस्त्र मँगाते हैं । किसको वृत्ति का लाभ होगा ?
*जुलाहे या बुनकर का ।*
.....अग्निहोत्र करने के लिये ब्राह्मणोंके लिये सबसे पवित्र अन्न क्या है ? दान में प्राप्त अन्न इतना पवित्र नहीं है ,शिलोञ्छ्रवृत्ति (फसल कट जाने पर खेत से अनाज चुनकर लाना ) का अन्न ही अति पवित्र है ,फिर भण्डारगृह (अनाज मंडी) आदि का अन्न अग्निहोत्रके लिये पवित्र कैसे हो सकता है ? इसीलिये भगवत् आराधनके लिये वस्त्र भी बुनकरके यहाँ से लाया हुआ पवित्र है ,न कि किसी बजाज के यहाँ लाया हुआ । पीले वस्त्र से पुरोहित ने किसकी वृत्ति की मार्केटिंग की ?

पुरोहितजी भगवान् शालग्रामके अभिषेक के लिये पंचामृत के लिये दूध ,दही ,मधु आदि मँगाते हैं । दूध से किसकी वृत्ति को लाभ हुआ ? *गोपालकों* को।

मधु आजकल की तरह चासनी वाला तो पूजा में प्रयोग होता नहीं है ,तो मधु निकालने वाले से मधु मंगाया जाता है ,तब किसको वृत्ति का लाभ हुआ ? पुरोहित ने किसकी वृत्तिकी मार्केटिंग की ? पुरोहितजी भगवान् सत्यनारायण के लिये कच्चा सूत और मोली मंगाते हैं। इससे किसकी वृत्ति को लाभ हुआ ? सूतकातने वाले का । पुष्प और मालाओं को मंगाकर किसके वृत्ति की व्यवस्था की पुरोहित ने ? *मालाकार की ।* धूप-दीप से अर्चन कर पुरोहित जी नैवेद्य मंगाते हैं । उससे किसको लाभ हुआ ? हलवाई को । सत्यनारायण भगवान् को ताम्बूल निवेदन कर किसकी वृत्ति की व्यवस्था की ? *पान बेचने वाले* की ।
ऋतुफल समर्पित कर किसकी वृत्ति की व्यवस्था की ? फलों वाले की । षोडशोपचार के बाद हवन करते हैं ,हवन के लिये समिधा (आम आदि की लकड़ी) मंगाते हैं ,किसको लाभ होता है उससे ? *लक्कड़हारे* को । सत्यनारायण की कथा में एक भील जातिके लक्कड़हारे का चरित्र सुनाया जाता है ,जो काशी में शतानन्द नामके ब्राह्मण जो कि सत्यनारायणकी कथा कर रहे होते हैं ,के घर अपनी लकड़ी बेचने जाता है -
*वनात्काष्ठानि विक्रेतुं पुरीं काशीं ययु: क्वचित् ।*
*एकस्तृषाकुलो यातो विष्णुदासाश्रमं तदा ।।* (भविष्यपुराण )

सारी लकड़ी बिक जाने पर वह भिल्ल लक्कड़हारा भी भगवान् सत्यनारायण की कथा करवाता है । तो हवन की लकड़ी से किसकी वृत्ति की मार्केटिंग हुई ?

अब बताइये सत्यनारायण भगवान् की छोटी सी पूजा से कितनों की वृत्ति की मार्केटिंग की पुरोहित ने ? क्या पुरोहित इन सबसे कमीशन लेते हैं ? ब्राह्मण पुरोहित बिना शुल्क बिना कमीशन के लिये सबकी वृत्ति की व्यवस्था करते हैं ।

यही नहीं जो ब्राह्मण पुरोहित धनके लालच में कर्मकाण्ड का आश्रय लेते हैं ,उनके अन्न को तो शास्त्र ने अपवित्र घोषित कर ही दिया है साथ में ऐसे पुरोहितों को श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन के भी अयोग्य ठहरा दिया है । चारों वर्णों की वृत्ति की व्यवस्था करने वाले ब्राह्मण पुरोहितका पालन यथासामर्थ्य दान-दक्षिणा देकर करना चाहिये । यज्ञ-पूजापाठके मण्डप स्थल पर गोबरसे लीपकर चौक बनाने और सर्वसमाज को यज्ञ-पूजापाठ में बुलावा देने की वृत्ति *नापित* पुरोहित कराते हैं । तुलादानके द्वारा *चांडाल* की वृत्ति पुरोहित कराता है । बच्चे के जन्मके समय मूल उतारने की वृत्ति ,तेल दान की वृत्ति *भड्डरी* को पुरोहित कराता है । यह सब सङ्केत मात्र हैं ,यह व्यवस्था बहुत विस्तृत है ,जिसका एक लेख में लिख पाना सम्भव ही नहीं ।

वर्णाश्रम व्यवस्था में कोई किसी की वृत्ति का हरण नहीं करता है ,अपितु सभी वर्ण एक दूसरे का भरण-पोषण करते हैं ,जिससे सभी की वृत्ति निर्धारित होती है ,समाज को वृत्ति लाभ होने पर राष्ट्रकी अर्थव्यवस्था सुदृढ होती है । अर्थव्यवस्था सुदृढ होने
पर धर्म की रीढ़ सुदृढ होती है ।

जब किसी राष्ट्र को दासिता की जंजीरों में जकड़ना हो ,तो उसकी रीढ़ अर्थव्यवस्था को मिटा दे ,अर्थव्यवस्था मिटती है उस राष्ट्र की संस्कृति और परम्परा से जिससे समाज का भरण-पोषण सहस्राब्दियों से होता आया हो । अँग्रेजों ने भी यही किया ,भारत पर राज्य करने के लिये भारत की रीढ़ भारतकी अर्थव्यवस्था पर प्रहार किया , अर्थव्यवस्था पर प्रहार करने के लिये संस्कृति को मिटाना आवश्यक था । भारतीय अर्थव्यवस्था और संस्कृति के मूल पुरोहितों को मिटाना आवश्यक था । तो अँग्रेजों ने पुरोहितों के प्रति समाज के मन में घृणा भर दी ,जिससे पुरोहित नष्ट हुए । फिर समाज के अन्य वर्गों की वृत्ति नष्ट की ,जो हस्तशिल्पी-कारीगर थे ,उनको नष्ट करके । हस्तशिल्पियों को उन्हें नष्ट किया आधुनिक मशीनों के द्वारा । पुरोहितों के नष्ट होने से अर्थ व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया ,सबकी वृत्ति की मार्केटिंग बन्द हुई ,फिर सबकी वृत्ति के साधन भी छीन लिये गये । परिणाम स्वरूप भारतमें आर्थिक विपन्नताका संकट उत्पन्न हो गया । आज युवा बेरोजगार क्यों है ? क्योंकि जो वृत्ति सभी वर्गों को हमारी संस्कृति में नैसर्गिक प्राप्त थी ,वह विदेशी षड्यन्तकारियों ने नष्ट करके एक दूसरे वर्ग के प्रति ऐसी घृणा भरी की उसकी भरपाई आज तक नहीं हो पाई है । हस्तशिल्पी-कारीगरों को नष्ट कर बड़े-बड़े यन्त्रों वाले कारखानों को जन्म दिया गया ,जिससे अर्थव्यवस्था पूर्ण रूप से चरमरा गई ,अब भी उन्ही उद्योगों की मार्केटिक बड़े बड़े क्रिकेटरों-अभिनेताओं के द्वारा होती है ,जिसके लिये वे करोड़ो-अरबों कम्पनियों से बसूलते हैं । हस्तशिल्पियों - कारीगरों के द्वारा निर्मित उत्पादनों की यही मार्केटिंग ब्राह्मण पुरोहित बिना शुल्कके करते थे ,तब उन पुरोहितों को अत्याचारी ,लुटेरे पंडे-पुरोहित बनाकर समाजमें उनके प्रति घृणा भर दी गयी । उत्पादन आज भी है ,मार्केटिंग आज भी है ,लेकिन आज अर्थव्यवस्था भी कमजोर है और ज्यादातर समाज वृत्तिविहीन बेरोजगार हैं। सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है आज भी स्वयं को धार्मिक हिन्दू कहने वाले कोई सत्यनारायण की कथा को पाखण्ड के नामपर तो कोई शोषणके नाम पर अर्थ व्यवस्था आधार ,सबकी वृत्तिकी मार्केटिंग करने वाले ब्राह्मण पुरोहितों का दुष्प्रचार करने में लगे हुए हैं । भारतकी रीढ़ अर्थ व्यवस्था पर प्रहार करने वाले ,भारत को विपन्नता की युवाओं को वित्तिविहीनता की भीषण चपेट में लाने वालों में आपका भी योगदान होगा । मिटा दीजिए पंडे-पुरिहितों को ,शतप्रतिशत रोजगारी का प्रकल्प कहाँ से लाएँगे ?
एक तरफ पुरोहित भगवान् की कथाके माध्यम से समाज के आत्मरंजन में लगे थे ,तो वहीं दूसरी तरफ वे सबकी वृत्ति की व्यवस्था करके अर्थ को मजबूत बना रहे थे । आज पुरोहितों को नष्ट करके आत्मरंजन को भूल मनोरंजन के नाम पर सिनेमा जगत् को करोड़ो-अरबों रुपये का व्यापार कराते हैं ,फिर बेरोजगारी नहीं मिटा सकते हैं ,लेकिन गाली पंडे-पुरोहितों को देंगे। आश्चर्य है ।
नारायण
नमामि श्री जगदम्बे
धनेश्वर शुक्ल मुंडेरा शुक्ल

25/03/2025

पापमोचनी एकादशी के व्रत से सारे पापों का क्षय हो जाता है।
पापमोचनी एकादशी की बहुत-बहुत बधाई बहुत-बहुत मंगल कामनाएं 25 मार्च दिन मंगलवार को सब की पापमोचनी एकादशी है।
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा भगवन चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है बताने की कृपा कीजिए।
भगवान श्री कृष्ण बोले राजेंद्र सुनो मैं इस विषय में एक पाप नाशक उपाख्यान सुनाऊंगा। जिसे चक्रवर्ती नरेश मांधाता के पूछने पर महर्षि लोमस ने कहा था।
मांधाता बोले भगवन मैं लोगों के हित की इच्छा से यह सुनना चाहता हूं कि चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? उसकी क्या विधि है, तथा उससे किस फल की प्राप्ति होती है? कृपया यह सब बातें बताइए।
लोमस जी ने कहा नृप श्रेष्ठ पूर्व काल की बात है। अप्सराओं से सेवित चैत्ररथ नामक वन में जहां गंधर्वों की कन्याएं अपने किन्नरों के साथ बाजे बजाते हुए विहार करते हैं। मंजुघोषा नामक अप्सरा मुनिवर मेधावी को मोहित करने के लिए गई। वह महर्षि वन में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करते थे।मंजुघोषा भय के कारण आश्रम से एक कुछ दूर ही ठहर गई, सुंदर ढंग से वीणा बजाती हुई मधुर गीत गाने लगी। मुनिश्रेष्ठ मेधावी घूमते हुए उधर से निकले और उस सुंदरी अप्सरा को इस प्रकार गान करते देखा ,सेना सहित कामदेव से परास्त होकर बरबस मोह के वशीभूत हो गए। उनकी ऐसी अवस्था देख मंजुघोषा उनके समीप आई और वीणा नीचे रखकर उनका आलिंगन करने लगी। मेधावी भी उनके साथ रमण करने लगे काम वश रमण करते हुए उन्हें रात और दिन का भान ही ना रहा। इस प्रकार मुनि जनोचित सदाचार का लोप करके, अप्सरा के साथ भ्रमण करते हुए बहुत दिन व्यतीत हो गए। मंजुघोषा देवलोक में जाने को तैयार हुई जाते समय उसने मुनि श्रेष्ठ मेधावी से कहा हे ब्रह्मन अब मुझे अपने देश जाने की आज्ञा दे दीजिए।
मेधावी बोले देवी जब तक सवेरे की संध्या ना हो जाए तब तक मेरे पास ठहर जाओ।अप्सरा ने कहा अब तक न जाने कितनी संध्या चली गई मुझ पर कृपा कर बीते हुए समय का विचार तो कीजिए।
लोमस जी कहते हैं, राजन अप्सरा की बात सुनकर मेधावी के नेत्र आश्चर्य से चकित हो गए, उस समय उन्होंने बीते हुए समय का हिसाब लगाया तो ज्ञात हुआ उसके साथ रहते 57 वर्ष व्यतीत हो गए। उसे अपनी तपस्या का विनाश करने वाली जानकर मुनि को उस पर बड़ा क्रोध हुआ, उन्होंने श्राप देते हुए कहा पापनी तू पिशाची हो जा। तब वह मुनि के श्राप से दग्ध होकर विनय से नतमस्तक हो बोली विप्रवर मेरे श्राप का उद्धार कीजिए। सात वाक्य बोलने या सात पग साथ साथ चलने मात्र से ही सत्पुरुषों के साथ मैत्री हो जाती है। ब्रह्मन मैं तो आपके साथ अनेक वर्ष व्यतीत किए हैं। अतः स्वामी मुझ पर कृपा कीजिए।
ऐसा सुनकर मुनि ने कहा चैत्र कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है उसका नाम पापमोचनी है। वह सब पापों का क्षय करने वाली है। सुंदरी इसका व्रत करने पर तुम्हारी पिशाचिता दूर होगी। ऐसा कह कर मेधावी अपने पिता मुनिवर च्यवन के आश्रम पर गए।
उन्हें आया देख च्यवन ने पूछा बेटा यह क्या किया? तुमने तो अपने पुण्य का नाश कर डाला। मेधावी बोले पिताजी मैं अप्सरा के साथ रमण करने का पाप किया है। कोई ऐसा प्रायश्चित बताइए जिससे पाप का नाश हो जाए। च्यवन ऋषि ने कहा बेटा चैत्र कृष्ण पक्ष में जो पाप मोचनी एकादशी होती है उसका व्रत करने पर पापराशि का विनाश हो जाएगा। पिता का यह कथन सुनकर मेधावी ने उस व्रत का अनुष्ठान किया। व्रत करने के कारण उनका पाप नष्ट हो गया, और वह पुनः तपस्या से परिपूर्ण हो गए।
इसी प्रकार मंजुघोषा भी व्रत करके या पिशाच योनि से मुक्त हुई और दिव्य रूप धारण कर लिया। श्रेष्ठ अप्सरा होकर स्वर्ग लोक में चली गई हे।
राजन जो श्रेष्ठ मनुष्य पापमोचनी एकादशी का व्रत करते हैं उनका सारा पाप नष्ट हो जाता है। इसको पढ़ने और सुनने से सहस्र गोदान का फल मिलता है। ब्रह्म हत्या, स्वर्ण की चोरी, सुरापान और गुरु पत्नी गमन करने वाले महापातकी भी इस व्रत के करने से पाप मुक्त हो जाते हैं। यह व्रत बहुत ही पुण्यमय है।

नोट:-- पारणा 26 तारीख को 8:2 तक प्रातः करना है।
नमामि श्री जगदम्बे
धनेश्वर शुक्ल

पंक्तिपावन समाज फाउंडेशन के जिलाध्यक्ष देवरिया श्री अंकित मणि त्रिपाठी जी को उनके जन्मदिन पर बहुत बहूत बधाई,जिला संयोजक ...
21/03/2025

पंक्तिपावन समाज फाउंडेशन के जिलाध्यक्ष देवरिया श्री अंकित मणि त्रिपाठी जी को उनके जन्मदिन पर बहुत बहूत बधाई,जिला संयोजक श्री राजन पांडेय जी और जिलाध्यक्ष श्री अंकित मणि त्रिपाठी जी की जोड़ी ने पंक्तिपावन समाज फाउंडेशन देवरिया में सफल नेतृत्व छमता का परिचय देते हुए जिला देवरिया में समस्त पंक्तिपावन गांवों को एकजुट करते हुए समस्त ग्राम प्रभारी की न्युक्ति में निर्णायक भूमिका का भी निर्वहन किया है ,बाबू अंकित मणि जी अपने नेतृत्व छमता से पंक्तिपावन समाज फाउंडेशन को नित्य नई ऊंचाइयों पर पहुंचाए यही ईश्वर से कामना है 🚩🚩🚩🚩🚩🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷👑👑👑👑👑👑👑👑🔱

20/03/2025

अगर यूं कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अन्य समाज के रीति रिवाज परम्पराओं के तुलना में --पंक्तिपावन समाज के रीति रिवाज व परम्पराओं में,--हर जाति को सम भाव और उनके रोल को पिरोया है ,उनके विना अपने शुरुआती दौर के जीवन को अधूरा समझता है -जैसे पंक्तिपावन समाज में --बिटिया के पाणिग्रहण संस्कार के समय कुछ रीत रिवाज व परम्पराए -- 1-धोबिन के द्वारा सुहाग कन्या को देना और पूरे दिन ब्रत भी रहना और बर पक्ष के द्वारा श्रृंगार के सभी आभूषण के साथ साड़ी आदि धोबिन के लिए आना । बारात पहुंचते ही, बारात में -नहछू-का होना और नाऊ पूरे बारातियों को नहछू का विजय कराता है और लगभग सभी बाराती कुछ पैसे रूपये बर वावू के समक्ष देते हैं जो पैसा --उस नाऊ -का होता है,। 3-कलशही का आना -पांच औरतें -कलशा लेकर बारात में गीत गाती हुई आती है और हंसी के साथ बर पक्ष के समधी जी को पैसा और साड़ी दे कर विदाई भी करनी पड़ती है। 4-कहने का मतलब कहाईन , मनिहारिन,नाऊनि , पंडित जी,महरिन आदि सभी जनों को अपनी परम्पराओं से जोड़ा गया है । 5-ग्वालिन द्वारा जमाए हुए कंहतरी की दही , शुभ का द्योतक , दुल्हन की विदाई में दुल्हा हाथ में ल
6--दुल्हन के आने पर,बुना हुआ दौरी या चंगेरी में पैर डालना आदि परम्पराओं में समांज के सभी वर्गों को सम भाव व हार्दिक रूप से भी मजबूत करने की परम्परा इस बदलते युग में भी चली आ रही है। धन्य है हमारी परम्पराए व रीति रिवाज, हमें गर्व है अपने पंक्तिपावनत्व पर । उपरोक्त में कुछ परम्पराओं को वर्णित नहीं किया गया है क्योंकि वह सभी समाज में कामन है जैसे --डाल और मौर आदि। हमें अपने पंक्तिपावनत्व और पंक्तिपावन समाज पर गर्व है ‌🙏 प्रेम नारायण मणि त्रिपाठी सिरजम देवरिया 🙏

Address

गोरखपुर
Gorakhpur

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when पंक्तिपावन समाज फाउंडेशन posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share

Category