21/08/2026
*हिस्सा 03*
*मीलादे मुस्तफ़ा: ﷺ*
*मीलाद और क़ुरआन*
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*_हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की विलादते पाक की खुशी मनाना जायज़ वोह दुरुस्त है आइये क़ुरआन की रौशनी में एक वाकिया पढ़ें और आप खुद फैसला करें_*
*_हजरत ईसा अलैहिस्सलाम के मानने वालों ने आप से सवाल किया कि क्या आप का रब आसमानों से पका पकाया खानों से भरा हुआ दस्तरखान भेजने पर कादिर है? ह़ज़रते ईसा अलैहिस्सलाम ने फरमाया अगर ईमान वाले हो तो अल्लाह से डरो मतलब यह कि ईमानदार होकर अल्लाह तआला की कुदरत का इंकार ना करो, ईसा अलैहिस्सलाम ने कहा हाँ मेरा अल्लाह ऐसा कर सकता है और फिर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने दुआ की, जिसका ज़िक्र क़ुरआन इस अन्दाज़ में कर रहा है अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है कि_*
*_क़ुरआन: तर्जुमा कंज़ुल ईमान:---- ईसा बिन मरियम ने अर्ज़ की ऐ मेरे अल्लाह आसमानों से हमारे लिए पके पकाए खानों से भरा हुआ दस्तरख्वान नाज़िल फरमा दे, ताकि हमारे लिए हम से पहेलों के लिए और बाद में आने वालों के लिए ईद हो जाए_*
*📕📚पारा 7, सूरह माइदा, आयत 114*
*_अल्लाह तआला ने ह़ज़रते ईसा अलैहिस्सलाम की दुआ क़ुबूल करते हुए बेहतरीन खानों से भरा हुआ दस्तरखान उतार दिया और इस तरह हजरते ईसा अलैहिस्सलाम के मानने वालों की ईद हो गई, कुरान पाक की इस आयत से यह हकीकत पूरी तरह से वाज़ेह हो जाती है कि जिस दिन अल्लाह करीम की तरफ़ से कोई निअमत अता हो, इमान वालों के लिए वह ईद का दिन बन जाता है, और फिर ईद के दिन हर तरह की खुशी, हर तरह का जश्न ,हर किस्म की चहल-पहल मनाने के साथ-साथ साफ-सुथरे कपड़े पहनने, खुशबू लगानी, गुसल करना, दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलना, मिठाई तक्सीम करना, और हर एक को मुबारकबाद देना, हर लिहाज़ से जायज और दुरुस्त है_*
*_इसी तरह 12 रबी उल अव्वल शरीफ़ के मुबारक दिन में अल्लाह तआला की तरफ से सबसे बड़ी निअमत हम मुसलमानों को सय्यिदुल अम्बिया हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नूरानी सूरत में सारी नस्ले इंसानी की हिदायत के लिए अहले ईमान को अता हुई, इसलिए बरेलवी ह़ज़रात इस निअमते उज़मा की खुशी में जश्ने ईद मिलादुन्नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि सल्लम मनाते हैं, मिठाई तक्सीम करते हैं ,बाजार सजाते हैं, खूबसूरत मेहराबें बनाते हैं, झन्डियां लगाते और लहराते हैं, एक-दूसरे को मुबारकबाद पेश करते हैं , नात ख़्वानी का लुत्फ़ उठाते हैं, और हुज़ूर की बारगाह में दुरुदो सलाम के फूल निछावर करते हैं, और फिर लुत्फ़ की बात तो यह कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की विलादते पाक के वक्त यह सब कुछ हुआ, झंडे खुदा के हुक्म पर जिब्राईल ने लहराए, दुरुदो सलाम फरिश्तों ने पढ़ा ,मुबारकबाद जानवरों ने दी, ऐलान नबियों ने किया, मुनादी जिब्रील ने सुनाई, और गवाही शजरो ह़जर ने दी,_*
*_आप खुद सोंचें कि जिस दिन आसमान से ख़्वान नाज़िल हुआ वो दिन इतवार का था और आज भी ईसाई इतवार के दिन खुशी यानि छुट्टी मनाते हैं सोचिए कि हजरते ईसा अलैहिस्सलाम ख़्वान के नाज़िल होने पर तो ईद का हुक्म दे रहे हैं तो क्या माज़अल्लाह हमारे नबी की विलादते पाक, एक खाने से भरे हुए तश्त से भी कम है, कि हम सुन्नी मुसलमान उस पर खुशी नहीं मना सकते, बेशक हमारे और आप सबके नबी दुनिया की सारी निअमतों से बढ़कर हैं, येह मैं अपनी तरफ़ से नहीं बल्कि खुद अल्लाह तआला क़ुरआन मजीद में इरशाद फरमा रहा है पढ़िए और फैसला करिये_*
*_क़ुरआन: तर्जुमा कंज़ुल ईमान:---- बेशक अल्लाह का बड़ा एहसान हुआ मुसलमानों पर कि उनमें उनहीं में से एक रसूल भेजा जो उन पर उसकी आयतें पढ़ते हैं और उन्हें पाक करते हैं और उन्हें किताब और हिक़मत सिखाते हैं_*
*📕📚पारा 4, सूरह आले इमरान, आयत 164*
*_अल्लाह तआला ने हम इंसानों को कितनी बड़ी बड़ी निअमतें अता फरमाई मसलन हम को आँख दिया, कान, नाक, मुंह, ज़बान, दिल, जिगर, हाथ, पैर, फिर सांसें, कहते हैं कि किसी मेडिकल रिसर्चर का बयान है कि एक इंसान के जितने भी आज़ा (अंग) हैं वैसे तो उनकी कोई कीमत ही नहीं सब अनमोल हैं लेकिन फिर भी मेडिकल सांइस एक इंसान को तक़रीबन 300 करोड़ रुपये की मिल्क समझती है, सुब्हानअल्लाह, हर इंसान 300, करोड़ रुपये का है फिर उस पर जो रब ने निअमतें दी जैसे ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए कितने ही साज़ो सामान दिया, फिर माँ, बाप, भाई, बहन, दोस्त, अहबाब, तमाम रिश्ते दार, उस्ताद, इतनी निअमतें अल्लाह ने दी है कि कोई शुमार ही नहीं कर सकता, मगर क़सम अल्लाह की पूरा क़ुरआन उठा कर देख लीजिए किसी भी निअमत पर अल्लाह ने अहसान नहीं जताया, अल्हमदू की अलिफ़ से वन्नास की सीन देख लें कहीं नहीं मिलेगा, मगर जब अपने महबूब सरवरे काएनात हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को जब बन्दों के दरमियान भेजा तब फरमाया मैंने अहसान किया मुसलमानों पर कि उन्में उन्हीं में से एक रसूल भेजा, ज़रा सोचिए कि हुज़ूर की विलादते पाक कितनी बड़ी निअमत है, अब आप फैसला करें कि हजरते ईसा अलैहिस्सलाम के मानने वालों के लिए आसमान से ख़्वान आने पर तो ईद मनाई गई तो फिर मुस्तफ़ा जाने रहमत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के आने पर ईद मनाना शिर्क कैसे हो गया? जबकि अल्लाह ने तो खुद अपनी दी हुई निअमतों का चर्चा करने का हुक्म दे रहा है_*
*_क़ुरआन: तर्जुमा कंज़ुल ईमान:---- और अपने रब की निअमत का खूब चर्चा करो,_*
*📕📚पारा 30, सूरह वद्दोहा, आयत 11*
*_मैं तमाम बद अक़ीदों वहाबियों से पूछता हूँ कि क्या हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से बढ़कर भी कोई निअमत हो सकती है,? नहीं- नहीं - नहीं- हरगिज़ नहीं, तो हम सुन्नी बरेलवी जब रब की दी हुई अज़ीम निअमत का चर्चा करते हैं तो फिर हम ग़लत कैसे हो गये? सच तो येह है कि जो उसकी दी हुई निअमतों का चर्चा नहीं करते वोह एहसान फरामोश गद्दार हैं_*
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